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पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव : लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल
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पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव : लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल

पांच राज्यों चुनाव की तारीख़ें तय हो गई हैं. भाजपा और कांग्रेस समेत सभी पार्टियां इन राज्यों की सत्ता हथियाने के लिए ज़ोर लगा रही हैं, क्योंकि ये चुनाव लोकसभा चुनाव के ठीक पहले होने जा रहे हैं, जो एक तरह से लोकसभा चुनाव पूर्वपीठिका भी साबित होंगे. पांचों राज्यों में राजस्थान, छत्तीसगढ और मध्य प्रदेश में मुकाबला सीधा कांग्रेस और भाजपा के बीच है तो दिल्ली और मिजोरम में अन्य दल भी प्रमुख भूमिका में नजर आ रहे हैं. पांचों राज्यों के चुनावी माहौल की प़डताल करती एक रिपोर्ट-

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पाँच राज्यों में चुनावों की तिथियों की घोषणा हो गई है. चूंकि अगले वर्ष लोकसभा चुनाव भी होने हैं, इसलिए इन चुनावों को सभी राजनीतिक दल सेमीफाइनल के तौर पर ले रहे हैं. भारतीय जनता पार्टी ने तो घोषणा भी कर दी है कि 2013 में पांच प्रदेश 2014 में पूरा देश. कांग्रेस के लिए यह चुनाव प्रतिष्ठा का विषय इसलिए भी है, क्योंकि उन्हें अपने युवराज में ही पार्टी का भविष्य खोजना है, इसलिए ये चुनाव कांग्रेस पार्टी के लिए एक इन्वेस्टमेंट के तौर पर हैं. यही वजह है कि यह मौजूं वक्त है कि जब इस बात की पड़ताल की जाए कि किन राज्यों में फिलहाल हवा किसके पक्ष में जाती हुई दिख रही है.

राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, दिल्ली और मिजोरम इन पांचों राज्यों पर गौर किया जाए तो कुछ हद तक मिजोरम को छोड़कर बाकी चारों राज्य ऐसे हैं जो दिल्ली तक पहुंचने का रास्ता तय करते हैं. इस क्रम में सबसे पहले बात करते हैं राजस्थान की. एक आम मतदाता या आम समझ वाले व्यक्ति के नज़रिये से देखें और जैसा कि चुनावी सर्वेक्षण और राजनीतिक विश्‍लेषक बता रहे हैं कि राजस्थान का राज इस बार कांग्रेस के हाथ से निकलकर भाजपा के पाले में जाता दिख रहा है. लेकिन जैसे चुनाव नजदीक आता जा रहा है, इस कयास के विरोध में भी स्वर उठने लगे हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह है कि पिछले कुछ महीनों में कांग्रेस ने हर स्तर पर रूठे हुए मतदाताओं को फिर से अपनी तरफ लाने की कोशिशें शुरू कर दी हैं. अब स्थिति यह है कि वसुंधरा राजे की राह जितनी आसान बताई जा रही है, वह उतनी भी आसान नहीं है. पिछले एक साल में अशोक गहलोत की अगुआई वाली सरकार ने एक-एक कर कई लोकलुभावन योजनाएं शुरू की हैं, जिन्होंने चुनाव को कांटे की टक्कर में तब्दील कर दिया है. इन योजनाओं के चलते अब राजस्थान में यह बात होने लगी है कि अगर कांग्रेस ने टिकट बंटवारा ठीक से किया और भाजपा ने टिकट बंटवारे में गलतियां कीं तो गहलोत की वापसी हो सकती है. हालांकि, जब तक दोनों दलों की तरफ से चुनावी अखाड़े में उतरने वाले उम्मीदवारों का नाम सामने नहीं आ जाता, तब तक स्पष्ट तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता.

वास्तव में देखा जाए तो यह चुनाव भाजपा से अधिक कांग्रेस के लिए चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि कांग्रेस के सामने यह बात तो स्पष्ट है कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा दोबारा सत्ता में आ रही है. हो सकता है दिल्ली में कांग्रेस वापसी कर ले. इसलिए दो राज्यों में मानसिक रूप से विन-विन सिचुएशन कांग्रेस अपने लिए ज़रूर बनाना चाहेगी. ऐसा भी नहीं है कि भाजपा एकदम से बैकफुट पर चली जाएगी, लेकिन सत्तारू़ढ गहलोत सरकार ने एक के बाद एक लोक लुभावन योजनाओं की घोषणा शुरू कर दी है, इससे भाजपा की भी राह आसान नहीं होगी. वैसे भी राजस्थान की राजनीति पर गौर करें तो हमेशा से वहां दो दलीय व्यवस्था रही है, इसलिए ऐसे किसी चमत्कार की उम्मीद करना बेमानी होगा. और देखा जाए तो हर बार चुनाव में ऐसा माहौल बनता है कि प्रदेश में कोई तीसरी ताकत उभरने वाली है, लेकिन अगर आप राजस्थान की राजनीति की प़डताल करें तो किरो़डी लाल मीणा एक तीसरी ताक़त के रूप में उभर रहे हैं. मीणा फिलहाल राष्ट्रीय जनता पार्टी में हैं, जिसका गठन कांग्रेस से अलग होने के बाद पीए संगमा ने किया था. किरोड़ी लाल मीणा इसी पार्टी में रहकर राजस्थान में एक ऐसा गठबंधन बनाने की कोशिश कर रहे हैं जो भाजपा और कांग्रेस दोनों को चुनौती दे. राष्ट्रीय जनता पार्टी फिलहाल प्रदेश की 150 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने जा रही है और जनता दल यूनाइटेड, भाकपा और माकपा जैसी पार्टियों से गठबंधन की बातचीत भी चल रही है. अगर ऐसा माहौल बनता है कि गैरभाजपा और गैरकांग्रेसी दल एकजुट होकर चुनाव लड़ें तो इस प्रांत की राजनीति में कुछ फेरबदल हो सकता है. हालांकि किसी बड़े फेरबदल की उम्मीद नहीं की जा सकती, क्योंकि मीणा राजस्थान की अगड़ी जनजाति मीणा के नेता हैं, जिनका एक सीमित क्षेत्र में ही प्रभाव है.

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राजस्थान के बाद बात करते हैं छत्तीसगढ़ की. छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक बड़ा मशहूर जुमला तैर रहा है कि राज्य में कांग्रेस की विरोधी पार्टी कांग्रेस ही है और वही उसको हराएगी. आखिर इसकी वजह क्या है अपनी ही पार्टी विपक्षी पार्टी के तौर पर खड़ी हो गई है. पहले इसको समझते हैं. राज्य का गठन होने के बाद ही विधायकों की संख्या बल के आधार पर छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार बन गई. आदिवासी बहुल इलाका और आदिवासी राजनीति पर ज़ोर देने के कारण आदिवासी नेता अजीत जोगी राज्य के पहले मुख्यमंत्री बन गए. अजीत जोगी ने तीन साल तक प्रदेश को जस का तस बनाए रखा और जब 2003 में चुनाव हुए तो भाजपा की रमन सरकार सत्ता में आई. रमन सिंह ने प्रांत को विकास की धारा से जोड़ा, हालांकि रमन का सिंह यह विकास भी मोदी के विकास की तरह शहरी इलाकों तक सीमित रहा. यही वजह है कि 2007 के चुनाव में कांग्रेस ने एक बार राज्य में खुद को स्थापित किया, लेकिन बहुमत भाजपा को ही हासिल हुआ.

लगातार दो बार सत्ता से दूर रहने के कारण पार्टी के भीतर असंतोष जन्म लेने लगा और प्रदेश में कांग्रेस दो खेमों में बंट गई. एक खेमे ने अजीत जोगी को अपना नेता माना और एक ने चरणदास महंत को. इस असंतोष ने धीरे-धीरे भितरघात का रूप ले लिया. इस चुनाव की तैयारियों की दौरान कई ऐसे वाक़ये हुए जब दोनों खेमों के लोगों ने एक-दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश की. इसी बीच कांग्रेस आलाकमान ने प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी चरणदास महंत को सौंप दी. इससे जोगी खेमा बेहद नाराज़ है और सूत्र तो यहां तक कहते हैं कि जोगी अपनी पार्टी बना सकते हैं. लेकिन इतना तो तय है कि कांग्रेस अपनी  स्थिति को बेहतर बनाना चाहती है तो अजीत जोगी को मनाना ही होगा. क्योंकि जोगी एक अदिवासी जननेता हैं और अदिवासी बहुल इलाकों में उनकी पकड़ बेहद मज़बूत है. अगर जोगी कोई और राह पकड़ लेते हैं तो इसका सीधा नुकसान कांग्रेस को होगा. क्योंकि अदिवासी बहुल इलाकों में आज भी जोगी की तूती बोलती है. अब कांग्रेस आलाकमान एक बार फिर से राज्य में डैमेज कंट्रोल कर रहा है और इसका हथियार बनाया है नई-नई घोषणाओं को. कांग्रेस के घोषणापत्र में किसान, आदिवासी, अनुसूचित जाति, अल्पसंख्यक व पिछड़ा वर्ग के साथ-साथ सामान्य वर्ग को भी रिझाने की भरपूर कोशिशें होंगी. उधर भाजपा ने जीत की हैट्रिक बनाने के लिए 3-4 माह पहले से ही सरकारी खजाना खोल दिया है. साइकिल, सिलाई मशीन, धान बोनस, लैपटॉप, टैबलेट से लेकर बहुत कुछ बांटे जा रहे हैं.

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इसी क्रम में बात करते हैं राजधानी दिल्ली की. दिल्ली में होने वाली राजनीतिक हार या जीत के प्रतीकात्मक तौर पर गहरे अर्थ होते हैं. दिल्ली का राजनीतिक माहौल पूरे देश को प्रभावित करता है, इसलिए देश भर की निगाहें दिल्ली की ओर हैं. दिल्ली का चुनाव इस बार एक मायने में और महत्वूर्ण है, क्योंकि आप पार्टी की राजनीतिक दिशा इसी चुनाव से तय होने वाली है. और जिस तरह के चुनाव पूर्व सर्वेक्षण आए हैं उनमें तो सबको चौंकाते हुए आप पार्टी को अप्रत्याशित सफलता दी है. हालांकि यह अभी तक अस्पष्ट है कि इस बार तीसरी पार्टी के आने का क्या असर होगा, किसके वोट किसके पास जाएंगे और स्विंग के कारण सीटों पर क्या फ़़र्क पड़ेगा. हालांकि, कांग्रेस पार्टी के लोग यह कह रहे हैं कि आप पार्टी के लाइम लाइट में आने का फायदा कांग्रेस को मिलेगा, क्योंकि कांग्रेस के दोषों को आप पार्टी ने दूर कर दिया और वह भाजपा के वोट काटेगी.

मुद्दों के आधार पर देखें तो दिल्ली विधानसभा चुनाव में महंगाई और भ्रष्टाचार सबसे बड़ा मुद्दा रहेगा. इसके अलावा महिलाओं की सुरक्षा व दिल्ली के अन्य स्थानीय मुद्दे जैसे बिजली-पानी भी प्रमुख मुद्दा बनेंगे. हालांकि कांग्रेस महंगाई को अपनी नाकामी नहीं वैश्‍विक स्तर पर बढ़ी महंगाई को इसका ज़िम्मेदार मान रही है. महंगाई को रोकने का कोई स्पष्ट खाका तो भाजपा के पास भी नहीं है, लेकिन वे इस मुद्दे पर कांग्रेस को घेरने की कोशिश कर रहे हैं. भ्रष्टाचार आप पार्टी के लिए सबसे बड़ा मुद्दा है और वह इसको महंगाई से जोड़कर देख रहे हैं. भ्रष्टाचार के मुद्दे पर पार्टी कांग्रेस के साथ-साथ भाजपा को भी लपेट रहे हैं. वह भाजपा शासित दिल्ली नगर निगम में भी भ्रष्टाचार को मुद्दा बना रहे हैं.

एक और मसला है दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने का. लेकिन यह इतना आसान दिखता नहीं और कई बार लगता है कि भाजपा इस मुद्दे को ज़बरदस्ती उछाल रही है क्योंकि किसी भी बड़े मतदाता वर्ग का हित इससे जुड़ा नहीं है. फौरी तौर पर तो सबसे बड़ा मुद्दा बिजली का है जिसकी दरों को कम करने के लिए आप और भाजपा में प्रतिस्पर्धा चल रही है. दिल्ली में निचले तबके की आबादी के लिए पानी एक बड़ा मुद्दा है. फ़िलहाल चुनावी मुद्दे के तौर पर इसे केवल आम आदमी पार्टी ही मुद्दा बना रही है. एक और बड़ा मुद्दा है अनधिकृत कॉलोनियों का. सरकार के दावों के बावजूद सैकड़ों कॉलोनियां नियमित नहीं हो पाई हैं. इन सभी दावों के बीच दिल्ली की तस्वीर अन्य चार राज्यों के मुक़ाबले काफ़ी धुंधली है. इसलिए इस बार अभी तक दिल्ली की गद्दी पर कौन बैठेगा, फिलहाल कह पाना मुश्किल है.

मध्य प्रदेश की बात करें तो वहां पर चुनावी विश्‍लेषक यह तय मान रहे हैं कि राज्य में शिवराज सिंह चौहान तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं. हालांकि उनके समक्ष पिछले चुनावों की तरह कोई ताक़तवर विपक्ष तो नहीं है, लेकिन कांग्रेस पार्टी ने शिवराज सिंह के ख़िलाफ़ ज्योतिरादित्य सिंधिया को मैदान में उतारकर पार्टी के एक उम्मीद ज़रूर पैदा की है. वास्तव में कमोबेश ये सहूलियतें हीं शिवराज की मुश्किल भी हैं.

गुजरात के मुख्यमंत्री के नरेंद्र मोदी को भाजपा ने आगामी लोकसभा चुनावों के लिए प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया है, लेकिन पार्टी के भीतर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को अब भी उनके लिए अहम चुनौती माना जा रहा है. शिवराज के नेतृत्व में भाजपा तीसरी बार मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव जीतने में कामयाब रहती हैं तो नरेंद्र मोदी के लिए चुनौती और बढ़ेगी, लेकिन वे हारते हैं तो ये न केवल कांग्रेस को एकजुट होने का मौका देगा, बल्कि उमा भारती जैसे उनके धुर विरोधी मध्य प्रदेश की राजनीति में तेजी से वर्चस्वशाली हो जाएंगे.

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मध्य प्रदेश में कांग्रेस में आंतरिक बिखराव और गुटबाज़ी के चलते बीजेपी कुछ सालों से फीलगुड में डूबी हुई है. कांग्रेस मध्य प्रदेश में विधानसभा का चुनाव एक व्यक्ति नहीं, बल्कि टीम के बूते लड़ने के मूड में हैं. इसने चुनाव के पूर्व सीएम के नाम का ऐलान नहीं करने की अपनी परंपरा कायम रखी और वन मैन आर्मी वाली रणनीति अ़िख्तयार नहीं की. कांग्रेस ने दिग्विजय सिंह को किनारे कर ज्योतिरादित्य सिंधिया पर भरोसा किया है. सिंधिया के आने के बाद कांगे्रस के कार्यकर्ताओं में कुछ उत्साह ज़रूर ब़ढा है इसीलिए अब यह चुनाव दो पार्टियों के बीच न होकर ब्रांड शिवराज बनाम ब्रांड सिंधिया बन गया है. वास्तव में मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह पूरी तरह से नरेंद्र मोदी को ही फॉलो कर रहे हैं. मोदी की ही तरह वे इमेज बिल्डिंग पर ज़ोर दे रहे हैं. यही वजह है कि नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह लोकायुक्त के सम्मुख इस आशय की शिकायत दर्ज करा चुके हैं कि सीएम शिवराज ने तीन माह में खुद की ब्रांडिंग पर 500 करोड़ रुपये ख़र्च किए हैं. बावजूद इसके कांग्रेस पार्टी के भीतर का विखराव भाजपा के लिए फायदेमंद साबित होगा. हां इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि भाजपा सरकार ने बीते दस सालों में विकास की जो राह दिखाई है, उसका फायदा भी पार्टी को होता दिख रहा है.

मिजोरम में फिलहाल कांग्रेस की सरकार है. हालांकि हर राज्यों में मौजूदा सरकार के प्रति एंटी इनकमबैंसी तो होती ही है, लेकिन मिजोरम में कांग्रेस को हराने के लिए सभी राजनीतिक दल एकजुट हो गए हैं. राज्य के क्षेत्रीय दल मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) और मिजोरम पीपुल्स कॉन्फ्रेंस (एमपीसी) का चुनावी एजेंडा भ्रष्टाचार मुक्त सरकार बनाना है. एमएनएफ-एमपीसी ने लोगों से आह्वान किया कि एक साफ छवि की सरकार देने के लिए वे प्रतिबद्ध हैं. अलगाववाद भी एक मुद्दा मिजोरम के चुनावों में उभर कर आ रहा है. यही वजह है कि मिजो नेशनल फ्रंट, मिजो राष्ट्रवाद को ज्यादा तवज्जो दे रहा है. एमएनएफ ग्रेटर मिजोरम के गठन की मांग को चुनावी मुद्दा बना रहा है. दूसरी ओर एमपीसी ने दस चुनावी बिंदुओं को केंद्र में रखा है, जो राज्य के विकास पर केंद्रित है.

भारतीय जनता पार्टी का कोई भी उम्मीदवार पिछले विधानसभा चुनावों में जीत नहीं पाया था. हालांकि ऐसा तो नहीं कहा जा सकता कि भाजपा के लिए राज्य में इस बार के चुनाव बड़ी उम्मीद लेकर आएंगे, लेकिन मोदी के भरोसे राज्य भारतीय जनता पार्टी इकाई किसी चमत्कार की उम्मीद में जरूर है. चुनावी फेरबदल की बात करें तो इस पिछले 10 वर्षों से सत्ता में काबिज कांग्रेस पार्टी के लिए इस बार खतरा है. 1998 में जिस एमएनएफ-एमपीसी के गठबंधन ने चुनाव जीता था वह अब फिर से सत्ता हथियाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रही है. दूसरा बड़ा बदलाव है मोदी के रूप में. यह जानकर ताज्जुब होता है कि पूर्वोत्तर के राज्यों में गांव-देहात तक मोदी का नाम पहुंच चुका है और लोग उन्हें बदलाव के प्रतीक के रूप में देख रहे हैं.

पिछले विधानसभा चुनावों में अधिकांश भारतीय राज्यों के चुनावी एजेंडे में भले ही पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन जैसे मुद्दों को प्राथमिकता नहीं मिलती है, लेकिन मिजोरम विधानसभा चुनाव के दौरान ये प्रमुख मुद्दे बन कर उभरे थे. बांस में आए फूल राज्य की सबसे बड़ी आर्थिक और पर्यावरणीय समस्या बने हुए थे, लेकिन इस बार भ्रष्टाचार बड़ा मुद्दा है और गैर सत्ताधारी पार्टियां यह मानकर बैठी हैं कि कांग्रेस ही इस भ्रष्टाचार की जड़ है.

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