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अफ़ीम बना नक्सलियों का टॉनिक
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अफ़ीम बना नक्सलियों का टॉनिक

opiumनक्सलियों के नाक में नकेल डालने के लिए भले ही तरह-तरह की योजनाएं बनाई जा रही हो और समय-समय पर योजनाओं को मूर्तरूप भी दिया जाता हो. लेकिन हकीकत यह है कि बिहार और झारखंड न केवल नक्सलियों के लिए सुरक्षित ठिकाना बनते जा रहे हैं बल्कि व्यापक पैमाने पर अफीम की खेती कर नक्सली आर्थिक रूप से संपन्न भी होते रहे हैं. बिहार व झारखंड से नक्सलियों के पैर नहीं उखड़ रहे, तो इसका सबसे बड़ा कारण नक्सलियों के द्वारा बिहार व झारखंड में अफीम की खेती करना ही है. नक्सलियों के साथ पुलिस की अक्सर भिड़ंत तो हो रही है, लेकिन नक्सलियों द्वारा की जा रही अफीम की खेती का बुनियाद नष्ट कर पाना पुलिस के लिए पानी में आग लगाने जैसा साबित हो रहा है. अफीम के सौदागर बन चुके नक्सलियों की खेती की व्यापकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बिहार और झारखंड के कई इलाकों में परंपरागत खेती से तौबा कर किसान अफीम की खेती करना ही फायदेमंद समझने लगे हैं. मक्का व अन्य फसलों के बीच हो रही अफीम की खेती को खंगाल पाना पुलिस के लिए आसान भी नहीं है.

ऐसी बात नहीं है कि अफीम की खेती पर पुलिस के द्वारा ग्रहण लगाने की कोशिश नहीं की जाती है, कोशिश तो समय-समय पर की गई है और कई बार फसलों को नष्ट भी किया गया है. लेकिन छोटे स्तर के किसानों पर शिकंजा कसने के अलावा पुलिस अब तक कुछ नहीं कर सकी है. अवैध रूप से अफीम की खेती कर संपन्न किसान और अधिक संपन्न तो हो ही रहे हैं, नक्सलियों के लिए टॉनिक भी पैदा कर रहे हैं. अफीम की खेती से प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए की आमद कर नक्सली अपनी ताकत में इजाफा करते जा रहे हैं और छोटे किसानों से लेकर बड़े-बड़े किसानों को आर्थिक संपन्नता प्रदान कर इन्हें अपने कुनबे में शामिल करते जा रहे हैं. नॉरकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले वर्ष अफीम की खेती कर नक्सलियों द्वारा लगभग दो सौ करोड़ रुपए एकत्रित किए गए हैं.

इसके पहले भी अफीम की खेती से नक्सलियों को करोड़ों रुपए की आमदनी हुई है. कैमूर, औरंगाबाद, नवादा, मुंगेर, पूर्णिया, लक्खीसराय, भागलपुर सहित कुछ अन्य इलाकों में भी अफीम की खेती तो हो ही रही है, जमुई, खगड़िया और गया में भी व्यापक पैमाने पर अफीम का उत्पादन किया जा रहा है. दरअसल इन इलाकों की भौगोलिक बनावट भी नक्सलियों के साथ-साथ अफीम की खेती करने वाले किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है और धीरे-धीरे किसानों की फौज अफीम की खेती का गुर सीखने की कला में निपुण होती जा रही हैं.

वैसे जांच के दौरान यह भी स्पष्ट हो रहा है कि कम समय में अधिक मुनाफे की चाहत रखने वाले स्थानीय व्यवसासियों द्वारा अफीम की खेती में निवेश किया जाता है. यहां तक कि व्यवसासियों द्वारा अफीम की खेती के लिए बीज सहित अन्य संसाधन उपलब्ध कराने के बावत व्यापक तौर पर फंडिंग भी किया जाता है. एनसीबी को लगातार मिल रही खुफिया रिपोर्ट के आधार पर गया, खगड़िया और जमुई जिलों में पिछले वर्ष 370 एकड़ में लगे अफीम के फसल को नष्ट किया गया था. लेकिन एनसीबी तथा पुलिस की संयुक्त टीम के द्वारा अन्य इलाकों को खंगाल पाना दुरुह साबित हुआ. जबकि एनसीबी को यह जानकारी भी मिली थी कि इन तीन जिलों के लगभग 800 एकड़ में अफीम की खेती हो रही है. भौगोलिक बनावट को देखकर आकर्षित नक्सलियों द्वारा कोसी इलाके में अफीम की खेती की संभावना तलाशी जा रही है. अब जबकि अफीम की खेती का समय नजदीक आ गया है, रिपोर्ट आ रही है कि कोसी में भी अफीम की खेती होने से इंकार नहीं किया जा सकता है. नदियों के गर्भ में बसे कोसी इलाके में अपना साम्राज्य कायम कर चुके अपराधी भी अब धीरे-धीरे नक्सलियों से सांठ-गांठ कर अफीम की खेती करने की चाहत में जुट गए हैं.

जानकारों का कहना है कि कुख्यात दस्यु सरगना रामानंद यादव से अगर नक्सलियों का पंगा नहीं होता तो अब तक कोसी में व्यापक पैमाने पर अफीम की खेती शुरू हो गई होती. माना जाता है कि कुख्यात दस्यु सरगना रामानंद यादव का नक्सलियों से पंगे का सबसे बड़ा कारण भी कहीं न कहीं अफीम की खेती ही है. कहा जाता है कि कुछ वर्ष पूर्व कुख्यात दस्यु सरगना रामानंद यादव की सहरसा पुलिस द्वारा नाटकीय ढंग से की गई गिरफ्तारी के बाद नक्सलियों ने कोसी तथा फरकिया में पांव पसारना शुरू कर दिया था. कुछ इलाकों में अफीम के फसल की बुआई भी की गई थी. लेकिन रामानंद के जेल से छूटते ही नक्सलियों ने कम से कम फरकिया से तौबा करना ही ठीक समझा.

कई पुलिस अधिकारी भी दबे जुबान से इस बात को स्वीकारते हैं कि कुख्यात दस्यु सरगना रामानंद यादव द्वारा नक्सलियों से अक्सर पंगा लेने के कारण ही फरकिया में नक्सलियों का पांव नहीं जम सका. बिहार के कोसी अथवा फरकिया की स्थिति को कुछ देर के लिए नजरअंदाज कर अगर झारखंड की बात करें तो गया के पड़ोसी जिला अर्थात झारखंड के चतरा सहित कुछ अन्य इलाकों में पहले से अफीम की खेती होती रही है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों से अधिक मुनाफे की चाहत रखने वाले व्यवसायियों तथा किसानों की अफीम की खेती में दिलचस्पी बढ़ने से स्थिति भयावह होती जा रही है. समय रहते अगर नक्सलियों की ‘अफीम आधारित अर्थव्यवस्था’ को नष्ट नहीं किया गया तो बिहार के साथ-साथ झारखंड में न केवल नक्सलियों के अंगदी पांव जमने की संभावना प्रबल होगी बल्कि पुलिस को दिन में तारे दिखने की संभावनाओं से भी इंकार नहीं किया जा सकता.

एनसीबी के क्षेत्रीय निदेशक टीएन सिंह कहते हैं, अफीम की खेती का समय नजदीक आते ही एनसीबी की चौकसी बढ़ गई है. सभी स्तर पर कड़ी नजर रखकर अफीम की खेती को नष्ट करने सहित अन्य कार्रवाई का खाका तैयार कर लिया गया है. गया-चतरा इलाके में खुफिया सहित अन्य स्तर पर भी कार्ययोजना बनाकर इसे मूर्तरूप देना शुरू कर दिया गया है. किसी भी कीमत पर अवैध रूप से हो रही खेती को नष्ट करना ही एनसीबी का लक्ष्य है. बहरहाल, दावे के मुताबिक एनसीबी अफीम की खेती को पूरी तरह नष्ट कर पाती है अथवा नहीं, यह तो समय ही बताएगा. लेकिन यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि अगर दावे के मुताबिक अवैध रूप से हो रही अफीम की खेती को नष्ट नहीं किया गया तो पिछले वर्ष की तरह इस बार भी व्यापक पैमाने पर अफीम की खेती होगी और स्थानीय पुलिस हाथ मलने के सिवाय कुछ नहीं कर पाएगी.

अनोखा है अफ़ीम की खेती का तरीक़ा

बिहार तथा झारखंड में व्यापक पैमाने पर हो रही खेती के तरीकों पर अगर नजर डाली जाय तो अफीम की खेती का तरीका भी अनोखा है. किसानों को बीज से लेकर अन्य संसाधन नक्सलियों द्वारा उपलब्ध कराए जाते हैं और नक्सलियों के संरक्षण में ही अफीम की खेती होती है. अफीम का फसल तैयार होने के बाद बिचौलियों के द्वारा खरीद लिया जाता है. अफीम के तैयार फसल को बिचौलियों अथवा एजेंट के द्वारा महज 25 हजार रुपए प्रति किलो के हिसाब से खरीदा जाता है और 52 से 55 हजार रुपए प्रति किलो के हिसाब से इसकी बिक्री की जाती है. मुनाफे का 60 प्रतिशत हिस्सा नक्सलियों द्वारा लिया जाता है, जबकि 40 प्रतिशत हिस्से को बिचौलिए, किसान और खेती में निवेश करने वाले व्यवसायियों सहित अन्य के बीच बांटा जाता है. जानकारी के अनुसार अफीम की खेती से प्रति एकड़ 13 से 15 लाख रुपए की आमदनी होती है.

आश्‍चर्यजनक तथ्य यह है कि अफीम के फसल की बुआई से पूर्व ही मुनाफे का 40 से 50 प्रतिशत हिस्सा नक्सलियों द्वारा वसूल लिया जाता है और मुनाफे का शेष हिस्सा फसल तैयार होने के बाद लिया जाता है. किसान भी दबे जुबान से इस बात को स्वीकारते हैं कि एक बार अफीम की खेती करने वाले किसानों को नक्सलियों द्वारा धमकाए जाने के कारण बार-बार खेती करना होता है. एक बार अफीम की खेती करने वाले किसान अगर बार-बार खेती करने से इंकार करते हैं तो नक्सलियों के सितम का शिकार होते हैं और बार-बार खेती करने के लिए मजबूर होते हैं तो पुलिसिया गिरफ्त का सामना करना पड़ता है. पुलिस की नजर में आने वाले किसानों की जिंदगी नरक बन जाती है. नक्सलियों तथा पुलिस के भय से किसानों को अंतत: खेती तो क्या घर-बार भी छोड़ना पड़ता है.

लीज़ पर ज़मीन लेकर धंधेबाज़ करते हैं अफ़ीम की खेती

एनसीबी तथा पुलिस से बचने के लिए कोसी के इलाकों में  धंधेबाजों के द्वारा लीज पर जमीन देकर अफीम की खेती कराई जाती है. इस बात का खुलासा तब हुआ था जब बिहार के खगड़िया जिले के बभगनगामा पंचायत स्थित खटहा दियारा के चार एकड़ में लगी अफीम के फसल को नष्ट किया गया था. एएसपी अभियान विमलेश चन्द्र झा के नेतृत्व में खगड़िया जिला पुलिस द्वारा जब जमीन मालिक महेन्द्र साव से पूछताछ की गई, तो उसने पुलिस को बताया था कि मानसी के किसी व्यक्ति को इन्होंने लीज पर जमीन दिया था.

लीज पर जमीन लेने वालों के द्वारा खेत में किस फसल की बुआई की गई, इसकी जानकारी इसे नहीं है. एसएसपी विमलेश चन्द्र झा का कहना था कि नष्ट किए गए फसल की कीमत अंतर्राष्ट्रीय बाजार में करोड़ो रुपए हो सकती है. इन्होंने यह भी कहा था कि मामले की जांच कर इस बात का पता जरूर लगाया जाएगा कि आखिर स्थानीय स्तर पर कौन-कौन इस तरह की खेती करने के जिम्मेवार हैं. हालांकि इसके बाद पुलिस या तो सुस्त पड़ गई अथवा गुनहगार अपना दामन बचाने में सफल हो गए. बहरहाल, स्थानीय लोगों का कहना है कि अन्य जगहों पर भी लीज पर जमीन लेकर धंधेबाजों के द्वारा व्यापक पैमाने पर अफीम की खेती की जा रही है.

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