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कोइराला के बाद नेपाली कांग्रेस का भविष्य
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कोइराला के बाद नेपाली कांग्रेस का भविष्य

आर्य सभ्यता की एक ख़ासियत है, किसी इंसान की मृत्यु हो जाने के बाद हम उसकी अच्छाइयों और उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करने की कोशिश में अक्सर उसे भगवान के समतुल्य खड़ा कर देते हैं. वास्तव में हमारी संस्कृति में मृत्यु सभी बुराइयों और पापों को धोने वाली कारक बन जाती है. नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष एवं पूर्व प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोइराला की मृत्यु के बाद उनकी याद में बहे आंसू और श्रद्धांजलियों में हमारी इसी सांस्कृतिक विरासत की झलक मिलती है. नज़रिया चाहे जो भी हो, लेकिन यह सत्य है कि नेपाल में चल रही शांति प्रक्रिया के मद्देनज़र और उनके स्तर के योग्य उत्तराधिकारी की कमी ने कोइराला की मृत्यु के बाद नेपाली राजनीति में एक ऐसा शून्य पैदा कर दिया है, जिसकी भरपाई मुश्किल है. कई लोगों की राय में इससे देश के नए संविधान और माओवादी लड़ाकों के भविष्य पर भी संदेह के बादल मंडराने लगे हैं.

नेपाल के दूरगामी हितों के नज़रिए से एक लोकतांत्रिक और केंद्रीय शक्ति के रूप में नेपाली कांग्रेस का पुनरुद्धार बेहद अहम है. इस उद्देश्य को ध्यान में रखें तो पार्टी के नए नेतृत्व का चरित्र कैसा हो, यह विचारणीय प्रश्न है. पार्टी के नए नेतृत्व, चाहे वह एकल हो या बहुल, में नैतिक आधार, दूरदर्शिता और सबको साथ लेकर चलने की क्षमता समय की मांग है. व्यक्तिगत गुणों-अवगुणों की अपनी अहमियत है. हालांकि नेतृत्व के मौजूदा दावेदारों पर नज़र दौड़ाएं तो ज़्यादा आशावान नहीं हुआ जा सकता, लेकिन इसके अलावा कोई विकल्प भी हमारे पास नहीं है.

सबसे बड़ी अनिश्चितता तो नेपाली कांग्रेस के नए नेतृत्व को लेकर है. 1948 में बी पी कोइराला द्वारा नेपाली कांग्रेस की स्थापना के बाद से ही कोइराला परिवार पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का अहम हिस्सा रहा है. अपने जीवनकाल में जी पी कोइराला ने बेटी सुजाता कोइराला को पार्टी में कोइराला परिवार के अगले प्रतिनिधि के रूप में स्थापित करने की हरसंभव कोशिश की, लेकिन ऐसा हो नहीं पाया. और, मौजूदा हालत में परिवार का कोई अन्य सदस्य नेपाली कांग्रेस के नेतृत्व का दावेदार बनता नज़र नहीं आता. इसे देखते हुए कोईराला की मृत्यु के बाद पार्टी को नेतृत्व देने की ज़िम्मेदारी अब उसकी दूसरी पीढ़ी के नेताओं के कंधों पर है. पार्टी के एकमात्र जीवित संस्थापक सदस्य के पी भट्टराई राजनीति से दूर हो चुके हैं. ऐसी हालत में नेपाली कांग्रेस को सहारा देने का काम पार्टी के तीन वरिष्ठ नेताओं के जिम्मे आता है- शेर बहादुर देउबा, कार्यकारी अध्यक्ष सुशील कोइराला और संसदीय दल के नेता रामचंद्र पौडेल. यदि उक्त तीनों मिलकर प्रयास करें, तभी देश की इस सबसे पुरानी और बड़ी लोकतांत्रिक पार्टी के कायाकल्प की कोई संभावना बनती है.  तीनों नेता इसके लिए तैयार हो भी जाएं, तब भी जी पी कोईराला के नेतृत्व क्षमता की कमी आने वाले कई सालों तक महसूस होती रहेगी.

नेपाल के दूरगामी हितों के नज़रिए से एक लोकतांत्रिक और केंद्रीय शक्ति के रूप में नेपाली कांग्रेस का पुनरुद्धार बेहद अहम है. इस उद्देश्य को ध्यान में रखें तो पार्टी के नए नेतृत्व का चरित्र कैसा हो, यह विचारणीय प्रश्न है. पार्टी के नए नेतृत्व, चाहे वह एकल हो या बहुल, में नैतिक आधार, दूरदर्शिता और सबको साथ लेकर चलने की क्षमता समय की मांग है. व्यक्तिगत गुणों-अवगुणों की अपनी अहमियत है. हालांकि नेतृत्व के मौजूदा दावेदारों पर नज़र दौड़ाएं तो ज़्यादा आशावान नहीं हुआ जा सकता, लेकिन इसके अलावा कोई विकल्प भी हमारे पास नहीं है. तीन बार प्रधानमंत्री पद पर रह चुके शेर बहादुर देउबा 1990 के दशक के अंत तक एक राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित हो चुके थे. उनकी सादगी, मिलनसार स्वभाव और स्वच्छ छवि ने आम जनता का ध्यान खींचा, लेकिन तबसे लेकर अब तक स्थितियां बिल्कुल बदल चुकी हैं. अब देउबा न केवल अमीर बन चुके हैं, बल्कि उनकी जीवनशैली और व्यवहार में भी बदलाव आ चुका है. अब वह आम लोगों से ज़्यादा मिलने-जुलने की कोशिश नहीं करते, बल्कि सुविधाभोगी बन चुके हैं. जिस तरह जी पी कोईराला अपने जीवनकाल में बेटी को राजनीति में स्थापित करने की कोशिश करते रहे, उसी तरह देउबा भी अपनी पत्नी को राष्ट्रीय राजनीति में स्थापित करने का भरसक प्रयास कर रहे हैं. कोइराला के साथ उनकी जुगलबंदी भी फलदायक नहीं रही, क्योंकि देउबा पार्टी के संसदीय दल के नेता पद के लिए हुए चुनाव में हार गए. इसके बाद उनके कई समर्थक भी उनका साथ छोड़ चुके हैं, लेकिन पार्टी में उनकी हैसियत और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नज़रों में उनकी विश्वसनीयता अभी भी बनी हुई है. देउबा यदि अपने रवैये में सुधार लाएं तो उनके लिए संभावनाएं अभी ख़त्म नहीं हुई हैं.

सुशील कोइराला की छवि बेदाग़ है, लेकिन उनकी सांगठनिक क्षमता संदेह के दायरे में है. पिछले दो दशकों में कई बार उन्होंने केंद्र में मंत्री पद से इंकार किया तो इसकी वजह उनकी त्याग की भावना नहीं थी, बल्कि मंत्रालय चला पाने के प्रति वह आश्वस्त नहीं थे. पार्टी में अपने विरोधियों को किनारे लगाने के लिए साजिशें रचने में कई बार उनका नाम आया है. कई लोग उन्हें नेतृत्व के लायक़ नहीं मानते, फिर भी जी पी कोइराला के समर्थक माने जाने वाले कई पार्टीजन उनकी सादगी के चलते उन्हें अपना नेता मानने के लिए तैयार हो सकते हैं. रामचंद्र पौडेल में काफी संभावनाएं दिखती हैं. उनके पास ज्ञान का भंडार है और पार्टी की विचारधारा पर भी उनकी अच्छी पकड़ है. हाल के दिनों में उन्होंने माओवादियों के व्यवहार और लोकतंत्र के प्रति उनकी प्रतिबद्धता पर सवाल उठाकर साहस का परिचय भी दिया है. लेकिन, उनका अस्थिर व्यक्तित्व और पार्टी में उनके समर्थकों की कम संख्या उनके रास्ते में एक बड़ी बाधा है.

यदि उक्त तीनों नेता अपनी कमज़ोरियों को दरकिनार करते हुए एक-दूसरे का सहयोग करें तो नेपाली कांग्रेस में नेतृत्व की समस्या का हल निकल सकता है, लेकिन चीज़ें देखने में जितनी आसान लगती हैं, उतनी वास्तव में होती नहीं हैं. सुशील कोइराला और रामचंद्र पौडेल का धड़ा पिछले कुछ समय से पार्टी को सामूहिक नेतृत्व देने की कोशिश कर रहा है, लेकिन देउबा अभी भी इस दायरे से बाहर हैं. यदि वह अपनी जिद पर अड़े रहे तो यह न केवल ख़ुद देउबा के लिए आत्मघाती हो सकता है, बल्कि पार्टी के लिए भी नुक़सानदायक है. पार्टी के कुछ अन्य वरिष्ठ नेता जैसे अर्जुन नरसिंह केसी, रामचरण महत, नरहरि आचार्य, प्रकाशमान सिंह एवं विमलेंद्र निधि आदि भी सामूहिक नेतृत्व की इस विचारधारा में अपनी भूमिका का निर्वाह कर सकते हैं.

वास्तविकता तो यह है कि जी पी कोइराला के दौर को छोड़कर नेपाली कांग्रेस में शुरू से ही सामूहिक नेतृत्व प्रचलित रहा है. स्थापना के दिनों में इसका नेतृत्व मातृका, बी पी और सुबर्ण शमशेर की तिकड़ी के हाथों में था. इसके बाद 1983 में बी पी कोइराला की मृत्यु से पहले तक बी पी, गणेशमान और के पी के हाथों में कमान थी, जबकि इसके बाद गणेशमान, के पी और जी पी कोइराला ने मोर्चा संभाला. पार्टी के इस सामूहिक नेतृत्व के खाते में कई ऐतिहासिक उपलब्धियां हैं, जैसे 1951 में लोकतंत्र की शुरुआत, 1959 के चुनावों में प्रभावशाली जीत, 1980 में जनमत संग्रह और 1990 में लोकतंत्र की वापसी. ईमानदारी से विश्लेषण करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि सामूहिक नेतृत्व की यह अवधारणा पार्टी के अलावा देश के लिए भी काफी फायदेमंद रही है. पुराने दौर के उन महान नेताओं के मुक़ाबले आधुनिक दौर के इन स्वार्थी नेताओं से ज़्यादा उम्मीदें लगाना बेमानी है. फिर भी यदि इन नेताओं का व्यक्तिगत अहं उन्हें पार्टी और देशहित में एक मंच पर आने से रोकता है, तो वे इतिहास के पन्नों से प्रेरणा ले सकते हैं.

(लेखक नेपाल के वरिष्‍ठ राजनीतिक समीक्षक हैं)

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