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साहस की मिसाल थीं क्रिस्टिना स्कारबेक
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साहस की मिसाल थीं क्रिस्टिना स्कारबेक

02मारिया क्रिस्टिना जैनिना स्कारबेक, जिन्हें क्रिस्टीन ग्रैनविले के नाम से भी जाना जाता था, द्वितीय विश्‍व युद्ध के दौरान ब्रिटेन के स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप का हिस्सा थीं. उन्हें नाजी अधिकृत पोलैंड और फ्रांस के खिलाफ जासूसी करने के लिए याद किया जाता है. उनका जन्म 1 मई 1908 को हुआ था. ब्रिटेन के स्पेशल ऑपरेशन्स एक्जिक्यूटिव की स्थापना होने से पहले ही वह ब्रिटिश एजेंट बन गई थीं. वे सबसे लंबे समय तक खुद को बचाकर जर्मनी के खिलाफ काम करने वाली ब्रिटिश जासूस थीं. ऐसा माना जाता है कि उनके व्यक्तित्व की वजह से कई महिलाओं ने जासूसी का पेशा अपनाने की तरफ कदम ब़ढाया था. सन 1941 में उन्होंने अपना जासूसी नाम क्रिस्टीन ग्रैनविले प्रयोग में लाना शुरू कर दिया था. इस नाम को उन्होंने कानूनी रूप से 1946 में एक ब्रिटिश नागरिक के तौर पर अपनाया.

स्कारबेक का जन्म 1908 में पोलैंड की वर्तमान राजधानी वॉरसा में हुआ था. उनकी मां एक अमीर यहूदी परिवार से ताल्लुक रखती थीं. उनके पिता ने मां से शादी ही इस वजह से कि थी जिससे वे अपने कर्जे चुका सकें और खर्चीली जिंदगी जी सकें. उनके पिता ने अपने दहेज में मिले पैसों को कर्जा चुकाने में समाप्त कर दिया था. अपनी किशोरावस्था में स्कारबेक का अपने पिता से साथ काफी झग़डा हुआ करता था, इसका कारण यह था कि भले ही स्कारबेक एक ल़डकी थीं लेकिन वे ल़डकों की तरह स्वच्छंद जीवन जीना चाहती थीं, जिससे उनके पिता को आपत्ति थी.
जब वे 22 वर्ष की थीं तभी उनके पिता की मौत हो गई. वे नहीं चाहती थीं कि अपनी मां पर वे आर्थिक रूप से बोझ बनें. इस वजह से उन्होंने कार कंपनी फियट में नौकरी शुरू कर दी. लेकिन कुछ ही महीनों बाद उनकी तबियत ख़राब रहने लगी तो एक्सरे से पता चला कि उन्हें टीबी है जिसके बाद उन्होंने नौकरी छो़ड दी. कार कंपनी की तरफ से इंश्योरेंश कंपनी ने बीमारी के लिए उन्हें मुआवजा भी दिया. डॉक्टरों ने उन्हें सलाह दी कि ज्यादा से ज्यादा समय खुली हवा में गुजारने की जरूरत है. इसके बाद वे दक्षिणी पोलैंड चली गईं. वहां वादियों के बीच उन्होंने अपने दिन गुजारने शुरू कर दिए. 1930 में उनकी शादी बिजनेसमैन गुस्ताव से हुई. लेकिन ये शादी ज्यादा दिनों तक नहीं चली. स्कारबेक ने उसे छा़ेड दिया लेकिन कुछ ही दिनों बाद उन्हें जर्ज़ी नाम के एक आदमी से प्यार हो गया जिससे उन्होंने 1938 में दोबारा शादी की. जब जर्मनी ने पोलैंड पर कब्जा करने के लिए हमला कर दिया तो ये युगल लंदन भाग गया. वहां पर स्कारबेक ने खुफिया एजेंसी से ज़ुडने की कोशिश की. उनकी मदद ब्रिटिश अधिकारियों ने की. इसका कारण यह था कि ब्रिटिश अधिकारी यह बात जानते थे कि स्कारबेक एक पोलिश महिला हैं और उन्हें अपने मिशन के लिए पोलैंड भी भेजना प़डेगा तो वे अपने देश के बारे में भली भांति परिचित हैं. स्कारबेक ने अपनी मेहनत से पोलैंड में ऐसा कूरियर सिस्टम बनाया जिसके जरिये जर्मन सेनाओं की सूचना आसानी से ब्रिटेन तक पहुंचाई जा सके. यह पूरा सिस्टम बनाने के बाद स्कारबेक पोलैंड से बुडापेस्ट के रास्ते तुर्की की राजधानी कायरो भाग गईं. जब वे काहिरा पहुंची तो स्पेशल ऑपरेशन एक्जीक्यूटिव के अधिकारियों ने उन पर शक किया क्योंकि स्कारबेक के संबंध पोलिश खुफिया एजेंसियों के भीतर भी थे. इसके अलावा शक की एक और वजह उन्हें मिला तुर्की का वीजा भी था क्योंकि उस तुर्की का वीजा ज्यादातर या तो जर्मनी की जासूसों को मिलता था या पोलिश जासूसों को, लेकिन स्कारबेक इन दोनों में कुछ भी नहीं थीं. जब जर्मनी ने सोवियत यूनियन पर हमला किया तो स्कारबेक ने पोलैंड में अपने संबंधों के जरिए कई खुफिया सूचनाएं ब्रिटेन तक पहुंचाई थीं. कुछ सालों बाद वे फ्रांस चली गई और एसओई की टीम के लिए काम करना शुरू कर दिया. वे फ्रेंच बोलने में निपुण थीं इस वजह से उन्होंने मैडम पाउलिन के छद्म नाम से ब्रिटेन की ओर से जर्मनी के विरुद्ध जासूसी करना शुरू कर दिया. स्कारबेक के काम की वजह से ब्रिटेन में उनकी काफी तारीफ हो रही थी. 1945 में उन्हें एक बार फिर पोलैंड भेजा गया. जब रेड आर्मी पोलैंड को नाजी सेनाओं के कब्जे से बाहर निकालने के लिए आगे ब़ढने लगीं तो उस समय गोपनीय सूचनाएं रूस और ब्रिटेन को बताकर स्कारबेक ने मित्र राष्ट्रों की काफी मदद की.
विश्‍व युद्ध समाप्त होने के बाद वे 1946 में वे ब्रिटेन वापस लौट गईं. वहां की सरकार ने उनकी काबिलियत के लिए काफी सराहा. सरकार का मानना था कि स्कारबेक एकमात्र जासूस थीं जो युद्ध के दौरान लगभग छह वर्षों तक लगातार जासूसी करती रहीं. इस दौरान उनके बहुत सारे साथी मार दिए गए लेकिन उन्होंने किसी तरह अपनी जान बचाने में सफलता पाई. इसके बाद उन्हें ब्रिटेन की नागरिकता दे दी गई.
स्कारबेक की मौत 1952 में लंदन के एक होटल में चाकू घोंपकर हत्या करने की वजह से हुई. उनको मारने वाले पर मुकदमा चलाकर मौत की सजा दे दी गई. स्कारबेक ने अपनी वीरता से नाजी सैनिकों को धूल चटाने की पूरी कोशिश की. वे लगभग हर जगह इस बात में कामयाब भी हुईं. दुनिया के इतिहास में उन्हें बेहतरीन महिला जासूसों में गिना जाता है.

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