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हथियार तस्करी में बच्चों का इस्तेमाल

हथियार तस्करी में बच्चों का इस्तेमाल

यह जानकर आपके माथे पर निश्चित तौर बल पड़ जाएंगे कि जिस उम्र में बच्चों को सलीके से चलना और बोलना नहीं आता, उस उम्र के बच्चों से बड़े पैमाने पर हथियारों की तस्करी कराई जा रही है. तस्करों ने बच्चों को बाकादा इस धंधे में सुरक्षित मोहरा बना लिया है. वे बच्चों को पेट भरने लायक पैसा देकर खुद मालामाल हो रहे हैं. उन मासूमों को यह भी पता नहीं होता कि वे जो कर रहे हैं, उसका अंजाम क्‍या होगा. लेकिन उन्हें इतना ज़रूर पता है कि इस काम के बदले में मिलने वाले पैसों से उन्हें और उनके घरवालों को भरपेट भोजन मिल सकता है. हालांकि कम जोखिम पर अधिक मुनाफा कमाने की चाहत में इस धंधे में अनपढ़ महिलाएं भी शामिल होती जा रही हैं. इसलिए लोगों के मुंह से यह बरबस निकलने लगा है कि पेट के खातिर शबनम बनने लगी है शोला. बेरोकटोक चल रहे इस धंधे का खौफनाक सच तब सामने आया, जब खगड़िया ज़िले के महेशखूंट स्टेशन से एक दस वर्षी बच्ची को तीन देसी कट्टों और जिंदा कारतूसों के साथ धर दबोचा गया.

पेट की आग शांत करने की गरज अक्सर सही-ग़लत के फैसले पर भारी पड़ जाती है. उस व़क्त नज़र सिर्फ पेट भरने के मक़सद पर ही टिकी रहती है. और, इसी दौरान कभी-कभी कुछ ऐसा भी हो जाता है, जो दुनिया और क़ानून की नज़रों में अपराध है. खगड़िया में यही हो रहा है. यहां हथियारों की तस्करी करने वाले राष्ट्र विरोधी तत्व मासूम बच्चों को अपनी ढाल बना रहे हैं. यानी एक तरह से दोहरा अपराध, लेकिन शासन-प्रशासन खामोश है. आ़खिर क्‍यों?

पुलिस के हत्थे चढ़ी शबनम उर्फ चांद ने बताया कि उसकी ग़रीबी देखकर एक फरिश्ते को दया आ गई. उसके घर में रोज चूल्हा नहीं जल पाता था. जलता भी था तो किसी तरह स़िर्फ शाम को. उस शाम किसी तरह पेट भर जाता था, लेकिन दूसरी शाम भोजन के लिए सोचना पड़ता था. इस स्थिति से उबरने के लिए उसने हथियारों का थैला गंतव्य तक पहुंचाने का काम शुरू कर दिया. इसकी एवज में उसे बंधी-बंधाई रक़म मिलने लगी और घर की बदहाली दूर होने लगी. उसे यह भी पता नहीं होता था कि जिस थैले को वह बताए गए स्थान तक पहुंचाती है, उसमें रखा सामान आ़खिर है क्‍या. उसने कभी थैले को खोलकर देखा ही नहीं. उसे तो बस इस बात से मतलब रहा कि वह जितनी बार थैले को पहुंचाएगी, प्रति खेप दो सौ रुपये उसे मि‍लेंगे. वह इस धंधे के मुख्‍य सरगना के बारे तो नहीं बता पाई, लेकिन उसने इतना ज़रूर बताया कि वह पिछले दस माह से यह काम कर रही है. एक बार भी पकड़ी नहीं गई. शबनम अकेली बच्ची नहीं है, जिसने ऐसे  खतरनाक काम से अपना नाता जोड़ रखा था. ऐसी कई बालिकाएं और बालक हैं, जिनके लिए इस धंधे में बने रहना अब मजबूरी बन गई है. जानकार बताते हैं कि बिहार के मुंगेर ज़िले में निर्मित विभिन्न तरह के हथियार देश के कोने-कोने में बेचे जाते हैं. पुलिस की सतर्क नज़रों से बचने के लिए तस्करों ने छोटे-छोटे बच्चों को इस धंधे में झोंक दिया. पुलिस बच्चों पर शक नहीं करती. शबनम उर्फ  चांद की पचपन वर्षीय मां असीमा खातून ने बताया कि वह अपने दामाद के माध्यम से उक्त हथियार उत्तर प्रदेश में खपाती है. इसकी एवज में उसे अच्छी-खासी कमाई हो जाती है. असीमा ने भी मुख्‍य सरगना का नाम बताने से इंकार कर दिया. इस काम में अपनी बच्ची की संलिप्तता पर उसने बेबाकी के साथ कहा कि शबनम उर्फ चांद पर पुलिस को शक नहीं होता था. इसलिए उसी के हाथों हथियार भेजे जाने लगे. मुंगेर की एक अवैध मिनीगन फैक्ट्री के कारीगर ने बताया कि यहां निर्मित विभिन्न हथियारों की गुणवत्ता इतनी अच्छी होती है कि विदेशी हथियार बताकर उन्हें मोटी क़ीमत पर बेच दिया जाता है. खरीदार को इस तरह के हथियार मेड इन अमेरिका, मेड इन जापान सहित अन्य जगहों की मर्जी मुहर लगाकर बेचे जाते हैं. हथियार इस तरह बनाए जाते हैं कि शक होने का सवाल ही पैदा नहीं होता. कारीगर के मुताबिक़ मुंगेर ज़िले के विभिन्न इलाक़ों में अवैध तरीक़े से हथियार बनाने का काम कुटीर उद्योग का रूप ले चुका है. कई बार मुंबई या अन्य शहरों में हथियार बरामदगी के बाद मुंगेर का नाम जब सामने आया, तब कुछ दिनों के लिए धंधे पर विराम लग गया. बाद में फिर धीरे-धीरे यह धंधा परवान चढ़ने लगा. इस धंधे में मुंगेर, खगड़िया एवं बेगूसराय के लगभग दस हज़ार लोग जुड़े हुए हैं. बच्चों के प्रति समाज और पुलिस की नरमी के कारण व्यापक पैमाने पर उन्हें इस धंधे से जोड़ा जाने  लगा है.

लोगों के मुंह से यह बरबस निकलने लगा है कि पेट के खातिर शबनम बनने लगी है शोला. बेरोकटोक चल रहे इस तरह के धंधे का खौफनाक सच तब सामने आया जब खगड़िया ज़िले के महेशखूंट स्टेशन से एक दस वर्षी बच्ची को तीन देसी कट्‌टे तथा जिंदा कारतूस के साथ दबोचा गया. पुलिस के हत्थे चढ़ी शबनम उर्फ  चांद ने बताया कि ग़रीबी को देखकर एक फरिश्ते को दया आ गई.

महेशखूंट के रेल थानाध्यक्ष पी के दास ने भी माना कि ग़रीब और लाचार बच्चों द्वारा अवैध हथियारों को बाज़ार में खपाए जाने का मामला कई बार सामने आया, लेकिन प्रयासों के बाद भी इस तरह के बच्चे हथियारों के साथ गिरफ्त में नहीं आए. समाजसेवी नागेंद्र सिंह त्यागी का कहना है कि संगठित गिरोहों द्वारा बच्चों को अपराध के दलदल में ढकेला जा रहा है. ग़रीबी और विवशता के कारण बच्चे इस धंधे से नाता जोड़ बैठे हैं. कहने को तो बच्चों के भविष्य निर्माण के नाम पर सरकार द्वारा तरह-तरह की योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन अफसरों और भ्रष्ट जन प्रतिनिधियों के कारण उक्त योजनाएं पूरी तरह ज़मीन पर उतर नहीं पाती हैं. इस धंधे में बच्चों की संलिप्तता तभी रोकी जा सकती है, जब हर हाथ को का’ और भरपेट भोजन नसीब हो सके. बच्चों द्वारा हथियार तस्करी का मामला बहुत गंभीर है. अगर समय रहते सरकार, प्रशासन एवं समाज के ज़िम्मेदार लोग सचेत न हुए तो आने वाले समय में उनके सामने पछताने के अलावा और कोई चारा शेष नहीं रहेगा.

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