fbpx
Now Reading:
रास्ट्रभाषा के संरक्षको का सम्मान
Full Article 5 minutes read

रास्ट्रभाषा के संरक्षको का सम्मान

भाषा का संबंध देश की उत्तपत्ति, विकास, संस्कृति और परंपरा से होता है. भाषा देश की अस्मिता होती है. हिंदी को राष्ट्रभाषा होने का गौरव प्राप्त है. जिस तरह समुद्र में न जाने कितनी छोटी बड़ी नदियां समा जाती हैं, उसी तरह हिंदी में भी न जाने कितनी बोलियों और भाषाओं के शब्द और संस्कार समाहित हो गए हैं. इसी वजह से तमाम बाधाओं के बावजूद समय के साथ हिंदी और ज्यादा परिपक्व और समृद्ध होती जा रही है. हिंदी की समृद्धि को उत्सव का रूप देने के लिए हर वर्ष संसद के केंद्रीय कक्ष में राष्ट्रभाषा उत्सव का आयोजन किया जाता है. जिसमें हिंदी की महत्ता को स्थापित करने और उसे बल देने में जुटे कलम के सिपाहियों, लेखकों, कवियों और पत्रकारों को उनके योगदान के लिए सराहा और पुरस्कृत किया जाता है.santosh-sir-award

हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी संसदीय हिंदी परिषद, परिचय साहित्य परिषद व विधि भारती परिषद द्वारा संसद के केंद्रीय कक्ष में राष्ट्रभाषा उत्सव का आयोजन किया गया. राष्ट्रभाषा उत्सव की अध्यक्षता पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित प्रतिष्ठित साहित्यकार डॉ. श्याम सिंह शशि ने की. पूर्व केंद्रीय विधि मंत्री और संसदीय हिंदी परिषद की अध्यक्ष डॉ. सरोजिनी महिषी, प्रतिष्ठित साहित्यकार अर्चना वर्मा सहित कई गणमान्य व्यक्ति मौजूद थे. इस अवसर पर संप्रेषण के विभिन्न क्षेत्रों में अपना अमूल्य योगदान दे रही कुछ महत्वपूर्ण श़िख्सयतों को राष्ट्रभाषा गौरव सम्मान से सम्मानित किया गया. पत्रकारिता के क्षेत्र में हिंदी भाषा में राजनीतिक विषयों पर मौलिक लेख लिखने और राजनीति जैसे गूढ़ विषय को सामान्य जन तक आसान भाषा में पहुंचाने के लिए लिए चौथी दुनिया के प्रधान संपादक संतोष भारतीय को राष्ट्रभाषा गौरव सम्मान से सम्मानित किया गया. इसी कड़ी में पत्रकारिता को संस्कृति से जोड़ने और हिंदी के विकास में अहम योगदान के लिए टीवी पत्रकार समीना अली को भी राष्ट्रभाषा गौरव सम्मान से सम्मानित किया गया. जिस गति से कंप्यूटर और सूचना प्रौद्योगिकी के नए संसाधनों का विकास हुआ है, उसी गति से हिंदी की लोकप्रियता भी बढ़ी है. बदलती तकनीक के इस दौर में हिंदी को बचाए रखने की चुनौती दिखाई पड़ रही थी, वहीं तकनीक हिंदी के एक वैश्‍विक भाषा बनने की राह में सबसे बड़ा वरदान साबित हो रही है. अब एक आम आदमी आसानी से कंप्यूटर, मोबाइल फोन आदि में अपने विचार हिंदी में प्रकट करता और बहस करता दिखाई देता है. इसमें उसे किसी तरह की कोई शर्म महसूस नहीं होती है. साहित्य व इंटरनेट पर योगदान आदि के लिए कवि शेरजंग गर्ग, डॉ. प्रवेश सक्सेना, डॉ. बालेन्दु शर्मा दाधीच तथा डॉ. शारदा वर्मा को राष्ट्रभाषा गौरव सम्मान से सम्मानित किया गया. कार्यक्रम के दौरान विधि भारती परिषद की महासचिव संतोष खन्ना द्वारा संपादित त्रैमासिक पत्रिका महिला विधि भारती के 75वें अंक का लोकार्पण किया गया. साथ ही अन्य कई पुस्तकों, जिनमें परिचय साहित्य परिषद के अध्यक्ष उर्मिल सत्यभूषण की सृजन-समग्र, अनुरागेंद्र निगम का काव्य संग्रह अंतस, डॉ. ऊषा देवी का कहानी संग्रह बड़ा हुआ तो क्या हुआ, सुषमा भंडारी की मौन के स्वर और सूर्य प्रकाश सेमवाल द्वारा संपादित पत्रिका हिम उत्तरायणी के राजभाषा विशेषांक का लोकार्पण भी हुआ.

संसदीय हिंदी परिषद की स्थापना गोविंद बल्लभ पंत जैसे दिग्गजों के सानिध्य में की गई थी. संविधान में हिंदी को संघ की राजभाषा घोषित किया जा चुका था. संसद में हिंदी के अधिकाधिक प्रयोग के लिए यह ज़रूरी था कि जनप्रतिनिधि संसद सदस्य संसद में हिंदी का अधिकाधिक प्रयोग करें. इसके लिए उन्हें हिंदी सिखाने के लिए संसदीय हिंदी परिषद की स्थापना की गई.

आरंभ से ही सांसदों और आम जनता में हिंदी को लोकप्रिय बनाने के लिए संसद के केंद्रीय कक्ष में हिंदी दिवस मनाया जाने लगा. कर्नाटक की हिंदी सेवी डॉ. सरोजनी महिषी 1962 में संसद में आईं तो उन्होंने हिंदी सिखाने का कार्यक्रम शुरू किया. 1972 तक वे संसद के केंद्रीय कक्ष में यह कार्यक्रम चलाती रहीं, पर बाद में यह काम लोकसभा सचिवालय ने अपने हाथ में ले लिया. उनका कहना था कि सेठ गोविंद दास ने तो हिंदी के विकास के लिए संसदीय हिंदी परिषद का गठन किया था.

गहन सोच के बाद यह तय किया गया कि संसद के केंद्रीय कक्ष, जहां से देश और दुनिया की बड़ी हस्तियां देश को संबोधित करती हैं, उस कक्ष में होने वाले इस समारोह को राष्ट्रभाषा उत्सव के रूप में मनाया जाए और देश की उन साहित्यकार विभूतियों को सम्मानित किया जाए, जो हिंदी की तन-मन से निरंतर सेवा कर उसे प्रगति के शिखरों तक ले जा रहे हैं. 12 सितंबर 2003 को पहली बार राष्ट्रभाषा गौरव सम्मान दिया गया. तब पुरस्कार पाने वालों में प्रभाकर श्रोत्रिय, दिनेश नंदिनी डालमिया, हिमांशु जोशी और राजकुमार सैनी जैसे साहित्यकार थे. अगले कुछ वर्षों में डॉ रमणिका गुप्ता, शांताबाई, डॉ. विश्‍वनाथ त्रिपाठी, डॉ. शाकुंतला कालरा, डॉ. परमानंद पंचाल, महीप सिंह, उर्मिल सत्यभूषण, डॉ. पूर्णचंद्र टंडन आदि को इस पुरस्कार से नवाजा गया. वर्ष 2011 में यह महसूस किया गया कि हिंदी को बढ़ावा देने में मीडियाकर्मी भी उल्लेखनीय भूमिका निभा रहे हैं. अतः उन्हें भी सम्मानित किया जाना चाहिए. 2011 में आयोजित किए गए राष्ट्रभाषा उत्सव में पहली बार पत्रकारों को राष्ट्रभाषा गौरव पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Input your search keywords and press Enter.