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भंवर में अन्ना

एक सच्ची घटना है- कुत्ता क्यों मरा? पंजाब के सबसे क़द्दावर मुख्यमंत्री थे सरदार प्रताप सिंह कैरो. स्वतंत्रता सेनानी के साथ-साथ बड़े क़द्दावर नेता थे. एक बार दिल्ली से चंडीगढ़ जा रहे थे. उनके साथ उनके संसदीय सचिव देवीलाल भी थे. सरदार कैरो की गाड़ी तेज़ी से भाग रही थी कि एक कुत्ता बीच में आ गया. कुत्ते की मौत हो गई. सरदार कैरो ने थोड़ी दूर जाकर गाड़ी रुकवाई. सड़क किनारे दो चक्कर लगाए और देवीलाल जी को बुलाया. उन्होंने पूछा, देवीलाल ये बताओ कुत्ता क्यों मरा? का़फी सोचने के बाद देवीलाल ने कहा कि कुत्ते तो मरते रहते हैं, यूं ही मर गया होगा. सरदार प्रताप सिंह कैरो ने फिर पूछा, बताओ कुत्ता क्यों मरा? देवीलाल जी खामोश रहे, फिर कहा कि आप ही बताइये. तब सरदार प्रताप सिंह कैरो ने देवीलाल से कहा कि यह कुत्ता इसलिए मरा, क्योंकि यह फैसला नहीं कर पाया कि सड़क के इस किनारे जाना है या उस किनारे. फैसला न लेने की वजह से वह बीच में खड़ा रह गया. अगर इसने फैसला कर लिया होता तो सड़क के  इस किनारे या उस किनारे चला गया होता और बच जाता. फैसला नहीं लेने की वजह से यह कुत्ता मारा गया. देवीलाल को राजनीति का मंत्र मिल गया. उन्होंने जीवन भर इसका पालन किया. वह कभी बीच में नहीं रहे. राजनीति में उन्होंने हमेशा फैसला लिया. हमेशा इधर या उधर खड़े रहे. इसी सीख की वजह से वह देश के उपप्रधानमंत्री भी बने.

आंदोलन की शुरुआत से ही सरकार ने यह सा़फ कर दिया कि अन्ना हजारे जिस तरह का लोकपाल बनाना चाहते हैं, वह उसके पक्ष में नहीं है. सरकार के पक्ष को जानते हुए भी जंतर-मंतर के आंदोलन के पहले और बाद में उन्होंने कई चिट्ठियां लिखीं, लेकिन कोई हल नहीं निकला. हल इसलिए नहीं निकला, क्योंकि सरकार अपनी ज़िद पर अड़ी थी. जंतर-मंतर के आंदोलन के बाद संयुक्त बैठक में जो हुआ उससे भी यह सा़फ हो गया कि सरकार टाल-मटोल कर रही है.

अन्ना की समस्या बिल्कुल यही है. वह फैसला नहीं कर पा रहे हैं कि क्या करें? इधर जाएं या उधर जाएं. वह कभी यात्रा पर निकलने की बात करते हैं, फिर बीच में यात्रा करने का इरादा छोड़ देते हैं. उन्होंने बड़े ज़ोर-शोर से यह ऐलान किया कि संसद सत्र में लोकपाल बिल पास नहीं हुआ तो फिर से आंदोलन करेंगे, फिर अचानक से चुप हो गए. अन्ना तय नहीं कर पा रहे हैं कि आंदोलन करना है या नहीं. सरकार का समर्थन करना है या नहीं. उत्तर प्रदेश में यात्रा करनी है या नहीं. अन्ना हजारे के फैसला नहीं लेने की वजह से भ्रम की स्थिति बनती जा रही है. इस बीच अन्ना का बयान आया कि अगर सरकार मज़बूत लोकपाल बिल लेकर आ जाएगी तो वह कांग्रेस का समर्थन करेंगे और अगर लोकपाल बिल नहीं आया तो वह भारतीय जनता पार्टी का समर्थन करेंगे. अन्ना अब तक यह फैसला नहीं कर पाए हैं कि सरकार का समर्थन करना है या नहीं. अन्ना भंवर में हैं. अब तक उन्हें यह समझ में ही नहीं आया है कि सरकार लोकपाल के साथ क्या करना चाहती है, जबकि यह दिन के उजाले की तरह सा़फ है कि सरकार जन लोकपाल बिल लाने के पक्ष में नहीं है. सवाल यह उठता है कि इस तरह के बयान का क्या मतलब है? क्या अन्ना हजारे की नज़र में जनता की ताक़त का कोई महत्व नहीं है? क्या जनता की ताक़त में उनका भरोसा नहीं है? जो लोग अन्ना हजारे के आंदोलन में शामिल हुए वे न तो कांग्रेस के थे और न ही भारतीय जनता पार्टी के थे. यह आम जनता थी. सरकारी तंत्र में मौजूद भ्रष्टाचार से त्रस्त और नाराज़ जनता थी. तो अब यह कहना कि कांग्रेस का समर्थन कर दूंगा, का क्या मतलब है. क्या अन्ना को लगता है कि वह जिसका समर्थन कर देंगे, वह चुनाव जीत जाएगा या जिसका विरोध करेंगे वह चुनाव हार जाएगा. इससे तो दिग्विजय सिंह की यह दलील सही लगती है कि अन्ना और उनकी टीम को चुनाव लड़ना चाहिए.

अन्ना हजारे को यह बात स्वीकार कर लेनी चाहिए कि रामलीला मैदान के अनशन से वह कुछ हासिल नहीं कर पाए. इस बात पर ग़ौर करने की ज़रूरत है कि रामलीला मैदान के  अनशन से पहले जो जन लोकपाल बिल की स्थिति थी और जो स्थिति आज है, उसमें कोई अंतर नहीं है. अन्ना हजारे को देश भर में जो समर्थन मिला, उसका फायदा टीम अन्ना नहीं उठा सकी. या यूं कहें कि इस अपार जन समर्थन की ताक़त को आंकने में अन्ना हजारे से चूक हो गई.

जब से अन्ना हजारे ने जन लोकपाल के लिए आंदोलन शुरू किया है, तब से लेकर आज तक ऐसे कई मौ़के आए, जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि अन्ना ठोस फैसले नहीं ले पाते हैं. आंदोलन की शुरुआत से ही सरकार ने यह सा़फ कर दिया कि अन्ना हजारे जिस तरह का लोकपाल बनाना चाहते हैं, वह उसके पक्ष में नहीं है. सरकार के पक्ष को जानते हुए भी जंतर-मंतर के आंदोलन के पहले और बाद में उन्होंने कई चिट्ठियां लिखीं, लेकिन कोई हल नहीं निकला. हल इसलिए नहीं निकला, क्योंकि सरकार अपनी ज़िद पर अड़ी थी. जंतर-मंतर के आंदोलन के बाद संयुक्त बैठक में जो हुआ उससे भी यह सा़फ हो गया कि सरकार टाल-मटोल कर रही है. फिर भी अन्ना हजारे और उनकी टीम यह ठोस फैसला नहीं कर सकी कि सरकार के खिला़फ जाना है या नहीं. इसका नतीजा यह हुआ कि सरकार ने अपनी मनमानी की. मजबूर होकर अन्ना को रामलीला मैदान में अनशन करना पड़ा. इस आंदोलन के दौरान सरकार ने उन्हें तिहाड़ जेल भेज दिया. आंदोलन के लिए जगह देने में कई रुकावटें खड़ी कीं. इतना सबकुछ होने के बावजूद अन्ना यह फैसला नहीं कर सके कि सरकार से किस तरह से लड़ना है. इसका नतीजा यह हुआ कि तेरह दिनों तक चला अन्ना का अनशन सरकार के साथ बातचीत में उलझ कर रह गया.

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अन्ना हजारे को यह बात स्वीकार कर लेनी चाहिए कि रामलीला मैदान के अनशन से वह कुछ हासिल नहीं कर पाए. इस बात पर ग़ौर करने की ज़रूरत है कि रामलीला मैदान के अनशन से पहले जो जन लोकपाल बिल की स्थिति थी और जो स्थिति आज है, उसमें कोई अंतर नहीं है. अन्ना हजारे को देश भर में जो समर्थन मिला, उसका फायदा टीम अन्ना नहीं उठा सकी. या यूं कहें कि इस अपार जन समर्थन की ताक़त को आंकने में अन्ना हजारे से चूक हो गई. अब हालत यह है कि सरकार वैसा ही बिल लेकर आ रही है, जैसा वह पहले लाना चाहती थी. सरकार ने जो मसौदा तैयार किया है, उसमें प्रधानमंत्री लोकपाल के दायरे से बाहर हैं. सरकारी लोकपाल बिल में केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई की भ्रष्टाचार निरोधक शाखा और केंद्रीय सतर्कता आयोग को लोकपाल से बाहर रखा गया है. सरकार ने निचले स्तर के अधिकारियों को भी लोकपाल के दायरे से बाहर कर दिया. न्यायपालिका में होने वाला भ्रष्टाचार भी लोकपाल के दायरे में नहीं है. सरकार तो अपनी जगह से हिली नहीं, वह जैसा लोकपाल लाने के लिए पहले से तैयार थी, वैसा ही बिल तैयार किया है. तो अब सवाल पूछना लाज़िमी है कि टीम अन्ना को अनशन से क्या हासिल हुआ. प्रधानमंत्री से पटवारी तक लोकपाल के दायरे में हों, यह मांग कहां ग़ायब हो गई. प्रधानमंत्री लोकपाल के दायरे में हों? इस पर अनशन खत्म करने से पहले समझौता क्यों नहीं हुआ? साधारण सा सवाल है. सरकार का जो लोकपाल बिल है, वह क्या जन लोकपाल बिल है. इस सवाल का साधारण सा जवाब है ही नहीं. इसका मतलब यही है कि अन्ना का पिछला आंदोलन सफल नहीं रहा. अन्ना ने पिछला आंदोलन शुरू किया था, तो यह नारा दिया कि जन लोकपाल बिल पास करो. लेकिन तेरह दिनों के बाद टीम अन्ना ने जन लोकपाल बिल को छोड़ दिया और स़िर्फ तीन मांगों तक सीमित रहकर अनशन तोड़ दिया. इन तीन मांगों में प्रधानमंत्री, न्यायपालिका, सीबीआई, सीवीसी और निचले स्तर के अधिकारी कहां हैं? मामला संसद में चला गया. संसद में बहस हुई, लेकिन किस क़ानून के तहत हुई, यह किसी को पता नहीं है. इस बहस की क़ानून की नज़र में क्या प्रासंगिकता और मान्यता है? राजनीतिक दलों ने इसे सेंस ऑफ द हाउस बताया. लोकसभा की प्रक्रिया के मुताबिक़ इस प्रस्ताव को स्पीकर के समक्ष पेश करना था. क्या इस प्रस्ताव को लोकसभा स्पीकर मीरा कुमार ने रखा? नहीं, इसे प्रणव मुखर्जी ने रखा. लोकसभा में क्या इन मांगों पर मतदान हुआ? नहीं, सरकार ने पूरी बहस को स्टैंडिग कमेटी के पास भेज दिया. हैरानी की बात तो यह है कि इससे पहले भी अन्ना हजारे स्टैंडिंग कमेटी में अपनी बात कह चुके थे. एक सांसद ने तो जन लोकपाल बिल को ही स्टैंडिंग कमेटी को सौंप दिया. मतलब यह है कि जो सुझाव अनशन के बाद स्टैंडिंग कमेटी को दिया गया, वह स्टैंडिंग कमेटी के पास पहले से ही था. इससे सा़फ पता चलता है कि टीम अन्ना से चूक हुई है. इसे भी स्वीकार करने की ज़रूरत है.

कोई भी आंदोलन दलील से नहीं, बल्कि जनभावना से ब़डा बनता है. जन लोकपाल के मामले में भी यही बात लागू होती है. जनभावना के सहारे अन्ना और उनकी टीम सरकार पर भारी प़ड गई. लेकिन जब बात समझौते तक पहुंची, तब दलील के आगे जनभावना कमज़ोर प़ड गई. लोकपाल बिल पास कराने की जल्दबाज़ी में जो कुछ हुआ, उसमें आम आदमी कहीं नहीं है. उधर, अन्ना भी संशय की स्थिति में हैं. भारत भ्रमण और जन जागरण का उनका कार्यक्रम अब तक अधर में है. दूसरी ओर, वह खुद लोकपाल बिल के भविष्य को लेकर दुविधा में हैं.

जिस व़क्त अन्ना हजारे रामलीला में अनशन कर रहे थे, उस समय देश के हर कोने में अनशन चल रहा था. अन्ना के समर्थन में देश में कहां-कहां आंदोलन हुए, यह तो टीम अन्ना को भी पता नहीं होगा. भारतीय नागरिकों ने तो अमेरिका में भी अनशन किया. गांवों और क़स्बों में जो लोग आंदोलन कर रहे थे, उन्होंने तो आंदोलन से पहले अन्ना का नाम तक नहीं सुना था. फिर भी आंदोलन में शामिल हुए. उनकी नाराज़गी सरकारी तंत्र के  भ्रष्टाचार के खिला़फ थी. महंगाई, बेरोज़गारी, बिजली आदि समस्याओं से जूझ रहे लोगों को लगा कि इस आंदोलन की वजह से बदलाव आएगा. सबकुछ बदल जाएगा. यही वजह है कि बच्चे, बूढ़े, नौजवान, औरतें, अमीर-ग़रीब, हर जाति और वर्ग के लोगों ने अन्ना हजारे को समर्थन दिया. हर राजनीतिक दल के समर्थकों के साथ-साथ हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई सब अन्ना के आंदोलन में थे. ये लोग स़िर्फ जन लोकपाल के लिए अन्ना को समर्थन नहीं दे रहे थे. अन्ना में लोग गांधी देख रहे थे, जो भारत की तस्वीर बदलने की आशा जगा रहा था. अन्ना के पास यह एक मौका था कि वह इस आंदोलन को स़िर्फ लोकपाल की बजाय व्यवस्था परिवर्तन और सरकारी तंत्र के तौर-तरीक़ों को बदलने का आंदोलन बना सकते थे. लेकिन अन्ना ने लोगों को निराश किया. अनशन के बाद हॉस्पिटल और वहां से वापस अपने गांव जाकर बैठ गए. अगर अन्ना देश की यात्रा पर निकल जाते. हर राज्य में निस्वार्थ रूप से आंदोलन करने वाले युवाओं और जनता से मिलते तो आज सरकार को एक लुंजपुंज लोकपाल क़ानून बनाने की हिम्मत नहीं प़डती. फिर कभी अन्ना को आंदोलन करने की ज़रूरत पड़ती तो उनकी एक आवाज़ पर देश के हर कोने में आंदोलन शुरू हो जाते. वह लोगों की इस ताक़त को समझ नहीं पाए. वह यह नहीं समझ पाए कि लोगों की आकांक्षाओं और सपनों से ज़ुडने के बाद अपनी मर्ज़ी नहीं चलती. जनता की भावनाओं के साथ उन्हें चलना पड़ता है, लेकिन अन्ना हजारे ने ठीक उल्टा किया. जिस तरह सरकार लोगों की भावनाओं का मज़ाक़ उड़ा रही है, वैसा ही अन्ना हजारे कर रहे हैं.

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सरकार अन्ना की इस कमज़ोरी को भली-भांति जानती है. यही वजह है कि सरकार एक लुंजपुंज लोकपाल बनाकर अन्ना के आंदोलन को खत्म करना चाहती है. सरकारी बिल में जन लोकपाल बिल के  कई मुद्दों को दरकिनार कर दिया गया है. बिल में स़िर्फ उन्हीं मुद्दों को शामिल किया गया है, जिससे सरकार टीवी चैनलों और संसद में बहस के दौरान विपक्ष के  सवालों का गोलमोल जवाब दे सके. सरकार जानती है कि लोकपाल बिल पेश करने के साथ ही टीम अन्ना का समर्थन आधा हो जाएगा. अगर ऐसा हुआ तो इसके  लिए सरकार के साथ अन्ना हजारे भी ज़िम्मेदार होंगे. सरकार ने टीम अन्ना से निपटने के लिए दूसरे रास्ते भी खोल दिए हैं. सरकार उनके सहयोगियों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाकर उन्हें बदनाम करना चाहती है. पहले कांग्रेस पार्टी प्रवक्ता मनीष तिवारी ने अन्ना हजारे को भ्रष्ट बताया. शशि भूषण और प्रशांत भूषण के खिला़फ सीडी निकल जाती है. अरविंद केजरीवाल पर जुर्माना लगाया जाता है और किरण बेदी को हवाई स़फर के टिकट के  लिए ज़लील किया जाता है. सरकार हर तरी़के से अन्ना हजारे और टीम अन्ना के सदस्यों को परेशान कर रही है. इसके बावजूद टीम अन्ना के सदस्य टेलीविजन कैमरे को देखते ही भ्रम फैलाने वाले बयान दे देते हैं. वे मीडिया के दबाव में आ जाते हैं. उन बातों पर ध्यान देने लग जाते हैं, जिनकी कोई ज़रूरत नहीं होती है. एक तऱफ सरकार एक लुंजपुंज लोकपाल क़ानून ला रही है, तो दूसरी तऱफ अन्ना हजारे और उनकी टीम ऐसे कामों में लगी है, जिसकी ज़रूरत नहीं है. यह समय सरकार पर दबाव देने का है तथा ऐसी योजनाएं बनाने का है कि अगर सरकार अपनी बात पर अडिग रही तो क्या करना होगा. हैरानी तो इस बात से होती है कि अन्ना हजारे अपनी टीम में पारदर्शिता लाने और संगठन में प्रजातांत्रिक मूल्यों को बढ़ाने के लिए समाज के और लोगों को भी शामिल करने में समय नष्ट कर रहे हैं. लोगों के मन में यह सवाल उठने लगा है कि अगर सरकार मज़बूत लोकपाल क़ानून नहीं लाई, तब क्या होगा. क्या फिर से देश में पहले जैसा आंदोलन खड़ा हो सकेगा? ऐसे महौल में राजनीति और चुनावों पर अन्ना भी चौंकाने वाले बयान दे देते हैं. सरकार देश को गुमराह कर रही है, लेकिन टीम अन्ना भी इसमें पीछे नहीं है. लोकपाल के मुद्दे पर सरकार ने पब्लिक ओपिनियन यानी जनमत का अनादर किया है. संसद में लोकपाल पर हुई चर्चा के दौरान राजनीतिक दलों और सरकार ने लोगों की भावनाओं के साथ मज़ाक़ किया है. सरकार के इस अपराध में अन्ना भी शामिल हैं. प्रजातंत्र में लोकमत सर्वोपरि होता है. देश की जनता भ्रष्टाचार के खिला़फ एक कड़ा क़ानून चाहती है. यही जनमत है. देश की जनता घोटालों, महंगाई, भ्रष्टाचार, कालाधन, बिजली, स्वास्थ्य सेवाओं और रोज़गार की कमी से त्रस्त हो चुकी है. अन्ना ने लोगों में आशा जगाई, इसलिए लोग अन्ना के आंदोलन से जुड़े. देश की आर्थिक स्थिति खराब हो रही है. राजनीति का भी वही हाल है. उत्तर प्रदेश में चुनाव है. कुछ लोग यह मान रहे हैं कि लोकसभा का चुनाव भी ज़्यादा दूर नहीं है. यह व़क्त फैसला लेने का है. अन्ना को यह फैसला लेना है कि भ्रष्टाचार और मज़बूत लोकपाल की लड़ाई में वह कहां खड़े हैं. कुत्ता क्यों मरा-के ज़रिए प्रताप सिंह कैरो ने जो सीख देवीलाल को दी, वही सीख अन्ना हजारे को लेने की ज़रूरत है.

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14 comments

  • निष्काम भाव से जन सेवा करना यही इश्वर की पूजा हैं। इस रास्ते पर काँटे बहुत है लेकिन काँटो के रास्ते से आगे बढने में वो आनंद है जो करोडपती होने से भी नही मिल सकता…।

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  • kya aap hamare sath milkar apni desh k prti apni bhawnao ko likhit roop me vayakt karna chahenge?

  • Anna भंवर मैं, यह विचार उन्ही को असक्त है ,जो सिर्फ एना को जानते हैं समझते नहीं हैं. जिस प्रकार किसी भी आन्दोलन की गति एक सामान नहीं रहती है, सिटीजन चार्टर आने से आम जनता को भरोसा होगा की जन लोकपाल भी आएगा और अन्नाजी वाला ही आएगा.
    अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें.
    जय हिन्द
    अशोक गौतम
    09920598898

  • अन्ना जी को वीच भंवर में नहीं रहना चाहिए .
    कांग्रेस कभी अन्ना जी वाला जन लोक पाल बिल नहीं लाएगी
    अन्ना जी को अब देश को विकल्प देने के वायदे पर ही खरा उतरना होगा जो की खुद उनने अनशन के अंतिम दिन देश के लाखों लोगों से किया था .

  • मै इस लेख से पूरी तरह से सहमत हु. टीम अन्ना अपने आन्दोलन में धयान देने के बजाय राजनीती में जुट गयी है.. काज़मी से क्या रेकॉर्डिंग की थी यह देश को भी पता होना चाहिए
    अभी बहुत से जबाब देने है केजरीवाल जी को भी..

  • बिलकुल सही पहचाना आपने.

  • भारत अक बेरोजगारों का देश है एंड चुटिया मीडिया का देश है,, जहा पर हर लोग अपना अपना सोच ले कर चतला है एंड सपना भी अपना होया है ,इस में कुछ बी हो सकता,,,कांग्रेसी पार्टी के पास, शाम, दंड,,,माफिया का सारा पॉवर है,,,इस के साथ लड़ने के लिया, अन्ना भी फ़ैल हो गाना, जनता इस फ़ैल हो गई,,, व्होले सिस्टम इस चोर,, किसी भी मै दम नहीं,,,है देश के लिया मरने के लिया, मीडिया जो कहता है ,,बो ही टिक है,,,,, जय भरतिया माडिया,,,,,सुब चोर है,,,,सिर्फ,,,,,,जिन के पास सदन है,,, अपने बाते रखने के भो ही इमानदार है,

  • मुझे ये लेख पढ़ कर हसी भी आ रही है, और गुस्सा भी, पहली बात कुत्ता ड्राईवर की गलती के वजह से मारा गया, इस बात को लेखक समझ नहीं पाए शायद! दूसरी बात अन्ना का आन्दोलन कमजोर पड़ा लेकिन उसकी वजह यह नहीं की अन्ना ने शक्त फैसला लिया बल्कि इसकी वजह सो कोल्ल्ड मीडिया भी है जिसने इस पुरे आन्दोलन में अपना दोगला चेहरा दिखाया है, अन्ना ये कहते है की अगर कांग्रेस जनलोकपाल लाती है तो टीम अन्ना कांग्रेस को सपोर्ट करेगी, ये लेखक को दिखता है मगर वे ऐसा क्यूँ करेगी शायद वह़ा तक ये सोच नहीं पाए , एक और बात अन्ना ने ऐसा कही भी नहीं कहा – “अगर लोकपाल बिल नहीं आया तो वह भारतीय जनता पार्टी का समर्थन करेंगे”. . एक तरफ यही मीडिया वाले उलटे-पुल्टे सवाल पूछते है अन्ना से फिर दिए गए जवाब को उल्टा-पुल्टा करके छपते है और कोई कुछ राग अलाप्ता है तो कोई कुछ! जब अन्ना या उनकी टीम कांग्रेस के खिलाफ हिस्सार में बोलती है ये मीडिया वाले ही कहते है की टीम आना वोटों की राजनीती कर रही है . . कांग्रेस विरोधी है, इत्यादी इत्यादी! लेख लिखना तो बहुत आसान है , थोड़ी पॉपुलरिटी भी मिल जाती है मगर ये देश का सवाल है और इसके भविष्य का भी, तो कम से कम यहाँ तो निःस्वार्थ भाव से आपना कर्तव्य समझें! जिस अन्ना ने इस देश को जगाया कम से कम उस व्यक्ति को तो एक नीच उदाहरण से संबोधित न करें . . धन्यवाद्!

  • I am not agree with this article! you only deal with negative attributes although Anna has made a lot of changes….
    this is just a beginning,the main war for corruption n all the
    problems…we have 2 fight fr these by the way as anna is doing.In my opinion Anna and his team is absoluetly doing good job……………

  • मैं इस लेख में लिख्खी गयी सभी बातोंसे पूरी तरह सहमत हूँ ,
    यद्यपि एक बात बिलकुल सूरज की रोशनी की तरह स्वत:स्पष्ट हैं
    भ्रष्टाचार अब नासूर बन गया हैं …अगर मैं उदहारण देने लगू तो पानसौ शब्दोंकी
    मर्यादा कम पड़ेगी और अन्ना निर्णय नहीं ले पा रहें हैं….इस आन्दोलन को कैसी
    दिशा देनी चाहियें? क्या करूँ ?यह भी सच हैं लेकिन इतनी सव्वासौ करोड़ आबादी वाले..
    इस तथाकथित[ ?] लोकतंत्र देश में कोई एक तो खड़ा हुवा है …यह क्या कम हैं….
    हम सब मिलके अन्नाजी के साथ खड़े होना यह जरुरी हैं …..अन्ग्रेजोंसे कांग्रेसियोंने अच्छी
    बात ढालीहैं समाज में दरमियाँ पैदा करो और राज करों और फिर बाकि सभी राजनेतिक पार्टियोंने
    यही रास्ता अपनाया.. किसी को भी दबे हुवे कमजोर लोगोंसे कुछ भी लेना देना नहीं हैं…
    उनकी परेशानियों को हल नहीं निकलना हैं….यह सब पैसे जुटानेमे लगे है ….
    अब यह जयप्रकाश नारायण जैसा आन्दोलन होना चाहिए और इन सभी ” भ्रष्ट ” लोगोंको सबक
    सिखाना चाहियें !!!!
    जयहिंद !!!!

  • अन्ना हजारे और उनकी टीम ने ने बाबा को धोखा दिया है,मैं बाबा रामदेव के साथ हूँ।

  • मैं इस लेख से १००% सहमत हु. टीम अन्ना ने बाबा रामदेव को दर किनार कर के देश के साथ dokha किया है. इनकी असलियत भी सामने आ जाएगी. जब अन्ना अगस्त मैं रामलीला मैदान मैं बैठे थे तभी मेरे मन मैं यह सवाल उठे थे की आज पूरा देश अन्ना के साथ है तो अन्नाजी विदोशो मैं जमा ब्लैक मोनी को रास्ट्रीय संपत्ति घोषित करने की मांग क्यों नहीं कर रहे. बाबा रामदेव का bahrat स्वाभिमान ट्रस्ट का लक्ष्य काफी व्यापक है.. और इस बात से सरकार और विदेशी कंपनिया भी डरी हुई है इसलिए ध्यान बाटने के लिए अन्ना को इतना बढ़ा चढ़ा कर दिखया जा रहा है. असली जन जाग्रति का काम बाबा रामदेव कर रहे है जिसे मीडिया ने कभी नहीं दिखाया.

  • Anna Hazare has started his campaign against corruption but after some time his subject was changed from corruption to Janlokpal bill. Each and every person knows that all bills are passed by political leaders who are elected by the people for the people . Hence his move is baseless and not possible to success in future ,he is just wasting time of government .

  • इस लेख से मई सहमत हूँ ६०%

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