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कौन किसे बदनाम कर रहा है
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कौन किसे बदनाम कर रहा है

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का ढोल पीटने वाला हिंदुत्ववादी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक बार फिर अपने ऊपर लगे आपराधिक आरोपों से तिलमिला उठा है और इसी तिलमिलाहट के परिणामस्वरूप संघ को राष्ट्रव्यापी धरना-प्रदर्शन का आयोजन गत 10 नवंबर को मात्र 2 घंटे के लिए करना पड़ा. भले ही संघ इसे राष्ट्रव्यापी धरना-प्रदर्शन क्यों न बता रहा हो, परंतु उसे स्वयं भी यह बात बख़ूबी मालूम है कि इस समय उसका संगठन देश के आधे से भी कम क्षेत्रों तक ही सीमित है और वह भी केवल शहरी क्षेत्रों तक. समय बीतने के साथ-साथ संघ अपनी ही ग़लत चालों, फैसलों एवं नीतियों के परिणामस्वरूप आहिस्ता-आहिस्ता और अधिक सिकुड़ता ही जा रहा है. राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि संघ का यह धरना-प्रदर्शन इसलिए भी आयोजित किया गया, ताकि वह अपने संगठन की ताक़त का अंदाज़ा लगा सके कि आख़िर वह कितने पानी में खड़ा है. संघ की राजनैतिक इकाई भारतीय जनता पार्टी ने भी लगभग सभी स्थानों पर आयोजित धरनों में उसका साथ दिया.

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को भी झूठमूठ का शोरशराबा, हाय- तौबा और कांग्रेस एवं राहुल गांधी को संघ या हिंदुत्व विरोधी प्रमाणित करने अथवा वामपंथियों के विरुद्ध हाथ धोकर पड़े रहने में अपना समय गंवाने के बजाय यह चिंतन करना चाहिए कि आख़िर उसके संगठन से जुड़े लोगों के नाम एक के बाद एक गंभीर अपराधों के सिलसिले में क्यों आ रहे हैं तथा क्या कारण हैं कि उसके संगठन-विचारधारा के लोग हिंसा का मार्ग अपना रहे हैं.

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ द्वारा इस धरने का कारण यह बताया जा रहा है कि कांग्रेस द्वारा उसकी सांस्कृतिक राष्ट्रवादी छवि को बदनाम किया जा रहा है. साथ ही साथ संघ यह भी कह रहा है कि कांग्रेस हिंदू धर्म को ही बदनाम करने की कोशिश और साज़िश कर रही है. यह वही आरएसएस है, जो अभी तक महात्मा गांधी की हत्या के आरोप से स्वयं को उबार नहीं पाया है. संघ से असहमति रखने वाले तमाम देशभक्त वही हैं, जो उदारवादी विचारधारा रखते हैं या गांधी दर्शन तथा गांधीवाद के समर्थक हैं. इनमें जाति-धर्म की कोई सीमाएं नहीं हैं. हमारा देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया जिस गांधी के विचारों, उनकी नीतियों एवं सत्य-अहिंसा के दर्शन से प्रभावित थी तथा उन्हें अपना आदर्श मानती है, वह यह बख़ूबी जानती है कि गांधी की विचारधारा का विरोध उन्हीं के देश में, यहां तक कि उन्हीं के अपने राज्य में तथा उन्हीं के अपने हिंदू धर्म के लोगों द्वारा किया गया था और आज भी किया जा रहा है.

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अब यहां प्रश्न यह है कि संघ के भाग्य में बदनामी और हत्या के आरोप लगने की शुरुआत तो गांधी की हत्या के समय से हो गई थी. क्या कांग्रेस ने नाथू राम गोडसे को गांधी की हत्या करने के लिए प्रोत्साहित किया था? उस समय से लेकर अब तक देश में सैकड़ों बड़े सांप्रदायिक दंगे हुए. उनमें जहां तमाम अन्य धर्मों-संगठनों के लोग पकड़े गए, वहीं दंगाइयों में तमाम ऐसे लोग भी पकड़े गए, जिनका संबंध आरएसएस से था. यदि हम गत वर्षों की ही बात करें तो भी गुजरात दंगों से लेकर अब तक दर्जनों संघ कर्यकर्ता किसी न किसी हत्याकांड, बम ब्लास्ट, दंगों और हिंसक गतिविधियों में संलिप्त पाए जा रहे हैं. लेकिन संघ के राष्ट्रीय स्तर के कुछ पदाधिकारियों के नाम पुलिस की जांच-पड़ताल के बाद उजागर होने पर अब जब बात संगठन के छोटे कर्यकर्ताओं के कारण होने वाली बदनामी तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि उसके राष्ट्रीय पदाधिकरियों पर भी एटीएस की उंगली उठी है, तो ऐसे में संघ को अपनी छवि बचाने का यही एक रास्ता नज़र आया कि वह सामाजिक संगठन होने का अपना दावा किनारे रखकर पूर्णतया राजनैतिक जामा पहनते हुए अन्य राजनैतिक दलों की ही तरह धरना-प्रदर्शन जैसे आयोजन का आह्वान भारतीय जनता पार्टी को साथ लेकर अपनी बेगुनाही का सबूत देने के लिए करे.

यही संघ उस समय भी बहुत आहत दिखाई दिया था, जब राहुल गांधी ने सिमी जैसे आतंकी संगठन और संघ को एक ही पैमाने में तौलने की कोशिश की थी. गृहमंत्री पी चिदंबरम ने जब भगवा आतंकवाद शब्द का प्रयोग किया था, तब भी संघ के सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों को बहुत ही नागवार गुज़रा था. ऐसे प्रत्येक आरोप या वक्तव्यों के बाद आख़िर संघ ही क्यों तिलमिला उठता है? क्या राहुल गांधी या पी चिदंबरम राष्ट्रवादी नहीं हैं? क्या उनकी देशभक्ति या राष्ट्रभक्ति संदेहपूर्ण है? संसद में भी संघ को एक-दो नहीं, बल्कि कई बार देशद्रोही अथवा राष्ट्रद्रोही संगठन कहकर कई नेताओं द्वारा संबोधित किया जा चुका है. स्वर्गीय माधवराव सिंधिया भी संघ को संसद में राष्ट्रद्रोही संगठन कहकर पुकार चुके हैं. संघ ऐसे ही आरोपों के कारण कई बार प्रतिबंधित भी हो चुका है. बावजूद इसके संघ खुद को पाक-साफ, शांतिप्रिय, अहिंसक एवं ग़ैर सांप्रदायिक सिद्ध करने का असफल प्रयास करता चला आ रहा है. संघ का दोहरा चरित्र भी पूरे देश के लोगों से छुपा नहीं है. उदाहरण के तौर पर संघ स्वयं को कभी सामाजिक संगठन बताता है तो कभी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का ध्वजवाहक. यह संगठन स्वयं को राजनीति से दूर रहने वाला एक ग़ैर राजनैतिक संगठन बताने की कोशिश करता है, परंतु हक़ीक़त इसके विपरीत है. पूरा देश जानता है कि संघ भारतीय जनता पार्टी का मुख्य संरक्षक संगठन है. भाजपा अध्यक्ष कौन बने और कौन नहीं, भाजपा शासित राज्यों का मुख्यमंत्री किसे बनाया जाए, यह सब संघ ही तय करता है. अभी एक ताज़ातरीन राजनैतिक घटनाक्रम के अंतर्गत कर्नाटक सरकार पर आए संकट के सिलसिले में मुख्यमंत्री येदुरप्पा द्वारा दिशानिर्देश लेने हेतु नागपुर स्थित संघ मुख्यालय जाने की ख़बर आई. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के शासनकाल में अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री रहते संघ का क़ाफिला अनेक बार 7 रेसकोर्स रोड स्थित प्रधानमंत्री निवास पर सलाह-मशविरा करने हेतु जाते देखा गया. यहां तक कि वर्तमान भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी स्वयं संघ द्वारा भाजपा पर थोपे गए अध्यक्ष बताए जा रहे हैं. ऐसे में यह साफ हो जाता है कि संघ स्वयं को चाहे जितना ग़ैर राजनैतिक बताता रहा, परंतु राजनीति में जितनी सक्रियता इस संगठन की है, उतनी किसी अन्य सामाजिक-सांस्कृतिक राष्ट्रवादी संगठन की हरगिज़ नहीं.

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इसमें कोई दो राय नहीं कि संघ तमाम प्रकार के समाजसेवी कार्यों में संलग्न है. जैसे शिक्षा का प्रचार-प्रसार. लेकिन यदि वह शिक्षा सांप्रदायिकता का पाठ पढ़ाती हो और एक भारतीय नागरिक को दूसरे भारतीय नागरिक से नफरत करना सिखाती हो तो क्या उसे शिक्षा का सकारात्मक प्रचार-प्रसार कहा जा सकता है? और भी कई धर्मों में विशेषकर इस्लाम एवं ईसाई धर्म में इसी प्रकार के तमाम मिशन चलाए जाते हैं. संघ भी उनकी आलोचना ही करता है. अतः संघ के ज़िम्मेदार नेताओं को ही स्वयं यह महसूस करना चाहिए कि जब वे सांप्रदायिकता के आधार पर किसी भी संप्रदाय द्वारा चलाए जाने वाले किसी मिशन यहां तक कि समाजसेवा का भी विरोध या आलोचना करते हैं, तो ऐसे में दूसरों से उन्हें स्वयं को राष्ट्रवादी कहलाने का क्या अधिकार बनता है? सच्चाई तो यह है कि क्या हिंदू, क्या इस्लाम, कोई भी धर्म किसी दूसरे धर्म के अनुयायियों अथवा किसी राजनैतिक संगठन के प्रयासों से उतना अधिक बदनाम नहीं हो रहा है, जितना उसके अपने अनुयायियों के सांप्रदायिकतापूर्ण कारनामे उसे बदनाम कर रहे हैं. उदाहरण के तौर पर जब कोई मुस्लिम युवक आतंकी गतिविधियों में शामिल होता है या आत्मघाती दस्ते का सदस्य बनकर स्वयं को विस्फोट से उड़ा लेता है तो ऐसी कार्रवाई करने के लिए किसी अन्य धर्म का व्यक्ति उसे प्रोत्साहित नहीं करता, न ही उसके अपने धर्म की शिक्षा उसे ऐसे मार्ग पर ले जाती है, परंतु ऐसा करने पर निश्चित रूप से इस्लाम धर्म बदनाम होता है और संदेह के घेरे में भी आ जाता है. इस प्रकर इस्लाम के आलोचक यह सोचने, प्रचारित-प्रसारित करने पर मजबूर हो जाते हैं कि इस्लामिक शिक्षाएं ही ऐसी हैं, जो मुस्लिम युवकों को आतंकवाद का मार्ग दिखाती हैं. मदरसा शिक्षा प्रणाली भी ऐसी ही कट्टर शिक्षा दिए जाने के कारण बदनाम हो चुकी है. इस प्रकर की बदनामियां किसी दूसरे समुदाय का व्यक्ति चाहते हुए भी किसी दूसरे धर्म पर नहीं मढ़ सकता.

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इसी प्रकार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को भी झूठमूठ का शोरशराबा, हाय- तौबा और कांग्रेस एवं राहुल गांधी को संघ या हिंदुत्व विरोधी प्रमाणित करने अथवा वामपंथियों के विरुद्ध हाथ धोकर पड़े रहने में अपना समय गंवाने के बजाय यह चिंतन करना चाहिए कि आख़िर उसके संगठन से जुड़े लोगों के नाम एक के बाद एक गंभीर अपराधों के सिलसिले में क्यों आ रहे हैं तथा क्या कारण हैं कि उसके संगठन-विचारधारा के लोग हिंसा का मार्ग अपना रहे हैं. संघ को शस्त्र पूजन के बजाय पुष्प पूजन की परंपरा की शुरुआत करनी चाहिए. जैसे वह बेल्ट एवं जूते का त्याग करने की योजना बना रहा है, उसी प्रकर शस्त्र प्रदर्शन एवं त्रिशूल दीक्षा आदि का भी त्याग करना चाहिए. स्वयं को अहिंसक एवं सांस्कृतिक राष्ट्रवादी साबित करने के लिए उसे सत्य, अहिंसा, प्रेम एवं सद्भाव के मार्ग को अपनाना होगा और पूरी ईमानदारी से यह महसूस करना होगा कि कहीं उसकी अपनी गतिविधियों के कारण तो हिंदू धर्म बदनाम नहीं हो रहा? भगवा आतंकवाद जैसे शब्द के सार्वजनिक होने के पीछे कहीं उसकी ही गतिविधियां ज़िम्मेदार तो नहीं? अंत में सवाल यह नहीं, शीशा बचा कि टूट गया, देखना यह है कि आ़खिर पत्थर कहां से आया?

1 comment

  • क्या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिन्दू धर्मं का माई बाप है , हिन्दू धर्म की छाती पर खड़े होकर राजीनति की रोटी सेकने वाली वी .जे. पी पार्टी आखिरकार हिन्दू धर्म के लिए क्या कर रही है . पिछले तीस साल का इतिहास उठा कर देखा जाये तो कुछ भी नहीं किया है . अगर किसी को फायदा हुआ है तो वी .जे. पी पार्टी के नेताओ को हुआ है या उसका सुख उनके बच्चे भोग रहे है . आम आदमी आज भी लाचार और बेबस खड़ा है . उसे हाथ में थमा दिया जाता है कमल का फूल ? वह फूल बन रहा है . धर्म की आड़ में गुमराह किया जा रहा है . उसकी लाचारी का फायदा उठाने में न हो सकी . कुछ ही स्टेट में अपनी सरकार बना पाई है . देखिये आगे आगे होता है क्या ?
    साक्षात्कार.कॉम
    प्रेसवार्ता.कॉम

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