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नव उदारवाद की प्रयोगशाला में भ्रष्‍टाचार
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नव उदारवाद की प्रयोगशाला में भ्रष्‍टाचार

एक दशक पहले यह खतरा पहचान में आने लगा था कि अगर नव उदारवादी नीतियों के मुक़ाबले में खड़े होने वाले जनांदोलनों का राजनीतिकरण और समन्वयीकरण नहीं हुआ तो नव उदारवाद के दलाल, चाहे वे नेता हों, नौकरशाह हों, बुद्धिजीवी हों, एनजीओबाज हों, धर्मगुरु हों, कलाकार हों या खिलाड़ी, विरोध के सारे प्रयास नाकाम कर देंगे. वही हो रहा है. आज नव उदारवाद के वास्तविक विरोधी रहे कतिपय समूह और व्यक्ति भी राजनीति को कोसने वालों के पीछे चलते नज़र आते हैं. इस पीछे चलने में अलग-अलग मुद्दों पर और क्षेत्रों में सक्रिय जनांदोलनों की एकजुटता से नव उदारवाद को पोसने वाली राजनीति के विकल्प की संकल्पना भी पीछे चली गई है. पिछले दो दशकों के संघर्ष में बाजी नव उदारवादियों के हाथ रही है. लोकपाल विधेयक और विदेशों में जमा काला धन वापस लाने के मुद्दों के इर्द-गिर्द चलने वाले भ्रष्टाचार विरोधी अभियान ने नव उदारवाद के पक्ष को और मज़बूत किया है. यह अभियान चलाने वाले प्रकटत: या प्रच्छन्नत: नव उदारवाद के समर्थक हैं.

अमेरिका से भारत तक नव उदारवाद स्वतंत्र राजनीति की इजाज़त नहीं देता. बराक ओबामा को राष्ट्रपति बने दो साल हुए हैं. अगला चुनाव लड़ने के लिए उन्होंने रिकॉर्ड धन इकट्ठा कर लिया है. अमेरिका में यह चल सकता है, लेकिन भारत में स्वतंत्र राजनीति का न रहना, भारत का न रहना हो जाएगा. नव उदारवाद की प्रयोगशाला में अर्थ नीति के बाद शिक्षा, स्वास्थ्य, भाषा, कला, साहित्य, संस्कृति, यहां तक कि नागरिक बोध और जीवन मूल्यों को भी नव उदारवादी मोल्ड में ढाला जा रहा है. अगर राजनीति भी इसी मोल्ड में ढल में जाएगी तो नव उदारवाद का प्रयोग पूरा हो जाएगा.

पिछले दो दशकों से देश पूरी दुनिया के साथ नव उदारवाद की प्रयोगशाला में तब्दील हो गया है. आरएसएस की पिछले क़रीब सौ वर्षों की कोशिशों के बावजूद जनता ने देश को सांप्रदायिकता की प्रयोगशाला नहीं बनने दिया, लेकिन पूंजीवादी साम्राज्यवाद के एजेंटों ने महज़ 20-25 सालों में इसे नव उदारवाद की प्रयोगशाला बना डाला. नव उदारवादी आर्थिक नीति से शुरू हुआ सिलसिला राजनीति, शिक्षा, भाषा, संस्कृति, कला, खेल, पत्रकारिता, धर्म एवं अध्यात्म आदि को अपनी जद में ले चुका है. सिविल सोसायटी एक्टिविस्टों का भ्रष्टाचार विरोधी अभियान नव उदारवादी शिकंजे को कहीं ज़्यादा गहराई में कस रहा है. साथी कहते हैं कि देश गर्म हो रहा है, जो चाहे इसका उपयोग कर ले. टीम हजारे और रामदेव के साथ जुटने वाले लोग नव उदारवाद विरोधी राजनीति के साथ भी जुट सकते हैं, जोड़ने वाला होना चाहिए. ऐसे साथियों की सदाशयता से इंकार नहीं किया जा सकता. वे वाकई कुछ सार्थक होता देखना चाहते हैं. सबसे बड़ी बात है कि वे का़फी बिगड़ चुकी स्थिति में भी निराश नहीं होना चाहते. लेकिन क्या वे नहीं जानते कि यह नव उदारवादी व्यवस्था के पेटे की गर्माहट है, जो उसने अपने बचाव के लिए पैदा की है? वरना नव उदारवाद की मार खाने वाले तो शुरू से संघर्ष कर रहे हैं और हताशा में आत्महत्या भी. कई लोग हैं, जो नव उदारवादी निजाम द्वारा संविधान की मूल आत्मा को नष्ट करने के प्रति आगाह करने में लगे हैं. इन सबका संघर्ष सीधे राजनीतिक भी नहीं है, लेकिन हजारे और रामदेव के हिमायतियों को इनका संघर्ष साथ देने लायक नहीं लगता. नव उदारवाद के चरित्र और प्रभावों को समझने और बताने के उद्देश्य से भारतीय भाषाओं में का़फी सामग्री (पर्चे, फोल्डर, पुस्तिकाएं, पत्रिकाएं, वेबसाइट) लगातार प्रकाशित हो रही है, लेकिन देश गरमाने वालों को इससे कोई सरोकार नहीं है. जाहिर है, देश को गरमाने का इनका एजेंडा अलग है, बल्कि जहां वास्तविक गर्माहट है, सिविल सोसायटी एक्टिविस्ट उस पर पानी डालने की कोशिश करते हैं.

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सिविल सोसायटी उपनिवेशवादी व्यवस्था कायम होने के साथ बनना शुरू हो गई थी, लेकिन वह इस कदर मुटाई पिछले क़रीब 25 सालों से जारी उस नव उदारवादी व्यवस्था के पेट में रहते हुए, जिसमें भ्रष्टाचार भी खूब पला-बढ़ा. अब वह भ्रष्टाचार रहित नव उदारवादी व्यवस्था चाहती है. भारत में यह कैसे संभव हो सकता है, जहां अर्थव्यवस्था केवल एक चौथाई आबादी के लिए बनाई और चलाई जाती हो? सभी जानते हैं कि नव उदारवादी व्यवस्था देश की तीन चौथाई आबादी को बाहर रखकर चलती है. नव उदारवादी आर्थिक सुधार अथवा नई आर्थिक नीतियां ज़्यादा से ज़्यादा 25 प्रतिशत आबादी को कवर करती हैं और लूटती समस्त संसाधनों और श्रम को हैं. बाकियों के लिए अपने असंगठित और फुटकर धंधे हैं या फिर गांधी समेत कांग्रेसी नेताओं के नाम पर चलाई जाने वाली कतिपय कल्याणकारी योजनाएं. उनमें भी बराबर भ्रष्टाचार होता रहता है. माना कि एक चौथाई आबादी की व्यवस्था में भ्रष्टाचार रोकने का पुख्ता इंतजाम हो भी जाता है तो इससे बाकी आबादी को क्या मिलने वाला है? इससे एक चौथाई आबादी के सुकून और संपन्नता में जरूर बढ़ोत्तरी हो जाएगी. क्या हम सिविल सोसायटी के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का यह अर्थ निकालें कि राजनीति, नौकरशाही और व्यापार में उच्च पदों पर आसीन हस्तियों के भ्रष्टाचार पर लगाम रहेगी तो सिविल सोसायटी, विशेषकर एक्टिविस्टों को नव उदारवादी नीतियों का फायदा और ज़्यादा मिलेगा? वेतन-भत्ते और बढ़ेंगे, एनजीओ को और फंड मिलेगा, देश-विदेश घूमना ज़्यादा सुविधाजनक और आरामदेह होगा, मौजमस्ती ज़्यादा हो पाएगी, बेटा-बेटी जल्दी और अच्छे से सेटल होंगे और महंगे से महंगा इलाज होने के बाद भी जब मौत आ ही जाएगी तो संततियों के लिए बड़ी संपत्ति छोड़ कर जाएंगे?

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काला धन वापस लाकर जनता का दरिद्रय हरने की वकालत करने वाले दरअसल झांसा देते हैं. काला धन जमा करने वाले स्विस अथवा अन्य बैंक इस व्यवस्था का स्वीकृत हिस्सा हैं. यह व्यवस्था धन को काला कर सकती है, लेकिन जिन्होंने वह पैदा किया है, उन पर खर्च नहीं कर सकती. वह खाद्यान्नों को बर्बाद कर देगी, उनका उत्पादन घटा देगी, लेकिन भूखी और कुपोषित जनता को उपलब्ध नहीं होने देगी. आप मारें या छोड़ें, कहना होगा कि भ्रष्टाचार के विरोध में जो देश गरमा रहा है, उसकी सच्चाई यही है. पिछले तीन दशकों से ज़्यादा की छोटी-मोटी राजनीतिक सक्रियता के अनुभव के आधार पर हमारा मानना है कि भ्रष्टाचार विरोध का यह अभियान वास्तव में राजनीति के विरोध का अभियान है. अमेरिका से भारत तक नव उदारवाद स्वतंत्र राजनीति की इजाज़त नहीं देता. बराक ओबामा को राष्ट्रपति बने दो साल हुए हैं. अगला चुनाव लड़ने के लिए उन्होंने रिकॉर्ड धन इकट्ठा कर लिया है. अमेरिका में यह चल सकता है, लेकिन भारत में स्वतंत्र राजनीति का न रहना, भारत का न रहना हो जाएगा. नव उदारवाद की प्रयोगशाला में अर्थ नीति के बाद शिक्षा, स्वास्थ्य, भाषा, कला, साहित्य, संस्कृति, यहां तक कि नागरिक बोध और जीवन मूल्यों को भी नव उदारवादी मोल्ड में ढाला जा रहा है. अगर राजनीति भी इसी मोल्ड में ढल में जाएगी तो नव उदारवाद का प्रयोग पूरा हो जाएगा. राजनीति से ऩफरत का आलम देखिए. पिछले दिनों दिल्ली में खूनी दरवाज़े के पास शहीदी पार्क में जेपी की मूर्ति के साये में आयोजित एक सभा में टीम हजारे के एक प्रमुख नुमाइंदे स्वामी अग्निवेश के राजनीति और लोकशक्ति पर विचार सुनने को मिले. अवसर कुछ साथियों द्वारा पटना से दिल्ली तक की गई संपूर्ण क्रांति संकल्प यात्रा के समापन का था. अग्निवेश ने राजनीति को बुरा और लोकशक्ति को अच्छा बताया. अपने मुंह मियां मिट्ठू बनते हुए खुद को और भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के संचालक अपने साथियों को लोकशक्ति का सच्चा प्रतिनिधि और भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को सच्चा अभियान घोषित किया, बिना किसी संदेह के. गोया लोकशक्ति रसगुल्ला हो, उठाया और गप से खा लिया. लोकशक्ति के गुणगान में गांधी का हवाला ज़रूर दिया जाता है. नव उदारवाद की प्रयोगशाला में गांधी को ऐसी गरीब गाय बना दिया गया है, जिसकी रस्सी खींचकर कोई भी अपने खूंटे से बांध लेता है, मनमोहन सिंह-सोनिया गांधी से लेकर अन्ना-रामदेव तक.

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नव उदारवाद की प्रयोगशाला में गांधी की एक अलग प्रतिमा गढ़ी जा रही है. वरना क्या कारण है कि हज़ारों निर्दोष नागरिकों की हत्या कराने वाले नरेंद्र मोदी के प्रशंसक अन्ना हजारे को गांधीवादी कहा और लिखा जा रहा है और गांधीवादी चुप ही नहीं, समर्थन में हैं. अग्निवेश ने भी अपने भाषण में गांधी का हवाला दिया कि वह उन्हीं का काम आगे बढ़ा रहे हैं. इन महानुभावों की नज़र में वही लोकशक्ति है, जो इनके आह्वान पर जंतर-मंतर और रामलीला मैदान पहुंचती है, कपिल सिब्बल के चुनाव क्षेत्र में जनमत संग्रह कराती है और टीवी-अ़खबारों में जन लोकपाल विधेयक के पक्ष में ताल ठोकती है. नव उदारवाद की प्रयोगशाला में लोकशक्ति का आधार और मायने बदल गए हैं. जिन्हें नव उदारवादी सुरक्षा कवच प्राप्त है, वे ही लोकशक्ति हैं. उन्हें रेहड़ी नहीं लगानी पड़ती, कचरा नहीं बीनना पड़ता, उनके बच्चे ढाबों पर बर्तन नहीं मांजते, उनकी औरतें कई-कई घरों में झाड़ू-पोंछा-बर्तन नहीं करतीं, उन्हें मलमूत्र स़फाई, कमरतोड़ फुटकर मज़दूरी, कारीगरी और किसानी नहीं करनी पड़ती. अग्निवेश ने अपने भाषण में इसी 28-29 मई को हैदराबाद में बनी सोशलिस्ट पार्टी का ज़िक्र किया, यह बताने के लिए कि भ्रष्ट राजनीति का म़ुकाबला राजनीतिक पार्टियां बनाकर नहीं किया जा सकता. उनके मुताबिक़, कोई भी नवगठित राजनीतिक पार्टी राजनीतिक होने के नाते भ्रष्ट ही होगी. मंच पर उपस्थित जस्टिस राजेंद्र सच्चर ने उनसे कहा कि वह भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष को वास्तविक और व्यापक बनाने के लिए सोशलिस्ट पार्टी में शामिल होने की बाबत सोचें. अग्निवेश ने जवाब दिया कि राजनीतिक पार्टी बनाना या उनमें शामिल होना भटके हुए लोगों का काम है. कुछ भटके हुए लोगों के नाम भी उन्होंने उछाले कि ऐसे लोग चाहें तो सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हो सकते हैं.

(लेखक दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के प्रोफेसर एवं समाजवादी चिंतक हैं)

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