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संविधान में राजनीतिक दल का ज़िक्र नहीं है : कब और कैसे बना हमारा संविधान
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संविधान में राजनीतिक दल का ज़िक्र नहीं है : कब और कैसे बना हमारा संविधान

इस अंक से हम डॉ. बी आर अंबेडकर द्वारा 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा में दिए गए आख़िरी भाषण के अंश प्रकाशित कर रहे हैं. अपने इस ऐतिहासिक भाषण में बाबा साहब ने न स़िर्फ भारतीय संविधान के बारे में बताया है, बल्कि भविष्य की चुनौतियों पर भी गहराई से प्रकाश डाला है. बाबा साहब के इस भाषण का एक-एक शब्द आज के समय में प्रासंगिक है.

PARLIAMENT-1

महाशय , 9 दिसंबर, 1946 की पहली बैठक के बाद हम लोगों को संविधान सभा पर काम करते हुए 2 वर्ष, 11 माह और 17 दिन हो जाएंगे. इस अवधि के दौरान संविधान सभा के कुल 11 सत्र बुलाए गए. 11 में से पहले 6 सत्र मूल अधिकार, संघ के संविधान, संघ की शक्ति, प्रांतीय संविधान, अल्पसंख्यक, अनुसूचित क्षेत्रों एवं अनुसूचित जनजाति जैसे मुद्दों पर समिति की रिपोर्ट पर विचार करने और उद्देश्यों को पारित कराने में बीत गए. 7, 8, 9, 10 और 11वें सत्र में प्रारूप संविधान पर विचार करने पर विशेष ध्यान दिया गया था. संविधान सभा के इन 11 सत्रों में कुल 165 दिनों का समय लगा. इसके अतिरिक्त संविधान के प्रारूप पर विचार करने में सभा को 114 दिनों का समय लगा.

प्रारूप समिति 29 अगस्त, 1947 को संविधान सभा द्वारा चुनी गई थी. प्रारूप समिति की पहली बैठक 30 अगस्त को हुई. 30 अगस्त से अगले 141 दिनों तक यह समिति प्रारूप संविधान बनाने में व्यस्त रही. संवैधानिक सलाहकार द्वारा बनाया गया प्रारूप संविधान प्रारूप समिति के लिए एक ऐसा विषय था, जिस पर प्रारूप समिति को काम करना था. इसमें 243 अनुच्छेद और 13 अनुसूचियां थीं. प्रारूप समिति द्वारा संविधान सभा के लिए बनाए गए पहले प्रारूप संविधान में 315 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियां थीं. अंत में प्रारूप संविधान में अनुच्छेदों की संख्या बढ़ाकर 386 कर दी गई, लेकिन जब प्रारूप संविधान पूर्ण रूप से बनकर तैयार हुआ, तो इसमें 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियां थीं. प्रारूप संविधान जब सामने लाया गया, तो इसमें लगभग 7,635 संशोधन हुए थे, लेकिन वास्तव में इन संशोधनों में से 2,473 को ही लिया गया था.

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मैं इन तथ्यों को इसलिए बता रहा हूं, क्योंकि इसके बारे में कहा जा रहा था कि सभा ने इस कार्य को करने में न केवल बहुत अधिक समय लिया, बल्कि जनता का धन भी खर्च किया. मैं अन्य देशों की संविधान सभाओं के कुछ उदाहरण दे रहा हूं, जिनका उस देश के संविधान निर्माण के लिए गठन किया गया था. संविधान निर्माण के लिए अमेरिकी सभा की 25 मई, 1787 की बैठक के बाद चार महीने लगे और उसने अपना काम 17 सितंबर, 1787 को पूरा किया. कनाडा की संविधान सभा की बैठक 10 अक्टूबर, 1867 को हुई और संविधान क़ानून के रूप में सामने आया मार्च, 1867 में. इसमें कुल 2 साल और पांच महीने लगे. ऑस्ट्रेलिया की संविधान सभा का गठन मार्च, 1891 में हुआ और संविधान क़ानून के रूप में सामने आया 9 जुलाई, 1900 को. इसमें नौ साल लग गए. दक्षिण अफ्रीकी संविधान सभा का गठन 20 सितंबर, 1908 को हुआ और संविधान क़ानून के रूप में सामने आया 20 सितंबर, 1909 को. इसमें एक साल लगा. यह सत्य है कि हमने अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका की संविधान सभा की तुलना में अधिक समय लिया, लेकिन इस सत्य से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि संविधान के निर्माण में हमने कनाडा और ऑस्ट्रेलिया की संविधान सभाओं से काफी कम समय लिया. संविधान निर्माण में समय की खपत की बात हो रही है, तो इसमें दो बातें बहुत ही महत्वपूर्ण हैं. पहली यह कि अमेरिका, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका एवं ऑस्ट्रेलिया के संविधान हमारे संविधान से काफी छोटे हैं और दूसरी यह कि हमारे संविधान में 395 अनुच्छेद हैं, जबकि अमेरिका के संविधान में मात्र 7 अनुच्छेद हैं. अमेरिका के संविधान के पहले 4 अनुच्छेद विभिन्न भागों में विभाजित हैं, जिससे उनकी संख्या बढ़कर 21 हो जाती है. कनाडा के संविधान में 147, ऑस्ट्रेलिया के संविधान में 128 और दक्षिण अफ्रीका के संविधान में 153 भाग हैं. एक और बात, जो इस मामले में ध्यान देने वाली है, वह यह कि अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया एवं दक्षिण अफ्रीका के संविधानों में संशोधनों की समस्या नहीं है. उन्हें उसी रूप में पारित कर दिया गया है. दूसरी तरफ़ देखा जाए, तो हमारी संविधान सभा को 2,473 संशोधनों पर काम करना पड़ा. इन सारे तथ्यों को देखने के बाद संविधान सभा पर लगने वाले सारे आरोप निराधार हैं. संविधान सभा के लोगों को कम से कम समय में यह जटिल कार्य पूरा करने के लिए बधाई देनी चाहिए.

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प्रारूप समिति द्वारा किए गए काम की गुणवत्ता को बदलने के लिए श्री नजीरुद्दीन अहमद ने इसकी निंदा करना अपना कर्तव्य समझा. उनकी राय में प्रारूप समिति का कार्य निंदा योग्य भी नहीं है. प्रत्येक व्यक्ति को प्रारूप समिति द्वारा किए गए कार्यों पर अपनी राय देने का अधिकार है. ऐसे में श्री नजीरुद्दीन की राय का भी स्वागत है. श्री नजीरुद्दीन का मानना है कि वह प्रारूप समिति के किसी भी सदस्य से ज़्यादा योग्य हैं. अगर संविधान सभा उनको इसके योग्य मानकर उनको नियुक्त करती है, तो प्रारूप समिति श्री नजीरुद्दीन का स्वागत करना चाहेगी. अगर श्री नजीरुद्दीन का संविधान निर्माण में कोई योगदान नहीं था, तो इसमें निश्‍चित तौर पर प्रारूप समिति का कोई दोष नहीं है. हालांकि श्री नजीरुद्दीन ने कभी भी प्रारूप समिति की प्रशंसा नहीं की, लेकिन मैंने हमेशा उनकी बातों को प्रशंसा के रूप में लिया.

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