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सपा सरकार पर एक साल में 104 दंगों का कलंक
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सपा सरकार पर एक साल में 104 दंगों का कलंक

यूपी में छोटी-छोटी घटनाएं बड़े तनाव की वजह बन रही हैं, लेकिन दिल्ली की गद्दी के लिए उतावले सपा नेताओं ने इस ओर ध्यान नहीं दिया. अखिलेश यादव राज्य के हालात से निपटने की बजाय अन्य राज्यों में सपा को मजबूत करने के लिए दौरे कर रहे थे. अक्सर देखने में यह आया है कि अखिलेश को जहां होना चाहिए होता है, वह वहां नहीं दिखते हैं. यह स्थिति इसलिए आती है, क्योंकि उनके ऊपर बैठे सुपर सीएम राजनीति के मैदान में उनके आका हैं. सांप्रदायिक हिंसा की वारदातों के बाद नेता मरहम लगाने के नाम पर वोटों के धु्रवीकरण का खेल शुरू कर देते हैं.

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उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के डेढ़ वर्ष के शासनकाल में करीब सौ से अधिक बार राज्य की जनता सांप्रदायिकता की आग में झुलस चुकी है. दर्जनों लोग मौत के मुंह में जा चुके हैं. हालिया दंगों में घायल हुए सैकड़ों लोग अस्पतालों में हैं. दंगा प्रभावित क्षेत्रों में जनजीवन, कारोबार सब ध्वस्त है. लेकिन कोई इस बात की जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है कि क्यों रह-रहकर लोग खून के प्यासे हो जाते हैं. प्रदेश को सरकार की नाकामी की भारी कीमत चुकानी पड़ रही है. क्या विपक्ष समाजवादी सरकार को बदनाम करने के लिए सूबे की आबो-हवा में सांप्रदायिकता का जहर घोल रहा है या फिर सरकार के नाकारेपन से प्रदेश बार-बार दंगों की आग में झुलस रहा है? या फिर खुद सरकार चुप रहकर दंगों को हवा दे रही है? ये सवाल अनुत्तरित हैं. सबसे दुख की बात यह है कि ऐसे मौकों पर जनता के जख्मों पर मरहम लगाने की बजाय नेतागण आरोप-प्रत्यारोप तक ही सीमित रह जाते हैं. वे किसी तरह की जिम्मेदारी लेने की बजाय राजनीति शुरू कर देते हैं. अधिकारियों को जानबूझ कर कार्रवाई करने से रोका जाता है. सवाल उठता है कि जब दंगे की संभावना मात्र से एक आईएएस को निलंबित किया जा सकता है तो फिर इस सरकार को भी तो कुछ सजा मिलनी चाहिए, जिसके राज में दंगों की बाढ़ आई हुई है. यह कहकर सरकार अपने दामन के दाग नहीं धो सकती है कि यह विपक्षियों की साजिश है. हालात ऐसे ही बने रहे तो समाजवादी सरकार के लिए अपना कार्यकाल पूरा करना मुश्किल हो जाएगा.

दुखद है कि मुजफ्फरनगर में भ़डके दंगों को अन्य जिलों में फैलने से रोकने में राज्य सरकार नाकाम साबित हुई. मुजफ्फरनगर की हिंसा ने तो सारे रिकार्ड ही तोड़ दिए. जिला स्तर के कुछ अधिकारियों का निलंबन या फिर तबादला करके सरकार की जिम्मेदारी कम नहीं हो जाती है. मुख्यमंत्री अध्यक्ष अखिलेश यादव, जिनके पास गृह मंत्रालय भी है, वह ऐसे मौकों पर क्या कर करते रहते हैं. डीजीपी देवराज नागर, एडीजी लॉ एंड आर्डर अरुण कुमार मुजफ्फरनगर ने दंगा प्रभावित इलाके का दौरा किया था. सब कुछ ठीक-ठाक होने की बात कही जा रही थी. लखनऊ में बैठे मुख्य सचिव जावेद उस्मानी भी सरकार के सुर में सुर मिला रहे थे. केंद्रीय गृह मंत्रालय पहले ही उत्तर प्रदेश सरकार को सचेत कर चुका था कि छोटी-छोटी घटनाएं बड़े तनाव की वजह बन रही हैं, लेकिन दिल्ली की गद्दी के लिए उतावले सपा नेताओं ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव राज्य के हालात से निपटने की बजाय अन्य राज्यों में सपा को मजबूती प्रदान करने के लिए दौरे कर रहे थे. अक्सर देखने में यह आया है कि अखिलेश को जहां होना चाहिए होता है, वह वहां नहीं दिखते हैं. यह स्थिति इसलिए आती है, क्योंकि उनके ऊपर बैठे सुपर सीएम राजनीति के मैदान में उनके आका हैं. सांप्रदायिक हिंसा की वारदातों के बाद नेता मरहम लगाने के नाम पर वोटों के धु्रवीकरण का खेल शुरू कर देते हैं. अयोध्या विवाद के बाद ऐसा ही धु्रवीकरण सपा-भाजपा के बीच देखने को मिला था, जिसका नतीजा यह हुआ कि दोनों पार्टियों ने उसका फायदा तो उठाया ही, कई वर्षों तक सूबे सियासत पर उसका असर देखा गया.

राजनीतिक हरकतों को देखकर ऐसा लगता है जैसे कि वोटों के धु्रवीकरण के लिए साम्प्रदायिकता भ़डकाना अनिवार्य हो गया हो. जिस राज्य का मुखिया इंसाफ और सजा का पैमाना अपराधी या फिर भुक्तभोगी की जात-बिरादरी देख कर तय करता हो, वहां की जनता का भगवान ही मालिक हो सकता है. जब उपद्रवी सेना के जवानों पर भी हमला करने की ताकत करने लगे, उपद्रवी खुले आम सुरक्षाकर्मियों के सामने असलहे लहराएं तो हालात की गंभीरता को समझा जा सकता है. सरकारी नाकामी या फिर वोट बैंक की राजनीति ही है जिसके चलते दंगे की आग गांवों तक पहुंच गई, जबकि इसके पहले शायद ही कभी देखने को मिला हो. सरकार एक पक्ष मात्र बन कर रह गई है.

अफसोस है कि समाजवादी सरकार बसपा राज के भ्रष्टाचार का तो खूब ढिंढोरा पीटती है, लेकिन बसपा राज में कानून व्यवस्था, सांप्रदायिक दंगों या तनाव के समय बसपा सरकार द्वारा उठाए जाने वाले कड़े कदमों की तरफ उसका ध्यान कभी नहीं जाता है. बसपा राज में सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए तो इसकी एक मात्र वजह थी, तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती का ऐसे मौकों पर निष्पक्ष होकर पुलिस को सख्ती के साथ पेश आने की छूट देना था. वह जिलाधिकारी और एसएसपी जैसे बड़े अधिकारियों को जरा सी घटना होने पर ही तलब कर लेती थीं. यही वजह थी इस समय छोटी-छोटी घटनाओं को निपटाने में भी अधिकारी एड़ी-चोटी का जोर लगा देते थे. बात पुरानी नहीं है, बसपा राज में उच्च न्यायालय का अयोध्या विवाद मामले में अहम फैसला आया था, लेकिन कहीं कोई हिंसा नहीं फैली. दहशत का आलम यह था कि फैसला आने के समय लोग घरों में किसी अनहोनी के डर से कैद हो गए थे, लेकिन सरकार की मुस्तैदी के चलते जनजीवन पूरी तरह से सामान्य रहा. कहीं कोई कर्फ्यू नहीं लगा. यही फैसला आज आया होता तो क्या हालात होते, यह समझा जा सकता है. सपा सरकार की नाकामी ही है जो कांगे्रस के दिग्विजय सिंह जैसे नेता भी समाजवादी सरकार के मुकाबले बसपा सरकार की तारीफ करने को मजबूर हो गए. प्रदेश के राज्यपाल बीएल जोशी को भी पश्‍चिमी उत्तर प्रदेश में फैले सांप्रदायिक तनाव के बाद अखिलेश सरकार के खिलाफ केंद्र को लिखना पड़ गया. राज्यपाल ने दंगों के लिए पूरी तरह से राज्य सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया. बसपा सुप्रीमो को लगता है कि ऐसे दंगे भाजपा और सपा की राजनैतिक सांठगांठ से ही होते हैं.

केंद्र पहले ही इस बात पर नाराजगी जता चुका था कि उत्तर प्रदेश में छोटी-छोटी घटनाओं को समय रहते नहीं निपटाए जाने के कारण बाद में सांप्रदायिक हालत बिगड़ जाते हैं. ऐसा ही कुछ मुजफ्फरनगर के कवाल में भी हुआ. स्कूली लड़की से छेड़छाड़ के बाद दो गुटों में हुए झगड़े को समय रहते सुलटा लिया जाता तो ऐसा नहीं होता, लेकिन पुलिस ने एकतरफा और वह भी गैरवाजिब कार्रवाई करके दूसरे समुदाय की नाराजगी मोल ले ली. एक के बदले दो लाशें गिराने के जुनून ने सब कुछ तबाह कर दिया. जो सरकार महिला सशक्तिकरण के बड़े-बड़े दावे करती हो, उसके निजाम में महिलाओं-लड़कियों की आबरू से खिलवाड़ किया जाए, तो स्थिति की गंभीरता को समझा जा सकता है. अब बसपा, राष्ट्रीय लोकदल सहित संपूर्ण विपक्ष राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग कर रहा है.

संभावना यह भी जताई जा रही है कि दंगों की आड़ में 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए विभिन्न दलों द्वारा चुनावी बिसात बिछाई जा रही है. सीधे तौर प्रदेश में हिंसा के लिए अखिलेश सरकार ही जिम्मेदार है, लेकिन भाजपा भी इस मौके को अपने हित में भुनाने का कोई मौका नहीं छोड़ रही है. वह अखिलेश सरकार पर तुष्टिकरण का आरोप लगाकर घेर रही है. पहले 84 कोसी परिक्रमा पर रोक के बहाने भाजपा ने सपा सरकार को घेरा, अब मुजफ्फरनगर में फैली सांप्रदायिक हिंसा के बहाने वह सरकार को घेर रही है. भाजपा नेताओं पर दंगा भड़काने का अरोप लगाए जाने और उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किए जाने के सियासी मतलब निकाले जा रहे हैं.

दरअसल, जब दंगे की राजनीति शुरू होती है तो सबसे मुश्किल कांगे्रस और बसपा को होती है. भाजपा तो यह मान कर चलती है कि मुस्लिम वोट उसके हाथ नहीं लगने वाला है, इसीलिए वह हिंदू हितों के नाम पर सरकार पर तुष्टिकरण का आरोप लगाती है, लेकिन कांगे्रस और बसपा को मुस्लिम वोटों की भी दरकार रहती है, इसलिए वह तुष्टिकरण जैसे शब्द चाहकर भी इस्तेमाल नहीं कर पाती हैं. यही कारण है कांगे्रस और बसपा को प्रदेश में राजनैतिक नुकसान होते दिखता है.

बहरहाल, दंगे करवाकर वोट बटोरने की राजनीति में मरना तो आम आदमी को पड़ रहा है. सभी दलों के नेता और जनप्रतिनिधि अपने-अपने घरौंदों में महफूज थे. दिन के उजाले में विभिन्न दलों के नेताओं द्वारा अखबारी बयानबाजी करके संवेदना जताई जाती हैं तो शाम को दंगों से फायदे-नुकसान का लेखा-जोखा खंगाला जाता है. मुजफ्फरनगर  शहर के समाजवादी विधायक चितरंजन स्वरूप इस समय राज्य सरकार में मंत्री हैं. जिले में जब नफरत की आग फैली तो वह कोसों दूर वाराणसी में थे. पूर्व डीजीपी श्रीराम अरुण पूरे घटनाक्रम पर काफी निष्पक्ष तरीके से अपनी बात रखते हुए कहते हैं, नौकरशाह हों या खाकी वर्दी वाले, सरकार का रुख जानते हैं. जहां काम करने वालों को सजा और नकारा अधिकारियों को पनाह दी जाती हो, वहां के हालात तो कुछ ऐसे ही होंगे. हालत यह है कि दंगों या अन्य आपराधिक वारदातों के समय पुलिस और प्रशासन सरकार की तरफ ताकते रहते हैं. ऐसे मौकों पर कार्रवाई करके दुर्गाशक्ति नागपाल की तरह निलंबन झेलने से बेहतर मूक दर्शक बने रहना है.

अखिलेश सरकार अमन-चैन के मोर्चे पर नाकाम हो रही है या फूट डालो राज करो की अंगे्रजी शैली को आगे बढ़ा रही है, यह तो वही जाने, लेकिन इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता है कि जिस तरह आज अखिलेश ने मुख्यमंत्री ने बनते ही प्रदेश को दंगों की आग में झोंक दिया, उसी तरह मुलायम सिंह भी करते रहे हैं. मुलायम ने भी 1990-91 में यूपी को दंगों के हवाले कर दिया था. एक साथ प्रदेश के 45 जिलों में कर्फ्यू लगा था. पश्‍चिमी उत्तर प्रदेश, खासकर मुजफ्फरनगर में जिस प्रायोजित तरीके से अफवाहें फैलाई गईं और और पुलिस ने दंगाइयों को माहौल में जहर घोलने का मौका दिया गया, उससे साफ है कि दंगे सरकार की शह पर ही हुए हैं.

पिछड़ा समाज महासभा के एहसानुल हक मलिक और भागीदारी आंदोलन के पीसी कुरील और भारतीय एकता पार्टी के सैयद मोइद अहमद कहते हैं कि सपा सरकार के डेढ़ वर्षों के शासनकाल में जिस तरह लगातार दंगे हो रहे हैं और सरकार इन्हें रोक पाने में विफल साबित हो रही है. यह इस बात का इशारा है कि सपा सरकार प्रदेश को सांप्रदायिकता के आगे न केवल नतमस्तक हो चुकी है, बल्कि इन दंगों की आड़ में हो रहे धार्मिक और जातीय धु्रवीकरण को अपने चुनावी लाभ के तौर पर देख रही है. इन दंगों ने साबित कर दिया है कि प्रदेश की कानून और व्यवस्था चलाने वाले पुलिस अफसरों पर से सरकार का नियंत्रण एकदम खत्म हो गया है. मुजफ्फरनगर में जो भी हुआ, उसकी पृष्ठभूमि अचानक नहीं बनी है, लिहाजा इतने बड़े पैमाने पर हुए इस जनसंघार को प्रायोजित करने में किन किन की भूमिका है,इसकी सीबीआई जांच कराई जाए.

समाजवादी पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता एवं मंत्री राजेंद्र चौधरी कहते हैं कि मुजफ्फरनगर में अशांति फैलाने वाले तत्वों की करतूत निदंनीय है. एक पत्रकार सहित निर्दोष लोगों की मौत दु:खद है. सरकार सांप्रदायिक शक्तियों पर अंकुश लगाने और शांति तथा सद्भावना बनाए रखने को कृत संकल्प है. सरकार को निशाना बनाकर कांगे्रस, बसपा और भाजपा के नेता अनर्गल बयानबाजी कर रहे हैं. वे सपा सरकार की छवि खराब करना चाहते हैं.

सपा के अन्य नेता कहते हैं मुजफ्फरनगर में जो कुछ घटा है, उसके पीछे वे दल हैं जो राज्य सरकार की विकास योजनाओं से च़िढे हैं और उन्हें अपनी जमीन खिसकती नजर आती है. इसलिए वे ऐसा कर रहे हैं. किसी को भी कानून हाथ में लेने की इजाजत नहीं दी जा सकती.

साल भर में दंगों का शतक

मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक दंगों के बाद गृह मंत्रालय ने एक रिपोर्ट जारी की. रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में 2012 में सांप्रदायिक हिंसा के 104 मामले दर्ज किए गए. गृह मंत्रालय की इस रिपोर्ट में लिखा है कि 100 से ज्यादा दंगों में 34 लोगों की मौत हुई और 456 जख्मी हो गए. जबकि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का कहना है कि 2012 में उत्तर प्रदेश में मात्र 27 दंगे हुए. अखिलेश इन दंगों का सारा दोष सांप्रदायिक ताकतों के सिर मढ़ रहे हैं कि ऐसी ताकतें सपा की सरकार को कमजोर करना चाहती हैं. एक वर्ष में दंगों का शतक लगाकर सपा सरकार ने अपनी खूब किरकरी कराई है. हालांकि, सपा को इससे अपना वोट बैंक मजबूत होता दिख रहा है. सत्ता में आने के कुछ ही माह बाद शायद अखिलेश सरकार समझ गई थी कि विकास और कानून व्यवस्था के मामले में हो रही फजीहत पर सांप्रदायिकता का पर्दा डालकर ही वोट बैंक सुरक्षित किए जा सकते हैं. अखिलेश राज के शुरुआती 12 महीने कानून व्यवस्था के लिहाज से बदतर साबित हुए हैं. रिकॉर्ड दंगों के चलते प्रचंड बहुमत की सरकार सवालों के घेरे में आ गई है.

बसपा राज का केएस बीएल फार्मूला

नौसिखुए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने तमाम दंगों के बाद भी पूर्ववर्ती बसपा सरकार के उस फार्मूले की ओर ध्यान नहीं दिया, जिसके सहारे माया ने यूपी में सांप्रदायिक ताकतों को उभरने नहीं दिया. कहीं कोई दंगा नहीं हुआ. यह फार्मूला तत्कालीन डीजीपी करमवीर सिंह (केएस) और इसी समय के एडीजी लॉ एंड आर्डर बृज लाल (बीएल) ने वर्ष 2010 में इस समय ईजाद किया था, जब अयोध्या विवाद पर हाईकोर्ट का फैसला आने वाला था. इस फार्मूले के आधार पर प्रत्येक गांव में लोगों को पाबंद किया गया. ऐसे लोगों से जो दंगा भड़का सकते थे, उनसे शपथ पत्र लिया गया कि वह कोई जुलूस नहीं निकालेंगे, नारेबाजी नहीं करेंगे और दंगा नहीं होने देंगे. प्रत्येक गांव में कुछ संभ्रात लोगों का गुट बनाकर उनके कंधों पर शांति व्यवस्था की जिम्मेदारी डाली गई थी. इस गुट में दोनों की संप्रदायों के लोग शामिल थे. ये लोग पुलिस अधिकारियों के संपर्क में रहते थे. यहां तक कि डीजीपी तक से इस गुट की मोबाइल से सीधी बात होती थी. केएसबीएल फार्मूले को ‘कानून व्यवस्था में जन सहयोग’ का सरकारी नाम दिया गया था. डीजीपी लॉ एंड आर्डर बृज लाल अपराधियों को संरक्षण देने के खिलाफ थे, उनसे सत्तारूढ़ दल के दागी और दबंग विधायक तक डरते थे. बृज लाल के ऊपर बसपा का ठप्पा लगाकर सपा सरकार ने किनारे लगा दिया है.

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