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संविधान में राजनीतिक दल का जिक्र नहीं है : बंधुत्व एकता की सीढ़ी है
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संविधान में राजनीतिक दल का जिक्र नहीं है : बंधुत्व एकता की सीढ़ी है

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पिछले अंक में आपने 26 जनवरी, 1950 को भारत के प्रजातांत्रिक देश बन जाने के बारे में पढ़ा. इस समापन किस्त में आपसी भाईचारे, बंधुत्व एवं एकता की चर्चा है, जो किसी भी देश और समाज के विकास के लिए परम आवश्यक है.

अगर अमेरिका के लोगों में एक राष्ट्र की भावना नहीं आएगी, तो अंदाजा लगाइए कि एक राष्ट्र वाली इस एकता को भारत के लिए समझना कितना कठिन होगा. मुझे वे दिन अच्छी तरह याद हैं, जब राजनीति की समझ रखने वाले उन भारतीयों ने, जिन्हें हम भारत के लोग कहते हैं, इन बिंदुओं पर अपनी नाराज़गी जाहिर की थी. मेरी राय में हमें एक राष्ट्र के सिद्धांत में विश्‍वास करना चाहिए, लेकिन हम भ्रम पाल बैठे हैं. 

प्रजातंत्र के लिए दूसरी बात यह ज़रूरी है कि इसमें भाईचारे का सिद्धांत पूरी तरह से स्वीकार किया जाए. अगर भारत के लोग स्वयं को एक मानते हैं, तो भाईचारे का मतलब होता है कि सभी भारतीयों में बंधुत्व की भावना का विकास हो. हालांकि यह इतना आसान नहीं है. यह कितना मुश्किल है, क्या इसके बारे में हमने कभी सोचा है? क्या कभी जेम्स ब्राइस का लेख पढ़कर किसी ने इस पर सोचा? जेम्स ब्राइस ने अमेरिकन कॉमनवेल्थ पत्रिका में संयुक्त राज्य अमेरिका पर लिखे गए अपने लेख में इस बारे में बताया है. उस कहानी को मैं फिर से यहां बता रहा हूं…

कुछ वर्षों पहले अमेरिकी प्रोटेस्टेंट चर्च ने अपनी 300वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित एक सम्मेलन में चर्च में होने वाली पूजा का तरीका ही बदल दिया. दरअसल, लोगों के मन में यह चाह थी कि प्रार्थना के वाक्य छोटे हों और उनमें राष्ट्र के प्रति एकता का भाव हो. इसे देखते हुए इंग्लैंड ने बहुत ही सुंदर शब्दों का प्रस्ताव रखा. वे थे, ओ लॉर्ड, ब्लेस आवर नेशन. इसके स्वीकार होने के बाद दूसरे दिन फिर यह वाक्य विचार के लिए लाया गया, जहां ढेर सारी प्रतिक्रियाएं सुनने को मिलीं. लोगों ने इस वाक्य में राष्ट्र को लेकर और अधिक संगठित दिखने की मांग की. अत: यह वाक्य बदल दिया गया. अब नया वाक्य था, ओ लॉर्ड, ब्लेस दीज यूनाइटेड स्टेट्स.

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उस समय अमेरिका में थोड़ी-बहुत एकता ही देखने को मिलती थी, क्योंकि उन दिनों अमेरिकी खुद को एक राष्ट्र के रूप में नहीं समझते थे. अगर अमेरिका के लोगों में एक राष्ट्र की भावना नहीं आएगी, तो अंदाजा लगाइए कि एक राष्ट्र वाली इस एकता को भारत के लिए समझना कितना कठिन होगा. मुझे वे दिन अच्छी तरह याद हैं, जब राजनीति की समझ रखने वाले उन भारतीयों ने, जिन्हें हम भारत के लोग कहते हैं, इन बिंदुओं पर अपनी नाराज़गी जाहिर की थी. मेरी राय में हमें एक राष्ट्र के सिद्धांत में विश्‍वास करना चाहिए, लेकिन हम भ्रम पाल बैठे हैं. आख़िर कैसे लोग एक देश में विभिन्न जातियों में बंटकर रहते हैं और इसके बावजूद वे उसे राष्ट्र कहते हैं. हाल में मैंने इस चीज को महसूस किया कि अगर सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक आधार पर देखा जाए, तो अभी तक हम लोग एक राष्ट्र नहीं हैं.

हम कैसे एक राष्ट्र बनें, इस बारे में सोचने के साथ ही गंभीरता से एक राष्ट्र बनने के तरीकों पर विचार करना बहुत ज़रूरी है, तभी हम इस लक्ष्य का मतलब समझ पाएंगे. हालांकि यह लक्ष्य प्राप्त करना बहुत ही कठिन है. खास तौर पर अमेरिका की तुलना में बहुत ही कठिन है. अमेरिका में जातिवाद नहीं है, जबकि भारत में जातिवाद की समस्या विकराल है. जातिवाद राष्ट्रवाद के लिए बाधक है. इससे सामाजिक जीवन में पृथकतावाद हावी हो जाता है, जो कि राष्ट्रवाद के ख़िलाफ़ है. जातिवाद की राजनीति से जलन और एक-दूसरे से अलगाव की भावना पैदा होती है. अगर हमारे अंदर सचमुच एक राष्ट्र बनने की चाहत है, तो यह भी तय मानिए कि एक दिन हम अपनी सारी समस्याओं पर विजय पा लेंगे. भाईचारे की भावना की बात करें, तो इस सत्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि राष्ट्र के बिना इसकी संकल्पना नहीं की जा सकती. भाईचारे या बंधुत्व की भावना के बगैर समानता और स्वतंत्रता की जड़ें गहरी हो ही नहीं सकतीं.

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इन बातों से मैं सरोकार रखता हूं, हालांकि कुछ लोगों का इससे कोई लेना-देना नहीं है. इस बात को कोई चुनौती नहीं दे सकता कि हमारे देश में कुछ राजनीतिक ताकतों का काफी लंबे समय से आधिपत्य रहा है और कुछ लोग स़िर्फ बोझ ढो रहे हैं. बड़े या कुछ लोगों का यह एकाधिकार उन लोगों के साथ अच्छा होने से नहीं रोक सकता, जो स़िर्फ बोझ ढोने के लिए अभिशप्त हैं. यह निचला तबका सरकार के इन रवैयों से थक चुका है. वह खुद का शासन चाहता है. इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस मत पर इन पद-दलित लोगों के बीच किसी तरह का वर्ग संघर्ष नहीं होगा. यह किसी घर के बंटवारे के समान होगा, जिसका अंत किसी दिन एक बड़ी तबाही के रूप में होगा. अब्राहम लिंकन ने ठीक ही कहा है कि अपना घर बहुत दिनों तक बंटवारे के साथ नहीं चल सकता. इसलिए जल्द ही ऐसे लोगों के लिए एक ऐसी जगह की ज़रूरत होगी, जहां वे अपनी महत्वाकांक्षाओं को महसूस कर सकें, कुछ लोगों के साथ अच्छा हो सके, देश के लिए अच्छा किया जा सके, इस देश की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए ध्यान दिया जा सके और इसके प्रजातांत्रिक ढांचे के साथ अच्छा किया जा सके. जीवन के किसी भी रूप में यह सब स़िर्फ समानता और भाईचारे या बंधुत्व की स्थापना द्वारा ही संभव है. इन बातों पर मैं जोर देना चाहूंगा, क्योंकि बिना इसके कुछ भी संभव नहीं है.

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मैं यह कभी नहीं चाहूंगा कि हमें ऐसा घर मिले, जो थका हुआ और सुस्त हो. इसमें कोई संदेह नहीं कि स्वतंत्रता से खुशी मिलती है, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि हमें जो स्वतंत्रता मिली है, उसमें ज़िम्मेदारी भी दी गई है. स्वतंत्रता के बाद अगर कुछ गलत हो रहा है, तो हम उसके लिए अंग्रेजों को गलत नहीं ठहरा सकते हैं. आज अगर कुछ भी गलत हो रहा है, तो उसके लिए स़िर्फ हम दोषी हैं. अगर कुछ गलत हो रहा है, तो यह हमारे लिए ही ख़तरनाक है. समय बदल रहा है. लोगों में नई-नई विचारधाराएं पनप रही हैं. सरकार के रवैये के कारण वे थके हुए महसूस कर रहे हैं. वे इसके लिए तैयार हैं कि सरकार लोगों के लिए है और यह उन स्थानों से भिन्न है, जहां लोगों की सरकार है और लोगों द्वारा सरकार है, अर्थात् जहां सरकार में लोगों की भागीदारी है. अगर हम संविधान को संरक्षित रखना चाहते हैं, तो हमें उन सिद्धांतों को स्थापित करना होगा, जिनमें लोगों की सरकार, लोगों के लिए सरकार और लोगों द्वारा सरकार को मान्यता दी गई है.

हमें उन सिद्धांतों की स्थापना के लिए ध्यान देना चाहिए, न कि इसके प्रति उदासीन रवैया अपनाना चाहिए. लोगों की सरकार, लोगों के लिए सरकार और लोगों द्वारा सरकार की यह भावना लेकर चलने से ही हम एक सही मार्ग का निर्माण कर सकते हैं, जो सभी के लिए अच्छा होगा. यह एकमात्र रास्ता है देश सेवा का. मेरी नज़र में इससे बढ़िया रास्ता कोई और हो ही नहीं सकता.

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