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कांग्रेस के युवराज का नया राजनीतिक पैंतरा
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कांग्रेस के युवराज का नया राजनीतिक पैंतरा

क्‍या राहुल गांधी ने कांग्रेस पार्टी के ख़िला़फ अभियान छेड़ दिया है? स्पष्ट शब्दों में कहें तो कांग्रेस के युवराज, जिन्हें उनके कई समर्थक भगवान कृष्ण के आधुनिक अवतार के रूप में देखते हैं, ने कहीं कांग्रेस-नीत सरकार के स्थापित सत्ता केंद्रों को चुनौती देना शुरू तो नहीं कर दिया है? ऐसा सत्ता केंद्र, जिसके शीर्ष पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनके गृह मंत्री पी चिदंबरम बैठे हुए हैं. इस सवाल की ठोस वजहें हैं. लंबे समय से मध्यमार्गी-दक्षिणपंथी विचारधारा का दोहन कर रही कांग्रेस को यह लगने लगा है कि अब इससे ख़ास फायदा नहीं मिलने वाला. इसलिए वह मध्यमार्गी-वामपंथी नीतियों की ओर आगे बढ़ने लगी है. हालांकि, इन दोनों नज़रियों का मतलब अब बदल चुका है. सच्चाई तो यह है कि पिछले दो दशकों में केंद्र ही अपने स्थान से खिसक गई है और इसके साथ वामपंथ एवं दक्षिणपंथ भी खिसका है. वामपंथ अब किसी विचारधारा का नहीं, बल्कि पॉपुलिज़्म का प्रतिनिधित्व करता है. मार्क्सवादी विचारधारा 1990 के दशक में ही मर चुकी थी और मिखाइल गोर्वाचेव एवं डेंग जियाओपिंग जैसे कॉमरेडों ने जिस सफाई से इसको दफन किया कि मार्क्स का भूत भी इससे बच नहीं सकता.

किसी भी सत्ताधारी पार्टी की सफलता की आदर्श स्थिति वही होती है, जबकि वह सरकार के साथ-साथ विपक्ष के लिए बनी जगह पर भी क़ब्ज़ा कर ले. ब्रिटिश शासकों को इस कला में महारत हासिल थी. मुस्लिम लीग की वफादारी का आलम यह था कि तीन दशकों तक चले स्वतंत्रता के संघर्ष के दौरान लीग का एक भी नेता जेल नहीं गया. कांग्रेस इतनी वफादार तो नहीं थी, लेकिन अपनी सीमा का उसे भी एहसास था.

उड़ीसा में जनजातीय समुदायों का वोट सुनिश्चित करने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश की योजना को ख़त्म करना किस्से का एक पहलू भर है. सरकारी नज़रिए के मुताबिक़ नक्सलवाद आज भारत के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बन चुका है. यदि चिदंबरम की चले, तो वह नक्सलियों को नेस्तनाबूद करने के लिए वायु सेना की मदद लेने से नहीं हिचकेंगे. एक ओर जब प्रधानमंत्री दिल्ली में राज्यों के पुलिस प्रमुखों को नक्सलवाद से लड़ने के लिए तैयार होने की नसीहत दे रही हों, ठीक उसी समय दूर उड़ीसा में एक जनसभा में राहुल गांधी के बगल में बैठे लाडो सिकोका को देखना चिदंबरम की आंखों को बिल्कुल नहीं भाया होगा. सिकोका के नक्सली होने के बारे में कोई संदेह नहीं. उसे पिछली 9 अगस्त को पुलिस ने गिरफ़्तार किया था और जमकर पिटाई की थी. उसे केवल इसीलिए रिहा किया गया कि वह नियमगिरि में राहुल के गले में फूलों की माला डालकर उनका स्वागत कर सके.

दिल्ली के सियासी गलियारों में यह सभी जानते हैं कि दिग्विजय सिंह ने राहुल गांधी की सहमति से ही चिदंबरम के ख़िला़फ बयानबाज़ी की थी. अब इसमें संदेह की कोई गुंजाइश भी नहीं रही. राजनीति में भावनाओं के लिए कोई जगह नहीं होती और चिदंबरम राहुल की कैबिनेट से बाहर रहने वाले पहले राजनीतिज्ञ हो सकते हैं. छत्तीसगढ़ का राज्यपाल बनकर भाजपा के अपने साथियों को वायु सेना की मदद के बिना नक्सलियों से लड़ने की सलाह देते चिदंबरम के शानदार राजनीतिक करियर का यह निराशाजनक अंत होगा. हमारे महत्वाकांक्षी गृह मंत्री के लिए यह बात किसी हालत में राहत पहुंचाने वाली नहीं होगी कि उनकी प्रशंसा में अधिकतर बयान अब भाजपा की ओर से ही आते हैं. अपनी स्थिति स्पष्ट करने के लिए ही शायद उन्होंने भगवा आतंक का मुद्दा उठाया था. यह अनुमान लगाना बिल्कुल आसान है कि राहुल गांधी की सरकार में गृह मंत्री कौन होगा.

किसी भी सत्ताधारी पार्टी की सफलता की आदर्श स्थिति वही होती है, जबकि वह सरकार के साथ-साथ विपक्ष के लिए बनी जगह पर भी क़ब्ज़ा कर ले. ब्रिटिश शासकों को इस कला में महारत हासिल थी. मुस्लिम लीग की वफादारी का आलम यह था कि तीन दशकों तक चले स्वतंत्रता के संघर्ष के दौरान लीग का एक भी नेता जेल नहीं गया. कांग्रेस इतनी वफादार तो नहीं थी, लेकिन अपनी सीमा का उसे भी एहसास था. हालांकि, महात्मा गांधी ने बाद के दिनों में कांग्रेस और आम जनता को अंग्रज़ों के भय और लोभ-लालच के चंगुल से मुक्त कराया और स्थितियां बदल गईं और शायद ही ऐसा कोई कांग्रेसी नेता हो जो स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जेल न गया हो.

प्रजातांत्रिक व्यवस्था का चरित्र ही ऐसा होता है कि इसमें लगातार बदलाव होते रहते हैं. जवाहरलाल नेहरू ने दक्षिणपंथी धड़े को कोई तवज्जो नहीं दिया, लेकिन ग़ैर-साम्यवादी वामपंथी धड़े को धीरे-धीरे कांग्रेस में आत्मसात कर लिया. वामपंथ के प्रति उनकी आस्था के प्रति कोई संदेह नहीं था और उनकी यह छवि इसमें मददगार साबित हुई. इंदिरा गांधी ने दक्षिणपंथी और वामपंथी ताक़तों को बड़ी चालाकी से विभाजित करके रखा, लेकिन आपातकाल के बाद ये ताक़तें कांग्रेस के ख़िला़फ एकजुट हो गईं. कांग्रेस के प्रति दुराव की यह भावना राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के गठन तक कायम रही, लेकिन इसके बाद वामपंथ और कांग्रेस फिर क़रीब आने लगे. पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे का किला ढहने की आशंका ने परिस्थितियों में फिर बदलाव ला दिया है. ममता बनर्जी के साथ मिलकर कांग्रेस माकपा को ध्वस्त तो करना चाहती है, लेकिन राष्ट्र की राजनीतिक सोच में मार्क्सवादी विचारधारा की अहमियत का उसे पता है. भूख और ग़रीबी से बेहाल हमारे देश में एक ऐसे राजनीतिक दल की मौजूदगी अपरिहार्य है जिसे ग़रीब जनता अपना मान सके. कांग्रेस इसी रास्ते पर आगे बढ़ रही है. एक साथ दो वोट बैंकों पर उसकी नज़र है. दिन के समय वह ग़रीबों की हितैषी नज़र आना चाहती है तो रात के अंधेरे में अमीरों और संभ्रांत वर्ग की. ग़रीबों के समर्थन से इसे वोट मिलेगा तो अमीरों के समर्थन से शासन करने की शक्ति. कांग्रेस की राजनीति का यह नया और चालाक चेहरा है, जिसकी पहली झलक उस नई पीढ़ी के सामने पेश की जा रही है, जिसे इंदिरा गांधी के बारे में ज़्यादा नहीं पता और जो नेहरू की नीतियों को पसंद नहीं करती. राजनीति के इस नए खेल का नायक वही हो सकता है, जिसके पास करिश्मा हो ताकि ग़रीब ख़ुद ही उसकी ओर खिंचा चला आए और अमीरों का समर्थन भी उसे हासिल हो सके. राहुल गांधी के सामने यही चुनौती है. उन्होंने ख़ुद को दिल्ली में ग़रीबों का अभिभावक बनकर रहने की घोषणा की है. इसका मतलब यह है कि देश के ग़रीबों को दिल्ली की सत्ता के संरक्षण की ज़रूरत है. अमीर और संभ्रांत वर्ग के साथ उनकी गोटी बैठ चुकी है और अब ग़रीबों को अपने प्रभाव में लेने की पहल उन्होंने शुरू कर दी है.

हालांकि, क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियां यह काम पहले ही करती रही हैं, अब भी कर रही हैं. नवीन पटनायक सत्ता की उलझनों को समझते हैं. उन्हें कई बार अमीर या ग़रीब तबकों में से किसी एक के पक्ष में खड़ा होने को मजबूर होना पड़ा है. उनकी समस्या यह है कि उनके पास मनमोहन सिंह जैसा कोई मुखौटा नहीं है. बुद्धदेव भट्‌टाचार्य इस विरोधाभास को संभालने में विफल हो गए, लेकिन दूसरे लोगों ने यह कला सीख ली है. पटनायक, नीतीश कुमार, मायावती या चंद्रबाबू नायडू को इतनी आसानी से ख़ारिज नहीं किया जा सकता. विरोधाभास और समस्याएं हर देश में मौजूद होती हैं, भारत की विशालता इस चुनौती को और ज़्यादा जटिल बनाती है. आने वाले दिनों में यह देखना रोचक होगा कि कांग्रेस पार्टी राजनीतिक रूप से कितनी दक्ष है और वह अपनी राजनीतिक ताक़त की मदद से सत्ता को नई पीढ़ी के हाथों में हस्तांतरित करने में कामयाब हो पाती है या नहीं.

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