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नवाज से उम्मीद क्यों करनी चाहिए ?
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नवाज से उम्मीद क्यों करनी चाहिए ?

नवाज़ शरीफ़ के प्रधानमंत्री बनने से भारत को क्या फ़ायदा होने वाला है? क्या नवाज़ शरीफ़ भारत के साथ अच्छे संबंध बनाने का प्रयास करेंगे और अगर करेंगे, तो क्यों? क्या नवाज़ शरीफ़ भारत के प्रति नरम रुख़ रखते हैं या फिर भारत के साथ संबंध सुधारना पाकिस्तान के हित में है, इसलिए नवाज़ शरीफ़ को क्या इस ओर क़दम उठाना चाहिए? आख़िर भारत को नवाज़ से उम्मीद क्यों करनी चाहिए?

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कट्टरपंथी संगठनों के हिंसात्मक विरोध के बीच पाकिस्तान में चुनाव हुए और लोगों ने लोकतंात्रिक मूल्यों को ज़िंदा रखने के लिए अपनी जान की परवाह किए बिना चुनाव में हिस्सा भी लिया. राजनीतिक दल सत्ता पाने के लिए चुनाव लड़ते हैं और जनता अपने भविष्य की सुरक्षा के लिए चुनाव में भाग लेती है. पाकिस्तान के चुनाव में साठ प्रतिशत मतदान हुआ, जिससे यह साफ़ हो गया है कि वहां की जनता को लोकतांत्रिक सरकार पर भरोसा है न कि सैनिक तानाशाही पर. तानाशाही और लोकतंत्र के बीच सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण अंतर यही होता है कि तानाशाह को जनता की नहीं, बल्कि सेना की ताक़त चाहिए, जबकि लोकतांत्रिक सरकार को जनता की ताक़त चाहिए. ज़ाहिर है कि अगर जनता को साथ रखना है, तो उसकी ज़रूरतों का ख्याल रखना होगा. सरकार अगर उसकी ज़रूरतों का ख्याल नहीं रखती है, तो वह उसे सत्ता से बाहर कर देगी. यही वह बात है, जो भारत के लिए उम्मीद की एक नई किरण पैदा करती है.

पाकिस्तान की नई सरकार को जनता की ज़रूरतों का ख्याल रखना होगा और इस समय जनता की सबसे बड़ी ज़रूरत आतंक से मुक्ति है, क्योंकि यही पाकिस्तान की समस्या की जड़ है, जो अन्य कई समस्याओं को पैदा करती है. अगर नई सरकार को अपनी विश्‍वसनीयता बहाल करनी है और फिर से सत्ता में आने की दावेदारी पेश करनी है, तो आतंकी संगठनों से पाकिस्तान को बचाना होगा और इसके लिए पाकिस्तान को भारत विरोध का राग अलापना बंद करना होगा. पाकिस्तान में आतंक की खेती होती है और इस खेती को बढ़ाने के लिए भारत विरोध नामक उर्वरक का उपयोग किया जाता है.

पाकिस्तान की नई सरकार को जनता की ज़रूरतों का ख्याल रखना होगा और इस समय जनता की सबसे बड़ी ज़रूरत आतंक से मुक्ति है, क्योंकि यही पाकिस्तान की समस्या की जड़ है, जो अन्य कई समस्याओं को पैदा करती है. अगर नई सरकार को अपनी विश्‍वसनीयता बहाल करनी है और फिर से सत्ता में आने की दावेदारी पेश करनी है, तो आतंकी संगठनों से पाकिस्तान को बचाना होगा और इसके लिए पाकिस्तान को भारत विरोध का राग अलापना बंद करना होगा. पाकिस्तान में आतंक की खेती होती है और इस खेती को बढ़ाने के लिए भारत विरोध नामक उर्वरक का उपयोग किया जाता है. जब तक इस उर्वरक को नष्ट नहीं किया जाएगा, तब तक पाकिस्तान में बढ़ते आतंक के ख़तरे को रोका ही नहीं जा सकता है. एक लोकतांत्रिक सरकार इस ओर क़दम बढ़ा सकती है, क्योंकि उसे जनता को सुरक्षा मुहैया करानी है और जनता को सुरक्षा तभी मिलेगी, जब आतंकी संगठनों को कमज़ोर कर दिया जाएगा. आतंकी संगठन जेहाद के नाम पर वहां के युवाओं को भ्रमित करते हैं. पहले तो इन्हें कश्मीर के नाम पर भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के लिए प्रेरित किया जाता है, लेकिन जब इनके नेता को लगता है कि पाकिस्तान सरकार या फिर वहां का समाज उनके अनुसार नहीं चल रहा है, तो ये भस्मासुर बन जाते हैं. पहले अमेरिका ने तालिबान को रूस के विरुद्ध उपयोग करने के लिए मदद की. जब तालिबान सशक्त हो गया और उसे लगा कि अमेरिका का हित उसके विरुद्ध जा रहा है, तो उसने अमेरिका के ख़िलाफ़ जंग छेड़ दी. इसी तरह पाकिस्तान के आतंकी संगठनों को भारत में जेहाद के नाम पर तैयार किया गया, लेकिन अब स्थिति यह है कि ये जितना ख़तरा भारत के लिए बने हुए हैं, उससे बड़ा ख़तरा पाकिस्तान के लिए भी हैं.

अगर पाकिस्तान सरकार आतंक से अपनी जनता को सुरक्षा देना चाहती है, तो सबसे पहले उसे भारत के साथ छद्म युद्ध की नीति त्यागनी होगी. चूंकि  नवाज़ शरीफ़ को जनता ने इसलिए चुना, क्योंकि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी उनकी आकांक्षाओं पर खरी नहीं उतरी. पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के शासनकाल में सेना और न्यायपालिका के साथ लगातार सरकार का टकराव होता रहा. राष्ट्रपति ज़रदारी के ऊपर भ्रष्टाचार का मुक़दमा चलाने के मुद्दे पर प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी को अपना पद त्यागना पड़ा. आतंकवाद पहले से अधिक बढ़ गया. वहां की जनता को लगा कि पीपीपी से उम्मीद करना बेकार है. जनता के पास दूसरा विकल्प इमरान ख़ान के रूप में उपलब्ध था, लेकिन इमरान पर सेना से गुपचुप समझौते का आरोप लग रहा था और वहां की जनता किसी भी तरह से सेना को शासन में शामिल नहीं करना चाहती थी. शायद इसलिए इमरान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ को ख़ैबर-पख्तून-ख्वा में बहुमत मिला, लेकिन नेशनल एसेंबली में उसे बहुत कम सीटें मिलीं. जनता ने नवाज़ शरीफ़ को इसलिए मौक़ा दिया है, क्योंकि उनकी सेना के साथ लगातार अनबन होती रही है. उसे दो बार सत्ता खोनी पड़ी है. पहली बार वह तीन साल के लिए और दूसरी बार दो साल के लिए प्रधानमंत्री बने. उन्हें अपनी नीतियों को लागू करने का मौक़ा नहीं मिला, जबकि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को पांच साल का मा़ैका मिला और उसने अपना चरित्र दिखा दिया. ऐसे में नवाज़ शरीफ़ को मौक़ा मिला है और अगर वह अपनी राजनीति को आगे बढ़ाना चाहते हैं, तो भारत के साथ संबंध सुधारना पड़ेगा. भारत विरोध की राजनीति त्यागने से आतंकवाद पर अंकुश लगेगा और इससे वहां की आर्थिक स्थिति बेहतर होगी. अर्थव्यवस्था में सुधार से शिक्षा और रोज़गार सृजन के क्षेत्र में निवेश किया जा सकेगा. बेरोज़गारी और आतंकवाद एक दूसरे के समानुपाति हैं, क्योंकि बेरोज़गार युवकों को भ्रमित करना ज़्यादा आसान होता है.

नवाज़ शरीफ़ एक परिपक्व राजनेता हैं और उनसे इस बात की उम्मीद की जा सकती है कि वह अपना और पाकिस्तान की जनता के भविष्य का ख्याल रखेंगे. हालांकि उन्होंने साफ़ तौर पर कहा है कि भारत और पाकिस्तान के बीच का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा कश्मीर है और इस पर बात होनी चाहिए, क्योंकि इसके बिना दूसरे रिश्ते नहीं सुधर सकते. नवाज़ की बात सही है और इस पर बात होनी भी चाहिए. दोनों देश इस मुद्दे को एक तार्किक परिणति तक पहुंचाएं, लेकिन शांतिपूर्ण तरी़के से. नवाज़ शरीफ़ भी यह कह रहे हैं और भारत सरकार का भी यही मानना है, इसलिए अच्छे रिश्तों की उम्मीद तो की ही जा सकती है. पाकिस्तान और भारत के बीच रिश्ते सुधरने से दोनों का व्यापार बढ़ेगा, भारत की तकनीकी जानकारी और बड़े बाज़ार का लाभ पाकिस्तान को होगा. पाकिस्तान के कपास, उर्वरक, खेल के सामान आदि का बहुत बड़ा बाज़ार भारत में है. इसलिए भारत के साथ संबंध सुधारने से ही पाकिस्तान की तरक्की का रास्ता तैयार होता है और अगर तरक्की होगी, तो जनता को शासन पर भरोसा होगा और इसी भरोसे से लोकतंत्र मज़बूत होगा. नवाज़ शरीफ़ इस लोकतंत्र की उपज हैं और वह इस बात को जानते भी हैं. यही कारण है कि उन्होंने पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के ऊपर भ्रष्टाचार आदि के इतने आरोपों के बावजूद उसकी सरकार गिराने के लिए ज़्यादा मेहनत नहीं की, बल्किउसे अपना कार्यकाल पूरा करने दिया. हालांकि नवाज़ के आने से इस बात की उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि पाकिस्तान का भारत के प्रति रुख़ बिल्कुल नरम हो जाएगा, लेकिन कुछ तो नरम होगा ही, क्योंकि इसमें पाकिस्तान और नवाज़ शरीफ़ का भविष्य भी सुरक्षित होगा और इससे दोनों देशों के बीच आर्थिक और कूटनीतिक संबंधों की बहाली का फ़ायदा जनता को भी मिलेगा. एक बार अगर जनता को भारत के साथ अच्छे संबंधों का फ़ायदा दिखाई देने लगेगा, तो भारत के प्रति उनकी कड़वाहट में कमी आना लाज़िमी है. इसलिए धीरे-धीरे दोनों को आगे बढ़ना होगा. इसके अलावा, सैनिक शासन की वापसी को रोकने के लिए भी नवाज़ भारत के मुद्दे को सुषुप्त करने की कोशिश करेंगे, क्योंकि पाकिस्तान के सैनिक तानाशाहों का सबसे बड़ा मुद्दा भारत विरोध ही रहा है. नवाज़ अपने राजनतीकि भविष्य को बचाए रखने के लिए भारत के प्रति नीति में परिवर्तन लाएंगे और उन्होंने चुनाव के बाद इसका संकेत भी दे दिया है.

 

यह अवाम की जीत है 

पाकिस्तान में चुनाव संपन्न हो गए. नवाज़ शरीफ़ की पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) सबसे बड़ी पार्टी बनी. लेकिन इस चुनाव में जीत किसकी हुई? देखा जाए, तो बेशक नवाज़ शरीफ़ जीते हैं, लेकिन इस चुनाव में वास्तविक जीत लोकतंत्र की हुई है और इस जीत का श्रेय जनता को जाता है. जनता ने जिन कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए लोकतंत्र की इस मुहिम को सफल बनाया है, उससे इस बात का संकेत मिलता है कि अब जनता अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो गई है. पाकिस्तानी तालिबान ने इस चुनाव का विरोध किया था. चरमपंथी संगठनों ने इस चुनाव को विफल बनाने का भरसक प्रयास किया. चुनाव से पहले पाकिस्तान के कई शहरों में बम विस्फोट किए गए. चुनाव के दौरान हुए हमलों में लगभग 110 लोग मारे गए और 300 से अधिक लोग घायल हुए. पार्टी के दफ्तरों के पास भी बम विस्फोट किए गए, यहां तक कि चुनाव के समय भी कई जगहों पर बम विस्फोट किए गए. चुनाव शुरू होने के क़रीब दो घंटे के बाद ही कराची में अवामी नेशनल पार्टी के दफ्तर के पास बम विस्फोट हुआ, जिसमें 11 लोगों की मौत हो गई तथा लगभग 60 लोग घायल हो गए. पाकिस्तानी तालिबान ने इसकी ज़िम्मेदारी भी ली. इन घटनाओं के बावजूद पाकिस्तानी अवाम ने देश में लोकतंत्र बहाल करने के प्रति अपनी कटिबद्धता दिखाई और घरों से बाहर निकलकर वोट डाले. पाकिस्तान के इस चुनाव में मतदान साठ प्रतिशत रहा, जिसे बहुत अच्छा माना जा सकता है. भारत जैसे देश में भी इसके आसपास ही वोट डाले जाते हैं, कुछ प्रदेशों में तो 50-55 प्रतिशत वोट डाले जाते हैं. पाकिस्तान की जनता ने साहस के साथ इन चरमपंथी संगठनों का सामना किया और अपनी जान की परवाह किए बिना वोट डाले. वोट डालने के लिए जाने वाले लोगों से जब कुछ पत्रकारों ने हिंसा के बारे में पूछा, तो उनमें से कुछ का कहना था कि वे या तो मतदान करेंगे या फिर मतदान करते हुए मारे जाएंगे. उनका कहना था कि मतदान करने के लिए जाते हुए मरना ज़्यादा पसंद करेंगे, बजाए इसके कि पांच साल तक हर दिन मरते रहें. देखा जाए, तो पाकिस्तान के इस चुनाव में किसी दल की नहीं, बल्कि अवाम की जीत हुई है, जो किसी भी हालत में फिर से सैनिक शासन नहीं चाहती है.

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