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चौपट शिक्षा व्यवस्था पर नीतीश सरकार का उत्सव
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चौपट शिक्षा व्यवस्था पर नीतीश सरकार का उत्सव

बिहार में देश के प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की जयंती पर तीन दिवसीय शिक्षक दिवस समारोह मनाया गया, जिसमें करोडों रुपये ख़र्च किए गए. पूरा महकमा एक महीने तक इस आयोजन की तैयारी में व्यस्त रहा. जितनी ऊर्जा राज्य सरकार ऐसे आयोजनों को मनाने में ख़र्च करती है, उतनी ही ऊर्जा राज्य की शिक्षा व्यवस्था को भी दुरुस्त करने में लगाती तो तस्वीर कुछ और ही होती. कई ज़िलों में शिक्षकों के बड़े वर्ग ने इस आयोजन को फिज़ूलख़र्ची बताकर इसका विरोध भी किया, लेकिन इस विरोध को कोई तवज्जो नहीं दी गई.nitish

भारत के प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के जयंती समारोह पर राजधानी पटना में तीन दिवसीय शिक्षा दिवस समारोह का आयोजन किया गया. आयोजन का उद्घाटन स्वयं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने किया. सूबे के कई मंत्रियों व आला-अधिकारियों ने भी इस दौरान शिरकत की. ढेर सारी घोषणाएं हुईं, ढेरों वादे किए गए. और तो और, इस बार के शिक्षा दिवस की थीम विद्यालय सशक्तिकरण रखा गया. इस दौरान शिक्षा मंत्री पीके शाही और प्रधान सचिव अमरजीत सिन्हा ने कहा कि वे सभी को अच्छा वेतन देना चाहते हैं, लेकिन राज्य की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है. इस दौरान गांधी मैदान और श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में कई आयोजन भी हुए. शिक्षा के क्षेत्र में बेहतर काम करने वाले सम्मानित भी हुए. इस पूरे आयोजन के लिए शिक्षा विभाग का पूरा महकमा कई महीने से व्यस्त था. जानकार कहते हैं कि जितनी ऊर्जा राज्य सरकार ऐसे आयोजनों को मनाने में ख़र्च करती है, उतनी ही ऊर्जा राज्य की शिक्षा व्यवस्था को भी दुरुस्त करने में लगाती तो तस्वीर कुछ और ही होती. बहरहाल, ऐसे आयोजन उत्साह और ऊर्जा को बनाए रखने के लिए आवश्यक भी हैं, लेकिन बिहार की शिक्षा व्यवस्था के कुछ और भी पहलू हैं. लगातार सरकार पर यह आरोप भी लगते रहे हैं कि इन आठ सालों में दो काम बड़ी ही प्रमुखता से हुए हैं. पहला यह कि द्वार-द्वार तक दारू पहुंचा दी गई है और दूसरा यह कि सूबे की शिक्षा व्यवस्था बिल्कुल ही चौपट हो गई है. आंकड़े बताते हैं कि सरकार के लाख प्रयासों के बावजूद भी सूबे में ड्रॉप आउट रेट घटने का नाम नहीं ले रहा है. हाल के दिनों में शिक्षा और शिक्षकों से जुड़े कई मसले देश भर में चर्चित भी हुए हैं. जहां पूरा महकमा गांधी मैदान में आयोजित शिक्षा दिवस मनाने में व्यस्त था, वहीं शिक्षकों और बच्चों की बड़ी संख्या उसे अपना उपहास ही समझ रही थी.

सूबे के कई जिलों में शिक्षकों का बड़ा वर्ग इस आयोजन को फिजूलख़र्ची और बकवास ही क़रार दिया. वहीं कई ज़िलों में इसका शांतिपूर्ण तरी़के से शिक्षकों ने विरोध भी किया. यह अलग बात है कि शिक्षकों का यह विरोध समारोह की चकाचौंध में नज़र नहीं आया. बिहार राज्य प्राथमिक शिक्षक संघर्ष साझा मंच के सदस्यों ने इस दौरान उपवास पर रहकर काम किया. मंच के सदस्यों ने शिक्षा विभाग के अधिकारियों पर लापरवाही और संवेदनहीनता बरतने का आरोप भी लगाया. साझा मंच के इस विरोध के कई कारण भी हैं. बताते चलें कि 95 प्रतिशत से ज्यादा स्कूल बिना प्रधानाध्यापक के ही चल रहे हैं. दो साल पहले पटना उच्च न्यायालय ने यह कहा था कि विभाग चार महीने के अंदर सारे स्कूलों में प्रधानाध्यापक की पदस्थापना करे. अगर ऐसा नहीं करती है तो विद्यालय बिना प्रधानाध्यापक के ही चलेगा. और इसके लिए राज्य सरकार ज़िम्मेवार होगी. दो साल बीत जाने के बाद भी उच्च न्यायालय के आदेश के आलोक में शिक्षा के विभाग के कान पर जूं तक नहीं रेंगी है.

सूबे की सरकार ने शिक्षकों को ठेके पर बहाल करना भी शुरू किया. इससे जुड़ी ढेरों समस्याएं उनके सामने सुरसा की तरह मुंह बाए खड़ी हैं. आए दिन ये नियोजित शिक्षक विभाग को तो छोड़िए, ख़ुद सीएम तक को परेशानी में डाल देते हैं. इस समय कई शिक्षाविदों ने यह कहकर आलोचना भी की थी कि यह कैसा निर्णय है कि जिनके हाथों में हमारे बच्चों का भविष्य होता है, जो उसे बनाते-सवांरते हैं, उन्हीं को ठेके पर बहाल किया जा रहा है. पठन-पाठन से जुड़े जो भी फैसले सरकार द्वारा लिए जाते हैं, उसमें दूरदर्शिता का अभाव भी दिखता है. पिछले साल नवंबर-दिसंबर के महीने में सरकार ने पूरे बिहार में 18 हज़ार शिक्षकों को स्नातक प्रशिक्षित पदों पर प्रोन्नत किया था. ये शिक्षक आने वाले 18 दिसंबर को प्रधानाध्यापक के पद पर प्रोन्नत होने के योग्य हो जाएंगे, लेकिन विभाग और उसके अधिकारी साज़िशन उन शिक्षकों को प्रधानाध्यापक पद पर रिक्तियों के बावजूद प्रोन्नत करने से वंचित करने जा रहे हैं. 31 दिसंबर 2013 को स्नातक वेतनमान पाने वाले लगभग 18 हज़ार शिक्षकों को विभाग यह कह कर प्रोन्नति में अड़ंगा लगा रहा है कि जिनकी नियुक्ति 1994 के बाद हुई है, उन्हें प्रोन्नत नहीं किया जाएगा. विभाग का यह निर्णय किसी के गले नहीं उतर रहा है. हैरत की बात यह है कि सरकार अपने ही नियम के विरुद्ध जा रही है. प्रोन्नति नियमावली 2011 में कहा गया है कि जो भी शिक्षक स्नातकोत्तर हैं और जिन्हें एक साल तक स्नातक वेतनमान में काम करने का अनुभव है, उन्हें हेडमास्टर पद पर प्रोन्नत किया जा सकता है. सरकार के इस फैसले के बाद से ऐसी आशंका जताई जा रही है कि उसके इस निर्णय के बाद नियोजित शिक्षकों के साथ साथ अब ये 18 हज़ार शिक्षक भी नीतीश की आगामी संकल्प यात्रा के दौरान उनका कड़ा विरोध करेंगे.

शिक्षा दिवस के उद्घाटन समारोह के दौरान शिक्षा मंत्री ने यह घोषणा की कि राज्य के सभी विद्यालयों को अगले साल उत्कृष्ट विद्यालय में तब्दील किया जाएगा. इस बार 274 विद्यालयों को उस श्रेणी में तब्दील किया गया है. शाही के अति उत्साही बयान की सच्चाई यह है कि कुल 76 हज़ार प्रारंभिक विद्यालयों में से पूरे सूबे में मात्र 274 ही उत्कृष्ट की श्रेणी में आने लायक थे, जो दशमलव पांच प्रतिशत के आंकड़े से भी कम है. इससे सरकार की उदासीनता और उसके खोखले प्रयासों की झलक साफ मिलती है. बावजूद इसके, सरकार समारोह आयोजित कर अपनी पीठ ख़ुद थपथपाती है.

बिहार के माध्यमिक और उच्च शिक्षा की बात छोड़ भी दें तो प्राथमिक विद्यालयों की स्थिति तो बहुत ही भयावह है. मानक कहता है कि 40 छात्र पर एक शिक्षक होना चाहिए, लेकिन यहां प्राथमिक विद्यालयों में कुल सवा दो करोड़ बच्चे हैं, जिन्हें पढ़ाने के लिए मात्र तीन लाख शिक्षक हैं. इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि शिक्षकों की कितनी कमी है. अब तक सरकार नियोजन के ही मामले में अपने लक्ष्य को नहीं पूरा कर सकी है.

इसी तरह एक साथ सूबे के कई स्कूलों को उत्क्रमित कया गया. अधिक फंड जुटाने के फेरे में सरकार ने उन स्कूलों को भी उत्क्रमित कर दिया, जिनके पास संसाधनों का घोर अभाव था. उदाहरण के तौर पर आप बेगूसराय जिले के सुघरन मध्य विद्यालय को देख सकते हैं. भूमि व भवनहीन प्राथमिक विद्यालय सुघरन को उत्क्रमित कर मध्य विद्यालय बना दिया गया. अधिकारियों की लापरवाही यहीं ख़त्म नहीं हुई. उन्होंने इसी विद्यालय में एक भवनहीन प्राथमिक विद्यालय सुघरन को भी शिफ्ट कर दिया. अब उत्क्रमित मध्य विद्यालय सुघरन की स्थिति काफी दयनीय है. इसे देखकर तबेला भी आपको इससे बेहतर लगेगा. स्थिति यह है कि पूर्व के तीन कमरे और चार निर्माणाधीन कमरों में दो स्कूलों की 13 कक्षाएं चलती हैं. और इस दयनीय स्थिति में कुल 1200 बच्चे पढ़ने को विवश हैं. ऐसा नहीं है कि राजधानी के सरकारी स्कूलों की स्थिति बहुत बेहतर है. जब पूरी राजधानी शिक्षा दिवस के समारोह में व्यस्त थी, पुरस्कार वितरण, व्याख्यानों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का सिलसिला जारी था, तो राजधानी के कुछ बच्चे अफसोस में डूबे ख़ुद को कोस भी रहे थे. शास्त्री नगर मध्य विद्यालय, उच्च विद्यालय टीके घोष, मध्य विद्यालय धीराचक सहित कई ऐसे विद्यालय हैं, जहां संसाधनों का घोर अभाव है. विद्यालय को देखकर लगता है कि ये हादसे को आमंत्रित कर रहे हों.

बिहार के माध्यमिक और उच्च शिक्षा की बात छोड़ भी दें तो प्राथमिक विद्यालयों की स्थिति तो बहुत ही भयावह है. मानक कहता है कि 40 छात्र पर एक शिक्षक होना चाहिए. लेकिन आयोजनों में व्यस्त सरकार को शायद पता नहीं है कि यहां प्राथमिक विद्यालयों में कुल सवा दो करोड़ बच्चे हैं, जिन्हें पढ़ाने के लिए मात्र तीन लाख शिक्षक हैं. इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि शिक्षकों की कितनी कमी है. अब तक सरकार नियोजन के ही मामले में अपने लक्ष्य को नहीं पूरा कर सकी है. सूबे में टीईटी उत्तीर्ण शिक्षकों की कुल संख्या एक लाख पच्चीस हज़ार के आसपास बताई जाती है, जबकि ढाई लाख पद रिक्त हैं. बावजूद इसके, अभी तक मात्र पच्चीस हज़ार शिक्षकों को ही नियोजित किया जा सका है. आयोजनों में व्यस्त विभाग को उन्हें पदस्थापित करने का समय नहीं है. हैरत की बात है कि उन पच्चीस हज़ार शिक्षकों को नियुक्ति के बाद दस माह बीत जाने के बाद भी वेतन नहीं दिया गया है. अंदाजा लगाया जा सकता है कि बिना वेतन के ये शिक्षक कितनी कुशलता से पठन-पाठन कराते होंगे. इतना ही नहीं, उन शिक्षकों से बिहार में और भी काम लिए जाते हैं. मसलन जनगणना करना, आपदा के वक्त राहत वितरण कार्य करना, मतदाता सूची बनाना, गाय-बकरी गिनना और कभी कभी बड़े अधिकारी अपने यहां उन्हें क्लर्की करने के लिए भी बुला लेते हैं. बिहार में शिक्षा की स्थिति को आंकड़े कुछ और साफ कर देते हैं. सूबे में प्राथमिक और मध्य विद्यालय मिलाकर कुल 76 हज़ार के आसपास स्कूल संचालित होते हैं. इनमें से 8600 स्कूल भवनहीन हैं. नियम क़ानून की बात करें तो प्राथमिक विद्यालय के लिए जब तक साढ़े सात कट्ठा जमीन न हो और माध्यमिक विद्यालय के लिए 16 कट्ठा ज़मीन न हो, तब तक स्कूल नहीं खोला जा सकता, लेकिन बिहार में 8600 स्कूल शैक्षणिक ग्राफ बढ़ाने और अधिक फंड लेने के लिए आनन-फानन में खुले. 7276 स्कूलों की रसोई को शेड तक मयस्सर नहीं हैं. 72 हज़ार स्कूलों में मिड डे मील योजना चलती है. प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में क़रीब दो करोड़ बच्चे नामांकित हैं, उनमें एक करोड़ तीस लाख बच्चों को मिड डे मील मिलता है. शेष बच्चों के लिए या तो अभी तक व्यवस्था नहीं हो सकी है या फिर वे स्कूल आते नहीं हैं. जब नियोजित शिक्षकों की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठने शुरू हुए तो सरकार ने उन्हें प्रशिक्षित करवाया. अब इग्नू ने जो प्रमाणपत्र उन्हें दिए हैं, वही एनसीटीइ मान नहीं रही है. गत साल ही यूनिसेफ ने समझें-सीखें नाम से अध्ययन रिपोर्ट भी तैयार की थी. रिपोर्ट में कहा गया था कि बिहार में 89 प्रतिशत शिक्षण तालिका यानी रूटीन का अनुपालन नहीं करते. 65 विद्यालयों में शिक्षक ब्लैकबोर्ड का ही प्रयोग ही नहीं करते. 98 प्रतिशत कक्षाओं में शिक्षक पाठ योजना का उपयोग नहीं करते. 86 प्रतिशत कक्षाओं में पाठ से संबंधित गतिविधियां ही नहीं होती. 81 प्रतिशत कक्षाओं में किसी भी रूप में उसका मूल्यांकन नहीं होता और 97 प्रतिशत शिक्षकों को उनकी कक्षाओं के शैक्षिक लक्ष्य के बारे में ही जानकारी ही नहीं रहती. बिहार में शिक्षा, उसकी आधारभूत संरचना वाकई ख़तरनाक दौर से गुज़र रही है. उस पर से अधिकारियों की लापरवाही, दृष्टिहीनता उसे और भयावह बनाती है. इस संदर्भ में प्राथमिक शिक्षक साझा मंच के रंजन कुमार कहते हैं कि जब बिहार की शिक्षा व्यवस्था अपने सबसे नाज़ुक दौर से गुज़र रही है तो ऐसे में समारोह मनाना कहीं से उचित नहीं है. अधिकारियों और विभाग की लापरवाही की वजह से हमारे शिक्षक अपनी अधिकतम योग्यता का प्रदर्शन नहीं कर पाते हैं. रंजन कहते हैं कि अब तक पूरे सूबे में 60 प्रतिशत बच्चों को किताबें नहीं मिली हैं, जो उन्हें क़ायदे से मार्च तक ही मिल जानी थीं. हैरत की बात है कि सरकार किताबो के नाम पर पैसे का रोना रोती है और समारोह के नाम पर करोड़ों ख़र्च करती है.

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