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मिस्र से सबक ले सरकार

आम आदमी का आक्रोश धीरे-धीरे बढ़ रहा है. महंगाई, घोटाले और भ्रष्टाचार इस आक्रोश को हवा दे रहे हैं. इन समस्याओं की असल वजह और इस मसले पर राजनीतिक दलों से लेकर आम आदमी और मीडिया की भूमिका को देखना-समझना होगा. मिस्र में जो हुआ, ट्यूनीशिया में जो हुआ, अरब और ग़ैर अरब के कुछ देशों में इस व़क्त जो हो रहा है, उससे भारत के सभी राजनीतिक दलों को सबक लेना चाहिए. महंगाई, भ्रष्टाचार और सरकार की अकर्मण्यता पर यहां भी जनता में आक्रोश है. सरकार कह रही है कि महंगाई दूसरे देशों में भी है तो उसे यह भी सोचना चाहिए कि दूसरे देशों में लाखों लोग तानाशाही के ख़िला़फ सड़क पर उतर आए हैं. इससे सरकार को सबक लेना चाहिए. हमारे यहां लोकतंत्र है, इसका यह मतलब नहीं है कि लोग सड़क पर नहीं उतर सकते. जनता अपना रोष स़िर्फ मतदान के ज़रिए ही नहीं प्रकट करती. जैसे महाभारत में कृष्ण ने अपना विराट रूप दिखाया, वैसे जनता भी अपना विराट रूप दिखा सकती है. सरकार भ्रष्टाचार पर क्या सोचती है, यह उसके मंत्री कपिल सिब्बल के बयान से पता चलता है. 2-जी मामले पर सिब्बल ने कैग की रिपोर्ट को झूठा साबित करने की कोशिश की. राजा की गिरफ़्तारी से भी कुछ ख़ास नतीजा देखने को नहीं मिलेगा. करुणानिधि से हरी झंडी लेकर उनकी गिरफ़्तारी हुई है. इस पूरे मामले पर लीपापोती की कोशिश होगी.

नेहरू ईमानदार थे, ऐसा किसी ने कभी नहीं कहा. गांधी ईमानदार थे, यह कहते हुए मैंने किसी को नहीं सुना, क्योंकि उनकी ईमानदारी उनके व्यक्तित्व में इस तरह घुली-मिली थी कि यह सब कहने की ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई. अगर मनमोहन सिंह ईमानदार हैं तो फिर स्विस बैंक अकाउंट्‌स के नामों का खुलासा क्यों नहीं करते? स्विस बैंक अकाउंट्‌स में जमा पैसा तो क्राइम का है.

अगर हर्षद मेहता तक जाएं, तो तब तक के घोटाले चंद करोड़ रुपये के ही हुआ करते थे. बोफोर्स का मामला, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित रहा, महज़ 64 करोड़ रुपये का था, लेकिन अब लाखों करोड़ों रुपये के घोटाले हो रहे हैं. राष्ट्रमंडल खेल, 2-जी स्पेक्ट्रम, स्विस अकाउंट की कहानी सामने है. इन सबकी जड़ में लोग नहीं जा रहे हैं कि आख़िर यह लूट मची क्यों है. असल में पूंजीवादी व्यवस्था की जड़ में ही भ्रष्टाचार है. हालांकि मैं यह नहीं कहता कि समाजवादी व्यवस्था में भी भ्रष्टाचार है, लेकिन समाजवादी व्यवस्था में कार्रवाई होती है. चीन में तो घोटालेबाज़ों को फांसी तक दी गई है. संपत्ति के लालच की कोई सीमा नहीं होती.

हमारे यहां की पूंजीवादी व्यवस्था में, खासकर पिछले 15-20 सालों में घोटालों की संख्या अचानक बढ़ी है और अगर हम इसकी जड़ में जाएं तो पाते हैं कि पिछले 20 सालों के दौरान मनमोहन सिंह वित्त मंत्री भी रहे और अब पिछले सात सालों से प्रधानमंत्री हैं. अमेरिका के आदेश पर इन्होंने विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के निर्देश पर नव उदारवादी अर्थव्यवस्था लागू की. इस अर्थव्यवस्था का दर्शन ही अधिकतम लाभ कमाना है. आम जनता तो जीवनयापन के चक्कर में ही इतनी व्यस्त है कि वह अधिकतम लाभ कमाने के बारे में सोच भी नहीं पाती. अब रह गए चंद मुट्ठी भर लोग यानी कुछ ख़ास औद्योगिक घराने. इनमें रिलायंस भी है, टाटा भी है, मित्तल भी है या कहें कि सब शामिल हैं. इन सबका व्यापार पिछले दस सालों में 100 गुना बढ़ गया. आख़िर यह कैसे संभव हुआ? क्या बिना भ्रष्टाचार किए, रिश्वत लिए या सरकार को बिना हाथ में लिए ऐसा होना संभव था? वर्तमान आर्थिक नीतियों की जड़ में ही भ्रष्टाचार है. क्या 2-जी मामले में अधिकारियों और मंत्रियों को रिश्वत नहीं खिलाई गई होगी? पूंजीवादी व्यवस्था का मतलब होता है लाभ कमाना, जबकि नव उदारवादी व्यवस्था में लाभ कमाने की कोई सीमा नहीं होती और न कोई मर्यादा. आप माइनिंग माफिया, गैस माफिया और तेल माफिया को इसका उदाहरण मान सकते हैं. 8 से 9 प्रतिशत की विकास दर की यही सच्चाई है और आधार भी. इसी देश में एक ओर अर्जुन सेन गुप्ता कमेटी की रिपोर्ट कहती है कि देश की 70 फीसदी आबादी की रोज की कमाई 20 रुपये से भी कम है. हम पहले कहते थे कि दिन दूना-रात चौगुना विकास करो और आज की हालत देखकर यही कहा जा सकता है कि कुछ लोग दिन में लाख गुना और रात में करोड़ गुना कमा रहे हैं.

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एक सवाल यह उठता है कि क्या इसके पीछे गठबंधन की राजनीति भी एक कारण है. मैं ऐसा नहीं मानता. अब सिंगल पार्टी का सत्ता में आ पाना संभव नहीं है. यह ज़रूर है कि गठबंधन का जमाना है और सब मिल-बांटकर खा रहे हैं. वाजपेयी सरकार से लेकर मनमोहन सिंह सरकार तक यही सब हुआ. लेकिन तय मानिए, अगले चुनाव में घोटालेबाज़ कांग्रेस का बुरा हाल होने वाला है. अभी पता चला कि नासिक की मंडी में किसानों से 5 रुपये किलो प्याज ख़रीदा गया, फिर उसे बड़े ख़रीददार ने 20 रुपये किलो की दर से ख़रीदा और आख़िरकार वही प्याज आम आदमी तक 48 रुपये किलो की दर से पहुंचा. मैं पूछता हूं कि 48 रुपये किलो बिकने वाले प्याज से किसानों को कितना मुना़फा हुआ. ज़ाहिर है, सारा मुना़फा बिचौलिए कमा रहे हैं. सरकार इस मुगालते में न रहे कि जनता सड़क पर नहीं उतरेगी. जनता ज़रूर सड़क पर उतरेगी और जब उतर जाएगी तो सरकार को समझ में नहीं आएगा कि अब क्या करना है.

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लोग कहते हैं कि प्रधानमंत्री ईमानदार हैं, लेकिन बड़े-बड़े घोटाले इन्हीं के कार्यकल में हो रहे हैं. मैं ऐसा मानता हूं कि जो ऊपर की कुर्सी पर बैठा है, वह ईमानदार है, यह अच्छी बात है. लेकिन जो उनके नीचे है और घोटाले कर रहा है और वह उसे संरक्षण दे रहे हैं. तो फिर ऐसी ईमानदारी किस काम की? नेहरू ईमानदार थे, ऐसा किसी ने कभी नहीं कहा. गांधी ईमानदार थे, यह कहते हुए मैंने किसी को नहीं सुना, क्योंकि उनकी ईमानदारी उनके व्यक्तित्व में इस तरह घुली-मिली थी कि यह सब कहने की ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई. अगर मनमोहन सिंह ईमानदार हैं तो फिर स्विस बैंक अकाउंट्‌स के नामों का खुलासा क्यों नहीं करते? स्विस बैंक अकाउंट्‌स में जमा पैसा तो क्राइम का है, ग़ैर क़ानूनी ढंग से कमाया और जमा किया गया है. स्विस अधिकारियों ने कभी नहीं कहा कि आप नाम नहीं बता सकते. अगर कोई ट्रिटी है, जिसके तहत आप नामों का खुलासा नहीं कर सकते तो यह ट्रिटी किसने की? क्यों की? आख़िर इस सब का जवाब कौन देगा?

बावजूद इसके भ्रष्टाचार के ख़िला़फ एक मज़बूत राजनीतिक आंदोलन नहीं दिख रहा है. असल में जब जनता मुख्य विपक्षी दल भाजपा से इस सब की उम्मीद करती है, तभी पता चलता है कि मैंने भ्रष्टाचार और घोटालों के लिए मुख्य तौर पर जिन नव उदारवादी आर्थिक नीतियों को ज़िम्मेदार बताया था, भाजपा भी उन्हीं नीतियों की समर्थक रही है और अपने शासनकाल में उसने इन्हीं नीतियों पर चलने का फैसला किया था. भ्रष्टाचार से तो फिर भाजपा भी नहीं बची है. ये लोग कर्नाटक में अपने एक विवादास्पद मुख्यमंत्री को नहीं हटा सके. ऐसे में मुख्य विपक्षी दल से भी कोई उम्मीद नहीं दिख रही है. जहां तक वामपंथी पार्टियों से ऐसी उम्मीद की जा रही है तो यहां भी कुछ समस्याएं हैं. हालांकि इससे पहले मैं मीडिया की भूमिका के बारे में भी बताना चाहता हूं. बोफोर्स जैसे अंतरराष्ट्रीय मामले को मीडिया ही जनता के सामने लाया, 2-जी को भी मीडिया ही सामने लाया, लेकिन मीडिया यह नहीं बता पा रहा है कि कौन इन मामलों के लिए लड़ा, किसने आवाज़ उठाई? कभी किसी ने सुना कि कम्युनिस्ट पार्टी का पैसा स्विस बैंक में है? इन बातों को मीडिया सामने नहीं लाता. मिस्र में जो आज इतना बड़ा आंदोलन हम सब देख रहे हैं, उसमें अल जजीरा की भी भूमिका है. मीडिया हमारे बारे में (वामपंथी पार्टियों) न्याय नहीं कर रहा है. वह हमारी बातें लोगों तक नहीं पहुंचाता. अंतिम फैसला जनता को ही करना है, इसलिए यह ज़रूरी है कि मीडिया जनता को उसके लिए तैयार करें.

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हम जब यूपीए-1 की सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे थे, तब भी उससे नीतियों के आधार पर टक्कर ले रहे थे. हम न्यूनतम साझा कार्यक्रम के आधार पर समर्थन दे रहे थे. हमने फाइनेंसियल सेक्टर का निजीकरण नहीं करने दिया. ज़्यादा देर हम ख़ुद को वहां नहीं रोक पाए. हमने समर्थन वापस ले लिया. न्यूक्लियर डील से ड़ेढ साल पहले से ही हमने यूपीए की बैठकों में जाना छोड़ दिया था. वैसे मैं आत्मालोचना करते हुए कहता हूं कि लेफ्ट की ताक़त अब उतनी नहीं रही. लेफ्ट की ताक़त अब लाखों लोगों को सड़क पर उतारने की नहीं रही. इस काम के लिए भी हमें मीडिया का सहयोग चाहिए. एक अंतिम बात कश्मीर के बारे में कहना चाहता हूं. कश्मीर का हल बंदूक़ और सेना के ज़रिए नहीं निकाला जा सकता. पत्थर के जवाब में गोली चलाने से समस्या का समाधान नहीं निकलने वाला. पूरे कश्मीर को नर्क बना दिया गया है.

आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट (अफसपा) घाटी में सेना की बर्बरता का एक जीता-जागता उदहारण है, जिसके तहत वह किसी भी तरह की मनमानी कर सकती है, उसे रोकने वाला कोई नहीं. मानो रक्षक ही भक्षक बन गया हो. केंद्र को चाहिए कि वह जल्द से जल्द अफसपा को हटाए. जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकारों की मांग करना गुनाह है? आख़िर उनका अपराध क्या है, जो उन मासूम कश्मीरियों की दुर्गति हो रही है? क्या उन्हें रोकने का यही तरीक़ा बचा है सरकार के पास? जिन लड़कों को गिरफ़्तार किया गया है, उन्हें रिहा किया जाए. जिन्होंने गंभीर अपराध, जैसे हत्या आदि की है, उन पर मुक़दमा चले, लेकिन बिना किसी जुर्म के जेल में बंद लड़कों को तत्काल रिहा किया जाना चाहिए. इस वजह से एक पूरी की पूरी पीढ़ी बर्बाद हो गई है. सेना को अगर पूरी तरह से नहीं हटा सकते तो भी उन्हें बैरक में रहने को कहा जाए. सेना की परेड राजपथ पर ही देखने में अच्छी लगती है, अगर उसे आपके घर के सामने बैठा दिया जाए तो ज़ाहिर है, आपको अच्छा नहीं लगेगा. कश्मीर एक राजनीतिक मसला है, इसका हल भी राजनीतिक ही होना चाहिए. पीपुल्स टू पीपुल्स डायलॉग शुरू किया जाना चाहिए.

(लेखक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव हैं)

2 comments

  • मिश्र और ट्युनिसिया या किसी भी अरब देश से भारत और यहाँ के शासन तंत्र की तुलना करना मेरे विचार से एक तरह से वकवास के सिवा और कुछ भी नहीं.भारत की जनता इतना जागरूक तो है ही की किसी भी पार्टी को अगले चुनाव में शिकस्त दे सकती है(और यहाँ की व्यवस्था में अगला चुनाव ज्यादा से ज्यादा पांच साल दूर रहता है) बशर्ते कि समुचित विकल्प मौजूद हो.बहुत दिन नहीं हुए जब इंदिरा गाँधी जैसा मजबूत व्यक्तित्व भी जनता के आगे घुटने टेकने पर मजबूर हुआ था.यह दूसरी बात है की विकल्प के बिखराव स्वरूपं उसी जनता ने उन्हें पुनः स्थापित भी कर दिया था.भारत में कोई भी तब तक ही तानाशाही कर सकता है जब तक जनता चाहे या जब तक समुचित विकल्प सामने नहीं आये.पश्चिम बंगाल में वाम पंथियों की तानाशाही अभी तक चल रही है क्योंकि जनता उनके डर से उनका समर्थन करती रही है,और साथ साथ समुचित विकल्प का भी अभाव रहा है.भारत स्तर पर जनता का विश्वास जीतना और सत्ता बदलना थोडा कठिन अवश्य है,क्योकि एक तो विपक्ष बिखरा हुआ है और दूसरे कोई भी ऐसा नेतृत्व सामने नहीं है जो जनता का विश्वास प्राप्त कर सके.तीसरा कारण यह भी है कि विकल्प भी बार बार विश्वासघाती सिद्ध हुआ है.मिश्र या अन्य अरब / अफ्रीकी देशों से भारत के स्थिति की तुलना करना कम से कम ए.वि.वर्द्धन जैसे अनुभवी राजनीतिज्ञ को तो शोभा नहीं ही देता,क्योंकि ऐसे वकवास कि उम्मीद कम से कम इन लोगों से तो नहीं ही क़ी जाती.

  • कॉम ऐ वी वर्धन से निवेदन है कि भारतीय जन -गण कि आकांक्षाओं के अनुरूप मौजूदा लोकतान्त्रिक व्यवस्था में वाम की एतिहासिक भूमिका के लिए अद्द्तन रिपोर्ट जारी करें ;यह वामपंथ की संयुक्त विमर्श के रूप में भारत की मौजूदा चुनौतियों के मद्द्ये नजर और अन्तर राष्ट्रीय परिदृश्य के परिप्रेक्ष्य में तात्कालिक कदम के रूप में होना चाहिए .अन्यथा वाम पंथ के रूप में देश के सर्वहारा वर्ग को भारी छति होने से कोई नहीं रोक सकेगा . सी पी आई ,सी पी एम् तथा तीसरे मोर्चे के घटक दलों को भी विश्वाश में लिया जाये .

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