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पाकिस्तान चुनाव : गठबंधन सरकार की उम्मीद
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पाकिस्तान चुनाव : गठबंधन सरकार की उम्मीद

 

पाकिस्तान में पहली बार किसी निर्वाचित सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया है. इसे पाकिस्तान के लोकतंत्र की सफलता ज़रूर कहा जा सकता है, लेकिन सरकार के कार्यकाल पूरा करने का कारण कुछ और भी रहा है. पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति खस्ताहाल में है, आतंकी घटनाओं की संख्या बढ़ ही रही है, अल्पसंख्यक  सुरक्षित नहीं है, और चुनाव में किसी को स्पष्ट बहुमत मिलने की उम्मीद भी कम है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या पाकिस्तान की अगली सरकार देश की स्थिति में सुधार ला सकेगी.

page 11पाकिस्तान में चुनाव होने वाले हैं, इसलिए संसद को भंग कर दिया गया है. अंतरिम प्रधानमंत्री को चुनाव कराने का दायित्व दिया गया है. लोकतांत्रिक तरी़के से चुनी गई सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया. पाकिस्तान के इतिहास में पहली बार चुनाव जीतकर बनाई गई सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया है और इसे पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी अपनी उपलब्धि समझती है. वह मई में होने जा रहे चुनाव में इस उपलब्धि को भुनाने की कोशिश भी करेगी. हालांकि सरकार के कार्यकाल पूरा करने में पीपीपी से बड़ी भूमिका पाकिस्तान की हालात की रही है. पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सरकार जिन परिस्थितियों से गुजरी है, वैसे में कार्यकाल पूरा करना लगभग असंभव था. पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट और सरकार के बीच तनाव काफी बढ़ गया था. सुप्रीम कोर्ट आसिफ अली ज़रदारी पर भ्रष्टाचार का मुक़दमा चलाने के लिए सरकार पर दबाव डाल रहा था. इसी मुद्दे पर पाकिस्तान के एक प्रधानमंत्री यूसुफ रज़ा गिलानी को पद से हटना पड़ा था क्योंकि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद राष्ट्रपति ज़रदारी पर भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए पहल नहीं कर रहे थे. गिलानी को सुप्रीम कोर्ट की अवमानना करने के अपराध में प्रधानमंत्री पद से हटना पड़ा. इसके बाद राजा परवेज़ अशरफ को पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनाया गया और उनके समक्ष भी सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का पालन संबंधी परेशानी आई और ऐसा लगा कि उन्हें भी पद से हटना पड़ेगा, लेकिन अंततः मामला सुलझा लिया गया और पीपीपी को प्रधानमंत्री के दूसरे उम्मीदवार की तलाश नहीं करनी पड़ी.

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सुप्रीम कोर्ट के अलावा पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी का सेना के साथ भी संबंध अच्छा नहीं रहा है. ग़ौरतलब है कि  सेना की ताक़त को कम करने के लिए अमेरिका से सहायता की अपील करने का मामला बहुत गंभीर था. पाकिस्तान में सेना एक ताक़तवर संस्था है और उसकी अनदेखी का परिणाम किसी भी निर्वाचित सरकार को भुगतना पड़ता है. सेना की ताक़त का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इससे पहले किसी भी निर्वाचित सरकार को सेना ने अपना कार्यकाल पूरा नहीं करने दिया. उसी सेना के साथ पीपीपी की सरकार का टकराव हुआ, लेकिन सेना प्रमुख कियानी ने तख्ता पलट की कोशिश तक नहीं की. ऐसा नहीं था कि सेना पर कियानी की पकड़ कमज़ोर है या फिर सरकार को हटाने से पाकिस्तान में विद्रोह हो जाता, लेकिन फिर भी कियानी ने सरकार को चलने दिया. इसका कारण पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति है जो सेना को शासन से दूर रखे हुए है. अभी एशियाई विकास बैंक पाकिस्तान को चेतावनी दी है कि साल के अंत तक उसे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से 9 अरब डॉलर का क़र्ज़ लेना पड़ेगा. पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति बहुत ख़राब है. ऐसे में सेना शासन का जोखिम नहीं उठा सकता क्योंकि वह जानता है कि निर्वाचित सरकार को हटाकर सत्ता पर क़ब्ज़ा करने का मतलब है कि अमेरिका सहित विश्‍व समुदाय का कोपभाजन बनना, जिससे वैश्‍विक आर्थिक संगठनों से सहयोग नहीं मिलेगा, आर्थिक प्रतिबंध लग जाएगा और ऐसे में ग़रीबी, बेरोज़गारी से जूझते पाकिस्तान की जनता को संभालना मुश्किल हो जाएगा. दूसरी तरफ़ विपक्षी पार्टियों ने भी ज़रदारी पर भ्रष्टाचार के आरोप और सेना के विरूद्ध अमेरिकी सहायता के अपील के बावजूद कोई ऐसा क़दम नहीं उठाया, जिससे कि लोकतांत्रिक सरकार को ख़तरा हो.

senateख़ैर किसी तरह पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा कर लिया और अब उसे चुनाव के मैदान में उतरना है. राजा परवेज अशरफ ने संसद भंग करने की घोषणा के बाद अपने अंतिम भाषण में कह दिया है कि उनकी सरकार ने बहुत अच्छा काम नहीं किया, क्योंकि उनकी सरकार को विरासत में हर तरफ से टूटा हुआ, हारा हुआ और आर्थिक संकट में डूबा हुआ देश मिला था. राजा परवेज के बयान से यह तो साफ है कि पीपीपी अपने विकास की उपलब्धि के साथ चुनाव में नहीं जाने वाली है. वैसे भी पीपीपी के पास लोकतंत्र और केवल लोकतंत्र के राग अलापने के अलावा, कोई और दूसरा मुद्दा नहीं है. उसके शासन काल बड़े शहरों कराची, पेशावर, क्वेटा लाहौर आदि में हर दिन दस से बीस लोगों की हत्या हुई. कट्टरपंथी संगठनों पर अंकुश नहीं लगाया गया. लगातार बम विस्फोट की घटनाएं होती रहीं. पीपीपी के मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे, सुप्रीम कोर्ट ने भी सरकार को बदनाम करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी और सेना के साथ भी संबंध ख़राब रहे, जिसके कारण सेना ने कट्टरपंथी संगठनों को शांत करने में अपनी अहम भूमिका नहीं निभाई. हालांकि पीपीपी के पास कोई ऐसा मुद्दा नहीं है, जिसे लेकर वह चुनाव में जाए और उन्हें व्यापक जनसमर्थन मिल जाए, लेकिन दूसरा मुद्दा विकल्प का है क्योंकि दूसरे दलों के साथ भी कुछ ऐसी ही स्थिति है. किसी के पास कोई बेहतर खाका नहीं है जिससे पाकिस्तान में बदलाव आ जाए, वहां की आर्थिक स्थिति सुधर जाए और कट्टरपंथी संगठनों पर अंकुश लगाया जा सके. पाकिस्तान की दूसरी बड़ी पार्टी नवाज़ शरीफ की पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) है. नवाज़ शरीफ ने पहले पीपीपी का साथ दिया था, लेकिन बाद में वह अलग हो गए. पंजाब में नवाज़ का आधार मज़बूत है और राज्य में उनकी पार्टी ही सत्ता में थी. पाकिस्तान की राजनीति में पंजाब का दबदबा रहा है. सबसे अधिक सीटें भी वहीं है. पाकिस्तान के नेशनल एसेंबली के कुल 372 में से 183 सीटें पंजाब से ही है. अगर नवाज़ शरीफ ने पंजाब को अपने पक्ष में कर लिया, तो उन्हें बढ़त मिल सकती है. इसके अलावा, पाकिस्तान मुस्लिम लीग (कायदे-आजम) को भी पिछले चुनाव में पचपन सीटें मिली थी और वह पीपीपी के साथ गठबंधन सरकार का हिस्सा भी था. पिछले चुनाव का बहिष्कार करने वाला तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी की स्थिति अभी अच्छी है. इसके नेता इमरान ख़ान ने पिछले दो सालों में कई रैलियां कर अपनी ताक़त का प्रदर्शन किया है. इमरान ख़ान ने भारत विरोधी बयान देकर पाकिस्तान के लोगों के भावनाओं को अपने साथ करने की कोशिश भी की है. उनकी विदेश नीति अमेरिका विरोधी रही है और वह पाकिस्तान में आतंकवाद का मुख्य कारण पाकिस्तान का अमेरिका के साथ युद्ध में शामिल होने को मानते हैं. इमरान ख़ान को सेना का भी परोक्ष समर्थन हासिल है. इस बार चुनाव में परवेज़ मुशर्रफ भी अपनी पार्टी पाकिस्तान मुस्लिम लीग के प्रचार के लिए देश वापस आ रहे हैं. उनके आने पर उन्हें गिरफ्तार किया जाएगा. शायद मुशर्रफ को अपनी गिरफ्तारी का फ़ायदा होने का अंदाज़ा है, इसलिए वह पाकिस्तान वापस आ रहे हैं.

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इस तरह देखा जाए, तो पाकिस्तान की राजनीतिक हालात को देखते हुए किसी एक पार्टी को बहुमत मिलने की उम्मीद नहीं दिखाई पड़ रही है. इस बार नवाज़ शरीफ और ज़रदारी दोनों को पिछले चुनाव की अपेक्षा नुक़सान हो सकता है, क्योंकि अभी तीसरे विकल्प के रूप में इमरान ख़ान भी मौजूद हैं. पिछली बार बेनजीर भुट्टो की हत्या के कारण पीपीपी को सहानुभूति वोट भी मिले थे, लेकिन इस बार उन्हें सहानुभूति के बदले अपने शासन की कमज़ोरियों का नुक़सान उठाना पड़ सकता है. पाकिस्तान की सेना पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी से तो नाराज़ है ही, लेकिन नवाज़ शरीफ से भी ख़ुश नहीं है. ऐसे में इमरान की पार्टी को सेना की सहानुभूति भी मिलेगा और सेना के पास अपना वोट बैंक भी है, जिसका फ़ायदा इमरान को मिल सकता है. अब चुनाव के नतीजे आने पर ही स्थिति स्पष्ट होगी, लेकिन ऐसी उम्मीद है कि पाकिस्तान में किसी दल को पूर्ण बहुमत मिलने की उम्मीद कम ही है. पूर्ण बहुमत के अभाव में गठबंधन सरकार बनेगी और गठबंधन सरकार कोई कठोर निर्णय लेने की स्थिति में नहीं रहती है, जिसके कारण आगे के समय में पाकिस्तान की हालत सुधर जाएगी, ऐसा कहना मुश्किल है.

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