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जन संवाद यात्रा : अब गांधी और मार्क्स नहीं, ज़मीन चाहिए

जन संवाद यात्रा : अब गांधी और मार्क्स नहीं, ज़मीन चाहिए

इस व़क्त देश में यात्राओं का दौर चल रहा है. मुद्दे तमाम हैं, भ्रष्टाचार से लेकर राजनीति तक, लेकिन इसमें समाज का वह अंतिम व्यक्ति कहां है जिसके उत्थान के लिए गांधी जी ने इस देश को एक ताबीज दिया था? जल, जंगल और ज़मीन पर वंचितों के अधिकार को लेकर शुरू की गई जन संवाद यात्रा से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर एकता परिषद के पी वी राजगोपाल से चौथी दुनिया के संवाददाता शशि शेखर ने विस्तार से बातचीत की. प्रस्तुत हैं मुख्य अंश:

यह देशव्यापी यात्रा शुरू करने के पीछे क्या मक़सद है, इससे आप क्या परिणाम निकालना चाहते हैं?

हम एक समग्र भूमि सुधार नीति चाहते हैं. भूमि सुधार का जो मामला है, वह अभी बीच में अटक गया है. तमाम भूमि कहीं सेज के नाम पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों को, कहीं अधिग्रहण के नाम पर बड़े-बड़े लोगों को दी जा रही है और गरीबों को भूमि देने का जो वादा है, उससे सरकार पीछे हट रही है. ग़रीबों से कहा जा रहा है कि अब भूमि नहीं है बांटने के लिए. सड़कें चौड़ी की जा रही हैं, एयरपोर्ट का विस्तार हो रहा है. हज़ारों-लाखों एकड़ ज़मीन माइनिंग कंपनियों को दी जा रही है. भूमि सुधार को लेकर सरकार जो लापरवाही बरत रही है, उससे ग़रीबी बढ़ रही है, लोग पलायन करने के लिए मजबूर हो रहे हैं और हिंसा बढ़ रही है. यह सब समाप्त करने के लिए हम चाहते हैं कि सरकार ग़रीबों के पक्ष में समग्र रूप से एक भूमि सुधार नीति लाए.

देश में कई लोग यात्रा शुरू कर चुके हैं और करने वाले हैं, जैसे आडवाणी, रामदेव, अन्ना हजारे. इनकी यात्रा से आपकी यात्रा किन मायनों में अलग है?

आज़ादी के समय गांधी जी ने इस देश को एक ताबीज दिया था. उसका अर्थ था कि जो कुछ भी करो, उसमें समाज के अंतिम व्यक्ति को नज़र में रखो. मुझे लगता है कि यात्राएं बहुत होंगी, बहुत सारी बातें होंगी, लेकिन हमारी यात्रा समाज के उस अंतिम व्यक्ति के लिए है, जिसे पिछले 65 सालों में अपना अधिकार नहीं मिला है, न्याय नहीं मिला है. लोगों के अंदर बहुत आक्रोश है. अभी तक मैं जहां-जहां घूमा, वहां लोग न गांधी सुनना चाहते हैं और न मार्क्स. वे कहते हैं कि इस नाम पर बात करके हमारे साथ बहुत धोखाधड़ी हुई. हमें चाहिए न्याय, हमें चाहिए ज़मीन. हमारा यह आंदोलन, यह यात्रा समाज के उसी अंतिम व्यक्ति को न्याय दिलाने के लिए है.

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यानी अंतिम व्यक्ति को न्याय दिलाने का मुद्दा ही इस यात्रा को अन्य यात्राओं से अलग करता है…

कुर्सी और अन्य मुद्दों के लिए रैलियां और यात्राएं होती रही हैं और अब तो भ्रष्टाचार को लेकर भी आंदोलन हो रहे हैं, लेकिन समाज के अंतिम व्यक्ति को न्याय मिले, इसे भी लेकर आवाज़ उठनी चाहिए इस देश में. यह नहीं हो पा रहा था. मुझे पैसा (रिश्वत) न देनी पड़े, यह तो अच्छी बात है, लेकिन मैं अगर सुख-संपन्नता से जीता हूं तो दूसरों को भी, पीछे छूटे हुए लोगों को भी कुछ मिलना चाहिए. इसके लिए हमने एक आंदोलन की ज़रूरत को महसूस किया, इसीलिए हमने इसे शुरू किया.

अन्य लोग जो अपनी यात्राएं शुरू कर चुके हैं या करने वाले हैं, क्या उनमें से किसी ने आपसे संपर्क किया? इस मुद्दे पर उनसे आपकी कोई बातचीत हुई?

मैंने सभी से बात की. मैंने अन्ना को चिट्ठी लिखी कि भ्रष्टाचार के विरोध में जो लड़ाई है, उसका अगला भाग यही है. जल, जंगल और ज़मीन में आम लोगों को भी उनका हिस्सा मिलना चाहिए. उस समय अन्ना हजारे सहमत भी थे कि यह स़िर्फ भ्रष्टाचार का मामला नहीं है. ग़रीब लोगों का मुद्दा भी सक्रियता से उठाना चाहिए. इस विषय पर बाबा रामदेव से भी मेरी बात हुई. उन्होंने आर्थिक क्रांति पर जो किताब लिखी है, उसमें भी वह मानते हैं कि जल, जंगल और ज़मीन का मुद्दा उठना चाहिए. इस देश को राजनीतिक आज़ादी तो मिल गई है, लेकिन सामाजिक-आर्थिक आजादी अभी भी नहीं मिली है. हमारा यह आंदोलन उसी सामाजिक-आर्थिक आज़ादी के लिए है.

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जब अन्ना हजारे और रामदेव आपके मुद्दों का समर्थन कर रहे हैं तो क्या वे आपकी इस यात्रा में भी शामिल होंगे?

अन्ना के आंदोलन का पहला चरण खत्म होने के बाद एक चर्चा हुई थी कि भ्रष्टाचार के इस आंदोलन को और व्यापक बनाना है. इसमें जल, जंगल और ज़मीन का मुद्दा भी जोड़ना है. इस पर एक एग्रीमेंट हुआ था. मुझे लगता है कि थ्योरिटकली सब एक साथ हैं, लेकिन वे लोग दिसंबर तक भ्रष्टाचार (जन लोकपाल) के मुद्दे पर ही जोर देना चाहते हैं. जबकि मैं मानता हूं कि जल, जंगल और ज़मीन का मुद्दा इस आंदोलन की वजह से शिथिल न हो. दिसंबर में जब बिल पारित होगा, तब शायद अन्ना के पास इस आंदोलन से जुड़ने का समय होगा.

एकता परिषद के लोग कई बार दिल्ली आकर शांतिपूर्ण धरना-प्रदर्शन कर चुके हैं. क्या वजह है कि सरकार ने अब तक आपकी मांगें नहीं मानी?

अभी जैसे ही हमने 2 अक्टूबर को अपनी यात्रा शुरू की, वैसे ही प्रधानमंत्री कार्यालय से चिट्ठी आ गई कि 28 अक्टूबर को नेशनल लैंड रिफॉर्म्स काउंसिल की बैठक बुलाई जा रही है. मुझे लगता है कि जो प्रधानमंत्री कार्यालय तीन साल से सोया हुआ था, वह एक लाख लोगों के साथ दिल्ली आने की हमारी घोषणा पर अमल होते देखकर जाग गया है. मार्च में जब मैं अन्ना हजारे के साथ प्रधानमंत्री से मिला था तो मैंने उन्हें याद दिलाया था कि अगर आप नेशनल लैंड रिफॉर्म्स काउंसिल की बैठक नहीं बुलाएंगे तो हमारे पास आंदोलन तेज़ करने के अलावा और कोई चारा नहीं बचेगा. हालांकि उसके बाद एंटी करप्शन मूवमेंट (अन्ना आंदोलन) ने पूरे माहौल को अपने हाथ में ले लिया था. मुझे लगता है कि अब वह जल्दी-जल्दी कुछ करेंगे.

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इस यात्रा के ज़रिए आप सरकार को क्या संदेश देना चाहते हैं?

हमें एक कंप्रेहेंसिव लैंड रिफॉर्म्स पॉलिसी तो चाहिए ही चाहिए. आप यह कहकर टाल नहीं सकते कि ज़मीन स्टेट का सब्जेक्ट है, क्योंकि भूमि अधिग्रहण क़ानून और सेज क़ानून आपके हैं. केंद्रीय क़ानूनों से आप ज़मीनें हड़प रहे हैं. हम कह रहे हैं कि आप एक पॉलिसी बनाओ. यह मालूम करो कि कितनी ज़मीन है, किस विभाग को कितनी ज़मीन देनी है और ग़रीबी उन्मूलन के लिए कितनी ज़मीन उपलब्ध कराई जाए. सरकार ताक़तवर लोगों को ज़मीन देने और उनकी ज़मीन बचाने में जो ताक़त लगा रही है, उसमें से अगर वह दस प्रतिशत भी ताक़त इधर लगा दे तो ग़रीबों को ज़मीन मिल सकती है.

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