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बड़े संपादकों के छोटे सवाल
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बड़े संपादकों के छोटे सवाल

किसी भी प्रजातंत्र में मीडिया का काम एक प्रहरी का होता है. वह सरकार का नहीं, जनता का पहरेदार होता है. मीडिया की ज़िम्मेदारी है कि सरकार जो करती है और जो नहीं करती है, वह उसे जनता के सामने लाए. जब कभी सत्तारूढ़ दल, विपक्षी पार्टियां, अधिकारी और पुलिस अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वाह नहीं करते हैं, तब मीडिया उन्हें उनके कर्तव्यों का एहसास कराता है. अ़फसोस इस बात का है कि सरकार की तरह देश का मीडिया भी क्राइसिस में है, वह दिशाहीनता का शिकार हो गया है.

किसी ने प्रधानमंत्री से यह पूछने की हिम्मत नहीं की कि आखिर सरकार किसके साथ है? देश के ग़रीबों और शोषितों के साथ है या फिर सरकार उनके साथ है, जो दुनिया के खरबपतियों की लिस्ट में अपना नाम दर्ज करना चाहते हैं? यह किसी ने नहीं पूछा कि सरकार अल्पसंख्यकों के लिए क्या कर रही है? यह किसी ने नहीं पूछा कि देश के नौजवान बंदूक़ क्यों उठा रहे हैं? यह भी किसी ने नहीं पूछा कि सोना उगलने वाले भारत के किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं?

बीती 16 फरवरी को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक स्पेशल प्रेस कांफ्रेंस बुलाई. स्पेशल इसलिए, क्योंकि इसमें स़िर्फ टेलीविजन चैनलों के चुनिंदा संपादकों को बुलाया गया था. इसमें वे सब चेहरे मौजूद थे, जिन्हें आप हर रोज़ टीवी पर देखते हैं. इस प्रेस कांफ्रेंस को देखकर मुझे हैरानी भी हुई, अ़फसोस भी हुआ. पत्रकारिता के सतहीपन पर हैरानी हुई कि इतने बड़े-बड़े पत्रकार बिना पढ़े, बिना किसी रिसर्च के, बिना तैयारी प्रधानमंत्री की प्रेस कांफ्रेंस में कैसे जा सकते हैं! अगर ये लोग पूरी तैयारी के साथ गए थे तो यह और भी अ़फसोस की बात है. टेलीविजन पत्रकारों ने जनता से जुड़े मुद्दों पर प्रधानमंत्री को घेरने की कोशिश नहीं की. देश के बड़े-बड़े टेलीविजन चैनलों के बड़े-बड़े संपादक पत्रकारिता की पहली परीक्षा में ही फेल हो गए. इतनी लंबी प्रेस कांफ्रेंस हुई, संपादकों को पूरा व़क्त दिया गया. इन सबने सवाल भी पूछे. अ़फसोस इस बात का है कि महान संपादकों का यह समूह प्रधानमंत्री से एक भी खबर निकाल नहीं सका. प्रधानमंत्री ने इस प्रेस कांफ्रेंस में कुछ भी नया नहीं कहा, कोई नया खुलासा नहीं किया.

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अगर अविश्वास ही करना चाहें तो हम कह सकते हैं कि यह प्रेस कांफ्रेंस प्रधानमंत्री की छवि को चमकाने का एक सरकारी प्रयास था, जिसमें देश के इन बड़े-बड़े संपादकों ने पूरा साथ दिया. हालांकि इस आरोप पर मेरा कोई भरोसा नहीं है. इस प्रेस कांफ्रेंस में संपादकों ने जनता से जुड़े मुद्दों और उसकी समस्याओं को नहीं उठाया. इसके लिए प्रधानमंत्री ज़िम्मेदार नहीं हैं, बल्कि इसके लिए महान संपादक और उनके द्वारा पूछे गए सवाल ज़िम्मेदार हैं. प्रधानमंत्री से इन लोगों ने श्रीलंका में भारतीय मछुआरों को परेशान किए जाने पर सवाल पूछा. 2-जी स्पैक्ट्रम घोटाले पर सवाल पूछा. एक संपादक ने देवास के साथ हुए समझौते के बारे में पूछा. किसी ने मंत्रिमंडल में फेरबदल के बारे में पूछा तो किसी ने मंत्रियों के विशेषाधिकार कोटे के बारे में सवाल पूछा.

लेकिन, किसी ने प्रधानमंत्री से यह पूछने की हिम्मत नहीं की कि आखिर सरकार किसके साथ है? देश के ग़रीबों और शोषितों के साथ है या फिर सरकार उनके साथ है, जो दुनिया के खरबपतियों की लिस्ट में अपना नाम दर्ज करना चाहते हैं? यह किसी ने नहीं पूछा कि सरकार अल्पसंख्यकों के लिए क्या कर रही है? यह किसी ने नहीं पूछा कि देश के नौजवान बंदूक़ क्यों उठा रहे हैं? यह भी किसी ने नहीं पूछा कि सोना उगलने वाले भारत के किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं? किसी ने यह नहीं पूछा कि 1991 में प्रधानमंत्री ने बड़े-बड़े वादे करके देश की आर्थिक नीति बदल दी, उन वादों का क्या हुआ? 2006 में प्रधानमंत्री ने एक बयान देकर खूब वाहवाही लूटी थी. उन्होंने कहा था कि देश के संसाधनों पर वंचितों और अल्पसंख्यकों का पहला हक़ है. उस वादे का क्या हुआ? सवाल यह है कि क्या इस प्रेस कांफ्रेंस में मौजूद महान संपादकों को प्रधानमंत्री का वह बयान याद भी था या नहीं?

मनमोहन सिंह ने प्रेस कांफ्रेंस की शुरुआत में ही कहा कि पिछले महीनों में महंगाई बढ़ी है. उन्होंने कहा कि अगर सरकार चाहती तो हार्ड मोनेटरी पालिसी लगाकर महंगाई पर क़ाबू किया जा सकता था, लेकिन हम चाहते थे कि इससे निपटने में विकास दर पर असर न पड़े. भारत अंतरराष्ट्रीय मंदी से अच्छी तरह से उबरा है. देश की अर्थव्यवस्था अच्छी है और विकास दर 8.5 फ़ीसदी है. मतलब यह कि सरकार महंगाई पर लगाम लगा सकती है, लेकिन विकास दर के आंकड़े को बरक़रार रखने के लिए जनता को महंगाई से जूझने के लिए छोड़ दिया गया. ताज्जुब इस बात का है कि इन संपादकों में से किसी ने यह नहीं पूछा कि इस महंगाई से सरकार को फायदा हुआ या फिर जमाखोरों और बाज़ार के माफिया को. अगर इस महंगाई से ग़रीब किसानों और छोटे दुकानदारों को फायदा हुआ होता तो भी कोई बात होती. असलियत यह है कि इस महंगाई का फायदा उन बड़े-बड़े व्यापारियों एवं उद्योगपतियों को हुआ, जिन्होंने सस्ते दामों में सामान खरीद कर अपने गोदामों को भर लिया और महंगाई बढ़ा दी. खूब मुना़फा कमाया. प्रधानमंत्री जी को इस अचानक आई महंगाई पर एक जांच बैठानी चाहिए, ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके.

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प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत की ऐसी छवि होती जा रही है कि यहां भ्रष्टाचार वाली सरकार है. मनमोहन सिंह ने सबसे पहले 2-जी स्पैक्ट्रम, राष्ट्रमंडल खेल, देवास एवं आदर्श सोसाइटी आदि मामलों का ज़िक्र किया और कहा कि मीडिया में इन सब मामलों पर ख़बरें छाई हुई हैं. भारतीय लोकतंत्र के प्रति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफ़ी सम्मान है. जब कभी भी मैं बाहर जाता हूं, लोग भारतीय लोकतंत्र और यहां मानवाधिकार के प्रति हमारे रुख़ की सराहना करते हैं. उन्होंने मीडिया से अपील की कि वह ज़्यादा नकारात्मक ख़बरों को जगह न दे, ताकि देश की ग़लत छवि बाहर न जाए. जिस देश में किसान आत्महत्या करें, ग़रीबों का शोषण हो, किसानों की जमीन छीन ली जाए, बेकारी हो, पीने का पानी न हो, अस्पताल न हों, अशिक्षा हो, अल्पसंख्यक बेसहारा हों, सरकारी महकमों में भ्रष्टाचार हो और घोटाले पर घोटाले हों, उस देश की सरकार को छवि की चिंता से ज्यादा इन समस्याओं का समाधान निकालने की ज़रूरत है.

इस प्रेस कांफ्रेंस में कुछ संपादकों ने अजीबोग़रीब सवाल पूछे. देश के सबसे बड़े टेलीविजन नेटवर्क के संपादक का भोलापन देखिए. उन्होंने प्रधानमंत्री से पूछा कि आपने यह प्रेस कांफ्रेंस क्यों बुलाई. सबसे मज़ेदार सवाल चौबीस घंटे चलने वाले टीवी चैनल की मालकिन ने पूछा. उन्होंने मनमोहन सिंह से क्रिकेट वर्ल्ड कप के बारे में पूछा कि सारा देश चाहता है कि भारत जीते, आपकी क्या राय है. प्रधानमंत्री ने भी कहा कि क्या किसी देश का प्रधानमंत्री यह कहता है कि मेरा देश क्रिकेट वर्ल्ड कप नहीं जीते, बल्कि पड़ोसी देश जीते. मैं भी चाहता हूं कि भारत जीते. बात यहीं खत्म नहीं हुई. उनका अगला सवाल यह था कि आपका फेवरेट प्लेयर कौन है. प्रधानमंत्री भी उलझन में पड़ गए. प्रधानमंत्री ने नाम नहीं बताया. इसके बाद देश के सबसे सीरियस चैनल के एडिटर की बारी आई. उन्होंने पूछ डाला कि आपका साढ़े तीन साल का कार्यकाल बचा है, क्या आप अगले चुनाव के बाद प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे.

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प्रधानमंत्री की प्रेस कांफ्रेंस से कई संकेत मिलते हैं. पहला यह कि सरकार जनता के प्रति अपने दायित्व को कम करना चाहती है. सरकार की नीतियां स़िर्फ इस बात पर केंद्रित हैं कि कैसे देश में अच्छा कॉरपोरेट माहौल बने, ताकि विदेशी कंपनियां यहां आकर मुना़फा कमा सकें. ग़रीबों के लिए जो योजनाएं हैं, वे स़िर्फ चुनाव जीतने के हथकंडे जैसी हैं. उन योजनाओं की पूर्ण सफलता पर सरकार का ध्यान नहीं है. सरकार का ध्यान स़िर्फ इस बात पर है कि कैसे ज्यादा से ज्यादा विदेशी पूंजी भारत में आए. खतरे की बात यह है कि सरकार यह संकेत दे रही है कि आने वाले दिनों में कड़े सुधारवादी क़दम उठाए जाएंगे. सुधारवादी नीतियों का असर भारत भुगत रहा है. ग़रीब और ग़रीब होते जा रहे हैं. भारत के छोटे शहर और गांव पिछड़ रहे हैं. देश का नौजवान विमुख होता जा रहा है. प्रधानमंत्री को लगता है कि जिस तरह मिस्र के लोगों ने सरकार के खिला़फ बग़ावत की, वैसी स्थिति भारत में पैदा नहीं हो सकती. सरकार को इस बात की चिंता नहीं है. मिस्र में जो कुछ हुआ, वैसा भारत में नहीं हो सकता. सरकार तो निश्चिंत है, लेकिन देश की जनता और मीडिया को सुधारवादी नीतियों और नव उदारवाद के नए हमले से निपटने के लिए तैयार रहना होगा.

2 comments

  • आदरणीय सर जी,
    सरकार जिस कार्पोरेट लाबी के विकास को अपने देश का विकास ठहराकर थोपने की कोशिश कर रही हे..उसी कोर्पोरेट के गर्भ से देश में मीडिया का एक हिस्सा बाहर आया हे..औए एक पुरानी कहावत हे की ” घुटना हमेशा पेट की तरफ ही झूकता हे “…पीएम की सभा में जाने वालों से वेसे भी देश को कोइ उम्मीद नहीं हे…क्योंकि इन बेचारों के पास खोने के लिए बहुत कुछ हे…डरपोक लोग जनता की आवाज नहीं उठा सकते | चुथी दुनिया जिंदाबाद |
    प्रदीप शर्मा, मंदसौर, मध्य प्रदेश
    २३.अप्रेल,२०१२

  • महोदय सम्पादक जी,आप बिलकुल सही कहते हैं और मुझे भी यही लगता है कि हमारे टी.वी.मीडिया के संपादकों के पास शायद ग़रीबों,किसानों,अल्पसंख्यकों,और देश के नौजवानों के उत्थान व विकास के बारे में कोई प्रश्न नहीं रह गया है या फिर दूसरी बात यह हो सकती है कि वह इस बारे में पूछना ही नहीं चाहते क्योंकि ऐसे निर्धन और ग़रीब लोगों से इस मीडिया को क्या सरोकार है?उनकी दूकान तो कार्पोरेट के बाबुओं से चलती ही है या फिर उन राज नेताओं से जिसका वह गुणगान करते हैं.मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ माना जाता है और उस पर जनता का आश्वासन भी है लेकिन अधिकतर होता यह है कि टी. वी .पत्रकारिता की तुलना में लोग प्रिंट मीडिया पर ज्यादा भरोसा करते है.टी.वी पत्रकारिता के अधिकतर चैनल ऊपरी साज-सज्जा,ग्लैमर तथा इसी प्रकार की अन्य चीज़ों के साथ अच्छी साम्यग्री परोसते हैं.इसी प्रकार ख़बरों से अधिक वह विज्ञापनों पर भरोसा करते हैं.मुझे तो लगता है कि टी वी पत्रकारिता के सम्पादक काफी अच्छे व्यापारिक हैं जो अच्छा व्यापार करना जानते हैं.और इस बात का प्रमाड उन्होंने प्रधान जी की प्रेस कांफ्रेंस में बचकाना सवाल करके दिए हैं कि वे मीडिया की दुनिया में अभी बच्चे हैं लेकिन व्यापारिक बहुत अच्छे हैं.पर इतने से बात ख़त्म नहीं होती,ग़रीब जनता जिस मीडिया पर अपना भरोसा जताती है तो मीडिया को भी उस भरोसे पर खरा उतरना होगा.उसकी तकलीफों को समझना होगा,सरकार से उनकी समस्याओं का हल पूछना होगा.अगर मीडिया जम्हूरियत का चौथा पिलर है तो इसे अपनी ज़िम्मेदारी को हर हाल में निभाना ही होगा.

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