fbpx
Now Reading:
भाजपा के लिए मिशन 2010 की राह कठिन
Full Article 5 minutes read

भाजपा के लिए मिशन 2010 की राह कठिन

भारतीय जनता पार्टी ने एक बार फिर उत्तराखंड के जनाधार वाले नेताओं को नकारते हुए गगन बिहारी नेता को राज्यसभा के लिए प्रत्याशी बनाकर आत्मघाती क़दम उठाया. इससे कई दिग्गजों के होश उड़ गए. कार्यकर्ताओं को एक बार फिर पैराशूट उम्मीदवार झेलना पड़ा. भाजपा हाईकमान द्वारा पांचजन्य के संपादक रह चुके अपने राष्ट्रीय प्रवक्ता तरुण विजय को राज्यसभा भेजने से पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूरी, टीपीएस रावत एवं पूर्व प्रदेश अध्यक्ष बच्ची सिंह रावत को खासा झटका लगा है. पिछली बार कैप्टन सतीश शर्मा को राज्यसभा प्रत्याशी बनाने पर कांगे्रस की खिल्ली उड़ाने वाली भाजपा एवं उसके दिग्गज इस बार खुद हंसी के पात्र बन गए. अब वे तरुण विजय को उत्तराखंडी साबित करने के लिए तरह-तरह के नाटक कर रहे हैं. मुख्यमंत्री निशंक ने तो अपने बयान में तरुण को उत्तराखंड का गौरव बता डाला. संसदीय कार्य मंत्री प्रकाश पंत ने तरुण विजय को प्रोजेक्ट करने के दायित्व का निर्वहन जिस खूबी के साथ किया, उसे भी लोग लाजवाब मानते हैं. तरुण को यहां से राज्यसभा भेजना भाजपा के लिए एक महंगा सौदा साबित हो सकता है. उसके मिशन 2012 की राह भारी पड़ सकती है. राज्यसभा चुनाव से पहले पार्टी ने शुरुआती दौर में जिस तरह स्थानीय नेताओं के नामों का पैनल तैयार करने और महिला प्रत्याशी की चर्चा जैसी लंबी-चौड़ी कसरत कराई, उससे तो यही लगा कि सूबे के किसी कद्दावर नेता के दिन बहुरने वाले हैं. पूवर्र मुख्यमंत्री खंडूरी का नाम सबसे आगे था. समर्थकों को भी लग रहा था कि हाईकमान खंडूरी को राज्यसभा भेज कर उनका खोया सम्मान वापस करेगा. लोकसभा चुनाव में पांचों सीटों पर हार का ठीकरा जिस तरह खंडूरी के सिर फोड़ा गया, उससे समर्थकों में खासा असंतोष देखने को मिला. उस हार के लिए राज्य के अन्य नेताओं के अलावा पार्टी हाईकमान भी ज़िम्मेदार था. बावजूद इसके सज़ा भुगतनी पड़ी खंडूरी को. फौजी जीवन से अनुशासन का पाठ पढ़कर राजनीति में आए खंडूरी को राजनीतिक छलियों ने हाशिए पर पहुंचा दिया. नितिन गडकरी ने भी राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद अपने पदाधिकारियों की जो फौज तैयार की, उसमें खंडूरी के धुर विरोधी भगत सिंह कोश्यारी को स्थान दे दिया गया. इस बार राज्यसभा प्रत्याशी के चयन में भी खंडूरी एवं उनके समर्थक टीपीएस रावत को नज़रअंदाज़ कर दिया गया. इससे सूबे की राजनीति में जितने मुंह उतनी बातें हो रही हैं. रावत ने जिस तरह भाजपा सरकार बनवाने में अग्रणी भूमिका निभाई थी, वह किसी से छुपी नही हैं. रावत को उम्मीद थी कि भाजपा हाईकमान उनके सहयोग के बदले उन्हें राज्यसभा ज़रूर भेजेगा. समर्थक भी यही सोच रहे थे कि भाजपा को सत्ता की देहरी पर खड़ा करने वाले रावत को नायक बनाकर हाईकमान खुद को कृतघ्न कहलाने से बचा लेगा, किंतु ऐसा नहीं हो सका. संघ परिवार से दूरी रावत के लिए अयोग्यता बन गई. हाईकमान ने भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष बच्ची सिंह रावत को भी नज़रअंदाज़ कर दिया. एक ज़मीनी कार्यकर्ता होना उनकी डीमेरिट का कारण बना. महिला उम्मीदवार के रूप में राज रावत की दावेदारी महज दिखावा साबित हुई. यह कोई पहला अवसर नहीं है, जब भाजपा ने पैराशूट उम्मीदवार उतारा है. इसके पहले भी 2004 में पार्टी ने सुषमा स्वराज को उतारा था. इसी तरह राजनाथ सिंह के पुत्र के साले को खुश करने के लिए टिहरी के युवराज का टिकट काटकर जसपाल राणा को प्रत्याशी बनाया गया था, लेकिन इससे सूबे में एक ग़लत संदेश गया और जनता ने इसे टिहरी राजघराने का अपमान मानते हुए हिसाब-किताब बराबर कर लिया. लोकसभा चुनाव में तो राज्य से भाजपा का सूपड़ा ही सा़फ हो गया. जानकारों का मानना है कि निशंक की शह पर ही फौजी से राजनेता बने खंडूरी को हर स्तर पर निपटाया जा रहा है. निशंक की एकमात्र नायक बने रहने की चाहत के चलते सूबे के कद्दावर भाजपा नेताओं के पर कतरे जा रहे हैं.

ईमानदार नेताओं के साथ हो रही नाइंसा़फी भाजपा के मिशन 2012 पर भारी पड़ सकती है. गढ़वाली महासभा के महासचिव रोशन धस्माना का मानना है कि यदि भाजपा ज़मीनी नेताओं पर भरोसा नहीं करेगी और यूं ही गगन बिहारी नेताओं को थोपती रहेगी तो मिशन 2012 की राह बहुत कठिन हो जाएगी.

तरुण विजय की जीत का जश्न मना रही भाजपा को संगठन के अंदर कार्यकर्ताओं के बीच व्याप्त असंतोष की शायद भनक नहीं है. हालांकि तरुण ने अपनी जीत का सेहरा सभी के सिर बांधा और कहा कि वह प्रदेश को विश्व में सम्मान दिलाने की हरसंभव कोशिश करेंगे. उधर तरुण की जीत ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि संघ परिवार आज भी सब पर भारी है.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Input your search keywords and press Enter.