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सांसद-विधायक निधि में फंसा विकास
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सांसद-विधायक निधि में फंसा विकास

बिहार में विधायक निधि खत्म कर नीतीश कुमार एक बार फिर चर्चा में हैं. उत्तर प्रदेश में भाकपा को छोड़कर अन्य किसी दल ने इसका समर्थन नहीं किया. बात जहां करोड़ों रुपए की आती है तो सारे दल एक साथ दिखाई देते हैं. इन दलों के सांसद विधायक इस बात का जवाब देने से भागते हैं कि वह जनप्रतिनिधियों को मिलने वाली सरकारी निधि का कितना उपभोग करते हैं. इस निधि से किसे लाभान्वित किया जाता है. उत्तर प्रदेश में जन प्रतिनिधियों को मिलने वाली निधियां अपनों की तिजोरी भरने का साधनमात्र बनकर रह गई हैं. अधिकांश जनप्रतिनिधि तो इस निधि के धन को पूरी तरह से खर्च तक नहीं कर पाते हैं. उदाहरण के  तौर पर मैनपुरी जनपद को देखते हैं, जहां से समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव सांसद हैं. मुलायम सिंह बड़े नेता हैं लेकिन सांसद निधि खर्च करने के  मामले में वह भी कंजूस ही दिखाई देते हैं. विधायकों का भी कमोवेश यही हाल है.

किशनी की सपा विधायक संध्या कठेरिया ने अपनी पूरी निधि का ज़्यादातर हिस्सा शिक्षा और विद्युत पर खर्च किया है. विधायक ने ग्राम जिजई में विद्युतीकरण पर 5.306 लाख रुपए तथा शिक्षा के  मद में 95 लाख रुपए दिए हैं. इसे देखकर लगता है कि मानों विधायक के  क्षेत्र में पानी, सड़क जैसी मूलभूत आवश्यकताएं पूरी हो गई हैं. हालांकि ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और है. क्षेत्र में विभिन्न छोटी-छोटी योजनाएं जो विधायक निधि से पूरी हो सकती है, उनकी ओर विधायक का ध्यान नहीं है. क्षेत्र में ज़्यादातर गांवों के  लिए संपर्क मार्ग नहीं है.

मैनपुरी जनपद से एक सांसद, पांच विधायक और एक एमएलसी हैं. जनता के  यह सात नुमाइंदे सरकारी धन को साल भर में खर्च नहीं कर सके हैं. इस बात का पता इनकी निधियों के  उपभोग का खाता देखने से चलता है. जनता के इन सात नुमांइदों को मिलने वाली निधि का योग इतना है कि इस रक़म से जनपद के  किसी भी एक कोने का कायाकल्प हो सकता है. लेकिन ऐसा हो नहीं पाता है और यह असंभव भी है. यहां पर हमें एक जुमला याद आता है, जो समाज में वर्षों से चला आ रहा है कि अंधा बांटे रेवड़ी अपने-अपने को देय निधि का किस तरह से दुरुपयोग किया गया है, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जनप्रतिनिधियों ने अपने क्षेत्र से बाहर काम करा दिया है. साहब विधायक जी है. काम क्षेत्र से बाहर भी करा सकते हैं. अपने क्षेत्र में सारा विकास हो ही चुका है.

मैनपुरी जनपद से एक सांसद, पांच विधायक और एक एमएलसी हैं. जनता के  यह सात नुमाइंदे सरकारी धन को साल भर में खर्च नहीं कर सके हैं. इस बात का पता इनकी निधियों के  उपभोग का खाता देखने से चलता है. जनता के इन सात नुमांइदों को मिलने वाली निधि का योग इतना है कि इस रक़म से जनपद के किसी भी एक कोने का कायाकल्प हो सकता है. मैनपुर से मुलायम सिंह यादव सांसद हैं. वहीं अशोक सिंह चौहान सदर विधानसभा सीट से विधायक हैं. 

मैनपुर से मुलायम सिंह यादव सांसद हैं. वहीं अशोक सिंह चौहान सदर विधानसभा सीट से विधायक हैं. आलोक शाक्य भोगांव से विधायक हैं. संध्या कठेरिया किशनी से विधायक हैं. सोवरन सिंह यादव करहल से विधायक हैं जबकि घिरोर से ठाकुर जयवीर सिंह विधायक हैं जो बसपा सरकार में स्वतंत्र प्रभार वाले मंत्री भी हैं. एक एमएलसी चंद्रप्रताप सिंह यादव हैं. इन जनप्रतिनिधियों के बावजूद जनपद में लोग जीवन की बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं. प्रदेश में कोई भी सरकार आए, उसने विकास की कहानी अपने हिसाब से गढ़ी. हक़ीक़त यही है कि किसी भी सरकार ने विकास को सही मायने में धरातल पर नहीं आने दिया. आज़ादी के बाद जो विकास होना चाहिए था, वह अभी तक नहीं हो पाया है. जनता सरकार बनाती तो है लेकिन बाद में खुद जनता का सरकार से कोई सरोकार नहीं रह जाता है. लोकतंत्र में जनता का हक़ सरकार बनाने तक ही है. इसके बाद सरकार जनता के लिए क्या करती है, यह सरकार पर निर्भर करता है. अभी तक जितनी भी सरकारें आईं, वह जनता का वाजिब हक़ नहीं दे सकी हैं.

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जनपद के  विकास के लिए जनप्रतिनिधियों को मिलने वाली सरकारी निधि जिन मदों में खर्च हो रही है, वह तर्कसंगत नहीं है. निधियों से होने वाले विकास के  कार्य मानक के अनुरूप नहीं हैं. इससे बनने वाली स़डकें, सरकारी व अर्ध सरकारी भवनों का निर्माण, बिजली, पानी, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि सभी कार्य भ्रष्टाचार का शिकार हैं. इन योजनाओं के लिए सांसद, विधायक निधि से दिए गए धन का सत्यापन किया जाए तो जनप्रतिनिधि भी भ्रष्टाचार में लिप्त नज़र आएंगे. सांसद को दो करोड़ रुपए सालाना और विधायक को सवा करोड़ रुपए सालाना मिलते हैं. इन सबका योग दस करोड़ रुपए से ज़्यादा है. जनपद के पांच विधायकों में एक मंत्री भी हैं. सरकार में बैठे मंत्री की जिम्मेदारी स़िर्फ अपने विधानसभा क्षेत्र तक ही सीमित नहीं है बल्कि उसकी जिम्मेदारी पूरे ज़िले को विकास से जोड़ने की है. इस जिम्मेदारी से ठाकुर जयवीर सिंह मुंह चुरा रहे हैं. अगर वह चाहते तो सपा के प्रभाव वाले इलाक़ों में विकास कार्य कराकर वहां बहुजन समाज पार्टी का आधार मजबूत कर सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया बल्कि सरकार में मंत्री बनकर सुविधाओं का लुत्फ उठाते रहे हैं.

सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने भी पिछले वर्ष अपनी निधि का पूरा पैसा सड़कों में खर्च किया था. इस वर्ष वह अपनी निधि का पूरा पैसा विभिन्न मदों में खर्च नहीं कर पाए है. सांसद निधि में वर्ष 2010-2011 के  लिए 90.537 लाख रुपए के प्रस्ताव स्वीकृत हुए हैं. इनमें 34.756 लाख रुपए अवशेष है. सांसद ने शिक्षा पर 38.00 लाख, सीसी सड़क पर 33.872 लाख, पानी पर 1.665 लाख तथा अपने संसदीय क्षेत्र जनपद इटावा के लिए भी 17.000 लाख रुपए दिए हैं. सांसद भी अपनी पूरी निधि वर्ष भर में खर्च नहीं कर पाए हैं.

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जनपद की कुछ समस्याएं ऐसी है जो जनता को बार-बार पिछड़ेपन की याद दिलाती हैं. जनपद के दो ब्लॉक गर्मी के सीजन में पानी के गंभीर संकट से जूझते हैं. इनमें सुल्तानगंज और बरनाहल ब्लॉक शामिल हैं. इन दोनों ब्लॉकों में पानी की समस्या के स्थाई समाधान के  लिए किसी ने भी प्रयास नहीं किए. सपा सरकार में बनी सड़कों की मरम्मत के लिए दोबारा धन मुहैया नहीं हो पाया है जिससे विकास की गति और मंद हो गई है. भोगांव विधानसभा क्षेत्र के विधायक आलोक कुमार शाक्य ने तो अपनी 1.25 करोड़ रुपए की निधि में ज़्यादातर हिस्सा शिक्षा, विद्युत, सड़क, सोलर लाइट पर खर्च किया है. यह राशि क़रीब 89.524 लाख रुपए है जिसमें से 61.584 लाख रुपए के  विकास कराए जा चुके हैं. व्यय धनराशि 4.117 लाख रुपए तथा अवशेष धनराशि 57.467 लाख रुपए है. जनपद के  सुल्तानगंज ब्लॉक में पानी की भारी किल्लत है लेकिन विधायक ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया है. पेयजल के  बजाय उन्होंने विधायक निधि को अन्य मदों पर ही खर्च किया है. यह दर्शाता है कि पानी की समस्या पर क्षेत्रीय विधायक का ध्यान नहीं है. जबकि हर वर्ष मई, जून के महीने में पानी की समस्या से जनता को जूझना प़डता है. करहल के सपा विधायक सोवरन सिंह यादव ने भी अपनी निधि का धन पानी, सीसी सड़क, पुलिया, ट्रांसफार्मर, सोलर लाइट पर खर्च किया है. सोवरन सिंह पूरे वर्ष में निधि का आधे से थोड़ा अधिक हिस्सा ही खर्च कर पाए हैं. आधी निधि कब और किस मद में खर्च होगी, यह विधायक पता नहीं कब तय करेंगे. विधायक ने 126 इंडिया मार्का हैंडपंप पर 36.522 लाख रुपए, सीसी सड़क पर 21.89 लाख रुपए, माइनर पुलिया पर  3.550 लाख रुपए, टांसफार्मर में 2.431 लाख, सोलर लाइट पर 5.590 लाख रुपए व्यय किया है. किशनी की सपा विधायक संध्या कठेरिया ने अपनी पूरी निधि का ज़्यादातर हिस्सा शिक्षा और विद्युत पर खर्च किया है. विधायक ने ग्राम जिजई में विद्युतीकरण पर 5.306 लाख रुपए तथा शिक्षा के मद में 95.000 लाख रुपए दिए हैं. इसे देखकर लगता है कि मानों विधायक के क्षेत्र में पानी, सड़क जैसी मूलभूत आवश्यकताएं पूरी हो गई हैं. हालांकि ज़मीनी हक़ीक़त कुछ और है. क्षेत्र में विभिन्न छोटी-छोटी योजनाएं जो विधायक निधि से पूरी हो सकती है, उनकी ओर विधायक का ध्यान नहीं है. क्षेत्र में ज़्यादातर गांवों के लिए संपर्क मार्ग नहीं है.

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भाजपा के मैनपुरी सदर से विधायक अशोक सिंह चौहान ने पानी, सीसी रोड, सोलर लाइट, शिक्षा, विकलांगों को उपकरण मदों में निधि का उपभोग किया है. विधायक अशोक सिंह ने 85.243 लाख रुपए पूरे वर्ष में खर्च किए हैं. इंडिया मार्का हैंडपंपों पर 1.920 लाख रुपए सीसी सड़क व नाली पर 75.201 लाख, सोलर लाइट पर 0.622 लाख, शिक्षा पर 5.500 लाख, विकलांग उपकरण पर 2.000 लाख रुपए खर्च किए गए हैं. घिरोर विधानसभा क्षेत्र से बसपा विधायक व मंत्री ठाकुर जयवीर सिंह ने अपने क्षेत्र में 13.155 लाख रुपए खर्च किए हैं. इनका कुछ पैसा फिरोजाबाद जनपद के क्षेत्र में भी खर्च किया गया है. मंत्री ने सोलर लाइट पर 5.212 लाख, शिक्षा पर 2.500 लाख, यात्री प्रतीक्षालय पर 1.033 लाख, सड़क व पुलिया पर 4.410 लाख रुपए खर्च किया है. वर्तमान में मंत्री की निधि को देखकर लग रहा है कि उन्हें विकास के कार्यों में कोई दिलचस्पी नहीं है. फिरोजाबाद जनपद में इनकी निधि से विकास के  लिए 40.00 लाख रुपए दिए गए हैं. विधायक निधि की कुल 1.25 करोड राशि में मंत्री आधा भी हिस्सा खर्च नहीं कर पाए हैं. एमएलसी चंद्र प्रताप सिंह यादव ने जनपद में सोलर लाइट, हाईमास्ट लाइट और शिक्षा पर 43.150 लाख रुपए खर्च किया है. एमएलसी ने अन्य जनपदों की तुलना में मैनपुरी में अपनी निधि का सबसे ज़्यादा हिस्सा खर्च कर दिया है.

जनपद में सपा के तीन, बसपा व भाजपा का एक-एक विधायक है. इसमें सबसे ज़्यादा लेट लतीफ और जनता के विकास कार्यों में रुचि लेने वाले विधायक ठाकुर जयवीर सिंह है. जिन्होंने अपनी निधि का एक हिस्सा ही खर्च नहीं किया है. किशनी की विधायक संध्या कठेरिया खर्च करने में सबसे आगे रही है. उन्होंने अपनी निधि का एक करोड़ रुपए से अधिक विकास कार्य में लगाए हैं. वहीं दूसरे स्थान पर भाजपा के सदर विधायक अशोक सिंह चौहान हैं जिन्होंने अपनी निधि से 85.243 लाख रुपए खर्च किए हैं. ये आक़डे यह दर्शाते है कि इन्होने क्षेत्र के विकास के लिए   काफी काम किया है जब कि सच्चाई इसके ठीक उलट ही है. सांसद और विधायक निधि के प्रति जनप्रतिनिधियों की यह बेरुखी दर्शाती है कि इन माननीयों की दिलचस्पी विकास के प्रति नहीं है. मतदाताओं को विकास के  लुभावने सपने दिखाने में माहिर ये नेता चाहें तो अपनी निधियों से ही संपूर्ण ज़िले का चहुंमुखी विकास करा सकते हैं लेकिन अगर ऐसा हो गया तो फिर उनकी नेतागीरी कैसे चमकेगी, शायद यही सोचकर सांसद-विधायक जनता को विकास से दूर रख रहे हैं.

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