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बंगाल ने बढ़ाई चुनाव आयोग की चिंता

बंगाल की लड़ाई के मैदान में आजकल मेडिकल टीमों के दौरे तो ख़ूब हो रहे हैं, पर युद्ध विराम का कोई संकेत नहीं मिल रहा है. हत्याओं के बाद परिजनों के आंसू पोछने के लिए सत्तारूढ़ एवं विपक्षी दलों के नुमाइंदे तांता लगाए हुए हैं तो संवैधानिक प्रमुख राज्यपाल यह जान रहे हैं कि हालात कैसे हैं? उधर चुनावी चिंता में दुबले हो रहे चुनाव आयोग की टीमें भी गांवों की धूल फांक रही हैं. रेकी हो रही है. पता लग रहा है कि थानों में सैकड़ों वारंटों की तामील अब तक नहीं हुई है और आरोपी सालों से फरार चल रहे हैं. चुनाव आयोग को अब समझ में आ गया है कि बंगाल में चुनाव कराना कितना मुश्किल है? गोलियों के घावों पर मुआवजे का कड़वा मरहम लग रहा है. ममता बनर्जी का कहना है कि अगर वह चुनकर आईं तो बंगाल की जनता को बिल्कुल चंगा कर देंगी, पर अमन के रास्ते पर चलने की अपीलें गोलियों की गर्जना के बीच गुम हो रही हैं. माकपा-तृणमूल के बीच लड़ाई ख़त्म होती है तो माओवादी दस्तक देते हैं और बताते हैं कि उन्हें हाशिए पर गया न समझा जाए. यही बताने के लिए बीती 23 जनवरी को माओवादियों ने सानबनी में 3 माकपा नेताओं का ख़ून कर दिया. इसके पहले 7 जनवरी को लालगढ़ के पास निताई गांव में माकपा कॉडरों के हाथों 9 लोग मारे गए थे. हालात ऐसे हैं कि कोलकाता हाईकोर्ट को निताई गांव में मेडिकल टीम भेजने का आदेश देना पड़ा, क्योंकि वहां घायलों का इलाज करने से भी रोका जा रहा है, ताकि मृतक संख्या और बढ़े, जिससे विरोधियों को करारा सबक मिले.

शोषणविहीन समाज के माकपाई सपने के उलट यहां सत्ताधारियों द्वारा विरोधियों का शोषण होता रहा. हत्या, आतंक, सामाजिक बहिष्कार और अन्य तरीक़े हथियार बनाए गए. अब इन्हीं हथियारों को तृणमूलियों ने अपना लिया है और टकराव इतना घनघोर रूप ले चुका है. बंगाल में चल रही हिंसा की राजनीति में पक्ष और विपक्ष कमोबेश दोनों का हाथ है और दोनों पक्ष अगर संयम नहीं बरतेंगे तो अमन के माहौल में विधानसभा चुनाव कराना नामुमकिन हो जाएगा.

तनाव के इस माहौल में भी मनोरंजक दांव-पेंच दिख रहे हैं. बीती 19 जनवरी को बिहार के मुख्य चुनाव अधिकारी सुधीर कुमार राकेश और नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के जकी अहमद की अगुवाई में चुनाव आयोग के पर्यवेक्षक पूर्व मिदनापुर के सुनिया गांव में हालात की रेकी करने गए थे. खेजुरी का दौरा करके जैसे ही टीम गांव में घुसने को हुई, पास के नामालडीहा गांव में गोलियां चलने लगीं. डीएम और एसपी के चेहरे लाल हो गए, पर इन लोगों ने टीम को यह कहकर बहलाया कि लोग पटाखे फोड़ रहे हैं. आयोग की टीम उस ओर जाने लगी तो आगे का रास्ता कई जगह से काटा हुआ मिला. काफिला दूसरी ओर बढ़ा तो उसका सामना नारे लगा रहे माकपा कॉडरों से हुआ, जो कोंटाई के एएसपी हृषिकेश मीणा का विरोध कर रहे थे. इस तरह इलाक़ा-दर-इलाक़ा पुलिस अफसरों पर भेदभाव का आरोप लग रहा है और आरोप माकपा और तृणमूल दोनों लगा रहे हैं. हाल में ममता बनर्जी ने चुनावों में जीत मिलने पर एक एसपी को सबक सिखाने की बात कही थी. पिछले साल सितंबर में खेजुरी को तृणमूल कांग्रेस के क़ब्ज़े से छ़ुडाने के लिए यहीं से माकपा कॉडरों की ङ्गौज गई थी. इस इलाक़े में महीनों से निषेधाज्ञा लगी है, पर पुलिस को रास्ता काटे जाने का पता ही नहीं था. साफ हो गया कि पुलिस इस इलाक़े में गश्त लगाने की ज़रूरत नहीं समझती. इस प्रसंग को एक सूचना ने और रोचक बना दिया. बाद में पता चला कि गाड़ियों और लोगों का हुजूम देखकर सुनिया गांव के माकपा कॉडरों ने सोचा कि तृणमूल की ओर से हमले की तैयारी हो रही है और इसी की प्रतिक्रिया में गोलियां चलाई गईं, ताकि दुश्मन को डराया और अपने कॉडरों को सतर्क किया जा सके. हैरत है कि पुलिस हर्मादवाहिनी एवं उसके अवैध हथियारों का सुराग भले ही न लगा पा रही हो, पर गोली दागने की आवाज़ उसे तुरंत पटाखे जैसी लगती है. प्रतीकात्मक अर्थ में यह सही भी है, क्योंकि बंगाल में आजकल बम और बंदूकें पटाखा समान हैं और चुनाव में इनका उपयोग भी दीवाली के पटाखों की तरह ही होना है.

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ठीक दो दिन पहले मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने दिल्ली में गृहमंत्री पी चिदंबरम को भरोसा दिलाया था कि सभी हथियारबंद गुटों के ख़िला़फ कार्रवाई की जाएगी, पर चुनाव आयोग की टीम को अपने पांच दिन के दौरे में जो अनुभव हुआ, उससे माथे पर पसीना आना ही था. कभी माकपा का गढ़ रहे हुगली के आरामबाग में भी कुछ ऐसा ही नज़ारा था, जहां चुनाव आयोग के पर्यवेक्षक पी एस रंतीश और डी के पांडेय से महिलाएं लिपट कर रोईं और उन्हें माकपा कॉडरों के अत्याचार के बारे में बताया. लोगों की तादाद इतनी ज़्यादा थी और उनमें इतना गुस्सा था कि स्थानीय माकपा सांसद और विधायक को पुलिस के घेरे में बाहर निकाला गया. इससे उलट हालात खेजुरी एवं पास के इलाक़ों में दिखे, जहां तृणमूल का क़ब्ज़ा है. क़दमदह में जब घर से भागे कुछ माकपा कॉडरों ने आयोग की टीम से बात करने की कोशिश की तो भीड़ में से किसी ने चुप रहने को कहा. इस पर रंतीश ने एसपी अशोक कुमार से पूछा कि हमारे रहते हुए कोई किसी को बोलने से कैसे रोक सकता है? माकपा कॉडर परिमल माइती की पत्नी प्रतिभा माइती को तृणमूल वालों ने पहले से धमका दिया था. चुनाव आयोग की टीम ने जब उनके घर छोड़कर भागने का कारण पूछा तो उन्होंने इसकी वजह बीमारी बताया. टीम के काफी ढांढस बंधाने पर प्रतिभा ने माना कि पिछले लोकसभा चुनाव के बाद से ही उसका परिवार तृणमूल कार्यकर्ताओं के जुल्म से तंग आकर खेजुरी से बाहर रह रहा है.

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इसी दौरान राज्यपाल एम के नारायणन ने भी हिंसा प्रभावित निताई गांव का दौरा किया, जहां हर्मादवाहिनी ने नौ लोगों को मौत के घाट उतार दिया था. वहां तारुलता सेन नामक एक विधवा ने कहा, सुना है कि मुझे मुआवजे के रूप में 2 लाख रुपये देने की बात कही गई है. अगर बाद में मेरे इकलौते बेटे को मार दिया जाता है और इतना मुआवज़ा फिर मिलता है तो मैं उसका क्या करूंगी. तारुलता ने एक तरह से राज्य में लगातार जारी हिंसा से उपजी भयावह हताशा की एक झलक दिखाई है. हालांकि उसके जैसी सैकड़ों विधवाएं ऐसी हैं, जिनके पति राजनीति की बलि चढ़ चुके हैं और उन्हें कोई मुआवज़ा नहीं मिला है. तारुलता ने राज्यपाल से एक और सवाल किया कि आपके चले जाने के बाद हमारी रक्षा कौन करेगा. एसपी मनोज वर्मा की ओर इशारा करते हुए उसने पूछा कि यह उस दिन कहां थे, जब माकपा कॉडर घायलों को अस्पताल ले जा रही एंबुलेंस को रोक रहे थे और पुलिस ख़बर देने के चार घंटे बाद निताईग्राम पहुंची. निताईग्राम चुनाव आयोग की टीम भी गई और उसे केंद्रीय बलों की तैनाती को लेकर एक अलग राय देखने को मिली. तृणमूल की मुखिया भले ही जंगल महल से बलों को हटाने की मांग करती रही हों, पर सालबनी के तृणमूल के प्रखंड स्तर के नेताओं ने इलाक़े में स्थानीय पुलिस हटाकर सीआरपीएफ तैनात रखने की गुहार की. इसके पहले 9 जनवरी को मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी ने भी कोलकाता दौरे में लगातार जारी राजनीतिक हिंसा को चिंता का विषय बताया था और कहा था कि इस पर अविलंब रोक लगाना राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी है.

संवैधानिक प्रमुखों के दौरों से इतना तो अंदाज़ लग गया है कि हालात कितने भयावह हैं. सूचना मिली है कि चुनाव आयोग विधानसभा चुनावों से पहले राज्य में सभी अवैध हथियारों को ज़ब्त करने का आदेश दे सकता है. आयोग बिहार मॉडल लागू करने के अलावा बंगाल में कुछ अतिरिक्त इंतज़ाम करने की योजना पर भी अमल करने वाला है, जिनमें वोटरों को मतदान के पर्चे देने का काम राजनीतिक दलों से ले लेना और चुनाव आयोग की ओर से उन्हें बंटवाना, दागी लोगों एवं अपराधियों की पहचान करके चुनाव से पहले ही उनकी गिरफ़्तारी करना, अवैध हथियारों के ख़िला़फ व्यापक अभियान और ज़ब्ती, राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों के चुनाव ख़र्च पर नियंत्रण और निगरानी के लिए अलग बैंक एकाउंट खोलने की व्यवस्था आदि शामिल है. पहले तीन उपायों पर तो चुनाव आयोग दृढ़ता के साथ क़दम उठाने को तैयार है, लेकिन बैंक खातों के लिए वह विचार-विमर्श कर रहा है. पिछले चुनाव में यहां केंद्रीय बलों की क़रीब 600 कंपनियां थीं. इस बार 50 फीसदी वृद्धि तय है. यह भी तय है कि आधुनिक तकनीक का प्रयोग होगा और संवेदनशील क्षेत्रों में हवाई निगरानी की व्यवस्था होगी.

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मई में होने वाले चुनावों के लिए किसी न किसी बहाने प्रचार भी जारी है. माकपा सिंगूर से नैनो कारखाने के गुजरात जाने से लेकर महंगाई और भ्रष्टाचार के आरोपों के तीर चला रही है तो तृणमूल एवं कांग्रेस ने वाममोर्चा के 34 सालों की दमन नीति के ख़िला़फ जनादेश मांगा है. चुनाव आयोग इस बार बिहार मॉडल लागू करने की सोच रहा है, पर स़िर्फ इतने से काम नहीं चलने वाला, बल्कि उसे कुछ अभूतपूर्व क़दम उठाने होंगे. जहां तक बिहार मॉडल लागू करने की बात है तो पिछले दो-तीन चुनावों से वहां के राजनीतिक समाज में संयम, क़ानून का डर या उसके प्रति सम्मान दिखा है. इसमें चुनाव आयोग की चुस्ती से ज़्यादा अपराधियों के ख़िला़फ नीतीश सरकार की कार्रवाई और बदले माहौल का अहम हाथ रहा. लालू-राबड़ी के जमाने में भी आयोग कड़े क़दम उठाता रहा, पर चुनावी हिंसा और बूथ दखल रोकने में कामयाबी नहीं मिलती थी, पर बंगाल के हालात काफी अलग हैं. यहां वोटरों में दलीय आधार पर विभाजन इतना साफ और कट्टर है कि बड़ी से बड़ी संवैधानिक मशीनरी के फेल होने का ख़तरा पैदा हो गया है. इसका एक जाना-पहचाना कारण यहां स्थानीय निकाय चुनावों का दलीय आधार पर होना है और इसका रास्ता 34 सालों से काबिज वाममोर्चा ने ही दिखाया है. जो दल सत्ता में है, उसके कॉडरों को ही ठेका, राशनिंग व्यवस्था, नौकरी, सब्सिडी आदि के रूप में सत्ता की मलाई का ज़्यादा हिस्सा मिलता रहा है. इसीलिए राजनीतिक ध्रुवीकरण और गहरा होता गया. अन्यथा देश में कहीं ऐसा उदाहरण नहीं मिलता कि एक राजनीतिक विचारधारा के लोग प्रतिद्वंद्वी दल के डर से महीनों तक गांव छोड़कर वहां रहें, जहां उनके दल का दबदबा है. शोषणविहीन समाज के माकपाई सपने के उलट यहां सत्ताधारियों द्वारा विरोधियों का शोषण होता रहा. हत्या, आतंक, सामाजिक बहिष्कार और अन्य तरीक़े हथियार बनाए गए. अब इन्हीं हथियारों को तृणमूलियों ने अपना लिया है और टकराव इतना घनघोर रूप ले चुका है. बंगाल में चल रही हिंसा की राजनीति में पक्ष और विपक्ष कमोबेश दोनों का हाथ है और दोनों पक्ष अगर संयम नहीं बरतेंगे तो अमन के माहौल में विधानसभा चुनाव कराना नामुमकिन हो जाएगा.

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