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उत्तर प्रदेश शासन : जो भ्रष्ट है वही योग्य है
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उत्तर प्रदेश शासन : जो भ्रष्ट है वही योग्य है

राज्य की राजधानी लखनऊ (मंडल) की कमान हो या समाज कल्याण आयुक्त की मलाईदार पोस्टिंग या फिर कानपुर के कमिश्‍नर का पद, लगभग हर जगह दागी ही काबिज हैं. ब़डा सवाल यह है कि दुर्गा नागपाल जैसे अधिकारी हासिये पर कर दिए जा रहे हैं और दागियों की तैनाती मलाईदार ओहदों पर हो रही है.

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उत्तर प्रदेश का यह दुर्भाग्य ही है कि एक ईमानदार एसडीएम को  सांप्रदायिक तनाव की आड़ लेकर निलबंन की तलवार से हासिये पर डाल दिया जाता है, तो राज्य की राजधानी लखनऊ (मंडल) की कमान एक ऐसे भ्रष्ट आईएएस संजीव शरण को थमा रखी है, जो अरबों के प्लॉट आवंटन  घोटाले की सीबीआई जांच में फंसें है.

सपा सरकार जनता की कसौटी पर खरी नहीं उतर रही है. प्रदेश की जनता ने जिस विश्‍वास के साथ अखिलेश की ताजपोशी का रास्ता सशक्त किया था, वह सपना चकनाचूर हो गया है. समाजवादी पार्टी के मंत्री और नेता अमर्यादित भाषा बोल रहे हैं. बसपा, भाजपा, कांगे्रस जैसे विरोधियों के प्रति उनकी तल्खी तो समझ में आती है, लेकिन ईमानदार युवा नौकरशाहों, साहित्यकारों, समाजसेवियों, व्यापारियों के प्रति ही नहीं, आम जनता के प्रति भी उनकी अमानवीय सोच और बेरुखी अकल्पनीय लगती है. मंत्रियों की बदजुबानी सिर चढ़कर बोल रही है. सपा के पाले हुए गुंडों की दहशत है. कानून व्यवस्था गर्त में जा रही है. राज्य की जनता आए दिन होने वाले साम्प्रदायिक दंगों से थर्राई हुई है. समय-समय पर बसपा सुप्रीमो मायावती को तानाशाह का खिताब देने वाले सपाई अगर अपने गिरेबान में झांक कर देखें, तो उन्हें यह समझने में देर नहीं लगेगी कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उनकी कैबिनेट के सहयोगी भी माया के नक्शे कदम पर चल रहे हैं. लोकतांत्रिक तरीके से उठने वाली आवाजें भी सपा नेताओं को सताने लगी हैं. तथ्यों से हट कर बात करने वाले सपाइयों में स्वार्थ की राजनीति तेजी से फल-फूल रही है. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव हों या सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव, महासचिव राम गोपाल यादव हों या फिर मंत्री आजम खां, शिवपाल जैसे पार्टी के कद्दावर नेता किसी को सपा के गिरते ग्राफ की चिंता नहीं है.

सच को झूठ और झूठ को सच साबित करने में महारथ हासिल किए सपाइयों को न तो मतदाताओं का भय है और न ही अदालतों का पहरा उनको सही राह दिखा पा रहा है. आंखें मूंद कर बैठे सपा नेता हकीकत को जाने बिना अपना गुणगान करते रहते हैं.

समाजवादी पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता एवं जेल, खाद्य और रसद मंत्री राजेन्द्र चौधरी ने तो इस कृत्य में महारथ ही हासिल कर ली है. उनका तो एक सूत्रीय कार्यक्रम बन कर रह गया है झूठ का प्रचार. वह जब भी बोलते हैं, तो नश्तर से चुभते हैं. बार-बार एक ही बात दोहराना उनकी नियति बन गई है. ऐसा लगता है कि उनके द्वारा जारी प्रेस नोट में सिर्फ तारीख ही बदली जाती हो. अगर ऐसा न होता, तो वह बार-बार नहीं दोहराते जाते समाजवादी पार्टी सरकार की उपलब्धियों और जनता के बीच बढ़ती स्वीकार्यता से प्रदेश के विपक्षी दल इस तरह बैखलाए हुए हैं. वे अपना विवेक ही खो बैठे हैं. बसपा को जनता ने उसके पांच साल के कुशासन के फलस्वरूप सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा दिया, जबकि कांगे्रस और भाजपा को तीसरे-चौथे क्रम में खड़े होने का प्रतियोगी बना दिया है. इन दलों का कोई भविष्य नहीं रह गया है.

जनता दोतरफा पिस रही है. नौकरशाही काम की जगह चापलूसी में ज्यादा समय बिता रही है. पिछले दो दशकों से उत्तर प्रदेश का काला इतिहास रहा है कि सत्ता पर जो भी दल काबिज होता है, अपने स्वार्थपूर्ति के लिए वह दागी और दबंग नौकरशाहों को अपनी गोद में बैठा लेता है. झूठे नौकरशाहों का बोलबाला होता है और ईमानदार अफसरों को प्रताड़ित होना पड़ता है.

उत्तर प्रदेश का यह दुर्भाग्य ही है कि एक ईमानदार एसडीएम को  सांप्रदायिक तनाव की आड़ लेकर निलबंन की तलवार से हासिये पर डाल दिया जाता है, तो राज्य की राजधानी लखनऊ (मंडल) की कमान एक ऐसे भ्रष्ट आईएएस संजीव शरण को थमा रखी है, जो अरबों के प्लॉट आवंटन  घोटाले की सीबीआई जांच में फंसें है. शरण के पास पर्यटन विभाग के प्रमुख सचिव और डीजी का भी कार्यभार है. इसी तरह प्लॉट आवंटन के कारण सीबीआई के शिकंजे मं आए एक और दागी आईएएस अधिकारी राकेश बहादुर को समाज कल्याण आयुक्त की मलाइदार पोस्टिंग दी जाती है. नोएडा, गे्टर नोएडा और यमुना एक्सप्रेस-वे अथॉरिटी के चेयरमैन के अहम पद पर तैनात रामा रमण लोकायुक्त जांच में फंसे हैं. रमण पर बसपा राज के दौरान फॉर्म हाउस घोटाले में भी संगीन आरोप हैं. मुख्यमंत्री के सचिव आईएएस अधिकारी आलोक कुमार पर सिडकुल घोटाले में गंभीर आरोप लगे थे और उसकी जांच भी हुई थी. आज की तारीख में वह अवैध खनन के मामले में न केवल आरोपों से घिरे हुए हैं, बल्कि अदालत ने उन्हें नोटिस भी भेज रखा है.

बसपा काल में तमाम घोटालों के लिए बदनाम रहे आईएएस महेश कुमार गुप्ता को कानपुर के कमिश्‍नर का रुतबा हासिल है. महेश सूचना भर्ती घोटाले में सीबीआई से चार्जशीटेड तक हो चुके हैं. मायावती सरकार के दौरान आबकारी आयुक्त के पद पर विराजमान होकर महेश गुप्ता ने शराब माफिया पोंटी चड्ढा को काफी मजबूती प्रदान की थी. माया के बाद सपा सरकार में भी महेश का कद कम नहीं हुआ है. आईएएस चंचल तिवारी ओर धनलक्ष्मी जैसे घोटालेबाज भ्रष्ट अफसर 4600 करोड़ के ट्रोनिका सिटी घोटाले की एसआईटी जांच में आरोपी हैं. सीबीआई और ईडी के पास भी इनका मामला पड़ा हुआ है. आईएएस धनलक्ष्मी के दिल्ली स्थित आवास से तो सीबीआई करीब सवा तीन करोड़ का काला धन बरामद भी कर चुकी है, लेकिन ईडी ने अभी तक धनलक्ष्मी के खिलाफ जांच नहीं शुरू की है. अखिलेश सरकार ने उन्हें जिलाधिकारी अमेठी बना रखा है. युवा सीएम ने भ्रष्ट आईएएस अफसर चंचल तिवारी को वाराणसी का कमिश्‍नर बना रखा है. चंचल के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले में सीबीआई और ईडी की जांच चल रही है. सपा राज में दागी आईएएस राजीव कुमार (द्वितीय) को भी काफी ताकत मिली हुई है. सपा सरकार ने वरिष्ठ आईएएस अधिकारी राजीव को यूपी का प्रमुख सचिव (नियुक्ति) बना रखा है. उन्हीं के हस्ताक्षर से दुर्गा शक्ति नागपाल को निलंबित किया गया था. नोएडा प्लॉट आवंटन घोटाले में राजीव कुमार एक सजायाफता अधिकारी हैं. यह वही मामला है, जिसमें यूपी की पूर्व मुख्य सचिव नीरा यादव को जेल जाना पड़ा था. फिलहाल, उनकी अपील पर हाईकोर्ट ने उनकी सजा पर रोक लगा रखी है. प्रमुख सचिव नियुक्ति रहकर राजीव कुमार ने कई घोटालों को अंजाम दिया था. राजीव को अखिलेश सरकार ने अपनी कोर टीम में रख छोड़ा है.

आईएएस ही नहीं, दागी पीसीएस अफसरों को भी सपा सरकार ने गले लगा रखा है. पहले तो अखिलेश सरकार ने सीबीआई तक की जांचों में फंसे पीसीएस बादल चटर्जी, अनिल, राजकुमार, भवनाथ, अजय कुमार उपाध्याय, शहाबुद्दीन, भास्कर उपाध्याय, तनवीर जफर अली, चंद्रपॉल समेत करीब दो दर्जन अफसरों को आईएएस कैडर में प्रमोट किया. इसके बाद उन दागदार अफसरों को महत्वपूर्ण पदों पर तैनात भी कर दिया गया. ताजा उदाहरण लखनऊ के एसएसपी जे रवींद्र गो़ड का है, जिनके खिलाफ सीबीआई ने बरेली फर्जी मुठभेड़ मामले में अभियोजन मंजूरी मांग रखी है, लेकिन सरकार ने इस पुलिस अफसर को बचाने के खातिर अभी तक जांच की मंजूरी नहीं  दी है. ऐसे में अक्षम पुलिस कप्तानों के जरिये पूरे प्रदेश की कानून व्यवस्था को बिगाड़ने के प्रयास भी हो रहे हैं. एक और भ्रष्ट आईएएस अफसर हैं मनोज कुमार सिंह, जिनके खिलाफ नियुक्ति घोटाले समेत तमाम गंभीर आरोप हैं, लेकिन सरकार ने इस भ्रष्ट अफसर को प्रमोट करके प्रमुख सचिव के पद पर मलाइदार तैनाती दे रखी है. आईएएस मनोज कुमार सिंह के खिलाफ सीबीआई ने पीलीभीत में संजय गांधी ट्रस्ट में अनियमितताओं के मामले में अभियोजन मंजूरीे मांग रखी है. इसी तरह करोड़ों के मनरेगा घोटाले में फंसे आईएएस सच्चिदा नंद दुबे, हृदयेश कुमार, पीसीएस बी राम,  राजबहादुर, समेत तमाम भ्रष्टों का बाल बांका तक नहीं हुआ. इतना ही नहींं, बसपा सरकार में भी तमाम घोटालों की जांचों में फंसे दागी आईएएस विजय शंकर पांडेय, फतेह बहादुर, नेतराम अनिल संत, समेत तमाम भ्रष्टों को महत्वपूर्ण पदों पर बैठाया गया है. बसपा राज में पुलिस भर्ती घोटाले में गिरफ्तार हो चुके कई आईएएस अधिकारियों पर भी सपा सरकार मेहरबानी बनाए हुए है.

उत्तर प्रदेश की अखिलेष सरकार भ्रष्टाचार के मामले में ढुलमुल रवैया अपना रही है. यह बात आम जनता और विपक्षी दलों के नेता ही नहीं कह रहे हैं. इस बात से सुप्रीम कोर्ट तक चिंतित है. इसीलिए पिछले दिनों उच्चतम न्यायालय को भ्रष्टाचार के लंबित मामलों का त्वरित निपटारा करने के लिए सीबीआई की अतिरिक्त विशेष अदालतें गठित करने का आदेश नये सिरे से जारी करना पड़ गया. सर्वोच्च अदालत इस बात से खफा है कि इसके पूर्व के आदेशों को अखिलेश सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया. बहरहाल, सपा सरकार जिस बेढंगी चाल से आगे बढ़ रही है, उससे आम जनता के बीच यही संदेश जा रहा है कि राज्य सरकार भ्रष्टाचारियों को सजा दिलाने के मामले में गंभीर नहीं है. समाजवादी सरकार के मुखिया अखिलेश यादव अक्सर कहते हैं कि वह अपने घोषणा पत्र के सभी वायदों को जल्द से जल्द पूरा करेगें, लेकिन बात जब भ्रष्ट नौकरशाहों और नेताओं के खिलाफ कार्रवाई की आती है, तो उनकी सरकार काफी पीछे दिखती है. ऐसा लगता है कि अखिलेश यादव ने भ्रष्टाचार से समझौता कर लिया है. अगर ऐसा न होता, तो भ्रष्टाचार के दलदल में फंसे बाबू सिंह कुशवाहा सपा के करीब न आते और ईमानदार कर्तव्यनिष्ठ आईएएस दुर्गा नागपाल की यह दशा न होती. खैर, सपा सरकार की छवि लगातार गिरती जा रही है. यूपी में सत्ता के कई केन्द्र होने का नुकसान भी सरकार को उठाना पड़ रहा है. समय आ गया है कि युवा सीएम अपनी और सरकार की फजीहत से बचने के लिए वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर कुछ सख्त फैसले ले. युवा मुख्यमंत्री को अपनी इमेज सुधारने के लिए ब्यूरोके्रसी और बेलगाम नेताओं, दोनों की ही लगाम खींच कर रखनी होगी.

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