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सच्चर कमेटी की रिपोर्ट और मुसलमान
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सच्चर कमेटी की रिपोर्ट और मुसलमान

इस्लाम हमेशा हमारे दिलों के क़रीब रहा है और भारत में इसका विकास और विस्तार लगातार जारी रहेगा. हमारी धार्मिक सोच इतनी विस्तृत है कि इसमें हर विचारधारा के लिए जगह है. सभी धार्मिक विचारधाराएं अपनी पहचान बनाए रखते हुए एक साथ रह सकती हैं. देश के मुसलमान राष्ट्रीय जीवनशैली, राजनीति, उत्पादन प्रक्रिया, व्यवसाय, सुरक्षा, शिक्षा, कला, संस्कृति और आत्माभिव्यक्ति में बराबर के साझीदार हैं. कोई भी ऐसा अवसर जो आम भारतीय के लिए है, वह हर भारतीय मुसलमान को भी उपलब्ध है. हम किसी भी धर्म के समर्थक के ख़िला़फ कोई विभेद नहीं करते हैं. यह बयान है हमारे देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का.

सच्चर कमेटी की रिपोर्ट 30 नवंबर, 2006 को गुरुवार के दिन लोकसभा में पेश की गई. संभवत: स्वतंत्र भारत में यह पहला मौक़ा था, जब देश के मुसलमानों के सामाजिक और आर्थिक हालात पर किसी सरकारी कमेटी द्वारा तैयार रिपोर्ट संसद में पेश की गई थी. हालांकि यह पहली बार नहीं था कि भारतीय मुसलमानों के सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन के मामले की जांच के लिए आधिकारिक कमेटी का गठन किया गया.

भारत सरकार ने 9 मार्च, 2005 को देश के मुसलमानों के तथाकथित सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक पिछड़ेपन से जुड़े मुद्दों की जांच के लिए एक उच्चस्तरीय कमेटी (भविष्य में एचएलसी के रूप में निर्दिष्ट) गठित की थी. कमेटी को मुसलमानों की आर्थिक गतिविधियों के भौगोलिक स्वरूप, उनकी संपत्ति एवं आय का ज़रिया, शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं का स्तर, बैंकों से मिलने वाली आर्थिक सहायता और सरकार द्वारा प्रदत्त अन्य सुविधाओं की जांच-पड़ताल के लिए कहा गया था. मानवाधिकारों के जाने-माने समर्थक जस्टिस राजिंदर सच्चर के नेतृत्व में गठित यह कमेटी सच्चर कमेटी के नाम से ही जानी जाती है. जाने-माने शिक्षाविद्‌ सैयद हामिद, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति एवं वर्तमान में हमदर्द विश्वविद्यालय के कुलाधिपति और सामाजिक कार्यकर्ता ज़़फर महमूद इसके सदस्यों में शामिल थे. इसके अलावा अर्थशास्त्री एवं नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च के सांख्यिकीविद्‌ डॉ. अबुसलेह शरी़फ इस कमेटी के सदस्य सचिव थे. कमेटी को सरकारी एजेंसियों और विभागों से काग़ज़ातों एवं रिकॉड्‌र्स मांगने की छूट दी गई थी.

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सच्चर कमेटी की रिपोर्ट 30 नवंबर, 2006 को गुरुवार के दिन लोकसभा में पेश की गई. संभवत: स्वतंत्र भारत में यह पहला मौक़ा था, जब देश के मुसलमानों के सामाजिक और आर्थिक हालात पर किसी सरकारी कमेटी द्वारा तैयार रिपोर्ट संसद में पेश की गई थी. हालांकि यह पहली बार नहीं था कि भारतीय मुसलमानों के सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन के मामले की जांच के लिए आधिकारिक कमेटी का गठन किया गया. सच्चर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट की शुरुआत में ही कहा है, भारत में मुसलमानों के बीच वंचित होने की भावना काफी आम है, देश में धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति के विश्लेषण के लिए आज़ादी के बाद से किसी तरह की ठोस पहल नहीं की गई है.

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जो लोग भारतीय मुसलमानों के हालात पर नज़र रखते हैं, उन्हें याद होगा कि 1983 में ही भारत सरकार ने यह स्वीकार किया था कि मुसलमानों के बीच यह धारणा आम है कि सरकार, चाहे वह केंद्र की हो या राज्यों की, की आर्थिक नीतियों के फायदे अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और समाज के दूसरे कमज़ोर वर्गों तक नहीं पहुंच पाते. इसी आधार पर 10 मई, 1980 को एक उच्चाधिकार प्राप्त पैनल का गठन किया गया था, जिसे गोपाल सिंह पैनल के नाम से जाना जाता है. पैनल ने 14 जून, 1983 को अपनी रिपोर्ट पेश की, लेकिन भारत सरकार ने इसे बहस के लिए संसद के पटल पर पेश नहीं किया. पैनल की रिपोर्ट लंबे समय तक धूल खाती रही. फिर वी पी सिंह की सरकार ने इसे जारी करने का फैसला किया. सरकारी उदासीनता से दूर मुस्लिम बुद्धिजीवियों एवं विद्वानों की एक जमात देश में मुसलमानों के सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन के कारणों को तलाश करने में लगातार लगी रही. आज़ादी के बाद के दौर में ऐसी शख्सियतों में मुशीरुल हसन, उमर खालिद और रफीक ज़कारिया का नाम सबसे पहले याद आता है. पिछले 10-15 सालों में इन लोगों ने इस क्षेत्र में जितना काम किया है, उस पर कई किताबें लिखी जा सकती हैं. सच्चाई तो यह है कि सच्चर कमेटी से पहले ही देश के मुसलमानों की सामाजिक-आर्थिक हालत से संबंधित दस्तावेज पर्याप्त मात्रा में मौजूद थे. फिर भी कमेटी की रिपोर्ट इन दस्तावेजों से ज़्यादा व्यापक और विस्तृत है, क्योंकि इन विद्वानों के पास रिकॉड्‌र्स, आंकड़ों और अन्य संसाधनों की कमी थी.

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प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा गठित सच्चर कमेटी (एचएलसी) के अध्ययन का दायरा गोपाल सिंह पैनल के मुक़ाबले ज़्यादा व्यापक था. कमेटी को निम्नलिखित मुद्दों की विस्तृत जांच-पड़ताल की ज़िम्मेदारी दी गई थी:

1-                 ऐसे राज्यों, इलाक़ों, ज़िलों और प्रखंडों की पहचान करना, जहां अधिकांश भारतीय मुसलमान रहते हैं.

2-                 उनकी आर्थिक गतिविधियों का भौगोलिक स्वरूप.

3-                 अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में समाज के दूसरे समूहों के मुक़ाबले इनकी संपत्ति और आय का स्तर.

4-                 सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की नौकरियों में उनकी हिस्सेदारी.

5-                 राज्य में अन्य पिछड़ा वर्गों की कुल जनसंख्या के मुक़ाबले मुसलमान समुदाय में इस वर्ग का अनुपात.

6-                 शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं, स्थानीय संस्थाओं, बैंकों से मिलने वाले क़र्ज़ और सरकार एवं सार्वजनिक उपक्रमों द्वारा उपलब्ध कराई जाने वाली अन्य सुविधाओं तक मुसलमान समुदाय की पहुंच.

सच्चर कमेटी की रिपोर्ट स्वाभाविक रूप से इन्हीं मुद्दों पर केंद्रित है. 12 खंडों में बंटी और 400 पृष्ठों में फैली यह रिपोर्ट गोपाल सिंह पैनल की रिपोर्ट से कहीं ज़्यादा उपयोगी है. दूसरे शब्दों में कहें तो भारत में मुसलमान समुदाय की सामाजिक-आर्थिक हालत का यह सबसे प्रमाणिक दस्तावेज है.

11 comments

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  • कलाकार जाति पेशेवर जाति ही अब सभी का इलाज है

  • कलाकार जाति पेशेवर जाति ही अब सभी का इलाज है

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  • सच्चर रिपोर्ट के आधार पर मुस्लिम समाज के लोगो के एजुकेशन एंड जॉब्स को और रिजर्वेशन के आधार पर जल्द से जल्द लागू किया जाये.जिस से इन के समाज और गावं की तरक्की हो सके.

  • मुसलमानों में दिनी तरक्की के साथ अब शैक्षिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, मानसिक, टेकनोलोजिक, जीवन के विविध स्तर पर कार्य होना चाहिए. और ये अब होगा ज़रूर क्योंकि इससे ज्यादा ज़वाल अब नहीं हो सकता, और मुझे यकीन है मुसलमानों में इन दिनों काफी बदलाव आया हुआ है. ये कौम भी अब जाग रही है. काफी ज़टके महेसूस करने के बाद जागना पढता ही है.
    ना-उम्मीदी कुफ्र की निशानी है. अल्लाह जिसके साथ है उसे डरने की कोई ज़रुरत नहीं. इंशाल्लाह मुसलमान भविष्य में अपना सही अस्तित्व पाएंगे. अपना सही मुकाम हासिल करके ही रहेंगे. मुझे अल्लाह की ज़ात से बहुत उम्मीद हैं. और इस कौम पर अब काम हो भी रहा है.
    गलत इतिहास लिखने से भी कई समस्याएं हमारे मुल्क में उभरी हैं. इन्हें दूर करना होगा. इसके लिए मुसलमानों में स्कालरों की ज़रुरत है. नौजवानों ने इसके लिए आगे आना चाहिए. पढ़े लिखों ने इसके लिए काम करना चाहिए. मुस्लिम बुद्धिजीवी भी आगे आयें और समाज को जागृत करें. चाहनेवाले नॉन-मुस्लिम लोगों की मदद लेकर अपना विकास करना चाहिए

  • सरकार को सिर्फ इलेक्शन के समय ही मुस्लिम कम्युनिटी की याद आती है ! जब भी सच्चर कमिटी की रिपोर्ट संसद में दाखिल की गयी तब भी सरकार ने कोई न कोई वजह बता कर उस पर कोई भी फैसला नही सुनाया आज भारत में आज मुस्लिम कम्युनिटी की संख्या १३.४% है इसके बावजूद आज मुस्लिम लोगो की न तो आर्थिक , सामाजिक, स्तिथि में कोई बदलाव नही आया. क्या भारतके मुस्लिमो की प्रति सरकार की कोई भूमिका नही है . क्यू सरकार भारत के मुस्लिम लोगो को अनदेखा करती है

  • राजिंदर सच्चर कमिटी ने २०० ६ को अपनी रिपोर्ट पेश की. इस रिपोर्ट के अनुसार मुसलमानो के हालात , उनकी शिक्षा एवं आर्थिक पिछडेपन की जानकारी मिली. आज जिस त्रासदीसे मुसलमान गुजर रहा है उसके जिम्मेदार खुद उनके लीडर है ! आज जो कोई ” खान ” हो या कोई नवाब हो , खेल या छोटे – बडे पडदेपर दिख रहा है वह मुसलमानोका सही रूप नही है ! गरीब लोग वो है जो भारत कि अछूत जाती या पिछडी जाती से इस्लाम मे दाखिल हुये ! वे लोग मजे मे है जो उंची जाती से तआल्लुक रखते है और जिन्होने इनाम के या ओह्दे के लालच मे इस्लाम कुबूल किया , जिनके नाम अंतुले , देशमुख , पारनेर ऐसे ब्राह्मणवर्ग के नामसे मिलते है ! पोलिटिकल रिजर्वेशन मे आज अनु. जाती एवं जनजाती कि तुलना मे मुस्लिम वर्ग पिछड गया है . ! राजनीतिक हिस्सेदारीही मुसलमानोकी तरक्की की कुंजी है ! जिस तरह संविधान के ३३० और ३३२ के अनुच्छेद के अनुसार एससी / एसटी को लोकसभा और विधान सभाओ मे उनकी जनसंख्या के अनुपात मे रिजर्वेशन मिल रहा है , उसी तरह मुसलमान एवं धार्मिक अल्पसंख्यांक को उनकी संख्या के अनुपात मे रिजर्वेशन की पहल संविधान बनते समय बाबासाहाब डॉ. अम्बेडकर ने की थी लेकिन मौलाना आझाद और कॉन्ग्रेस ने सब उलटफेर कर दिया ! २१ दिसंबर १९५१ को मुंबई मे महमद अली रोडपर , बेग महमद बाग यहा पर मुस्लिम समाज की बहुत बडी तादाद मे जनसभा हुई , वहा डॉ. अम्बेडकर ने कहा ,” संविधान बनाते वक्त कॉन्ग्रेसने अल्पसंख्याको के राजनीतिक भविष्य के बारेमे गठन कि गयी समिती की सभा जिस दिन थी उसके ठीक पहले दिन मै कॉंग्रेसी प्यादा मौलाना आझाद इनसे भेंट की और उनको अल्पसंख्यांको की सभी समस्या एवं भविष्य के बारेमे पुरी जानकारी दी ! लेकिन मौलाना आझाद दुसरे दिन सभा मे हाजिर न रहकर निकल गये. मुस्लिम भाई और उसी तरह दुसरे अल्पसंख्यांको का मुद्दा मेरे सिवा वहा किसीने नही रख्खा और मै आपकी तरफ से अकेलाही होने की वजह से पंडित नेहरूने मुसलमानो को आरक्षित जगह देने की सूचना को कॉंग्रेस कि ओरसे विरोध किया और आप के हाथ से राजनीतिक आरक्षण निकल गया ! -[ Dr. BABASAHEB AMBEDKAR , Writings And Speeches Vol. 18 Part 3 – Page 300 . ] १९५० को अगर अल्पसंख्यांक समुदाय के लिये राजनीतिक रिजर्वेशन संविधान में लिखा जाता तो आज बहुत सारी समस्याये हल हुई होती और आज १३८ दशलक्ष [ २००१ जनगणना ] मुसलमान के अनुपात [ १५ %] में लोकसभामे सिर्फ ६% प्रतिनिधित्व नही होता . पंधरा प्रतिशतही होता !

  • लिखा तोह बाधा अच्छा हैं.

    मगर तुम उन लोगो का हक चीन रहे हूँ जो हिन्दू होकर म्हणत करते हैं. कल अगर तुम हिन्दू होते तें तब समझ में आता.

    UP में १८ % मुस्लिम को २०% आरक्षण, कितना अच्छा हैं की पूरा १००% ले लो.

    यही हैं की अल्लाह के नाम पर दुसरो के गले पढ़ जाओ. किसी ने मन कर दिया हैं किसी चीज़ का की पूरी एकोनोमोय बाप के नाम पर लिखा लो.

  • मुस्लिम समाज : एक चिंतन
    – डॉ. ज़र्रा काजी, उस्मानाबाद. (महाराष्ट्र)
    एसोसिएट प्रोफेसर ०९०४९०६४६७७
    drzarrakazi@gmail.com
    २०२० तक भारत को महासत्ता बनाने के लिए मुस्लिम समाज पर काम करना अब ज़रूरी है. क्योंकी १८ % मुसलमान भारत में रहते हैं. यदि ये पिछड़े रहेंगे तो देश महासत्ता कैसे बनेगा? इसलिए मुसलमानों की जाग्रति का कार्य अब राष्ट्रीय कार्य होना चाहिए.
    भारत में कई नॉन-मुस्लिम संघटन हैं , कई बुद्धिजीवी हैं जो मुसलमानों को साथ लेकर चलना चाहते हैं और मुसलमानों का विकास चाहतें हैं. उनका साथ लेकर हमने आगे आना चाहिए. इनमे मराठा सेवा संघ, संभाजी ब्रिगेड, छावा, भारत मुक्ति मोर्चा, बामसेफ आदि कई संघटन हैं. अलग अलग राज्यों में अलग संगठन हैं. इनका साथ लेकर आगे बढ़ना चाहिए.
    मुसलमानों पर काम करना अब ज़रूरी बन गया है. ये सबसे पिछड़ी कौम बनते जा रही हैं.इसकी असली वजह है मुसलमानों में शिक्षा की बेहद कमी और जाग्रति का अभाव. मुसलमानों की तरक्की एजुकेशन में है. कुरान की पहली आयात कहती है. इकरा बेइस्मेरब्बिकल्लज़ि — और मुसलमान तालीम से दूर होता जा रहा है.
    मुसलमानों में दिनी तरक्की के साथ अब शैक्षिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, मानसिक, टेकनोलोजिक, जीवन के विविध स्तर पर कार्य होना चाहिए. और ये अब होगा ज़रूर क्योंकि इससे ज्यादा ज़वाल अब नहीं हो सकता, और मुझे यकीन है मुसलमानों में इन दिनों काफी बदलाव आया हुआ है. ये कौम भी अब जाग रही है. काफी ज़टके महेसूस करने के बाद जागना पढता ही है.
    ना-उम्मीदी कुफ्र की निशानी है. अल्लाह जिसके साथ है उसे डरने की कोई ज़रुरत नहीं. इंशाल्लाह मुसलमान भविष्य में अपना सही अस्तित्व पाएंगे. अपना सही मुकाम हासिल करके ही रहेंगे. मुझे अल्लाह की ज़ात से बहुत उम्मीद हैं. और इस कौम पर अब काम हो भी रहा है.
    गलत इतिहास लिखने से भी कई समस्याएं हमारे मुल्क में उभरी हैं. इन्हें दूर करना होगा. इसके लिए मुसलमानों में स्कालरों की ज़रुरत है. नौजवानों ने इसके लिए आगे आना चाहिए. पढ़े लिखों ने इसके लिए काम करना चाहिए. मुस्लिम बुद्धिजीवी भी आगे आयें और समाज को जागृत करें. चाहनेवाले नॉन-मुस्लिम लोगों की मदद लेकर अपना विकास करना चाहिए.
    याद रखें everything is possible in this world.
    अल्लाह इस बात को कुबूल करें, आमीन.

  • हां यह सही है कि सच्चर कमेटी ने अपनी रिपोर्ट को भारतीय समाज पटल पर रखा लेकिन ऐसी क्या मजबूरियां थी कि किसी भी सरकार ने इसे लागू करने में ज़हमत नहीं उठाई. क्या अब इसके लिए किसी जांच समिति की जरूरत होगी.. जो चीज गलत है वो गलत है… इस समस्या को जल्द से जल्द खत्म किया जाए.

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