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इस्लाम में औरतों को तमाम हुक़ूक़ मुहैया हैं
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इस्लाम में औरतों को तमाम हुक़ूक़ मुहैया हैं

teen talaqआखिरकार 22 अगस्त 2017 को सुप्रीम कोर्ट का वो फैसला आ ही गया, जिसका मुस्लिम समुदाय की महिलाओं को बेसब्री से इंतजार था. मुद्दा था झटके से एक बार में दिया गया तीन तलाक़, जिसे इस्लाम धर्म के कुछ ठेकेदार जायज़ ठहरा रहे थे और खुले तौर पर महिलाओं का उत्पीड़न कर रहे थे. इस फैसले से मुस्लिम समुदाय का बुद्धिजीवी तबका भी  खुश था, जिसने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का सोशल साइट्‌स पर भी स्वागत किया.

आइए देखते हैं इस फैसले पर मुस्लिम समुदाय के लोगों की क्या प्रतिक्रियाएं रहीं –

मीडियाकर्मी गुल्नाज़ रशीद कहती हैं कि तलाक़ बुरी बात है. अल्लाह और उसके नबी को सख्त नापसंद है. एक साथ तीन तलाक़ तो इस्लाम में है ही नहीं. सुप्रीम कोर्ट ज़िन्दाबाद दरख्शां बानो इंग्लिश की पीएचडी स्कॉलर हैं. उनका कहना है, इस्लाम में औरतों को तमाम हुकूक मुहैया हैं. कुरान पाक औरतों को इज्जत से रखने की ताकीद करता है. बीवी को शौहर का हमराह माना जाता है. तलाक़ का यह ग़लत रिवाज़ औरत को हिकारत देता था, जो कि इस्लाम में नहीं है. अच्छा हुआ एक गलत रिवाज़ ख़त्म हुआ!

गृहिणी शाहीन खातून कहती हैं, ट्रिपल तलाक़ को इस्लाम में सबसे ज़्यादा नापसंद कहा गया है. फिर इतना हंगामा क्यूं?

इतिहास की प्रवक्ता हिना जाफरी कहती हैं, इस ग़लत प्रथा के नाम पर जो मर्द हलाला जैसी गलीज़ प्रथा का लाभ उठा रहे थे, वो सब अब बंद हो जाएगा. न्यायपालिका का यह फैसला बेहद सराहनीय है. इससे औरतों की दशा सुधरेगी और मर्द मनमानी नहीं कर पाएंगे.

उर्दू की छात्रा हुस्ना जैनभ कहती हैं, इस फैसले से औरतों को शौहर बेवजह तलाक़ देकर छोड़ नहीं पाएंगे, उन पर अब  कानून की लगाम होगी.

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आम मुस्लिम औरतों के साथ महबूबा मुफ़्ती जी का यह कथन भी इस फैसले की उपयुक्तता पर मोहर लगाता है. महबूबा मुफ्ती कहती हैं, जम्मू कश्मीर में भी 3 तलाक का कानून लागू हो. यहां तक कि समझदार मुस्लिम पुरुष भी इस फैसले को सराह रहे हैं-

व्यापारी ताल्हा आबिद कहते हैं, ट्रिपल तलाक पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ गया है. उम्मीद है अब मुस्लिम महिलाओं के साथ अन्याय नहीं होगा. वहीं, मुस्लिम समुदाय का एक तबका, जो इस रिवाज़ के नाम पर महिलाओं के शोषण पर सहमति की मोहर लगाए था, ख़ासा तिलमिलाया नज़र आया.

इसमें से कुछ तो ऐसे भी हैं, जो ये जानते तक नहीं थे कि झटके से तीन तलाक़ की कुप्रथा असल में इस्लाम का हिस्सा है ही नहीं. ऐसा कोई भी तलाक़ का इंस्टेंट तरीका कुरान में दर्ज नहीं है, बल्कि यह कुछ अवसरवादी व धूर्त धार्मिक ठेकेदारों की महिलाओं के खिलाफ फैलाई गई साज़िश है. इसे एक रिवाज़ का जामा पहना कर नासमझ और जाहिल तबके को बहकाने के लिए प्रयोग में लाया जा रहा है.

जिस तरह सती प्रथा, बाल विवाह, विधवा पुनर्विवाह निषेध आदि कुप्रथाएं महिला विरोधी थीं. धर्म की आड़ लेकर सदियों तक ये प्रथाएं चलती रहीं, लेकिन एक दौर में गर्त में धकेल दी गईं और गैर कानूनी घोषित कर दी गईं. उसी तरह झटके से तीन तलाक़ वाली यह कुप्रथा भी खत्म हो गई, जो केवल महिलाओं के उत्पीड़न व भोग को ध्यान में रखकर इंसानों द्वारा चलन में लाई गई थी. ये केवल महिलाओं के उत्पीड़न को बढ़ावा देती थीं. आज यदि न्यायप्रणाली द्वारा यह असंवैधानिक घोषित कर दी जाती हैं, तो यह अत्यंत हर्ष की बात है. इसे समस्त मुस्लिम समुदाय को भी सहर्ष स्वीकार करना चाहिए, जो मुस्लिम समुदाय का समझदार तबका कर भी रहा है. कुछ अज्ञानी, अशिक्षित, कट्‌टरवादी व पुरुष सत्ता एवं प्रभुत्व के भूखे मुस्लिम समुदाय के पुरुष इस बदलाव को हज़म करने में खुद को अक्षम पा रहे हैं. वे मनगढ़ंत तर्कों के साथ इसकी घोर निंदा यह कहकर कर रहे हैं कि यह उनके धर्म पर आघात है, जबकि असल में इस प्रथा का धार्मिक किताब में कहीं वर्णन ही नहीं है. यदि मुस्लिम समुदाय को तरक्की करनी है, तो ग़लत रिवाज़ों को ख़त्म करना ही होगा. कुरान भी महिलाओं के शोषण को ग़लत ठहराता है. महिलाओं के हक व हुकूक की बात कुरान भी करता है. हज़रत मुहम्मद (स.अ.) की पूरी जीवनी उठा के पढ़िए, तो मालूम पड़ेगा कि औरतों को कितनी इज्जत और कितनी एहमियत दिए जाने की बात की गई है. हज़रत खदीजा, जो हज़रत मुहम्मद की पत्नी थीं, वे उम्र भर उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलीं. जब तक वो जिंदा रहीं, उनके अलावा हज़रत मुहम्मद  ने किसी और से निकाह नही किया.

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इस्लाम में कहीं भी, कभी भी औरतों को कमतर नहीं बताया गया. न ही उनके शोषण को जायज़ ठहराती हुई कोई आयत कुरान पाक में मौजूद है. यहां तक कि औरतों के हक को ध्यान में रखते हुए तलाक़ की असल प्रक्रिया बहुत लंबी व पेचीदा बनाई गई है, जिसका वर्णन कुरान पाक की सुराह तलाक़ में मिलता है.

अब सवाल ये उठता है कि फिर यह झटके से तीन तलाक कहां से चलन में आया? जो बात, जो तरीका कहीं खुद की किताब या खुद के रसूल की जीवनी में भी नहीं दिख रही हो, वो कैसे इस्लाम का हिस्सा बन गया? इसका जवाब केवल उन कट्‌टरवादी पुरुषवादी, अवसरवादी धर्म के ठेकेदारों के पास मिलेगा, जो इस्लाम की स्वयं अनर्गल परिभाषा बना कर मुस्लिम समुदाय के अज्ञानी तबके को बरगलाते हैं. यदि मुसलमानों को तरक्की करनी है, तो उनको स्वयं कुरान बा मायने पढ़ना पड़ेगा. खुद इस्लाम को समझना पड़ेगा न कि किसी धूर्त धर्म गुरु की बनाई हुई परिभाषा के आधार पर जकड़न भरी मानसिकता लिए अंध रिवाजों की बलि चढ़ते रहना. इस्लाम और खुदा भी चाहता है कि उसके मानने वाले खुद पढ़ें, खुद जानें, खुद समझें. इसीलिए कुरान पाक की पहली आयत जो रसूल पाक पर नाजिल हुई उसके मायने थे- पढ़ो, अपने खुदा के नाम पर पढ़ो. सुराह इकरा अरे मेरे मुसलमान भाइयों, अभी भी वक़्त है पढ़ लो, तभी दिमाग खुलेगा, तभी इस कट्‌टरता से तुम आज़ाद होगे तभी अपने विकास पर ध्यान दे पाओगे. तब कोई तुमपर बेजा के रिवाज़ नहीं लाद पाएगा, तब कोई तुम्हारा शोषण नहीं कर पाएगा तब कोई अपने राजनैतिक फायदे के लिए तुम्हारी बलि भी नहीं चढ़ा पाएगा. पढ़ो, मेरे भाई मेरी बहनों पढ़ो.

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– लेखिका समाजसेविका हैं और विश्व धर्म पर अंतरराष्ट्रीय कॉन्फ्रेंस में कई व्याख्यान दे चुकी हैं.

1 comment

  • मेने जीवन मे कभी नही सोचा था कि में मोदी जी के किसी भी फैसले से खुश होउंगी।लेकिन मोदी जी के तीन तलाक वाले फैसले पर में उनको दिल से सलाम करती हूं, दिल से धन्यवाद देती हूं।उनका यह फैसला उस वक़्त आया जब में अपनी 20 साल की शादीशुदा जिंदगी को बचाने के लिए जद्दोजहद कर रही हूँ।अपनी कमाई से बनाये घर को पाने के लिए कानून का सहारा लेना पड़ा।मुजे एक झटके में 3 तलाक देकर बेगर कर दिया जाता अगर सही समय पर मोदी जी का ये फैसला नही आता। जिस तरह डूबते को तिनके का सहारा ही काफी होता है पर मुजे तो बचाने के लिए मजबूत हथियार दिया मोदी जी ने।आपका दिल से बहुत बहुत शुक्रिया मोदीजी।

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