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दाने-दाने के मोहताज हैं ढलवा मूर्ति के शिल्पकार

दाने-दाने के मोहताज हैं ढलवा मूर्ति के शिल्पकार

हिस्से की ज़मीन तलाशते, मोहताज ये शिल्पी
ज़िंदगी यूं हुई बसर तन्हा, फिलहाल साथ और स़फर तन्हा…

गुलज़ार के गीत की इन पंक्तियां आज चरितार्थ कर रहे हैं ललितपुर जनपद के जखौरा ब्लॉक के शिल्पी. पीतल के अनगढ़ टुकड़ों को अपने हुनर से मंदिर में भगवान के रूप में प्रतिष्ठा दिलाने वाले ये शिल्पी आज भूमंडलीकरण के कारण दाने-दाने को मोहताज हैं. सरकारी लालफीताशाही के चलते उनकी इस ढलवा मूर्ति शिल्पकला का लाभ दलाल खुलेआम लूट रहे हैं.

जखौरा की पीतल शिल्पकृतियों की महीन कलात्मकता और पारंपरिक विशिष्टता ने ललितपुर के इन अनजान से कस्बे को ढलवा मूर्तिशिल्प जगत में नई पहचान दिलाई है. बुंदेलखंड के खजुराहो, ओरछा, चंदेरी, देवगढ़ तथा झांसी आने वाले विदेशी सैलानी आए दिन ढलवा, पीतल की मूर्तियां व अन्य सामग्री खरीदते हैं. लेकिन मूर्ति निर्माण से जुड़े जखौरा और ललितपुर के दर्जनों शिल्पी कड़ी मेहनत के बावजूद अपने परिवार का भरण-पोषण नहीं कर पा रहे हैं.

ललितपुर जनपद गुप्तकाल से ही मूर्ति गढ़ने के लिए प्रसिद्ध रहा है. पहले सैंडस्टोन, ग्रेनाइट और गोरा पत्थर की मूर्ति गढ़ी जाती थी. इसलिए यहां के एक स्थान का नाम देवगढ़ पड़ा. पिछले सौ वर्षों से यहां पीतल व अष्टधातु की मूर्ति बनाने की ढलवा कला फल-फूल रही थी. ललितपुर और जखौरा के शिल्पी अपनी अनूठी कला दक्षता के लिए उत्तर प्रदेश सरकार के विभिन्न पुरुस्कारों से सम्मानित भी हो चुके हैं. मूर्ति शिल्पी वृंदावन लाल सोनी बताते हैं कि ढलवा धातु शिल्प की कला अत्यंत धैर्य और कौशल के बिना अंजाम तक नहीं पहुंचती है. सबसे पहले हम मिट्‌टी पर आकृति गढ़ते हैं तथा विभिन्न प्रकार की बारीक़ ऩक्क़ाशी करके मिट्‌टी की मूर्ति को सूखने के लिए रख दिया जाता है. जब मूर्ति सूख जाती है, तो उस पर कच्चे मोम का लेप चढ़ा देते हैं. लेप सूख जाने के बाद उस पर मिट्‌टी चढ़ा कर सांचा तैयार करते हैं, फिर उसे पीतल डालने के लिए पूरी तरह बंद करके सांचे को सूखने के लिए रख देते हैं. इसके बाद धरिया में पीतल के टुकड़ों को डालकर गर्म किया जाता है. जब धातु पानी की तरह तरल हो जाता है, तब उसे सांचे में डाला जाता है. गर्मी के कारण मोम जल जाता है और ख़ाली स्थान पर पीतल अपना आकार ले लेता है.
शिल्पी रमेश बताते हैं कि ढलाई के समय अत्यधिक सावधानी बरतनी पड़ती है. यदि पीतल बीच में रुक गया या ठंडा हो गया तो सारी मेहनत बेकार चली जाती है. मूर्ति की ढलाई पूर्ण हो जाने के बाद सांचा ठंडा करके तोड़ते हैं. मूर्ति की सफाई, छिलाई और पालिश करके बाज़ार में बेचने के लिए भेजा जाता है.
यहां के मूर्तिकारों की कला मात्र धार्मिक मूर्तियों के निर्माण तक ही सीमित नहीं है. वे आधुनिक सोच और बाज़ार की मांग के अनुसार भी अपनी कला में परिवर्तन के प्रति संवेदनशील हैं. बुंदेलखंड की प्राचीन परंपरा को ध्यान में रखकर आधुनिक प्रयोग करने वाले शिल्पकारों द्वारा निर्मित शिल्प में रथ आरूढ़ श्रीकृष्ण, मूषक रथ पर गणपति, नृत्य करते गणेश, उमा महेश्वर, नृवराह, विष्णु-लक्ष्मी, राम-जानकी के अलावा चार घोड़ों के रथ पर सवार कृष्ण-अर्जुन आदि प्रमुख हैं. कलात्मकता से परिपूर्ण शीशदान, पानदान, श्रृंगारदान, इत्रदान, फूलदान, विभिन्न प्रकार के ऐश-ट्रे आदि महत्वपूर्ण हैं. कड़ी मेहनत और हुनर की बदौलत दो व़क्त की रोटी के लिए सृजनरत शिल्पकारों को जब कुरेदते हैं, तो उनका दर्द शब्दों के माध्यम से फूट पड़ता है. वे बताते हैं कि मुरादाबाद के पीतल शिल्प से तुलना किए जाने के कारण उनके श्रम का सही मूल्य नहीं मिलता है. मशीनों द्वारा निर्मित पीतल की सामग्री कभी कला का स्थान नहीं ले सकती है. हम प्रत्येक मूर्ति को गढ़ने के लिए हर बार नया सृजन करते हैं. पीतल की क़ीमत में निरंतर आने वाले उछाल के साथ लकड़ी तथा कोयले की बढ़ती क़ीमत से हमारा मुना़फा घट रहा है. एक मूर्ति के निर्माण में चार से पांच दिन का समय लगता है. लगातार भट्‌टी के पास खड़े रहने के कारण अनेक जानलेवा रोग के शिकार होना शिल्पकारों की मजबूरी है. धातुकला की पारंगत विधि में दक्षता के लिए पुरस्कृत शिल्पकार राम बाबू स्वर्णकार कहते हैं कि हम सरकार से भीख नहीं मांग रहे हैं. हमें स़िर्फ कच्चा माल ख़रीदने के लिए कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध हो जाए, तो हमारी शिल्प कला विदेशी मुद्रा कमाने का अच्छा स्रोत बन सकती है. आज हम साहूकारों के क़र्ज़ के कारण सस्ते मूल्य पर उन्हें ही अपनी मूर्ति बेचने को मजबूर हैं. साहूकार हमारी कलाकृतियों को दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े महानगरों के शो-रूमों में ऊंची क़ीमत पर बेचते हैं. बिचौलियों की गिरफ़्त में ढलाई मूर्ति कला के शिल्पकारों को अपना हक़ नहीं मिल पा रहा है. इसके कारण अनेक शिल्पी परिवार अपनी पुस्तैनी व्यवसाय व हुनर से नाता तोड़ने को मजबूर हो गए हैं. राजशाही में पल्लवित और पोषित होने वाली धातु शिल्प कला लोकशाही के पांच दशक बाद भी अपनी संरक्षण का ठौर न पाने कारण दम तोड़ती नज़र आ रही है. समय रहते इस कला के संरक्षण के लिए पहल नहीं की गई तो ढलवा मूर्ति शिल्प स़िर्फ किताबों में रह जाएगी. अपने हिस्से की ज़मीन तलाशते शिल्पकार नामचीन कलाकार की तरह अपनी कलाकृतियों के प्रदर्शन के लिए ऐसा मंच चाहते हैं, जहां कला के पारखी पहुंच सकें और उन्हें दो जून की रोटी के साथ कलाकार के रूप में पहचान मिल सके.

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