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सुरक्षा परिषद खुद असुरक्षित है

सुरक्षा परिषद खुद असुरक्षित है

भारत संयुक्त राष्ट्र के संस्थापक सदस्यों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है. यह 7 बार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य रह चुका है. इतना ही नहीं, भारत संयुक्त राष्ट्र के शांति स्थापना संबंधी अभियानों में महती भूमिका निभाने वाला सबसे बड़ा देश है. संयुक्त राष्ट्र के शांति स्थापना के लिए चल रहे 14 मिशनों में से 7 मिशनों में भारत सशस्त्र बल भाग ले रहा है. भारत ने 1996 में अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद पर एक प्रारूप प्रस्तुत किया. भारत ने संयुक्त राष्ट्र में पूर्ण परमाणु निरस्त्रीकरण एवं अप्रसार के मुद्दे को आगे बढ़ाया है. यह परमाणु हथियारों से लैस एकमात्र ऐसा देश है, जिसने परमाणु हथियारों के पूर्ण उन्मूलन की मांग की है. भारत ने 2005 में संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या निधि का गठन किया.america

संयुक्त राष्ट्र में भारत

सुरक्षा परिषद संयुक्त राष्ट्र के छः प्रमुख अंगों में से एक है, जिसका उत्तरदायित्व है अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना, लेकिन सऊदी अरब ने जिस तरह से सुरक्षा परिषद की सदस्यता ठुकरा दी है, उससे सुरक्षा परिषद के औचित्य पर ही सवाल ख़डे हो गए हैं. इस देश को पहली बार परिषद का अस्थायी सदस्य चुना गया था. सऊदी अरब ने यह आरोप लगाया है कि सुरक्षा परिषद विश्‍व में शांति कायम करने के लिए दोहरे मापदंड अपनाता है. उसका मानना है कि शांतिपूर्ण तरीके से मसले सुलझाने के लिए सुरक्षा परिषद का आधुनिकीकरण और विस्तार जरूरी है. परिषद मध्यपूर्व में पुराने संघर्ष को और परमाणु हमले के खतरे को खत्म करने में विफल रहा है. उसका यह भी आरोप है कि सीरिया में तीन साल से चल रहे गृहयुद्ध को खत्म करने के कोई उपाय नहीं किए हैं. हालांकि सऊदी अरब को मध्यपूर्व के क्षेत्र और विशेष रूप से सीरिया में आतंकवादी संगठनों का मुख्य समर्थक माना जाता है. उसका यह भी कहना है कि फिलस्तीन-इजरायल के बीच 65 साल पुराने संघर्ष को परिषद नहीं रोक पाया है. बहरीन जैसे कुछ देशों ने सऊदी अरब के फैसले का समर्थन किया है और कहा है कि सुरक्षा परिषद की खाड़ी एवं अरब देशों के प्रति दोहरे मापदंडों को सामने लाने के लिए यह पश्‍चिमी देशों को एक कड़ा संदेश है. उसका कहना है कि सुरक्षा परिषद अंतर्राष्ट्रीय मुठभेड़ों से निपटने में विफल रही है.

क्यों ठुकराई सदस्यता

सऊदी अरब द्वारा परिषद की सदस्यता ठुकराने के पीछे दो कारण हो सकते हैं. पहला तो यह कि सीरिया पर अमेरिकी आक्रमण की चाह रखने वाले सऊदी अरब अपने निजी हितों को पूरा न होता देख तिलमिला गया हो और आनन-फानन में परिषद की सदस्यता अस्वीकार कर दिया हो. दूसरा कारण यह कि सचमुच सुरक्षा परिषद की प्रासंगिकता समाप्त हो गई हो. हालांकि सऊदी अरब के मामले में दूसरा कारण सही साबित नहीं होता, क्योंकि सऊदी अरब ने इसे लेकर पहले कभी कोई सवाल क्यों नहीं उठाया और एक ही बार उसने सदस्यता नामंजूर कर लेने का फैसला कैसे कर लिया. ये सारी घटनाएं सऊदी अरब के हताशा को ही व्यक्त करती हैं. सऊदी अरब के इस फैसले पर विदेश नीति के जानकारों का कहना है कि सीरिया में बशर असद की सरकार को गिराने के लिए सऊदी अरब ने विश्‍व के अनेक देशों से आतंकवादियों को एकत्रित किया और उन्हें प्रशिक्षण तथा भारी हथियार दिए. उसे क़तर और जॉर्डन सहित अनेक देशों का भरपूर सहयोग भी मिला, लेकिन सऊदी अरब को सीरिया की जनता और सरकार से लज्जाजनक पराजय मिली है, जिससे वह परेशान हो गया है. ओबामा प्रशासन ने जिस तरह से सीरिया संकट का कूटनीतिक समाधान निकाला है, वह भी सऊदी अरब को बहुत अखरा है, जिससे सऊदी अरब की शाही सरकार बुरी तरह हताश है.

सऊदी अरब ने सुरक्षा परिषद की सदस्यता ठुकरा दी है. इस देश का कहना है कि परिषद दोहरे मापदंड अपनाता है. परिषद के 120 सदस्य देश भी सुरक्षा परिषद की कार्यशैली पर समय-समय पर सवाल उठाते रहे हैं. वास्तव में यह पूरे विश्‍व का मसला हो गया है. ज़रूरत है कि समय रहते सुरक्षा परिषद ख़ुद को बदले. अन्यथा आज सऊदी अरब ने इसकी सदस्यता ठुकराई है, कल कोई और देश ठुकराएगा और ऐसे में एक दिन सुरक्षा परिषद का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा.

स्वागतयोग्य क़दम

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सुरक्षा परिषद की सदस्यता ठुकराने की घटना सऊदी अरब की हताशा ही सही, लेकिन इससे जो ब़डी बात निकल कर सामने आई, वह यह कि वर्षों से सुरक्षा परिषद के कार्यों और उसकी नीतियों पर कम से कम किसी देश ने सवालिया निशान तो लगाया. सऊदी अरब का यह कदम स्वागत योग्य है. परोक्ष-अपरोक्ष रूप से इस देश के इस कदम का समर्थन सुरक्षा परिषद के वे 120 सदस्य देश भी कर रहे हैं, जो पहले ही सुरक्षा परिषद के कार्यों और उसके दोहरे मापदंड को लेकर लगातार सवाल ख़डे करते आ रहे हैं.

हालांकि सऊदी अरब ने सुरक्षा परिषद से अलग होने के पीछे परिषद को ही जिम्मेदार ठहराया है, ताकि विश्‍व जनमत उसके निजी हितों के मुद्दों को लेकर उसकी खिल्ली न उ़डाए और सुरक्षा परिषद के ढुलमुल कार्यों को देखते हुए परिषद पर ही सारा दोष म़ढ दिया जाए. सऊदी अरब का यह आरोप लगभग सही निशाना पर लग भी गया है, क्योंकि सऊदी के सुरक्षा परिषद की सदस्यता से इन्कार कर देने से विश्‍व में सुरक्षा परिषद के औचित्य पर ही सवाल ख़डा हो गया है. हालांकि दबी जुबान से सऊदी अरब के इस कदम को लेकर विश्‍व के देशों में सुगबुगाहट भी शुरू हो गई है कि सऊदी अरब अपने निजी हितों और अपनी मनमानी न पूरा होते देख सुरक्षा परिषद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है.

सुरक्षा परिषद की विफलता

सुरक्षा परिषद का कार्य है वैश्‍विक संघर्षों को निपटा कर संपूर्ण विश्‍व में शांति की स्थापना, लेकिन अपनी स्थापना से लेकर आज तक उसने ऐसा कोई महत्वपूर्ण योगदान नहीं दिया है, जिससे उसके होने या न होने का औचित्य समझ में आए. यही कारण है कि विश्‍व के लगभग अधिकांश सदस्य देश उसकी कार्य शैली पर समय-समय पर उंगली उठाते रहे हैं. ऐसे में सऊदी अरब का यह कदम आग में घी डालने का काम किया है. सबसे ब़डी बात तो यह है कि सुरक्षा परिषद की अपनी कोई सेना नहीं है. नाटो देशों के पास अपनी सेना है, जिससे वे उन देशों के खिलाफ कार्रवाई कर सकते हैं, जो उनके हितों की अनदेखी करते हैं. यही कारण है कि विश्‍व नाटो देशों से खौफ खाता है. सुरक्षा परिषद के पास अपनी सेना नहीं होने से विश्‍व के देशों पर न तो किसी तरह का भय काम करता है और न ही किसी तरह का बंधन. ऐसे में सवाल उठता है कि अगर कोई देश मनमानी करता है तो परिषद उस देश पर कार्रवाई किस आधार पर करे. सेना के होने का मतलब आक्रमण करना ही नहीं है, बल्कि सेना सांकेतिक तौर पर भी शांति को ब़ढावा देती है.

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सुरक्षा परिषद की परवाह नहीं

वैश्‍विक देशों की हालत यह है कि कोई भी देश अपने निजी स्वार्थ को साधने के लिए दूसरे देश से दुश्मनी मोल ले लेता है. यही नहीं, छोटे-छोटे मसलों पर वे देश न सिर्फ कमजोर देश को सताते हैं, बल्कि वहां के संसाधनों पर कब्जा करने की फिराक में छिटपुट हमले भी कर देते हैं और उस देश के जान-माल की तनिक भी चिंता नहीं करते. अमेरिका का उदाहरण इस मामले में बहुत सही है, जिसने पूरे विश्‍व में घूम-घूम कर हमला किया है और आज भी वह इसके लिए बहाना ढू़ढता है. अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अभी हाल ही में सीरिया के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को लेकर सुरक्षा परिषद को दरकिनार कर आगे बढ़ने का फैसला किया था. ओबामा ने यहां तक कह दिया था कि यह निकाय पूरी तरह से पंगु हो चुकी है. सुरक्षा परिषद की भूमिका को लेकर भारत का कहना है कि सुरक्षा परिषद अपनी संरचना और कामकाज में सुधार की कमी के चलते वैश्‍विक संकटों पर सटीक रुख अपनाने में अक्षम है. हाल ही में रूस की यात्रा पर गए भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और रूस के राष्ट्रपति ब्लादीमिर पुतिन ने सुरक्षा परिषद में सुधार की आवश्यकता जताई, ताकि उभरने वाली चुनौतियों से और प्रभावी तरीके से निपटा जाए और इसमें ज्यादा से ज्यादा प्रतिनिधित्व हो सके.

वैश्‍विक देशोंे का यह मानना है कि जिस तरह से पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा परिषद ने अपने कार्यों का निर्वहन किया है, उसे लेकर पूरे विश्‍व में निराशा का माहौल है. कहना गलत नहीं होगा कि सुरक्षा परिषद के होने और न होने का कोई बहुत मतलब नहीं है. वह विभिन्न संकटों के समय प्रतिक्रिया नहीं करता. दूसरी तरफ वह अपने सदस्य देशों को साथ लेकर न तो चल पाता है और न ही उन देशों में सामंजस्य बैठा पाता है. परिषद के कुछ स्थायी सदस्य भी सुरक्षा परिषद में सुधार को लेकर चिंतित हैं. सुरक्षा परिषद में जितना जल्दी सुधार होगा, वह अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बरकरार रखने की अपनी भूमिका उतनी अधिक निभा सकेगा. सबसे ब़डा सवाल यह है सुधार के बिना सुरक्षा परिषद आखिर कितने समय तक कार्य कर सकता है.

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क्या हो सकता है

अगर सऊदी अरब अपनी बात पर अड़ा रहता है तो एशिया पेसिफ़िक ग्रुप को महासभा के पटल पर किसी अन्य देश का नाम रखना होगा, लेकिन इससे पहले सऊदी अरब को मनाने के लिए कूटनीतिक प्रयास किए जाएंगे. बान की मून ने कहा है कि कुछ सदस्य देश, खासकर संबंधित सदस्य देशों का समूह इस मुद्दे पर विचार-विमर्श कर रहा है. ये देश इसके बारे में कौन-सा फैसला करेंगे, इस पर वो खुद भी करीबी नजर रखेंगे. कुवैत सऊदी अरब का स्थान लेने के लिए प्रयास भी करने लगा है. कुछ भी हो, लेकिन सुरक्षा परिषद की महत्त्वपूर्ण भूमिका है और हर देश का अपना एक मत हो सकता है. इसलिए यह जरूरी है कि हर देश, जिसे सुरक्षा परिषद में महत्वपूर्ण भूमिका दी जाए, उसका जिम्मेदारीपूर्वक निर्वहन करे, न कि अपनी जिम्मेदारियों से भागे. कोई सदस्य देश संगठन में रहकर भी अपनी बात कह सकता है, लेकिन अफसोस सऊदी अरब ने ऐसा नहीं किया.

सुरक्षा परिषद की महत्ता

सुरक्षा परिषद संयुक्त राष्ट्र के छः प्रमुख अंगों में से एक है, जिसका उत्तरदायित्व है अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना. सुरक्षा परिषद का अध्यक्ष हर महीने वर्णमालानुसार बदलता है. परिषद को अनिवार्य निर्णयों को घोषित करने का अधिकार भी हैं. वीटो या प्रतिनिषेध शक्ति द्वारा सुरक्षा परिषद के बहुमत से स्वीकृत कोई भी प्रस्ताव किसी एक सदस्य देश की असहमति से भी रोका जा सकता है.

भारत की स्थाई सदस्यता

भारत की सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता को लेकर परिषद के अधिकांश स्थाई सदस्य देशों ने भारत के दावे का समर्थन किया है, लेकिन अभी भी भारत को सुरक्षा परिषद मेंे स्थाई सदस्यता नहीं मिल पाई है. हाल ही में रूस ने एक बार फिर सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता के भारत के दावे का समर्थन किया है. सुरक्षा परिषद का आखिरी विस्तार साल 1963 में हुआ था, जब अस्थाई श्रेणी में सदस्यों की संख्या 11 से बढ़ाकर 15 कर दी गई. भारत के साथ ब्राजील, जर्मनी और जापान ने मिलकर सुरक्षा परिषद में स्थाई सदस्यता में विस्तार हेतु दबाव बनाने के लिए चार देशों का समूह (जी4) बनाया है. फिलहाल सुरक्षा परिषद में पांच स्थाई सदस्य हैं- चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका. इसके अलावा 10 अस्थाई सदस्य भी हैं, जिसमें पांच सदस्य दो वर्ष के कार्यकाल के लिए हर साल चुने जाते हैं.

 

 

 

 

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