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एक चुनौतीपूर्ण समय
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एक चुनौतीपूर्ण समय

एक चुनौतीपूर्ण समय

देश एक कठिन समय से गुज़र रहा है, मुद्दे कई हैं, जिन्हें चुनाव से पहले तक निपटाना है, लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या ये मुद्दे समय रहते निपट जाएंगे? चौथी दुनिया का विश्‍लेषण…

एक चुनौतीपूर्ण समय

एक चुनौतीपूर्ण समय

अगर रिश्‍वत की बात छोड़ भी दी जाए, तो भी एक सवाल सामने खड़ा दिखाई पड़ता है. प्रत्येक वीवीआईपी हेलिकॉप्टर की क़ीमत 320 से 350 करोड़ रुपये है. ऐसे बारह वीवीआईपी हैं, जिन्हें किसी भी समय इस तरह के हेलिकॉप्टरों की आवश्यकता है. ये लोग कौन हैं? राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और कह सकते हैं कि सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी एवं रॉबर्ट बढेरा. लेकिन ये तो केवल सात ही हैं! बाक़ी कौन हैं, जो इस तरह की सुविधा ले सकते हैं? अब इस तरह के ख़र्च को कैसे न्यायसंगत माना जा सकता है? सैन्य बजट में तो इस ख़र्च का प्रावधान होता है, जबकि इसका उपयोग करने वाले लोग सैन्य अधिकारी नहीं, बल्कि दूसरे हैं. क्या कभी किसी ने इस पर चर्चा की है? आश्‍चर्य की बात तो यह है कि वर्षों से ऐसा होता रहा है, लेकिन इस मुद्दे को संसद में उस समय किसी ने क्यों नहीं उठाया, जब इस तरह के वीवीआईपी हेलिकॉप्टर ख़रीदने का निर्णय लिया गया था. क्या बजट सत्र के समय ही इस पर हंगामा होना चाहिए था या फिर होगा? संसद का सत्र न चलने देने के लिए विपक्ष को एक और बहाना मिल जाएगा. किसी भी समय संसद सत्र सही तरी़के से न चलने देने के लिए न केवल एक बहाना मिल जाता है, बल्कि सदन में हंगामा करना अब एक परंपरा बन गया है. सुशील कुमार शिंदे भाजपा एवं आरएसएस को परेशान करने में विशेषज्ञ बन गए हैं. शिंदे जानते थे कि वह क्या कह रहे हैं, लेकिन फिर भी उन्होंने भगवा आतंकवाद की बात कही. उसके बाद उन्होंने कसाब और बाद में अफजल गुरु की फांसी को मंजूरी देकर भाजपा से ऐसा मुद्दा हथिया लिया, जिसके आधार पर वह कांग्रेस को घेरती रहती थी. हालांकि अब उन्होंने भगवा आतंकवाद पर माफ़ी भी मांग ली है. वैसे, लोकसभा चुनाव की तैयारी होने लगी है और यह मई 2014 में ख़त्म होगी. मुलायम सिंह यादव कभी-कभी यह कहते नज़र आते हैं कि चुनाव समय से पूर्व भी हो सकता है. दरअसल, यह बात कहकर वह प्रधानमंत्री पद पर अपनी दावेदारी पेश करना चाहते हैं, क्योंकि अगर दोनों बड़ी पार्टियों को बहुमत नहीं मिला या फिर उनके सहयोगियों में सहमति नहीं हुई, तो उन्हें प्रधानमंत्री बनने का मौक़ा मिल सकता है. उनके अलावा कई लोग हैं, जो प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं. भाजपा में ही नरेंद्र मोदी, लालकृष्ण आडवाणी, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली और यहां तक कि नितिन गडकरी भी प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं. कांग्रेस राहुल गांधी को नेता घोषित कर सकती है, लेकिन हो सकता है कि वह प्रधानमंत्री न बनें और कांग्रेस सुशील कुमार शिंदे, पी चिदंबरम या फिर दिग्विजय सिंह को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाकर जुआ खेले. सबसे ज़्यादा निश्‍चित तो मई 2014 के चुनाव परिणाम हैं, जिन्हें तो आना ही है. पिछले अगस्त में हुए ओपिनियन पोल में कांग्रेस को 127 और भाजपा को 145 सीटें मिलने की बात कही गई थी. इसके बाद सबसे अधिक यानी 30 सीटें समाजवादी पार्टी को मिलने की बात कही गई थी और अन्य सीटें छोटी पार्टियों को मिलेंगी. इसके बाद नरेंद्र मोदी को पी-2 जी-2 एजेंडे के साथ आगे बढ़ाया जाने लगा. नरेंद्र मोदी के वादे के मुताबिक़, वह भाजपा को वे साठ सीटें दिला सकते हैं, जो 2009 में मनमोहन सिंह की घोषणाओं से कांग्रेस को मिली थीं, यानी विकास का मुद्दा. ऐसा हो सकता है, लेकिन भाजपा और आरएसएस को अपने मंदिर के आत्मघाती एजेंडे से मोदी को मुक्त करना होगा. कांग्रेस को इस बात के लिए प्रार्थना करनी चाहिए कि कुछ सालों तक आरएसएस इसी तरह भाजपा के ऊपर हावी रहे. अगर देखा जाए, तो आरएसएस कांग्रेस को ही लाभ पहुंचा रहा है. राहुल गांधी कांग्रेस में सनसनी फैला सकते हैं, लेकिन वह कांग्रेस को अधिक सीटें दिला देंगे, यह तर्क का विषय है. हां, वह कांग्रेस की कमज़ोरियां दूर करने का प्रयास ज़रूर कर रहे हैं. अपने पिता की तरह उन्होंने यह समझ लिया है कि पार्टी के अंदर सुधार ख़ुद-ब-ख़ुद नहीं हो सकता है. ऊपर के स्तर पर कांग्रेस में वंशवाद हो सकता है और यह हिंदू राजशाही की तरह है कि उनके सहयोगी चुनाव के समय तो लोगों को पार्टी के साथ ला सकते हैं, लेकिन पार्टी के लिए अपने पद से इस्तीफ़ा देकर काम नहीं कर सकते हैं. पार्टी के बुजुर्ग लोगों को हटाकर नए लोगों, यानी युवाओं को लाने की बात मज़ाक लगती है. स्थानीय राजनीति में जातियों के कैडर की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है. कांग्रेस के पास एकमात्र आशा है कि वह सोनिया गांधी को चुनाव प्रचार में लगाए. सोनिया गांधी ने 2004 एवं 2009 के चुनाव में मनमोहन सिंह की सहायता से अच्छा प्रचार किया था. वह जिस तरह लोगों की सहानुभूति हासिल कर सकती हैं, राहुल गांधी नहीं कर सकते. अगर भाजपा मोदी को प्रधानमंत्री बनाना चाहती है, तो उसे अपने दम पर क़रीब 200 सीटें लानी ही होंगी, तभी उसे दूसरे दलों का समर्थन मिलेगा, लेकिन कांग्रेस को गठबंधन सरकार बनाने के लिए केवल 150 सीटें चाहिए. भाजपा की मध्यकालीन सोच, यानी हिंदुत्व एवं मंदिर उसे 30 सीटों का नुक़सान करा सकते हैं. अगर मोदी एवं मंदिर दोनों की बात करें, तो यह आंकड़ा 50 हो जाएगा. इसके साथ ही एक नया राजनीतिक दल भारत में उभर रहा है. अन्ना हज़ारे का आंदोलन और दिल्ली में सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद हुआ जनांदोलन अलग मुद्दा है. इन युवाओं का एजेंडा अलग है, ये अधिकार और ज़िम्मेदारी की बात करते हैं. इनके वोट किसके पास जाते हैं, यह भी देखना होगा.

 

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