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तू डाल-डाल, मैं पात-पात
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तू डाल-डाल, मैं पात-पात

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राजनीति में न तो कोई किसी का स्थायी दोस्त होता है और न ही दुश्मन. यह बात सपा, बसपा और कांग्रेस के राजनीतिक सौदेबाजी को लेकर आपसी तिक़डमों से साबित हो जाती है. ये पार्टियां जो नाटक रच रही हैं, वह जनता के दिखावे और दबाव की राजनीति से ज़्यादा कुछ भी नहीं.

समाजवादी पार्टी एक तरफ केंद्र की यूपीए सरकार को अपनी बैशाखी का सहारा दे रही है, तो दूसरी तरफ इसे कोसने का कोई मौक़ा भी नहीं छोड़ रही है. यही हाल कांगे्रस का है, वह समाजवादी पार्टी और बसपा से समर्थन भी ले रही है. और दोनों की जड़ो में मट्ठा डालने का भी काम कर रही है.कई मुद्दों पर तीनों दलों के बीच गहरा मतभेद दिखाई दे रहा है.बस फर्क इतना है कि समाजवादी नेता अपनी नाराजगी का इजहार खुले आम कर रहे हैं, वहीं बसपा नेत्री दबी ज़ुबान इस्तेमाल कर रही हैं.यही वजह है यूपीए-2 में समाजवादी पार्टी के मुकाबले बसपा को कांगे्रस अपने ज्यादा करीब पा रही है.कहा यह भी जा रहा है कि मुलायम का प्रधानमंत्री बनने का सपना कांगे्रस और सपा के बीच बढ़ती खाई की मुख्य वजह बनता जा रहा है, जबकि मायावती अपने आप को प्रधानमंत्री की रेस से दूर रखे हुए हैं, भले ही मौका देखकर वे करवट बदलने से बाज नहीं आएंगी, यह राजनीति का नियम भी है. यहां वफादारी और बेवफाई का सिलसिला एक साथ चलता हैं.

समाजवादी पार्टी सभी  मोर्चो पर केंद्र सरकार और  कांग्रेस को घेर रही है. लगता है सपा मानसून सत्र से पहले कांगे्रस पर अधिक से अधिक दबाव बना लेना चाहती है, ताकि कांगे्रस को कुछ मुद्दों पर झुकाया जा सके. इसी सोच के चलते सपा नेताओं ने राग अलापना शुरू कर दिया है कि 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद कांगे्रस से दिल्ली की कुर्सी छिन जानी है. जनता त्रस्त है और देश की अर्थव्यवस्था पटरी से उतर चुकी है. सीमाएं असुरक्षित है. घरेलू मोर्चे पर भी केंद्र की यूपीए सरकार का रिजल्ट कार्ड बहुत ख़राब है. इससे क्षुब्ध और कुंठित कांग्रेस जाते-जाते जनता को गहरे आघात देने का मन बना चुकी है. मंहगाई और भ्रष्टाचार को खुली छूट दे दी गई है, ताकि आम आदमी जीते जी मृतप्राय हो जाए. केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने हाल में ही चालू सत्र की पहली तिमाही में मनरेगा के पैसे के कम खर्च के लिये राज्य सरकार पर ठीकरा फोड़ा, तो सपा-कांगे्रस में तकरार शुरू हो गई है. जयराम नरेश ने मनरेगा में लापरवाही का आरोप प्रदेश सरकार पर लगाते हुए मुख्यमंत्री को एक पत्र लिखा था. इस पर उत्तर प्रदेश के ग्राम्य विकास राज्य मंत्री(स्वतंत्र प्रभार) अरविंद सिंह गोप ने जबावी हमला करते हुए यहां तक बोल दिया कि जयराम रमेश झूठ बोल रहे हैं. अन्य राज्यों की अपेक्षा उप्र में मनरेगा की प्रगति चौथे नंबर पर है. गोप ने यह भी आरोप लगाया कि केंद्र की वजह से मनरेगा कर्मियों को वेतन का भुगतान नहीं हो पा रहा है.

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सपा तमाम मसलों पर केंद्र को घेर रही है. उसने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने तेल कंपनियों को मनमर्जी से पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने की छूट दे दी है. तेल कंपनियों ने छह हफ्तों में लगातार चौथी बार पेट्रोल के रेट बढ़ा दिए हैं. पेट्रोल की क़ीमतों में पहले कुछ वर्षों में, फिर कुछ महीनों में एक बार बढ़ोत्तरी होती थी, लेकिन अब तो हर सप्ताह दामों में उतार चढ़ाव नज़र आता है. पेट्रोल के साथ डीजल के दामों में भी बढ़त होती है, तो ईंधन गैस के भी दाम बढ़ा दिए जाते हैं, इससे माल ढुलाई मंहगी होती है. गैस के दाम बढ़ने से घरेलू बजट अस्त व्यस्त होता है. कांगे्रस के सांसद और पूर्व नौकरशाह पीएल पुनिया ने सपा के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि कांगे्रस पार्टी ने देश को विकास, अमन और खुशहाली दी, लेकिन पिछले कुछ दशकों में ग़ैर कांगे्रसी सरकारों ने प्रदेश में विकास और तरक्की के रास्तों को अवरुद्ध करके यहां जातिवाद का विष फैला दिया.

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बहरहाल, सपा के अरोपों को अनदेखा नहीं किया जा सकता. खुद सरकारी आंकड़े बताते है कि मंहगाई जून में बढ़कर 486 फीसदी हो गई, जो कि मई में 470 फीसदी थी. जून में खाद्य उत्पादों के थोक मूल्य सूचकांक में 974 फीसदी की वृद्धि अंकित की गई है. प्याज और सब्ज़ी की कीमतें तो आसमान छूने लगी है. प्याज की क़ीमतों में जून, 2013 में 114 प्रतिशत का इजाफा हुआ है. सब्ज़ियों की मंहगाई दर जून, 2013 में 1647 बढ़ी, जो मई, 2013 में 485 प्रतिशत थी. चावल की मंहगाई दर जून में क्रमश: 1718 और 1911 प्रतिशत थी, जो मई, 2013 में 1601 तथा 1848 प्रतिशत थी.

सपा की बातों में दम लगता है. देश में कथित अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री के रहते भी रुपए की क़ीमत में गिरावट थमने का नाम नहीं ले रही है. रुपया डालर के मुक़ाबले गिरकर 6121 के निम्न स्तर पर पहुंच गया है. निर्यात  में 46 फीसदी और औद्योगिक उत्पादन में 16 प्रतिशत की गिरावट आने से देश की अर्थव्यवस्था की चिंताजनक स्थिति का प्रदर्शन होता है. वित्तमंत्री और प्रधानमंत्री के साथ रिजर्व बैंक के गवर्नर सुब्बाराव की बैठकें भी बेनतीजा साबित हो रही हैं. देश में बढ़ती मंहगाई पर संसद में मुलायम सिंह यादव ने केंद्र सरकार से डॉ. राम मनोहर लोहिया की दाम बांधों नीति अपनाने का आग्रह किया था, लेकिन कांग्रेस सरकार ने इनके सुझावों पर ध्यान नहीं दिया. नतीजा सामने है. देश दुनिया के सामने भारत की किरकिरी हो रही हैं. देशवासी बुरी तरह परेशान हैं और दुश्‍वारियों में घिरे हैं. कितने ही ग़रीबों ने कुपोषण और किसानों ने बदहाली के चलते अपनी जानें गवाई है.

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इधर, बात बसपा की कि जाए, तो बसपा सुप्रीमो मायावती आगे से कांगे्रस के लिए ज़्यादा मुफीद साबित हो रही हैं. तुनकमिजाजी के चलते पल भर में गंठबंधन तोड़ने और साथ छोड़ने में देरी नहीं करने वाली माया ने अब प्रोन्नति में आरक्षण के मुद्दे को छोड़कर किसी भी मसले पर यूपीए सरकार के सामने मुश्किल खड़ी नहीं की. इसलिए कांगे्रसी उन पर मुलायम के मुक़ाबले ज़्यादा भरोसा कर रहे हैं. माया का पीएम रेस में खुले तौर पर शामिल नहीं होना भी कांगे्रस को भला लग रहा है.

समाजवादी पार्टी सभी मोचों पर केंद्र सरकार और  कांग्रेस को घेर रही है. लगता है सपा मानसून सत्र से पहले कांगे्रस पर अधिक से अधिक दबाव बना लेना चाहती है, ताकि कांगे्रस को कुछ मुद्दों पर झुकाया जा सके. इसी सोच के चलते सपा नेताओं ने राग अलापना शुरू कर दिया है कि 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद कांगे्रस से दिल्ली की कुर्सी छिन जानी है. जनता त्रस्त है और देश की अर्थव्यवस्था पटरी से उतर चुकी है. सीमाएं असुरक्षित है. घरेलू मोर्चे पर भी केंद्र की यूपीए सरकार का रिजल्ट कार्ड बहुत ख़राब है.

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