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भारत-श्रीलंका : फिर उठा तमिल मुद्दा

श्रीलंका पर आरोप लग रहा है कि तमिल विद्रोहियों के खिला़फ चलाए गए सैन्य अभियान में बड़े पैमाने पर मानवाधिकार का हनन हुआ है. यह मुद्दा तो एलटीटीई के विरुद्ध कार्रवाई शुरू करने के समय से ही उठाया जा रहा था, लेकिन अभी जब चैनल 4 पर एक डॉक्यूमेंट्री दिखाई गई तो एक बार फिर से यह चर्चा में आ गया. इस डॉक्यूमेंट्री में प्रभाकरण के 12 वर्षीय बेटे के मृत शरीर को दिखाया गया है. उसके शरीर में पांच गोलियों के निशान हैं. हालांकि भारत में श्रीलंका के उच्चायुक्त प्रसाद करियावसन ने फिल्म निर्माता द्वारा लगाए गए आरोपों का खंडन किया है, लेकिन भारत में इस पर कड़ी प्रतिक्रिया जताई जा रही है. खासकर तमिलनाडु में इसे लेकर श्रीलंका सरकार के विरुद्ध का़फी रोष देखा जा रहा है. तमिलनाडु के सांसदों ने राज्यसभा में इस मुद्दे को उठाया तथा वामपंथी सांसदों के सहयोग से राज्यसभा की कार्यवाही में बाधा उत्पन्न की. सांसदों का कहना था कि इस बात पर चर्चा हो. बाद में तो इतना हंगामा हो गया कि सभापति को दिनभर के लिए सदन की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी. तमिलनाडु विधानसभा ने तो एक प्रस्ताव भी परित किया था, जिसमें केंद्र सरकार से कहा गया था कि वह श्रीलंका के युद्ध अपराध के मामले को संयुक्त राष्ट्र संघ में उठाए. हालांकि बीजेपी ने अभी तो कोई कड़ा रु़ख अख्तियार नहीं किया है, लेकिन इतना ज़रूर कहा है कि जब इस पर चर्चा होगी तो वह अपनी बात रखेगा.

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ग़ौरतलब है कि श्रीलंका के गृह युद्ध के दौरान तमिलों के खिला़फ कथित रूप से हुई ज़्यादतियों के विरुद्ध अमेरिका, फ्रांस और नार्वे ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में एक प्रस्ताव रखा है. तमिलनाडु के सांसद और विधायक केंद्र सरकार पर इस बात के लिए दबाव डाल रहे हैं कि भारत इन देशों के प्रस्ताव का समर्थन करे. हालांकि भारत सरकार ने सावधानी बरती है. संसदीय कार्यमंत्री पवन बंसल ने सांसदों को आश्वासन दिया है कि वह विदेश मंत्री से बात करने के बाद ही अपना वक्तव्य जारी करेंगे. लेकिन विरोध का यह स्वर अभी दबा नहीं है. तमिल सांसदों ने प्रधानमंत्री से भी इस मुद्दे पर अपना वक्तव्य देने को कहा है. अब सवाल यह उठता है कि ब्रिटेन, फ्रांस या अमेरिका क्यों इस मुद्दे को हवा दे रहे हैं. क्या युद्ध में मानवाधिकार हनन का मुद्दा आज इतना महत्वपूर्ण हो गया कि इसे उछालना ज़रूरी है. अमेरिका, फ्रांस ने श्रीलंका गृह युद्ध के समय हुए मानवाधिकार हनन के विरुद्ध यूएनएचआरसी में प्रस्ताव लाया है. शायद ये देश यह भूल गए कि किसी भी सैनिक कार्रवाई में मानवाधिकार का हनन होता ही है. यह हो सकता है कि किसी जगह पर यह कम हो और कहीं अधिक. अमेरिका को अ़फग़ानिस्तान और इराक़ की बात याद करनी चाहिए. इन देशों में हुई सैन्य कार्रवाई के समय मानवाधिकार को धता बताया गया था. हज़ारों की संख्या में बेगुनाह लोगों की हत्या हुई या कहें कि मारे गए. लेकिन उस समय तो उन्हें मानवाधिकार की बात याद नहीं आई. लेकिन आज जब श्रीलंका की बात आई है, तो उन्हें मानवाधिकार की याद आने लगी है.

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पश्चिमी मीडिया भी इसे बढ़ा चढ़ाकर पेश कर रही है. क्या ये लोग भारत को ध्यान में रखकर इस मुद्दे को उठा रहे हैं. इसकी संभावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता है. पश्चिमी देशों को इस बात की जानकारी तो हैं कि अगर तमिलों पर अत्याचार की बात उठाई जाएगी तो भारत में कुछ तमिल प्रदेश सरकार पर दबाव डालेंगे. अगर भारत इस मुद्दे को उठाता है, तो श्री लंका के साथ इसके संबंधों पर असर पड़ेगा. मानवाधिकार के नाम पर हो रही विश्व राजनीति के दलदल में फंसकर भारत अपने एक पड़ोसी के साथ संबंध बिगाड़ ले. लेकिन भारत सरकार को इस मुद्दे पर का़फी सावधानी बरतनी चाहिए. जल्दबाज़ी में उठाया गया एक क़दम दो देशों के बीच फिर से पनप रहे मधुर संबंधों में खटास उत्पन्न कर देगा. वैसे भी भारत पर तमिल विद्रोहियों को संरक्षण देने का आरोप लगता रहा है. यहां तक कहा जाता रहा है कि प्रभाकरण को पैदा करने में भारत की अहम भूमिका रही है. इतना तक कहा जाता था कि भारत में तमिल विद्रोहियों को प्रशिक्षण दिया जाता था. इन आरोपों को ग़लत साबित करने के लिए ही भारत सरकार ने तमिल अलगाववादियों के विरुद्ध शांति सेना भेजी थी. उस समय की गई सैनिक कार्रवाई में भी मानवाधिकार का हनन हुआ था. तमिल विद्रोहियोंके खिला़फ भारत सरकार द्वारा की गई इसी कार्रवाई के कारण राजीव गांधी की हत्या तमिल विद्रोहियों ने कर दी थी. लेकिन फिर भी भारत सरकार ने अपना संयम नहीं खोया था, जबकि अमेरिका ने अपने यहां हुए हमले का जवाब अ़फग़ानिस्तान पर आक्रमण करके दिया था. इस बार भी भारत को संयम से काम लेना चाहिए. तमिलनाडु के सांसदों को भी केंद्र पर इस बात के लिए ज़्यादा दबाव नहीं डालना चाहिए. अगर युद्ध के बाद भी श्रीलंका में तमिलों पर अत्याचार किया जा रहा हो, तो भारत सरकार की नैतिक ज़िम्मेदारी है कि वह श्रीलंका के साथ कठोरता से पेश आए. लेकिन सैन्य कार्रवाई के समय जो हुआ, उसे ज़्यादा तूल देने की आवश्यकता नहीं है. भारत को भी अपने यहां चल रहे अलगाववादी तथा नक्सलवादी आंदोलन के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई करनी पड़ सकती है. उस समय भी मानवाधिकार का मुद्दा उठेगा. वैसे भी कश्मीर में यह मुद्दा हमेशा से उठता रहा है. विदेशी हस्तक्षेप की कोशिश भी की गई है. अगर भारत भी अपने पड़ोसी देश के कठिन दौर में उसकी सहायता नहीं करता है तो फिर भविष्य में परेशानी हो सकती है. भारत को कोई भी क़दम उठाने से पहले उस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए और देशहित को ध्यान में रखकर काम करना चाहिए न कि आंतरिक राजनीति या सरकार बचाए रखने के लिए नहीं.

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