fbpx
Now Reading:
सांप्रदायिक दंगे रोकने के लिए कानून नहीं, इंसाफ की जरुरत

सांप्रदायिक दंगे रोकने के लिए कानून नहीं, इंसाफ की जरुरत

भारत दुनिया का एक मज़बूत लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष देश है, जिसने सभी महत्वपूर्ण धर्मों के मानने वालों को अपने यहां शरण दी. यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय धार्मिक और आध्यात्मिक रहनुमाओं ने इस सरज़मीं को अपना आशियाना बनाया और पूरा जीवन मानवता के कल्याण, शांति और भाईचारे के लिए अर्पित कर दिया. लेकिन इसी सरज़मीं पर ऐसी मानसिकता वाले लोग भी मौजूद हैं, जिन्होंने इस मिट्टी की मोहब्बत की ख़ुशबू को अस्त-व्यस्त किया. इसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका सांप्रदायिक चेतना की रही. अक्सर भारत इस गंदी साज़िश से कांप उठता रहा है, लेकिन अपनापन, भाईचारे, प्रेम और एकता जैसे मानवीय तत्व हमेशा से इस देश की आत्मा में रचे-बसे रहे हैं, इसीलिए यह सरज़मीं पवित्रता की प्रतीक रही है और दूषित मानसिकता वालों को सज़ा देती रही है. भारत के इसी धर्मनिरपेक्ष भाईचारे और सहनशीलता की रक्षा के लिए देश की सबसे बड़ी पंचायत, संसद से क़ानून बनते रहे हैं. पिछले दो या तीन दशकों से ख़ामोशी के साथ और कभी दो टूक इस देश के पवित्र माहौल को बर्बाद करने के लिए क़दम उठाए जाते रहे हैं. परिणामस्वरूप यहां के जागरूक और बुद्धिमान लोगों ने साजिश करने वालों को सज़ा देने और उन्हें हतोत्साहित करने के लिए प्रभावी क़ानून बनाने की वकालत की है.

प्रतिनिधियों ने मांग की है कि जिस वर्ग के लोग धार्मिक योजना के तहत क़त्ल किए जाते हैं, उस वर्ग के सुझावों को शामिल किए बिना संसद में यह विधेयक पेश न किया जाए. देश की धर्मनिरपेक्ष ताक़तों, सिविल सोसायटी और राजनीतिक दलों ने भी कहा है कि सरकार जल्दी में विधेयक पेश न करे. पहले इसकी समीक्षा करे, ताकि कमियों को दूर किया जा सके और सभी को समान अधिकार दिलाए जा सकें.

ऐसे ही प्रयासों के तहत सांप्रदायिक हिंसा निरोधक विधेयक 2005 (विरोध, कंट्रोल और पीड़ितों का पुनर्वास) के रूप में देश को एक सकारात्मक और प्रभावी क़ानून देने की योजना बनाई गई. इस विधेयक को सबसे पहले 5 दिसंबर, 2005 में राज्यसभा में पेश किया गया. कहा गया कि इस विधेयक का उद्देश्य केंद्र और राज्य सरकारों को अधिकृत करना है कि वे यह क़ानून लागू करके देश में सांप्रदायिक सौहार्द क़ायम और मज़बूत रखने और ऐसा माहौल बनाए रखने के लिए निरोधात्मक कार्रवाई करें, जिससे देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे, एकता और आंतरिक सुरक्षा का संरक्षण किया जा सके. साथ ही पीड़ितों का पुनर्वास और अन्य संबंधित मामलों को हल किया जा सके. यूपीए ने वर्ष 2004 के अपने चुनावी घोषणापत्र में कॉमन मिनिमम प्रोग्राम के तहत यह वादा किया था कि ऐसा क़ानून बनाया जाएगा, जिसके द्वारा सांप्रदायिक हिंसा के विरुद्ध जंग करने वालों के हाथों को मज़बूत किया जाएगा और फिर 2005 में वादे के अनुसार इस विधेयक को संसद में पेश कर दिया गया. इसके मसौदे को पढ़ने और उस पर विचार करने के बाद प्रसिद्ध विचारकों, क़ानूनविदों एवं स्वयंसेवकों, जो इसके लिए सक्रिय रहे हैं, ने इस विधेयक को ख़ारिज कर दिया और कहा कि उनके साथ केंद्र सरकार ने धोखा किया है. मांग की गई कि विधेयक में संशोधन किया जाए.

Related Post:  गुलाम नबी आजाद का बड़ा बयान, झारखंड को बताया मॉब लिंचिंग और हिंसा की फैक्ट्री

विरोधियों के आगे केंद्र सरकार ने घुटने टेके और विधेयक को पार्लियामेंट्री स्टैंडिंग कमेटी होम अफेयर्स को समीक्षा के लिए भेज दिया, लेकिन अ़फसोस की बात है कि जब कमेटी ने इस बिल को 6 दिसंबर, 2006 को संसद में पेश किया तो पर्याप्त संशोधन नहीं किए गए थे. 2005 से 2006 तक सिविल सोसायटी और सरकार के बीच कई बैठकें हुईं. गृहमंत्री, महत्वपूर्ण अधिकारियों और सांसदों से कई बार बातचीत हुई, लेकिन कोई ध्यान नहीं दिया गया. केंद्र सरकार ने इस विधेयक में लगभग 59 संशोधन करके केंद्रीय मंत्रिमंडल के पास भेज दिया, जिसने अपनी ओर से इसकी पुष्टि कर दी. प्रत्यक्ष रूप से आंसू पोंछने के लिए कुछ क़दम उठाए गए, लेकिन सिविल सोसायटी के एक भी सुझाव को शामिल नहीं किया गया. अगर यह बिल पारित हो जाता और इसे क़ानून का रूप दे दिया जाता तो उन ताक़तों का मनोबल बढ़ता, जो माहौल को गंदा करके अपनी मंशा पूरी करने की ताक में रहते हैं. जबकि विधेयक का मक़सद भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को सुरक्षित और मज़बूत बनाना, सभी नागरिकों की सुरक्षा करना, इज़्ज़त-आबरू का सम्मान करना था. इस महान उद्देश्य को हासिल करने के लिए ज़रूरी था कि केंद्र और राज्य सरकारें ऐसे नियम और क़ानून तय करतीं, जिनसे सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनीतिक और मानवीय मूल्यों की सुरक्षा सुनिश्चित होती और सरकार यह सब करने की अपनी ज़िम्मेदारी महसूस करती. केंद्र सरकार ने 2005 के सांप्रदायिक हिंसा निरोधक विधेयक में कुछ संशोधन किए और इसे ड्राफ्ट सांप्रदायिक हिंसा निरोधक विधेयक 2009 (विरोध, कंट्रोल और पीड़ितों का पुनर्वास) का नाम दे दिया. सरकार की इस निरर्थक कार्यवाही के विरुद्ध आवाज़ उठाने के लिए विभिन्न मुस्लिम संगठनों के प्रतिनिधियों ने बीते एक अप्रैल को दिल्ली में एकत्र होकर दो टूक कहा कि सांप्रदायिक हिंसा निरोधक विधेयक 2009 (विरोध, कंट्रोल और पीड़ितों का पुनर्वास) अनुचित, अस्वीकार्य और काउंटर प्रोडक्टिव है. इन सबने सरकार से सख्ती से मांग की कि इस विधेयक की समीक्षा की जाए, क्योंकि तथाकथित 59 संशोधनों के बावजूद 2009 का विधेयक 2005 के विधेयक से भिन्न नहीं है, इसलिए जब तक महत्वपूर्ण संशोधन नहीं होते, 2009 का बिल अपने उद्देश्य प्राप्त करने में सफल नहीं होगा.

Related Post:  पश्चिम बंगाल में TMC-BJP के बीच झड़प, 4 कार्यकर्ताओं की मौत, गृह मंत्रालय ने ममता सरकार से मांगा जवाब

प्रतिनिधियों ने स्पष्ट कहा कि दंगे की आशंका तब तक बरक़रार रहेगी, जब तक इसके विरोध के पर्याप्त प्रयास नहीं होंगे. जब तक सांप्रदायिक दंगे को तत्काल नियंत्रित करने का प्रभावी तरीक़ा नहीं अपनाया जाएगा, पीड़ितों एवं उत्तराधिकारियों के पुनर्वास के लिए भरपूर आर्थिक सहायता नहीं दी जाएगी, संपत्तियों की तबाही का मुआवज़ा नहीं दिया जाएगा, दोषियों को चिन्हित करके मुक़दमा चलाकर सज़ा नहीं दी जाएगी और शासन-प्रशासन के ज़िम्मेदार लोगों को जेल भेजने की व्यवस्था नहीं होगी, तब तक 2009 का बिल भी किसी काम का नहीं होगा. प्रतिनिधियों की बात सुनकर केंद्र सरकार के कान खड़े हुए और फिर प्रस्तावों और मांगों पर ध्यान से विचार करने का काम शुरू हुआ. प्रतिनिधियों ने महसूस किया कि यह बिल भी पुलिस-प्रशासनिक अधिकारियों को जवाबदेह बनाने के लिए कोई क़ानूनी व्यवस्था नहीं करता है. अगर अचानक दंगा हो जाए या फैल जाए या सप्ताह भर में नियंत्रित न हो पाए तो मानवाधिकार आयोग तक को भी कोई अधिकार नहीं है कि वह प्रभावी तरीक़े से हस्तक्षेप करके पीड़ितों को न्याय दिला सके. अगर राज्य सरकार दंगा नियंत्रित न कर सके तो केंद्र सरकार संविधान के अनुच्छेद 355 के तहत अपने अधिकारों का प्रयोग करके उसे भंग करा सके, इसकी भी कोई व्यवस्था इस बिल द्वारा नहीं की गई है. दूसरी ओर यह विधेयक पुलिस के हाथों को मज़बूत करता है. इस विधेयक द्वारा पुलिस को अधिकार है कि वह किसी भी क्षेत्र को कम्युनिटी डिस्टर्ब एरिया घोषित कर दे, बस उसका काम हो गया, क्योंकि ऐसा करने के बाद पुलिस को मनमानी करने का अधिकार मिल जाता है जैसा कि अब तक देखा गया है.

मुस्लिम संगठनों के प्रतिनिधियों ने सरकार से मांग की कि सांप्रदायिक हिंसा को उचित और सटीक शब्दों में परिभाषित किया जाए, ताकि ऐसे अपराधों को आम दंडनीय अपराधों की श्रेणी से अलग करके इसकी अति का एहसास किया जा सके और इसके मुजरिमों का सामाजिक बहिष्कार हो और उनकी संपत्ति ज़ब्त कर ली जाए. राहत शिविरों को तब तक खिखत्म न किया जाए, जब तक पीड़ित अपने ठिकाने पर जाने की स्थिति में न हों. यह भी मांग की गई कि इस तरह की परिस्थितियों में तत्काल एफआईआर दर्ज करने की व्यवस्था होनी चाहिए, घटना या अपराध की जांच विशेष जांच दल द्वारा हो. नामज़द अपराधियों, राजनीतिक नेताओं और पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ विशेष अदालत में विशेष वकीलों, जो पीड़ितों को स्वीकार हों, द्वारा मुक़दमा चलाया जाए, सरकारी अधिकारियों के ख़िलाफ़ इस तरह के मुक़दमों के लिए अनुमति लेने की व्यवस्था को अनावश्यक घोषित किया जाए, पूरे देश में दंगा पीड़ितों को समान मुआवज़ा दिया जाए. इसके लिए धर्म, क्षेत्र, व्यक्तित्व और रुतबा आड़े नहीं आना चाहिए और न ही इसे आधार बनाना चाहिए. नुक़सान के अनुमान के लिए विशेष आयुक्त की सेवाएं ली जानी चाहिए, ताकि जांच और अनुमान के कामों में कोई अनुचित हस्तक्षेप न हो. इन तमाम प्रावधानों के बिना 2005 के विधेयक को 2009 के विधेयक के रूप में संसद में पेश नहीं किया जाना चाहिए. प्रतिनिधियों ने मांग की है कि जिस वर्ग के लोग धार्मिक योजना के तहत क़त्ल किए जाते हैं, उस वर्ग के सुझावों को शामिल किए बिना संसद में यह विधेयक पेश न किया जाए. देश की धर्मनिरपेक्ष ताक़तों, सिविल सोसायटी और राजनीतिक दलों ने भी कहा है कि सरकार जल्दी में विधेयक पेश न करे. पहले इसकी समीक्षा करे, ताकि कमियों को दूर किया जा सके और सभी को समान अधिकार दिलाए जा सकें. इस संयुक्त वक्तव्य पर मुस्लिम संगठनों के प्रतिनिधियों, विचारकों एवं बुद्धिजीवियों ने अपने हस्ताक्षर किए हैं, ताकि सरकार को मालूम हो सके कि पूरी मुस्लिम क़ौम प्रस्तावित सांप्रदायिक हिंसा निरोधक विधेयक 2009 (विरोध, कंट्रोल और पीड़ितों का पुनर्वास) को कमियों का एक बंद पिटारा समझती है. हस्ताक्षर करने वालों में सैय्यद हामिद, मौलाना सैय्यद जलालुद्दीन, मौलाना अरशद मदनी, सैय्यद शहाबुद्दीन, डॉ. मोहम्मद मंज़ूर आलम, ज़फ़र सैफुल्लाह, असुद्दीन उवैसी, मुफ्ती मोहम्मद मुकर्रम एवं मौलाना एजाज़ अहमद असलम आदि शामिल हैं.

Related Post:  गोकशी पर बवाल: भीड़ ने मदरसे में की तोड़फोड़ और लगाई आग, फतेहपुर में दो गुटों में हिंसक झड़प

जारी…

(लेखक सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Input your search keywords and press Enter.