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चीन की छत्रछाया के निहितार्थ
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चीन की छत्रछाया के निहितार्थ

दुनिया जानती है कि हर दृष्टिकोण से सर्वाधिक ताक़तवर स़िर्फ अमेरिका है, लेकिन बीच-बीच में चीन के उछलने से कई सवाल खड़े होते रहते हैं. ख़ासकर तब, जब वह पाकिस्तान जैसे देश के संरक्षण के लिए लाठी लेकर खड़ा दिखता है. हालांकि चीन को यह पता है कि पाकिस्तान यदि अमेरिका या भारत के विरुद्ध कुछ करना तो दूर की बात, कूटनीतिक रूप से ऐसा सोच भी ले तो ये दोनों देश उसकी ईंट से ईंट बजा देने की क्षमता रखते हैं. यदि बीच में चीन आ जाए तो उसे भी सबक सिखा सकते हैं. इस स्थिति में यह सोचनीय है कि अमेरिका और भारत जैसी शक्तियों को छोड़ चीन पाकिस्तान जैसे डूबते जहाज पर सवारी करने को क्यों बेक़रार रहता है. यह किसी से छिपा नहीं है कि आज पाकिस्तान राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और कूटनीतिक यानी हर तरह के गंभीर संकट से दो-चार है. पूरे देश में बदहाली का आलम है. अवाम परेशान है, समस्याओं का अंबार है. हाल में चीन यात्रा से लौटे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ रज़ा गिलानी ने अपने एक बयान में चीन को भरोसेमंद दोस्त बताया है. उन्होंने कहा कि चीन ने संकट की घड़ी में पाकिस्तान का हमेशा साथ दिया है. बकौल गिलानी, चीन हर परीक्षण पर खरा उतरा है और हर तरह के हालात में पाकिस्तान का दोस्त रहा है. पाकिस्तान और चीन के बीच कूटनीतिक संबंधों के साठ साल पूरे होने के अवसर पर यूसुफ रजा गिलानी चीन पहुंचे थे.

यूसुफ रज़ा गिलानी की चीन यात्रा से लगता है कि पाकिस्तान भारत और अमेरिका के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक मज़बूत सहयोगी की तलाश में है. इस मामले में चीन ने उसकी मदद करने की वचनबद्धता दोहराई है. यदि पूरे प्रकरण को कूटनीतिक नज़रिए से देखें तो भारत और अमेरिका को चाहिए कि वे इस तरह के मसलों पर अपना व्यापक और संवेदनशील दृष्टिकोण बनाए रखें, ताकि पाकिस्तान का चीन जैसा दोस्त सिर न उठा सके.

पाकिस्तान की धरती पर अमेरिकी हमले में ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद गिलानी की इस यात्रा को काफी अहम माना जा रहा है. वहीं गिलानी की इस मुंहजबानी दरियादिली से ख़ुश होकर चीन ने हर हाल में उसकी मदद करते रहने का आश्वासन दिया है. उसने पाकिस्तान को 50 से अधिक लड़ाकू विमान देने पर सहमति जताई है. गिलानी के साथ चीन गए पाकिस्तान के रक्षा मंत्री चौधरी अहमद मुख्तार ने बीजिंग में कहा कि चीन ने पाक को 50 से ज़्यादा जेएफ़-17 थंडर लड़ाकू विमान देने का फ़ैसला लिया है. ये लड़ाकू विमान छह महीनों के भीतर पाकिस्तान को मिल जाएंगे. हालांकि चीन के विदेश मंत्रालय ने अभी इस बारे में कुछ स्पष्ट नहीं किया है. ख़ैर, यदि मुख्तार की ही बात मानें तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि पाकिस्तान की मदद के लिए चीन हर व़क्त अपने बटुए का मुंह खोले रहता है. यदि हालात की समीक्षा करें तो यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि चीन ने पाकिस्तान की मदद करते रहने का जो बीड़ा उठाया है, वह उसकी (पाकिस्तान) गिड़गिड़ाहट का परिणाम है. वरना चीन वहीं चारा फेंकता है, जहां से उसे कुछ मिलने वाला होता है. यानी चीन की छवि एक पेशेवर देश की है. वह अनायास किसी से दोस्ती अथवा दुश्मनी नहीं करता.

अब यदि पाकिस्तान की चर्चा करें तो पता चलेगा कि चीन के आगे उसके गिड़गिड़ाने का अनुमान इसलिए लगाया जा सकता है, क्योंकि पाकिस्तान की धरती पर आतंक के पर्याय ओसामा बिन लादेन के मारे जाने के बाद अमेरिका और उसके दूसरे सहयोगी देशों द्वारा उसे लगातार फटकार लगाई जा रही है. पाकिस्तान को डर है कि यदि इन देशों की मदद बंद हो जाए तो उसे रोटी के लाले पड़ जाएंगे और अवाम जीना मुहाल कर देगी. बावजूद इसके, जानकार यह मानते हैं कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी ने चीन की यात्रा कर अमेरिका को संदेश देने की कोशिश की है कि पाकिस्तान के पास चीन की शक्ल में एक मज़बूत कूटनीतिक विकल्प मौजूद है. ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद आतंकवाद के ख़िलाफ़ चल रहे युद्ध में आईएसआई की भूमिका पर भी कई सवाल खड़े हो रहे हैं. अमेरिका सहित कई देशों ने पाकिस्तान सरकार की कड़ी आलोचना की है कि पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसियों को ओसामा बिन लादेन की जानकारी क्यों नहीं थी. वहीं चीन एकमात्र ऐसा देश है, जिसने ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद खुलकर पाकिस्तान का समर्थन किया और कहा कि आतंकवाद के ख़िलाफ़ युद्ध में पाकिस्तान की सफलताओं को याद रखना चाहिए. चीन से मिले समर्थन की बदौलत ही पाकिस्तान कहता है कि अमेरिका ने बिना बताए अभियान चलाकर उसकी संप्रभुता का उल्लंघन किया है. वरना पाकिस्तान की इतनी हिम्मत कहां, जो वह अमेरिका के बारे में इस तरह की तल्ख टिप्पणी करे.

रहा सवाल चीन का तो वह अपनी आदतों के मुताबिक़ दुनिया के उन सभी देशों का दोस्त बना रहेगा, जिनकी भारत और अमेरिका से दुश्मनी है. जैसे भारत-पाकिस्तान के बीच तकरार है तो वह (चीन) पाकिस्तान के साथ है. कोरियाई प्रायद्वीप में अमेरिका और भारत दक्षिण कोरिया के साथ हैं तो चीन उत्तर कोरिया के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार है. यानी चीन को वह सब कुछ करना अच्छा लगता है, जो भारत और अमेरिका को पसंद नहीं है. चीन का दूसरा रूप यह भी है कि वह अन्य देशों से अलग विशुद्ध रूप से एक व्यवसायिक देश की छवि बनाए हुए है. यानी उसे दुनिया में बाज़ार चाहिए, जिसमें वह अपने सामान बेचकर तेजी से विदेशी मुद्रा अर्जित करे और वह ऐसा कर भी रहा है. चीन के प्रति भारत और अमेरिका के रुख़ को देखकर तो यही लगता है कि ये दोनों उसे एक व्यवसायिक देश के रूप में ही देखते हैं. चीन की इस छवि में उसकी छोटी-छोटी खामियां छिप जाती हैं. नतीजतन, उसे जानबूझ कर नज़रअंदाज़ भी किया जाता है. वैसे यह ठीक नहीं है, क्योंकि तेजी से आर्थिक रूप से समृद्ध होता चीन भविष्य में भारत-अमेरिका के लिए चुनौती बन सकता है. इसलिए इस ओर समय रहते ध्यान दिया जाना चाहिए, वरना कहानी बिगड़ सकती है. बहरहाल, यूसुफ रज़ा गिलानी की चीन यात्रा से लगता है कि पाकिस्तान भारत और अमेरिका के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक मज़बूत सहयोगी की तलाश में है. इस मामले में चीन ने उसकी मदद करने की वचनबद्धता दोहराई है. यदि पूरे प्रकरण को कूटनीतिक नज़रिए से देखें तो भारत और अमेरिका को चाहिए कि वे इस तरह के मसलों पर अपना व्यापक और संवेदनशील दृष्टिकोण बनाए रखें, ताकि पाकिस्तान का चीन जैसा दोस्त सिर न उठा सके.

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