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भाजपा और सांस्‍कृतिक राष्‍ट्रवाद का ढोंग
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भाजपा और सांस्‍कृतिक राष्‍ट्रवाद का ढोंग

नितिन गडकरी को जब राजनाथ सिंह के स्थान पर भारतीय जनता पार्टी का अध्यक्ष चुना गया था, उसी समय दो बातें बिलकुल स्पष्ट हो गई थीं. एक तो यह कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ किसी ऐसे नेता को भाजपा प्रमुख के पद पर आसीन करना चाहता था, जो संघ की पृष्ठभूमि का हो और संघ एवं उसकी नीतियों के प्रति वफादार रहे. लिहाज़ा संघ के रणनीतिकारों की नज़र नितिन गडकरी पर जा टिकी. भाजपा अध्यक्ष बनने से पूर्व गडकरी राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान रखने वाले नेता हरगिज नहीं थे. दूसरी बात यह कि लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी एवं राजनाथ के बाद गडकरी जैसे प्रदेश स्तर के नेता को भाजपा की राष्ट्रीय कमान सौंप दी गई. यहीं पर यह ग़ौर करना ज़रूरी है कि यदि देश में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का सबसे अधिक ढिंढोरा पीटने वाला कोई संगठन है तो वह आरएसएस और भाजपा है.

दरअसल भाजपा में नेतृत्व का अकाल तो उसी समय महसूस होने लगा था, जबकि वेंकैया नायडू और उसके बाद राजनाथ सिंह जैसे दूसरी श्रेणी के नेताओं के हाथों में पार्टी की बागडोर सौंपे जाने का दौर शुरू हुआ था.

अब ग़ौर कीजिए सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के ध्वजावाहक गडकरी द्वारा गत दिनों चंडीगढ़ की सार्वजनिक सभा में दिए गए उस भाषण को, जिसने एक बार फिर यह एहसास करा दिया कि भाजपा वास्तव में पार्टी विद ए डिफरेंस है. गडकरी ने फरमाया कि लालू यादव एवं मुलायम सिंह यादव शेर की तरह गुर्राते हैं, परंतु कांगे्रस अध्यक्ष सोनिया गांधी के घर जाकर… उनके तलवे चाटते हैं. गडकरी के भाषण के इस बेहूदे अंश को लेकर मीडिया ने उन्हें आईना दिखाना शुरू किया और यह बताने की कोशिश की कि भारतीय जनता पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष किस तरह के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बात करता है, देश यह देख ले. कुछ ही देर बाद गडकरी को संभवत: अपनी गलती का एहसास हो गया और इससे पहले कि तमाम टीवी चैनल गडकरी की शान में कसीदे प़ढने में मशगूल हो जाते, उन्होंने समझदारी का परिचय देते हुए झटपट माफी मांग ली. उनके माफी मांगने के बावजूद देश को यह पता लग गया कि गडकरी के नेतृत्व में भाजपा आने वाले समय में किस स्तर तक जा सकती है और इस पार्टी में पहले से ही मौजूद फायर ब्रांड नेता आगे चलकर और कैसी भाषाओं का प्रयोग कर सकते हैं.

अटल बिहारी वाजपेयी, भैरो सिंह शेखावत, लालकृष्ण आडवाणी एवं मुरली मनोहर जोशी आदि वे नाम हैं, जिनके बलबूते भाजपा स्वयं को अनुशासित एवं पार्टी विद ए डिफरेंस होने का दावा करती थी. पर

जैसे-जैसे इन नेताओं के हाथों से निकल कर पार्टी का नेतृत्व दूसरी पीढ़ी के हाथों में जाने लगा, वैसे-वैसे भाजपा का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का दावा खोखला पड़ता नज़र आने लगा. कभी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके बंगारू लक्ष्मण रिश्वत में मिलने वाले नोटों के बंडल गिनते हुए खु़फिया कैमरे के सामने रंगे हाथों पकड़े गए तो कभी वाजपेयी मंत्रिमंडल में रहे केंद्रीय मंत्री दिलीप सिंह जूदेव रुपये की तुलना खुदा से करते पाए गए. पार्टी में कई और भी नेता हैं, जिन पर संसद में प्रश्न पूछने के बदले पैसे लेने का आरोप लग चुका है और उन पर कार्रवाई भी हो चुकी है. यानी इनका सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पहले भी कई बार बेनक़ाब हो चुका है.

ऐसा नहीं है कि केवल भाजपा ही देश की अकेली ऐसी पार्टी है, जिसमें भ्रष्ट एवं बेईमान नेता पाए जाते हों. संभव है, इससे भी अधिक भ्रष्ट और बदज़ुबान नेता अन्य पार्टियों भी हों, लेकिन कोई अन्य राजनीतिक दल सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का ऐसा ढोल नहीं पीटता, जैसा भाजपा के नेताओं द्वारा पीटा जाता है. एक सत्य यह भी है कि गडकरी जैसी बदज़ुबानी और बंगारू जैसी रिश्वतखोरी के जीते-जागते प्रमाण फिलहाल अभी तक किसी राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक पार्टी के अध्यक्षों के विरुद्ध नहीं देखे गए. बात जब भाजपा नेताओं द्वारा सार्वजनिक रूप से प्रयोग की जाने वाली भाषा शैली की चल पड़ी है तो एक बार फिर याद दिला दें कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी, जो स्वयं को कभी सरदार पटेल का वारिस बताने की कोशिश करते हैं तो कभी खुद में देश का प्रधानमंत्री बनने की संभावना तलाश करने लगते हैं, द्वारा भी कभी- कभी ऐसी भाषा शैली का प्रयोग सार्वजनिक रूप से किया जाता है कि पार्टी का सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का दावा महज़ एक ढोंग दिखाई देने लगता है.

याद कीजिए, एक बार नरेंद्र मोदी ने सोनिया गांधी के विषय में कहा था कि उन्हें रहने के लिए कोई अपना मकान भी किराए पर नहीं देगा. स्वयं को रामराज्य का रहबर और सोनिया गांधी को रोमराज्य का प्रतीक तो मोदी प्राय: कहते ही रहते हैं. मोदी ने ही राहुल गांधी के विषय में एक बार टिप्पणी की थी कि राहुल को तो कोई अपनी कार का ड्राइवर भी नहीं रखेगा. ग़ौर फरमाइए भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदारों के ऐसे राजनीतिक आकलन. यहां यह बताने की ज़रूरत नहीं कि इन टिप्पणियों और नरेंद्र मोदी के विशेष प्रयासों के बावजूद, जिन्हें वह पूरा जोर लगाकर गुजरात में कर रहे हैं, आज सोनिया गांधी पर जनता द्वारा कितना विश्वास किया जा रहा है. जबकि रामराज्य के मोदी सरीखे ध्वजावाहक को अभी कुछ समय पहले एसआईटी द्वारा दो दिनों तक लगातार गुजरात दंगों के सिलसिले में पूछताछ हेतु अपने कार्यालय में बुलाया जा चुका है. वैसे भी मोदी स्वयं को कितना भी बड़ा क्रांतिकारी, राष्ट्रभक्त, हिंदुत्व का अलमबरदार और भाजपा के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का पहरेदार क्यों न बताते फिरें, परंतु वास्तविकता यही है कि इस समय देश के सबसे विवादित मुख्यमंत्री वही हैं. इस बात की पुष्टि सुप्रीम कोर्ट द्वारा नरेंद्र मोदी के विषय में की गई उस टिप्पणी से हो जाती है, जिसमें गुजरात दंगों के सिलसिले में मोदी को गुजरात का नीरो बताया गया था.

दरअसल भाजपा में नेतृत्व का अकाल तो उसी समय महसूस होने लगा था, जबकि वेंकैया नायडू और उसके बाद राजनाथ सिंह जैसे दूसरी श्रेणी के नेताओं के हाथों में पार्टी की बागडोर सौंपे जाने का दौर शुरू हुआ था. वेंकैया नायडू ने अपनी वाकपटुता एवं हिंदी बोलने के अपने लोकप्रिय अंदाज़ से देश की जनता को जबरदस्ती इंडिया शाइनिंग हज़म करवाने का प्रयास किया था. उसके पश्चात जिस प्रकार राजनाथ सिंह एवं अरुण जेटली के मध्य रस्साकशी चली और बाद में वसुंधरा राजे सिंधिया ने राजनाथ सिंह को उनकी राजनीतिक हैसियत की पहचान कराई, उससे भी यह अंदाज़ा होने लगा था कि पार्टी के भीतर सब कुछ ठीकठाक नहीं चल रहा है. रही-सही कसर भैरो सिंह शेखावत के बयान ने पूरी कर दी थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि राजनाथ सिंह उस समय पैदा भी नहीं हुए थे, जबसे मैं राजनीति कर रहा हूं. गत लोकसभा चुनाव के दौरान वरुण गांधी द्वारा सांप्रदायिकतापूर्ण ज़हरीला भाषण दिया गया और उसे तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह द्वारा समर्थन दिया गया. बल्कि राजनाथ सिंह ने एटा (उत्तर प्रदेश) की जेल में जाकर वरुण से मुलाकात करके कुछ विशेष संदेश देने की भी कोशिश की.

इन कदमों से स्पष्ट होने लगा था कि भाजपा अपने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के कथित सिद्धांतों से दूर होती जा रही है और पार्टी विद ए डिफरेंस का नारा बेमानी साबित होता जा रहा है. लिहाजा नितिन गडकरी द्वारा चंडीगढ़ में सार्वजनिक रूप से कहे जाने वाले अपशब्दों को गंभीरता से लेने के बजाय यह समझ लेना चाहिए कि न केवल भाजपा, बल्कि इसे पिछले दरवाज़े से निर्देश जारी करने वाला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके नितिन गडकरी जैसे वरिष्ठ स्वयंसेवकों का वास्तविक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद है क्या. कहा जा सकता है कि भाजपा नेता अब अपनी उपलब्धियां एवं गुण जनता को बताने के बजाय दूसरों को अपमानित करने और दूसरे नेताओं के विरोध में अपनी बढ़त तलाश कर रहे हैं.

1 comment

  • बहुत खूब सर जी… आपने तो भाजपा की दुखती राग पे हाथ रख दिया…
    आज भाजपा की असली पहचान बस इतनी भर ही है की किसी भी तरह मीडिया में बनी रह एचाहे इसके लिए कुछ भी बयान देना पड़े….

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