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कंधमाल हिंसा: यह आग कब और कैसे बुझेगी?
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कंधमाल हिंसा: यह आग कब और कैसे बुझेगी?

ईसा मसीह की टूटी मूर्ति, अधजले धर्मग्रंथ, जले घर, घर से बाहर झांकता एक मासूम चेहरा और तिलक-चंदन लगाकर लोगों को फिर से हिंदू बनाने का आयोजन. यह कहानी वे तस्वीरें ख़ुद बयां करती हैं, जो कंधमाल में अल्पसंख्यक ईसाइयों के ख़िला़फ हिंसा के दौरान या उसके बाद ली गई हैं. सांप्रदायिक हिंसा से उपजे ज़ख्म अभी भी कंधमाल के अल्पसंख्यक ईसाइयों के दिलोदिमाग़ पर छाए हुए हैं. न्याय मिलने की उम्मीद कम ज़रूर हुई है, लेकिन ख़त्म नहीं हुई है. यही वजह है कि 2007 में ईसाइयों के ख़िला़फ हुई हिंसा के मामले पर राष्ट्रीय सद्भावना फोरम ने 22 से 24 अगस्त तक दिल्ली में नेशनल पीपुल्स ट्रिब्यूनल का आयोजन किया. इस मौक़े पर एक चित्र प्रदर्शनी भी लगाई गई थी, जिसका उद्घाटन मशहूर शायर जावेद अख्तर ने किया.

इस तरह की हिंसा के लिए मैं उन सभी लोगों को दोषी मानता हूं, जो मास किलिंग को जायज़ ठहराते हैं. आख़िर कोई कैसे मास किलिंग को जायज़ मान सकता है?

– महेश भट्ट, मशहूर फिल्मकार

राष्ट्रीय दलित आंदोलन के महासचिव डॉ. आर प्रसाद कहते हैं कि लोग कंधमाल हिंसा को पुरानी बात बताते हैं, लेकिन यह सच नहीं है. कंधमाल हिंसा के जख्म अभी भी लोगों के  जेहन में ताजा हैं. प्रसाद ने कहा कि प्रदेश सरकार ने राहत शिविर हटा लिए हैं, लेकिन हिंसा प्रभावित इलाक़ों के जनजातीय लोग अभी भी राहत शिविरों जैसे हालात में हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, अगस्त 2007 से दिसंबर 2008 के बीच अकेले कंधमाल में 600 गांव सांप्रदायिक हिंसा की चपेट में आए. क़रीब 6000 घर लूटे या जलाए गए. 54 हज़ार लोग बेघर हो गए. सरकारी आंकड़े 38 लोगों के मारे जाने की बात कहते हैं, लेकिन मानवाधिकार संगठन यह संख्या 100 से ज़्यादा बताते हैं. 295 से ज़्यादा छोटे-बड़े चर्चों एवं अन्य पूजास्थलों को क्षतिग्रस्त कर दिया गया.

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ट्रिब्यूनल में दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ए पी शाह, राजेंद्र सच्चर, एडमिरल विष्णु भागवत, महेश भट्ट, वृंदा ग्रोवर, हर्ष मंदर एवं उर्वशी जैसे लोग शामिल थे. ट्रिब्यूनल के सामने कंधमाल हिंसा की 43 घटनाओं की गवाही भी हुई. ट्रिब्यूनल ने इस हिंसा के संबंध में पुलिस, प्रशासन एवं मीडिया की भूमिका, दलित-आदिवासियों के अधिकार, बच्चों पर इस हिंसा का असर जैसे मुद्दों पर भी विचार किया. तमाम चर्चा के बाद ट्रिब्यूनल इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि पीड़ितों को अब तक न्याय नहीं मिल सका है. पुनर्वास की गति भी मंद है. ट्रिब्यूनल में शामिल ज्यूरी का मानना था कि सांप्रदायिक ताक़तों ने धर्मांतरण के मुद्दे को राजनैतिक रूप दे दिया था. ज्यूरी ने यह भी साफ किया कि कंधमाल में हिंसा के दौरान ज़िला और राज्य प्रशासन ने किसी भी मौक़े पर लोगों की धार्मिक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा नहीं की. सरकार पीड़ितों को सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा देने में नाकाम रही.

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ट्रिब्यूनल की महत्वपूर्ण अनुशंसाएं

  • पूरे मामले की जांच हो और अपने कर्तव्य को निभाने में असफल पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारियों को निलंबित किया जाए.
  • हिंदूवादी ताक़तों द्वारा घृणा और विभाजनकारी कार्यक्रमों जैसे कलश यात्रा, श्रद्धांजलि सभा आदि को रोका जाए.
  • इंडियन पेनल कोड की धारा 153 ए और बी को सख्ती से लागू किया जाए.
  • एक स्पेशल इंवेस्टीगेटिव टीम का गठन करके सभी दर्ज एफआईआर की जांच कराई जाए और फिर से एक बार एफआईआर दर्ज कराई जाए.
  • विशेष लोक अभियोजक नियुक्त किया जाए, जिस पर पीड़ित समुदाय का भरोसा हो.
  • ट्रायल के दौरान और उसके बाद तक राज्य सरकार पीड़ितों और गवाहों को पूरी सुरक्षा मुहैया कराए.
  • राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की अनुशंसा के आधार पर जन अपराध के संबंध में एक नया विधेयक बनाया जाए.
  • हिंसा के शिकार बच्चों की शैक्षणिक ज़रूरतों को पूरा किया जाए. उनके लिए सर्व शिक्षा अभियान, कस्तूरबा बालिका विद्यालय और आवासीय विद्यालयों की व्यवस्था की जाए.
  • हिंसा पीड़ितों के जीवनयापन के लिए व्यवस्था की जाए. मसलन मनरेगा, पी एम स्किल ट्रेनिंग आदि योजनाओं में उन्हें विशेष स्थान दिया जाए.
  • दलित ईसाइयों को वे सभी गैर संवैधानिक सुविधाएं दी जाएं, जो अन्य दलितों को मिलती हैं.
  • पुलिस-प्रशासन के लिए बने ट्रेनिंग सेंटरों में धर्म निरपेक्षता, अल्पसंख्यकों की संवैधानिक सुरक्षा और अधिकारों के बारे में अधिकारियों को बताया जाए.
  • राज्य और जिला प्रशासन को तत्काल राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की अनुशंसाएं लागू करनी चाहिए, जो आयोग ने जनवरी, अप्रैल एवं सितंबर 2008 में दी गई अपनी रिपोर्ट में की हैं.
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