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नक्सली बनाम भारतीय राज्य व्यवस्था
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नक्सली बनाम भारतीय राज्य व्यवस्था

आप बसें जलाएं, सार्वजनिक संस्थानों को क्षति पहुंचाएं, दुकानदारों की दुकान लूट लें, मज़दूरों की रोज़ी-रोटी पर लात मार दें, क़ानून-व्यवस्था का पालन करने वाले सामान्य नागरिकों का जीवन अस्त-व्यस्त कर दें और पुलिस वालों का जीवन संकट में डाल दें, लेकिन डरने की कोई बात नहीं. आपको कोई सज़ा नहीं मिलेगी. आपको क़ानून के लंबे हाथों से बचाने के लिए कांग्रेस, जो केंद्र और आंध्र दोनों में ही सत्तासीन है, के ही कुछ सांसद आ जाएंगे. मुख्यमंत्री भी आपके साथ खड़े नज़र आएंगे. न्याय व्यवस्था भाड़ में जाए, लेकिन कम से कम तेलुगुदेशम पार्टी और तेलंगाना राष्ट्र समिति के पास वोट तो न जाएं. क्या कांग्रेस ने सारी शर्म-ओ-हया त्याग दी है, क्या सारी कर्तव्यनिष्ठा को ताक पर रख दिया गया है? अब पुलिस वाले जब दंगाइयों से रूबरू होंगे तो क्या कर पाएंगे? राजनीतिक पार्टियां छात्रसंघों को बड़े नाज़ से पोषित करती हैं. छात्रनेताओं को शुरू से ही क़ानून की अवहेलना करना सिखाया जाता है, ताकि वे भविष्य में जब बड़े नेता बनें तो ऐसा ही करते रहें. कांग्रेस अपनी आंध्र इकाई की बाग़डोर खो चुकी है और इसी कारण वह प्रदेश में अपने हर कर्तव्य को भी तिलांजलि दे चुकी है. यहां तक कि क़ानून- व्यवस्था बनाए रखने के कर्तव्य को भी.

बिनायक एक अच्छे व्यक्ति हैं, लेकिन उन्हें कोर्ट में पेश करने से पहले छत्तीसगढ़ पुलिस ने उनके साथ बहुत दुर्व्यवहार किया. बहुत सारे लोग, जो उनकी रहनुमाई कर रहे हैं, वे ऐसे लोग हैं जो नक्सली हिंसा को भी ठीक मानते हैं. इन लोगों के अनुसार, राज्य ने आदिवासियों का साथ छोड़ दिया है और उन्हीं आदिवासियों की समस्याओं को लेकर नक्सली आगे बढ़ रहे हैं. इसीलिए भले ही नक्सल आंदोलन अवैधानिक हो, लेकिन उचित है.

राजस्थान में भी कांग्रेस की कमोबेश यही हालत है. गूजरों ने हाहाकार मचा रखा है. वे रेल और सड़क आवागमन को बाधित कर देते हैं और बजाय इसके कि यह व्यवस्था ठीक की जाए, कांग्रेस के एक मंत्री वहां पहुंच कर गूजरों से माफ़ी मांगते हैं, पर गूजर टस से मस नहीं होते. और हों भी क्यों? उन्हें पता है कि उद्दंडता से काम होते हैं. अगर वे अपना काम कराना चाहते हैं तो वे कुछ बसें और रेल कोच जला देंगे. कांग्रेस राज में बवाल की राजनीतिक महत्ता है. अब इसके विपरीत हमें बिनायक सेन का मामला देखना चाहिए. उन्हें देशद्रोह के आरोप में आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई है. उनके विरुद्ध पाए गए सबूत शायद कमज़ोर हैं. मैं इस बारे में बहुत अधिक नहीं कह सकता, पर यह बात तो साफ़ है कि बिनायक सेन के विरुद्ध कोई हिंसा का मामला न तो बनता है और न दर्ज किया गया है. उन पर आरोप है कि उन्होंने नक्सल नेताओं से जेल में मिलने जाकर और चिट्ठियां इधर से उधर करके नक्सली हिंसा को बढ़ावा दिया. लेकिन सोचने वाली बात यह है कि ममता बनर्जी ने भी तो खुलेआम नक्सलवादियों का साथ दिया, पर उनके विरुद्ध शायद यह मामला नहीं बनता. दरअसल वह उस कांग्रेस की छत्रछाया में हैं, जिसके लिए सब चलता है.

क़ानून-व्यवस्था के लिए आवश्यक है कि राज करने वाले एक तरीक़े से काम करें. और इसीलिए जो भी बिनायक सेन के साथ हो रहा है, मुझे उस पर कोई अचंभा नहीं होता. वह निर्दोष हो सकते हैं, लेकिन ऐसा पूर्वाभास उचित नहीं है. एक और अपील के तहत क़ानूनी कार्यवाही ही यह तय कर पाएगी. बात यह है कि यदि आपने कुछ ग़लत किया है तो उसका निर्णय न्यायालय में होना चाहिए, लेकिन इसके विपरीत कुछ प्रगतिशील लोग ऐसा नहीं मानते. ये सारे लोग बिनायक सेन के साथ राजनीतिक सहानुभूति रखते हैं. बिनायक एक अच्छे व्यक्ति हैं, लेकिन उन्हें कोर्ट में पेश करने से पहले छत्तीसगढ़ पुलिस ने उनके साथ बहुत दुर्व्यवहार किया. बहुत सारे लोग, जो उनकी रहनुमाई कर रहे हैं, वे ऐसे लोग हैं जो नक्सली हिंसा को भी ठीक मानते हैं. इन लोगों के अनुसार, राज्य ने आदिवासियों का साथ छोड़ दिया है और उन्हीं आदिवासियों की समस्याओं को लेकर नक्सली आगे बढ़ रहे हैं. इसीलिए भले ही नक्सल आंदोलन अवैधानिक हो, लेकिन उचित है. ऐसा मानना या तो पूंजीवाद के विरोध के नाम पर है या फिर संपत्तिजीवियों के विरोध के नाम पर. इस तर्ज़ पर बहस की जाए तो बिनायक सेन भले ही क़ानून की दृष्टि में अपराधी हों, उन्हें स्वतंत्रता आंदोलनकारी मानना चाहिए और इस कारण उन्हें बरी कर देना चाहिए. और इसी दृष्टिकोण पर हमें प्रश्नवाचक लगाना होगा. बिनायक सेन को अपील करने का पूरा अधिकार है. उनके मूल अधिकारों का हनन हुआ है और उन्हें कोर्ट जाने का पूरा हक़ है. लेकिन यह याद रखा जाना चाहिए कि अपील का अधिकार और मूल अधिकारों की सुरक्षा संपत्तिजीवी पूंजीवादी भारतीय राज्य व्यवस्था द्वारा ही प्रदत्त है. अगर आप इस राज्य को न्यायसंगत नहीं मानते तो आपको इसके द्वारा दी गईं सहूलियतों को भी नहीं लेना चाहिए. नक्सली होकर पूंजीवादी राज्य द्वारा दी गई क़ानून व्यवस्था की गुहार लगाना, जो एक संपत्तिजीवी संस्थान है, ठीक नहीं है. ऐसी दोहरी मानसिकता का समर्थक होना चौ एनलाई का कारगर मूर्ख होना ही है. बिनायक सेन को अपील करने दें और उन्हें अपने आपको निर्दोष साबित करने दें. यही भारतीय राज्य व्यवस्था को सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी.

1 comment

  • बहुत विन्रमता के साथ कहना चाहुंगा की लेखक को पहले भादस की धारा १२४ ए पर एक नजर डालना चाहिये था . इसके अनुसार भारत का हर वह व्यक्ति जो सरकार के जन विरोधी कदम के खिलाफ आवाज उठाता है , देश के खिलाफ जंग का दोषी है . रही बात न्यायालयों की तो पचास प्रतिशत से ज्यादा कैदी जो जेल में आजीवन कारावास की सजा काट रहे हैं , या काट चुके हैं , निर्दोष हैं या थें . यह गप्पबाजी नहीं है , साबित करने योग्य साक्ष्यों के साथ कह रहा हुं. भूल जायं न्यायपालिका को , सड़ चुकी है , एक और बात मुझे भी साम्यवादी मानने कीं भूल न करेंगे , साम्यवाद को एक ठहरी हुई विचारधारा मानता हुं जो कभी भी नई चीजों या बदलाव का स्वागत नहीं करती और कुछ हद तक भाजपा के हिम्दुवादी कट्टर विचारधारा से बुरी बल्कि बहुत बुरी विचारधारा है साम्यवाद की .

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