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पाकिस्तानी बिसात पर अमेरिकी मोहरें

पाकिस्तानी बिसात पर अमेरिकी मोहरें

पाकिस्तान के सबसे ज़्यादा बिकने वाले उर्दू अख़बार जंग के एक बड़े स्तंभकार नाज़िर नाजी अपने आठ मई के स्तंभ में एक बड़ी चौंकाने वाली बात लिखी है. नाजी ने लिखा है अफ-पाक का हिस्सा बनने के बाद पहली बार इलाक़े के दोनों इनचार्ज एक साथ अमेरिका में हाज़िर हुए. करज़ई को ऐतिहासिक तौर पर अपनी हैसियत मालूम है. हमारे सद्र (राष्ट्रपति) अफ-पाक की तरफ से नए-नए गए हैं. हमें यक़ीनन नतीजे पर ताज्जुब हुआ. जो कुछ दिया गया, वह कुछ यूं है-किताबें, यूनीफार्म, स्टेशनरी और ट्रांसपोर्ट का इंतज़ाम किया कराया मिलेगा-रोज़ का जेब ख़र्च साथ-साथ देते रहेंगे. अफगानिस्तान में बीते दिनों से अफगान शासकों को जेब ख़र्च मिलता आया है, करज़ई तक को. अब हमें भी मिलेगा. मैं अफ-पाक में छिपे मतलब को इस तरह देखता हूं. पहले हम उप-महाद्वीप और दक्षिण एशिया के महत्वपूर्ण देश थे. अब हम अफगानिस्तान से नत्थी कर दिए गए हैं.

भूतकाल का उप-महाद्वीप, और पूर्वी पाकिस्तान खोने के बाद भुट्टो साहिब का तलाश किया हुआ दक्षिण एशिया, जिसे वह भारत का पिछवाड़ा नहीं मानते थे बल्कि उसे मध्य एशिया की अगाड़ी कहते थे.

अपनी बात साबित करने के लिए ही उन्होंने इस्लामी कांफ्रेंस आयोजित की थी, जिसकी सज़ा उन्हें दे दी गई. वह सब कुछ सपना हो गया. शब्दावली के बदलाव से जो फर्क़ आया वह यह है कि हम न उप-महाद्वीप की ऐतिहासिक विरासत और उसके फैलाव में हिस्सेदार रहे, न दक्षिण एशिया के लंबे-चौड़े इलाक़े के महत्वपूर्ण सदस्य रहे और न ही मध्य एशिया की अगाड़ी बनकर तेल और भूगोल की ताक़त को अपनी सामरिक पहचान में शामिल कर सके. हम अपने सारे संभावित विस्तार को छोड़ कर अफगानिस्तान में सामरिक गहराई ढूंढ़ने जा निकले. यह उसी तरह था कि ज़मीन के नीचे रहने वाले किसी प्राणी को खुले मैदान उपलब्ध हों, लेकिन वह बिल के अंदर छुप जाने का इंतज़ाम करता रहे. इंतज़ाम हो गया. हमें सामरिक गहराई तो न मिली-सामरिक गहराई को हमारे साथ मिला दिया गया और हम अफ-पाक हो गए. अब हम अफ-पाक की अगाड़ी हैं.
नाज़िर नाजी का यह लेख पाकिस्तान की शतरंजी बिसात पर खेले जाने वाले खेल के सटीक आंकड़े हैं. सच्चाई यह है कि उप-महाद्वीप के एक हिस्से को अलग किए जाने की पूरी तैयारी चल रही है, लेकिन उप-महाद्वीप का बड़ा और अभिन्न अंग होने के बावजूद भारत में अभी तक कोई गंभीर विचार-विमर्श नहीं हो रहा है. तालिबान के नाम पर खेले जाने वाला यह खेल क्या रंग दिखाएगा, यह तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन इस पूरे खेल के कुछ इशारे मिलने शुरू हो गए हैं. पड़ोस में लगी आग को बुझाने के उपाय नहीं किए गए तो यह आग पूरे दक्षिण एशिया को अपनी लपेट में ले सकती है. पाकिस्तान से अफगानिस्तान तक खेला जाने वाला यह खेल हमारे अपने लिए चिंता का विषय है. क्या तालिबान इतनी बड़ी ताक़त बन गए हैं कि अफगानिस्तान में अमेरिकी और नाटो की फौजें उनको पिछले आठ वर्षों में काबू नहीं कर पाई हैं? क्या पाकिस्तानी तालिबान अफगानिस्तान में 1994 में उभरने वाले तालिबान का हिस्सा हैं या फिर वे किसी और के लिए काम कर रहे हैं? तालिबान को मिलने वाले हथियार और पैसे कहां से आ रहे हैं? क्या कोई आतंकवादी संगठन किसी देश की फौज से टक्कर लेने की कोशिश अपने बल-बूते पर कर सकता है?  इन, और इन जैसे कई और सवालों पर गंभीरता से सोचना ज़रूरी है. तालिबान के उत्थान को स़िर्फ एक धार्मिक उन्माद का नाम देकर टाला नहीं जा सकता. इस धार्मिक उन्माद के पीछे कौन सी ताक़तें काम कर रही हैं और वे इस पूरे उप-महाद्वीप में क्या खेल खेल रही हैं, इस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए ताकि पाकिस्तान में लगी इस आग को फैलने से रोका जा सके. पाकिस्तान से आने वाली ख़बरों के अनुसार, 2 मई 2009 को स्वात, बुनेर और दीर के इलाक़ों में शुरू होने वाली फौज की कार्रवाई के कारण अभी तक 10 लाख से अधिक लोगों का पलायन हो चुका है. यूएनएचसीआर और रेड क्रॉस जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठन भी बेघर होने वाले ख़ानदानों की मदद के लिए मैदान में आ चुके हैं. यह भी कहा जा रहा है कि फौज दक्षिण वज़ीरिस्तान में भी ऑपरेशन की तैयारी कर रही है. इस हिसाब से आने वाले दो महीनों में बेघर लोगों की संख्या 25 लाख तक पहुंच जाने का अनुमान है. और अगर उसके बाद भी यह ऑपरेशन जारी रहता है, तो उनकी संख्या का सिर्फ अनुमान लगाया जा सकता है. न स़िर्फ पाकिस्तान बल्कि अमेरिकी हरकारों ने ऑपरेशन शुरू होने से पहले यह कहा था कि केवल कुछ सप्ताह में ही ये इलाक़े तालिबान से खाली करा लिए जाएंगे. अब अमेरिकन काउंटर इंटरजेंसी के एक्सपर्ट माने जाने वाले डेविड किलकुल्लेन का कहना है कि पाकिस्तानी फौज के लिए इस तरह की स्थिति से निपटना संभव नहीं है.
इस का मतलब है कि अफगानिस्तान के बाद पाकिस्तान में भी तालिबान के विरुद्ध ऑपरेशन के लिए अमेरिकी और नाटो की मदद की दरकार होगी. ऐसी स्थिति में पाकिस्तान के हालात क्या होंगे, इसका अंदाज़ा लगाया जा सकता है. इराक़ में भी अमेरिकी विनाशकारी हथियारों के नाम पर घुसे थे जो बाद में ग़लत साबित हुआ. कहीं ऐसा ही खेल पाकिस्तान में खेलने की तैयारी तो नहीं हो रही, इस पर नज़र रखना आवश्यक है.
पाकिस्तान के शासक मुंह खोलने से पहले अमेरिका से इजाज़त लेते रहे हैं और यही वजह है कि अब अमेरिकी पाकिस्तान में अपनी मनमानी करने पर उतर आए हैं. अमेरिकी मीडिया से लेकर पाकिस्तानी अख़बारों तक यह संदेश दिया जा रहा है कि इतनी भारी संख्या में लोगों का पलायन फौज के ऑपरेशन के बाद शुरू हुआ.  फौज का ऑपरेशन शुरू होते ही पाकिस्तान में डॉलरों की बरसात शुरू हो गई है. लेकिन यह सब अपनी जगह, पाकिस्तान में आम आदमी बेहाल है और सरकार या कोई भी राजनीतिक पार्टी उसका दुख-दर्द बांटने के लिए तैयार नहीं है. कहा यह जा रहा है कि तालिबान पर फौज के कंट्रोल के फौरन बाद इन लोगों को उनके इलाकों में वापस भेज दिया जाएगा. लेकिन यह कब होगा, इस का कोई भी संकेत नहीं दिया जा रहा. इतनी भारी तादाद में लोगों के पलायन का असर पाकिस्तान के दूसरे प्रांतों पर पड़ेगा. कराची में पठानों और मोहाजिरों और लाहौर में पठानों और पंजाबियों के बीच पहले भी झगड़े होते रहे हैं. इतनी बड़ी संख्या में लोगों के पलायन के बाद पाकिस्तान के दूसरे इलाक़ों में उनको बसाया जाएगा और इसके कारण सामाजिक और आर्थिक ढांचे पर पड़ने वाले बोझ की वजह से वहां पहले से रहने वालों के दिल में इन लोगों के विरुद्ध भावनाएं परवान चढ़ेंगी. इन तमाम समस्याओं से जूझना पाकिस्तान सरकार के लिए आसान नहीं होगा.
कुल मिला कर असर यह है कि अपना घर छोड़ कर  जानेवाले लोग अपने पुराने इलाक़ों में वापस नहीं जा पाएंगे. पाकिस्तान के क़बाइले इलाक़े अब पाकिस्तान के कंट्रोल में रहेंगे और वहां पर तालिबान के नाम पर पहले अमेरिका और नाटो की फौजें ऑपरेशन करेंगी और जब सारे लोग उन इलाक़ों को ख़ाली कर जाएंगे तब फिर अमेरिकी कंपनियां अपने साज़-ओ-सामान के साथ गैस और तेल की तालाश में अपने खेमे वहां गाड़ देंगी. और पाकिस्तान के शासक अपना-अपना हिस्सा लेकर स़िर्फ यह कह कर अपना दामन छुड़ा लेंगे कि- दुनिया में बादशाह है सो है वो भी आदमी और मुफलिस-ओ-ग़दा है सो है वो भी आदमी ज़रदार (ए) है सो है वो भी आदमी नेमत जो खा रहा है सो है वो भी आदमी टुकड़े चबा रहा है सो है वो भी आदमी.

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