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रूस : पुतिन की वापसी

रूस की जनता ने ब्लादिमीर पुतिन को अपना राष्ट्रपति चुना है. विगत चार मार्च को रूस में राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव कराए गए, जिसमें पुतिन को लगभग 64 फीसदी मत मिले. उनके विरोधियों में से किसी ने बीस प्रतिशत मत नहीं पाए. कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार गेन्नादी ज्युगानोव को लगभग 18 फीसदी मत मिले, जबकि अन्य उम्मीदवार दहाई के अंक तक नहीं पहुंच सके. रूस के एक बड़े उद्योगपति मिखाइल प्रोखोरोव को लगभग 7.9 फीसदी मत मिले. लिबरल-डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता व्लादीमिर झिरिनोव्सकी को क़रीब 6.24 फीसदी और न्यायशील रूस पार्टी के सर्गेई मिरोनोव को 3.8 फीसदी मत मिले. चुनाव परिणाम पुतिन के पक्ष में रहे और उन्हें तीसरी बार राष्ट्रपति बनने का मौक़ा मिला. हालांकि उनके विरोधियों ने उन पर चुनाव में धांधली के आरोप लगाए हैं, लेकिन इस पर विश्वास नहीं किया जा सकता. उनके कुछ विरोधियों ने कहा है कि मतदाताओं को बसों में भरकर लाया गया. एक मतदाता ने कई-कई बार मतदान किया. वहीं इस चुनाव पर नज़र रखने के लिए आए विदेशी पर्यवेक्षकों ने चुनाव को निष्पक्ष बताया. ग़ौरतलब है कि राष्ट्रपति चुनाव पर नज़र रखने के लिए विभिन्न संगठनों के लगभग 670 प्रतिनिधि रूस आए थे, जिनमें यूरोपीय सुरक्षा एवं सहयोग संगठन के 219, स्वाधीन राज्य मंडल के 231, स्वाधीन राज्य मंडल की अंतरसंसदीय असेंबली के 44, यूरोपीय काउंसिल के 37 प्रतिनिधि एवं शंघाई सहयोग संगठन के 12 प्रतिनिधि शामिल थे. स्वाधीन राज्य मंडल की अंतरसंसदीय असेंबली के पर्यवेक्षकों ने कहा है कि चुनाव में कोई गंभीर उल्लंघन नहीं दिखाई पड़ा. इस पर्यवेक्षक दल के समन्वयक वादिम पोपोव ने कहा कि 11 क्षेत्रों के 350 मतदान केंद्रों का पर्यवेक्षक दल ने दौरा किया, लेकिन कुछ तकनीकी कमियों के अलावा किसी तरह की बड़ी गड़बड़ी का कोई सबूत नहीं मिला है. ऐसी तकनीकी गड़बड़ियों से मतदाताओं पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता. सर्बिया के पर्यवेक्षक ने कहा कि सभी देशों को रूस के इस चुनाव से प्रेरणा लेनी चाहिए. इटली के प्रतिनिधि ने इस चुनाव को कमाल का लोकतांत्रिक चुनाव बताया. हंगरी के प्रतिनिधि ने यूरोपीय संसद को सलाह देते हुए कहा कि वह अपने संसदीय चुनाव में उन तकनीकों एवं उपायों का उपयोग करे, जैसा कि रूस के राष्ट्रपति चुनाव में अपनाया गया है. फिनलैंड के मानवाधिकार कार्यकर्ता आयोन हेल्विग का कहना था कि रूस को बदनाम करने का अभियान असफल हो गया है. योहन बेर्कमन ने पश्चिमी मीडिया को आड़े हाथों लिया. उन्होंने कहा कि जिस तरह पश्चिमी मीडिया ने रूस के चुनाव में गड़बड़ी की ख़बरें चलाईं, पर्यवेक्षकों ने स्थिति उससे बिल्कुल उल्टी पाई.

ग़ौरतलब है कि रूस में हुए राष्ट्रपति चुनाव में काफी सावधानी बरती गई थी. मतदान के लिए बनाए गए 95,000 मतदान केंद्रों पर वेब कैमरे लगाए गए थे. कैमरों को मतपेटियों पर केंद्रित किया गया था, ताकि किसी तरह की गड़बड़ी न हो. हालांकि इतना होने के बावजूद मतदान में गड़बड़ी के आरोप विपक्षियों ने लगाए हैं, लेकिन विदेशी पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट के बाद ऐसे आरोपों का कोई वजन नहीं रह जाता. बीते दिसंबर माह में हुए संसदीय चुनाव में पुतिन पर गड़बड़ी के आरोप लगाए गए थे. पश्चिमी मीडिया ने इसे बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया था. अमेरिका ने भी संसदीय चुनाव में गड़बड़ी के आरोप को ख़ूब उछाला था. रूस में भी पुतिन के विरोध में प्रदर्शन हुए थे और निष्पक्ष चुनाव कराने की मांग की गई थी, लेकिन इस चुनाव परिणाम और पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट से यही लगता है कि संसदीय चुनाव में धांधली के आरोप निराधार थे. परिणामों पर नज़र डालें तो भी यही लगता है. पुतिन के नेतृत्व वाली यूनाइटेड रसिया पार्टी को संसदीय चुनाव में 50.2 फीसदी मत मिले थे, जबकि कम्युनिस्ट पार्टी को 19.12 फीसदी और जस्ट रसिया पार्टी को 13.3 फीसदी मत मिले थे. राष्ट्रपति के चुनाव में भी कम्युनिस्ट नेता को 18 फीसदी मत मिले. इससे तो यही लगता है कि चुनाव में उस समय भी कोई ऐसी धांधली नहीं हुई थी, जिसे मुद्दा बनाया जा सके. यह पुतिन की लोकप्रियता कम करने और उन्हें बदनाम करने की साजिश थी. पश्चिमी देशों ने पुतिन पर चुनाव में धांधली का आरोप लगाना शुरू किया और मीडिया ने भी उन्हीं का साथ दिया. विरोधियों ने अपने समर्थकों से पुतिन विरोधी प्रदर्शन कराए और यह दिखाने की कोशिश की कि पुतिन लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं. राष्ट्रपति चुनाव से कुछ दिनों पहले भी पुतिन विरोधी प्रदर्शन किए गए थे और 34 किलोमीटर लंबी मानव श्र्ंखला बनाई गई थी, लेकिन अब लगता है कि रूस में पुतिन विरोधी प्रदर्शन का आधार समस्या नहीं थी, बल्कि विपक्षी दलों ने अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए उक्त प्रदर्शन कराए थे. चुनाव से कुछ दिनों पहले पुतिन को मारने की साजिश का पर्दाफाश किया गया था. सच्चाई क्या है, यह तो कहना मुश्किल है, लेकिन रूस के ख़ु़फिया विभाग ने तो यही जानकारी दी कि पुतिन को मारने की साजिश की जा रही थी. जिन लोगों को पकड़ा गया, उनके पास पुतिन के काफिले का एक वीडियो भी मिला.

पुतिन को 64 फीसदी मत मिले हैं, जबकि संसदीय चुनाव में उनके दल को 50.2 फीसदी मत मिले थे. संसदीय चुनाव के बाद ऐसी अटकलें लगाई जा रही थीं कि राष्ट्रपति का चुनाव जीतना पुतिन के लिए कठिन हो सकता है, लेकिन विरोध प्रदर्शनों को यूरोपीय देशों और अमेरिका का सहयोग मिलना पुतिन के लिए फायदेमंद हो गया. पुतिन की छवि एक मज़बूत नेता की रही है. उन्होंने कई मौक़ों पर अमेरिका का विरोध किया है. अभी सीरिया के मुद्दे पर रूस ने वीटो किया था और अमेरिका के मंसूबे पर पानी फेर दिया था. ईरान के मामले में भी रूस अमेरिका का साथ नहीं दे रहा है. पुतिन बहुध्रुवीय विश्व की बात करते हैं और अमेरिका की सुपरमेसी का विरोध करते हैं. बीते चार महीनों के दौरान अमेरिका, उसके सहयोगी देशों एवं मीडिया ने पुतिन को बदनाम करने की कोशिश की, लेकिन रूस में उसका उल्टा असर हुआ. पुतिन का समर्थन बढ़ गया और लोगों को लगा कि पुतिन ही सही मायनों में रूस को नई दिशा दे सकते हैं. अगर अन्य देश पुतिन का विरोध न करते और प्रतिद्वंद्वी अन्य मुद्दों को उनके विरोध का आधार बनाते, तो हो सकता है कि दूसरे दौर की मतगणना करने की नौबत आ जाती. संसदीय चुनाव में पचास फीसदी का आंकड़ा किसी तरह पार किया गया था. अगर इस चुनाव में पचास फीसदी से कम वोट मिलते तो दूसरे दौर की मतगणना मजबूरी बन जाती और फिर कुछ भी हो सकता था, लेकिन पुतिन को तो पहले ही दौर में 64 फीसदी मत मिल गए. चार महीने में 14 फीसदी मत उन्हें ज़्यादा मिल गए. हालांकि संसदीय चुनाव और राष्ट्रपति चुनाव में थोड़ा अंतर होता है. दोनों के मुद्दे अलग होते हैं और मतदाताओं की अपेक्षाएं भी भिन्न होती हैं.

बहरहाल, पुतिन अगले 6 वर्षों के लिए राष्ट्रपति बन गए हैं. अब देखना यह है कि आगे उनकी नीति क्या होती है. वैसे जब आगे की रणनीति के बारे में पूछा गया तो उनका कहना था कि वह रूस में लोकतंत्र को मज़बूत करेंगे, आर्थिक सुधारों द्वारा रूस को आर्थिक ताक़त बनाएंगे और रोज़गार सृजन के लिए भरपूर कोशिश करेंगे, ताकि युवाओं को काम मिल सके. उनकी विदेश नीति वर्तमान विदेश नीति से भिन्न नहीं होगी, क्योंकि भले ही रूस के राष्ट्रपति दीमीत्री मेदवेदेव थे, लेकिन नीति निर्धारण में पुतिन की अहम भूमिका रही. जब यह कहा गया कि पिछले 12 सालों से आप सत्ता में हैं तो उनका कहना था कि पिछले चार सालों से वह प्रधानमंत्री थे, राष्ट्रपति नहीं. उन्होंने कहा कि संविधान ने प्रधानमंत्री को जो अधिकार दिए हैं, वह उन्हीं के दायरे में रहकर काम कर रहे थे और मेदवेदेव के कामों में उनका कोई हस्तक्षेप नहीं रहा.

पुतिन चाहे जो कहें और उन्हें कहना भी चाहिए, लेकिन सच यही है कि राष्ट्रपति चाहे मेदवेदव रहे हों, लेकिन वास्तविक सत्ता पुतिन के हाथों में थी. पुतिन संवैधानिक अवरोध के कारण तीसरी बार राष्ट्रपति नहीं बन सकते थे, इसलिए मेदवेदव को राष्ट्रपति बनाया गया था, लेकिन बाद में जब रूस के संविधान में संशोधन किया गया तो साफ हो गया कि ऐसा पुतिन को राष्ट्रपति बनाने के लिए किया गया है. पुतिन के राष्ट्रपति बनते ही पश्चिमी देशों को यह आशंका होने लगी है कि कहीं रूस की विदेश नीति में कोई परिवर्तन न हो. इसीलिए ऐसे बयान आ रहे हैं कि विदेश नीति नहीं बदलेगी. भारत को भी पुतिन का स्वागत करना चाहिए और रूस को अपना अच्छा मित्र बनाने का प्रयास करना चाहिए. वैसे तो रूस भारत का परंपरागत मित्र रहा है, लेकिन जब भारत अमेरिका की ओर ज़्यादा झुकाव दिखाने लगा तो रूस भी अपनी रणनीति बदलने लगा और पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने का प्रयास करने लगा. संकेत साफ है कि भारत अगर रूस को तवज्जो देना कम करता है तो वह पाकिस्तान के नज़दीक जा सकता है. अभी चीन भारतीय सीमा पर जिस तरह की हरकतें कर रहा है, वैसे में भारत का रूस के साथ मज़बूत संबंध बनाना बेहद ज़रूरी हो गया है. पुतिन ने भारत को सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाने के लिए समर्थन दिया है, जबकि अमेरिका इस मुद्दे पर परोक्ष रूप से भारत का विरोध कर रहा है. भारत के लिए यह अच्छा मौक़ा है कि वह पुतिन की वापसी पर रूस को फिर से अपना वैसा मित्र बनाए, जैसा सोवियत संघ के समय था.

 

1 comment

  • chauthiduniya

    The same wetern journalists and their spies in idnia never critice that the American spy manmoahn singh was installed as prime misnter without winnign a single elction even as local councillor let aloen as MP –that farse of democracy is never decreid because that manmnoahsn ignh is traitor to india and is selling india cheap to angloamerican bastards.

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