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कांग्रेस ने पाया काम का इनाम
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कांग्रेस ने पाया काम का इनाम

कांग्रेस और यूपीए को लगभग स्पष्ट जनादेश देकर देश की जनता ने अपनी इच्छा और संकल्प दोनों व्यक्त कर दिए हैं। वामपंथियों को उनकी औकात बताते हुए और दक्षिणपंथियों को नकारते हुए दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश ने कांग्रेस के नेतृत्व में एक बार फिर सरकार बनाने का जनादेश दे दिया। इस जनादेश में युवा भारत की आकांक्षा है, तो ग़रीबों—किसानों की उम्मीदें भी। कमज़ोर तबके का सुरक्षा का सपना है, तो बेरोज़गारों और मंदी की मार झेल रहे नौजवानों की रोटी का सपना भी। अब कांग्रेस के सामने पहले से कहीं ज़्यादा चुनौतियां हैं। आवाम ने कांग्रेस को महज़ अपना वोट ही नहीं दिया है बल्कि अपना भविष्य, अपनी ज़िंदगी के बेशक़ीमती पांच साल भी दे दिए हैं। यूं तो संप्रग आम आवाम के हित में किए गए अपने कई कामों का ब्यौरा देता है, पर उन सभी में से तीन अहम क़दमों को सबसे ज़्यादा सफलता मिली है। वे हैं राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना, किसान ऋण माफी योजना और सूचना का अधिकार। किसान ऋण माफी योजना से देश के चार करोड़ किसानों को सीधे तौर पर फायदा पहुंचा है। देश के जो किसान क़र्ज़, ग़रीबी और भुखमरी से तंग आकर आत्महत्या कर रहे थे, उन्हें सरकार के इस क़दम ने नई ज़िंदगी दे दी। किसानों के आत्महत्या का प्रतिशत अचानक बेहद कम हो गया। क़र्ज़ माफी से देश के किसानों ने नई ज़िंदगी बसर करनी शुरू की। छोटे और सीमांत किसानों के 60 हज़ार करोड़ रुपयों का क़र्ज़ माफ कर दिया गया। इसके लिए सरकार ने पुख़्ता क़दम भी त्वरित उठाए। 2007—08 में समेकित निधि से 10 हज़ार करोड़ रुपए सार्वजनिक खाते में हस्तांतरित कर के क़र्ज़ माफी की प्रक्रिया शुरू कर दी गई। इस कोष का विस्तार वर्ष 2011-12 तक किया जाएगा। इस योजना से लाभान्वित चार करोड़ किसानों का सीधा समर्थन कांग्रेस को मिला।

इसी तरह ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना से देश के डेढ़ करोड़ बेरोज़गार युवकों को रोज़ी-रोटी मिली। उनकी ख़ुशहाली बढी। जो नौजवान रोज़गार की तलाश में अपना घर-बार छोड़ कर दूर-दराज़ के शहरों में दर-दर भटकते थे,उन्हें अपने गांवों में ही रोज़गार मिल गया। वे अपने घर में ही रह कर दो जून की रोटी सम्मान के साथ खाने लगे। ज़ाहिर है, इसका सीधा फायदा कांग्रेस को मिला। सरकार की कोशिश रही कि रोज़गार गारंटी योजना के जरिए आर्थिक विकास का लाभ आम आदमी को मिले। इस मुद्दे पर भी सरकार की ख़ूब छीछालेदर हुई कि यह योजना समान रूप से देश भर में लागू करने में कोताही की जा रही है, जिससे इसका लाभ सभी को नहीं मिल पा रहा। लेकिन बाद में हुए सर्वे से यह बात साबित हो गई कि यह योजना सरकार की सफलतम योजनाओं में से एक है। हालांकि यह ज़रूर है कि आर्थिक विकास का पूरा लाभ आम आदमी को नहीं मिला। देश में जिस तेज़ी से अरबपतियों की संख्या बढ़ी है उतनी ही तेज़ी से ग़रीबों की संख्या भी बढ़ी। मंदी से निपटने के लिए सरकारी नौकरियों की संख्या बढ़ाने में भी सरकार विफल रही। खाद्य पदार्थ, फर्टिलाइज़र और पेट्रोल पर सब्सिडी तथा दूसरी सरकारी सेवाओं का लाभ ग़रीबों तक कम ही पहुंचा।

उसी तरह सूचना के अधिकार का क़ानून बनाना यूपीए सरकार की बड़ी उपलब्धियों में से एक रहा। हालांकि विपक्षियों ने सरकार की इस बात के लिए काफी आलोचना की थी कि सरकार इस क़ानून को लेका संज़ीदा नहीं है। पर देश की आम जनता को इसका महत्व समझ में आया और उसने इस क़ानून का भरपूर लाभ  भी उठाया। एक आम आदमी जो किसी अधिकारी से बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था, वह इस क़ानून के तहत अपने प्रदेश के मुख्यमंत्री तक से भी सवाल पूछने लगा। सरकार के इस क़दम से जनता में यह संदेश गया कि यूपीए सरकार देश में पारदर्शी शासन व्यवस्था क़ायम करना चाहती है। ज़ाहिर है, इस संदेश का लाभ भी कांग्रेस को प्रत्यक्ष तौर पर मिला। चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी, अध्यक्ष सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह आदि ने सरकार द्वारा आम आदमी के हित में उठाए गए इन क़दमों का ख़ूब प्रचार किया। चूंकि जनता को इन योजनाओं का लाभ मिल चुका था, लिहाज़ा यह बात कांग्रेस के पक्ष में वोटों में तब्दिल हो गई। इसके अलावा एक और बेहद महत्वपूर्ण पहलू है परमाणु करार। कांग्रेस को लगता है कि देश के लोगों को इस करार का लाभ समझ में आ चुका है,  जिसका उसे ज़बरदस्त फायदा मिला है। हालांकि प्रत्यक्ष तौर पर जो मुगालता कांग्रेस को इस करार के फायदों को लेकर है वैसा हक़ीकत में है नहीं। सच तो यह है कि आम लोगों की समझ में अभी तक नहीं आया है कि आख़िरकार यह बला है क्या चीज़। पर इतना ज़रूर है कि इस करार के मसले पर ठनी रार में जो फतह मनमोहन सिंह ने हासिल की, उसने एक बड़ा सकारात्मक संदेश जनमानस में छोड़ा। और यक़ीनन उसकी भूमिका भी कांग्रेस की इस शानदार जीत में रही।

मुसलमान और दलित वोटों का कांग्रेस की तरफ वापस मुड़ना,राहुल गांधी के करिश्माई व्यक्तित्व के कारण युवा वोटरों में कांग्रेस की तरफ रुझान पैदा होना आदि तो कांग्रेस की जीत के कारणों में से हैं ही। देश में 171 सीटों पर मुसलिम मतदाताओं की संख्या लगभग 20 फीसदी है। इनमें से 85 सीटों पर यूपीए उम्मीदवारों ने विजय हासिल की। साफ है कि कांग्रेस को मुसलमानों का ज़बरदस्त साथ मिला।

कांग्रेस के लिए उसके गठबंधन के सहयोगियों का टूट कर जाना फायदेमंद ही रहा। युवा वोटरों को रिझाने की वैसे तो सभी दलों ने कोशिश की, पर देश के युवाओं ने यूपीए को ही प्राथमिकता दी। क्योंकि युवाओं को लगता है कि यूपीए के पास राहुल, सचिन पायलट, प्रिया दत्त, ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद और उमर अब्दुल्ला जैसे युवा नेताओं की कतार है जो देश के पटल पर युवाओं की बात पूरी मज़बूती से रख सकते हैं, उनकी समस्याएं दूर कर सकते हैं। देश की जनता भी चूंकि टूट-फूट से आजिज़ आ चुकी थी, इसलिए वह किसी एक दल को पांच साल के लिए सत्ता सौंपना चाहती थी। और इसके लिए उसके सामने कांग्रेस से अच्छा विकल्प नहीं था। जिस तरह की समस्याओं से इस वक्त दुनिया घिरी हुई है उसमें जनता को लगा कि मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियां ही खेवनहार बन सकती हैं।

बहरहाल, ये सब तो वे कारण रहे जो कांग्रेस की जीत के कारक रहे। अब ज़रा एक नज़र नई सरकार की चुनौतियों पर। मंदी के इस भयावह दौर में भी युवाओं ने यूपीए सरकार की कोशिशों पर ज़्यादा भरोसा किया। यही वजह है कि युवाओं ने कांग्रेस को एक मौका और देना ज़्यादा बेहतर समझा।

नई सरकार के सामने सबसे बड़ी समस्या गिरती विकास दर और बढ़ते राजकोषीय घाटे के दो पाटों में फंसी देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना है। आकाश छूती महंगाई से लोगों को निजात दिलाना होगा।और ऐसी नीतियां बनानी होंगी ताकि देश को दुनिया की आर्थिक महाशक्ति के रूप में प्रतिष्ठापित किया जा सके। यूपीए के शासनकाल में महंगाई दर ने पिछले तेरह वर्षों का रिकार्ड तोड़ा। महंगाई दर 12।63 फीसदी की ऊंचाई पर पहुंची। विपक्ष ने इस पर ख़ूब शोर मचाया, पर जनता ने इसे खुली अर्थव्यवस्था की स्वाभाविक परिणति के रूप में देखा। हजारों नौजवानों की नौकरियां आर्थिक मंदी के कारण चली गईं। सरकार ने राहत पैकेज की घोषणा का अपनी सक्रियता दिखाने की कोशिश भी की, पर हैरानी यह कि वैसा असर ग्रामीण इलाकों में दिखा ही नहीं।

इसके साथ ही आतंकवाद की समस्या से भी जमकर लड़ना होगा। नई सरकार को आतंकवाद से निपटने के लिए ऐसी कारगर रणनीति बनानी होगी, ताकि 26 नवंबर जैसी घटना दोबारा नहीं हो सके। खुफिया तंत्र को मज़बूत बनाना भी बहुत बड़ी चुनौती है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी को सक्षम बनाना होगा। ग़रीबी से लड़ना भी एक बड़ी समस्या है। हालांकि भारत की अर्थव्यवस्था विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुकी है। इसका कुल जीडीपी 1।089 ट्रिलियन डालर है। रिजर्व बैंक के अनुसार, पिछले पांच साल के दौरान देश की विकास दर सात फीसदी रहने का अनुमान है। बावजूद इसके, निर्धनता पर विश्व बैंक की ताज़ा रिपोर्ट बताती है कि ग़रीबी उन्मूलन की दिशा में देश को अभी बहुत कुछ करना बाक़ी है। इस रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2015 में भी देश की एक चौथाई आबादी सवा डालर रोज़ाना से भी कम आय पर जीवन यापन करेगी। नई सरकार को इस दिशा में बहुत प्रयास करने पड़ेंगे।

नक्सलवाद भी देश की एक बड़ी समस्या है। सरकार की तमाम कोशिशों के बावज़ूद देश में अब भी सामाजिक और आर्थिक शोषण बरकरार है। नक्सलवाद की समस्या इसी शोषण का नतीज़ा है। इसे सभी सरकारें क़ानून और व्यवस्था की ही समस्या मानती आई हैं। सरकार पर यह महती ज़िम्मेदारी है कि वह नक्सल क्षेत्रों के लोगों के सामाजिक व आर्थिक उत्थान को केंद्र में रखकर उन्हें मुख्यधारा में लाए। इसके अलावा देश के ढांचागत विकास पर भी सरकार को ध्यान केंद्रित करना होगा। किसी भी देश का विकास इस बात पर निर्भर करता है कि देश में आधारभूत ढांचे की क्या स्थिति है। अपने पड़ोसी देश चीन से ही तुलना करें तो हम पाएंगे कि आधारभूत ढांचे के विकास में भारत बहुत पिछड़ा हुआ है। प्रधानमंत्री सड़क योजना और भारत निर्माण जैसी योजनाओं को और आगे ले जाना होगा। विदेश नीति भी एक बहुत बड़ी चुनौती है। हमारे तीन पड़ोसी देश नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका लगातार अस्थिरता के दौर से गुज़र रहे हैं। इन देशों को लेकर भारत की अभी तक कोई स्पष्ट विदेश नीति सामने नहीं आई है। श्रीलंका और नेपाल में जिस तरह चीन का दखल बढ़ता जा रहा है, उसके मद्देनज़र कांग्रेस की सरकार को एक स्पष्ट और मज़बूत नीति बनानी होगी। चीन और अमेरिका की नीतियों पर सतर्क निगाह रखनी होगी। नहीं तो इन देशों की नीतियां भारत के सामरिक हितों पर विपरीत प्रभाव डाल सकती हैं।

अपनी जीत का जश्न मना रही कांग्रेस और उसके मित्र दलों के सामने सुरक्षा और सामरिक क्षेत्रों की समस्याएं भी सिर उठाए खड़ी हैं। संप्रग सरकार को अपने कार्यकाल के शुरू से ही इनसे जूझना होगा। श्रीलंका और पाकिस्तान की मानवीय त्रासदी और नेपाल का राजनीतिक घटनाक्रम सरकार की पेशानी पर बल ला सकता है।

बहरहाल, इसमें कोई दो राय नहीं कि यूपीए को नई पीढ़ी का समर्थन और विश्वास हासिल हुआ है, और तभी कांग्रेस को 204 सीटों पर जीत हासिल हुई। इस बार की चुनावी प्रक्रिया में लगभग 4 करोड़ 30 लाख मतदाता ऐसे शामिल हुए जिन्हें पहली बार यह अधिकार हासिल हुआ था। कुल मतदाताओं का 24 फीसदी हिस्सा 18 से 35 वर्ष की उम्र के युवाओं का था। यह संख्या तकरीबन 18 करोड़ होती है। इस तबके ने चुनाव परिणाम पर गहरा असर डाला। जनता ने लोक लुभावन नारे, सांप्रदायिक उन्माद, क्षेत्र और जातिवाद की संकीर्ण राजनीति को साफ तौर पर नकार दिया। विकास, रोज़गार, स्थायित्व, देश की सुरक्षा और आर्थिक मंदी से निपटने जैसे मुद्दों को ज़्यादा तरज़ीह दी। कांग्रेस का मानना है कि युवाओं ने परमाणु करार के कारण उसकी तरफ अपना ज़बरदस्त रुझान दिखाया। इसके अलावा कांग्रेस यह भी मानती है कि उसने जन कल्याण की अनेक योजनाओं से जनता का विश्वास जीता है। आंतरिक सुरक्षा के सवाल को विश्व मंच पर बेहद संजीदगी से उठा कर कूटनीतिक सफलता हासिल की तो तीन लाख करोड़ रुपए का राहत पैकेज देकर बैंकों तथा औद्योगिक क्षेत्रों को मंदी के दौर से डूबने से बचा कर अपने सुशासन का परिचय दिया।

लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होगी। कांग्रेस को इन सभी मुद्दों पर पूरी तरह खरा उतरना होगा। वरना इस देश की जनता उसे ठीक उसी तरह नहीं माफ नहीं करने वाली, जैसे उसने इस चुनाव में भाजपा सरीखी पार्टियों को नहीं किया। तब ऐसा न हो कि 204 सीटें जीत कर इतिहास रचने वाली कांग्रेस एक बार फिर दूसरी पार्टियों की मोहताज़ बन जाए। इसलिए कांग्रेस के पास यह एक ऐसा बेमिसाल मौका है कि वह अपने बूते ख़ुद को देश का खैरख्वाह साबित कर सके और लोगों ने जो उस पर भरोसा दिखाया है उसे टूटने न दे।

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