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संसद को जनता के गुस्से से डरना चाहिए

संसद को जनता के गुस्से से डरना चाहिए

राजा अभी कुछ महीनों पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल में मंत्री थे. अब सीबीआई की गिरफ्त में हैं, पहले रिमांड फिर जेल, ज़ाहिर है, ज़मानत पर बाहर आ ही जाएंगे. पर उनकी गिरफ्तारी ने सीधा सवाल प्रधानमंत्री की कार्यशैली पर खड़ा कर दिया है. मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्री बनने के दूसरे कार्यकाल में राजा ही संचार मंत्री रहे. उनसे पहले के संचार मंत्री दयानिधि मारन ने जिस तरह से प्रधानमंत्री कार्यालय को धमकाया, ज़ुबानी नहीं, खत लिखकर, उसके बाद तो प्रधानमंत्री कार्यालय को जैसे सांप सूंघ गया. दयानिधि मारन ने पहले मनमानी की, बाद में ए राजा खुलकर खेले. इतना खुलकर खेले कि सभी को पता चल गया कि उनके पीछे देश के किस पैसे वाले का चेहरा है.

राजा के कारनामों से लाभ उठाने वालों में कहीं कोई ऐसा शख्स तो नहीं है, जिसका नाम आने से सरकार की स्थिरता पर ही खतरा खड़ा हो जाए? या फिर राजा ने सबको थोड़ा दिया और ज़्यादा खुद हड़प लिया. चेन्नई के शहंशाह की राजा से खुन्नस कुछ ऐसे ही संकेत दे रही है. पहले मधु कोड़ा और फिर राजा, लूट की इस महागाथा में कई अध्याय ऐसे हैं, जिनका पढ़ा जाना अभी बाक़ी है. अगर प्रधानमंत्री राजा को ब़र्खास्त कर देते तो किसी भी कीमत पर द्रमुक उनसे समर्थन वापस लेने की हिम्मत नहीं करती.

राजा की गिरफ्तारी किसने टाली या फिर राजा को मंत्रिमंडल में बनाए रखने की मजबूरी क्या थी? क्या प्रधानमंत्री को यह डर था कि यदि वह राजा का विभाग बदल देंगे या उन्हें मंत्रिमंडल से हटा देंगे तो द्रमुक उनकी सरकार गिरा देगी? क्या इस डर से प्रधानमंत्री ने राजा को भ्रष्टाचार करने की छूट दे रखी थी? या प्रधानमंत्री को सचमुच पता नहीं था कि संचार मंत्रालय में क्या हो रहा है, पर यह तर्क विश्वास करने के लायक नहीं है.

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हर रात साढ़े नौ बजे के बाद डायरेक्टर आईबी नियमित रूप से प्रधानमंत्री से मिलने जाता है. उसकी यह ड्यूटी है कि वह देश के हालात के बारे में प्रधानमंत्री को बताए. आईबी मंत्रियों और सचिवों की लगातार निगरानी करती है. इसलिए अवश्य आईबी ने प्रधानमंत्री को संचार मंत्रालय में चल रहे घपलों और कॉमनवेल्थ गेम्स जैसे लूट के खुले महाखेल के बारे में अवश्य बताया होगा. सवाल है कि क्यों प्रधानमंत्री ने इसकी अनदेखी की.

राजा के कारनामों से लाभ उठाने वालों में कहीं कोई ऐसा शख्स तो नहीं है, जिसका नाम आने से सरकार की स्थिरता पर ही खतरा खड़ा हो जाए? या फिर राजा ने सबको थोड़ा दिया और ज़्यादा खुद हड़प लिया. चेन्नई के शहंशाह की राजा से खुन्नस कुछ ऐसे ही संकेत दे रही है. पहले मधु कोड़ा और फिर राजा, लूट की इस महागाथा में कई अध्याय ऐसे हैं, जिनका पढ़ा जाना अभी बाकी है.

अगर प्रधानमंत्री राजा को बर्खास्त कर देते तो किसी भी कीमत पर द्रमुक उनसे समर्थन वापस लेने की हिम्मत नहीं करती. प्रधानमंत्री अगर अपने मंत्रियों पर लगाम लगाते तो उन्हें भी बड़े व्यक्तियों में गिना जाता. उन पर यह आरोप नहीं लगता कि यह कई प्रधानमंत्रियों की अराजक कैबिनेट है, जिसकी एक दिशा नहीं है. इस मंत्रिमंडल में शरद पवार हैं, इसमें ममता बनर्जी हैं और इसमें जयराम रमेश हैं. वैसे इसमें कमलनाथ, कपिल सिब्बल और सीपी जोशी भी हैं. ये सब प्रधानमंत्री हैं, जिनका संयोजन मनमोहन सिंह करते हैं.

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मनमोहन सिंह अर्थशास्त्री हैं, पर उनका अर्थशास्त्र भारत के अस्सी प्रतिशत लोगों के काम में नहीं आ रहा है. सन्‌ बयानवे की बनाई आर्थिक नीतियां आज देश में न औद्योगिक दर बढ़ा पा रही हैं और न रोज़गार दे पा रही हैं. भूख और बीमारी से लड़ना तो दूर, जो थोड़ा-बहुत आसान ज़िंदगी जी रहे थे, उन्हें भी महंगाई ने खून के आंसू रुला दिए. महंगाई से सरकार चिंतित दिखाई ही नहीं दी. प्रधानमंत्री ने जब खुद कहा कि वह ज्योतिषी नहीं हैं तो फिर शरद पवार पर टिप्पणी क्यों करें.

प्रधानमंत्री की आलोचना करना हमारा काम है भी और नहीं भी. पर मन रोने लगता है, जब सौ करोड़ से ज़्यादा लोगों की ताक़त वाले देश का प्रधानमंत्री किसी भी समस्या के सामने असहाय दिखाई पड़ता है. राजा का भ्रष्टाचार हो या कॉमनवेल्थ गेम्स का, घोटालों के किसी भी खेल को रोकने में प्रधानमंत्री बेबस नज़र आते हैं. महंगाई, बेकारी, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसे सवाल तो उन्हें विचलित करते ही नहीं.

हां उनकी मुस्कराहट तभी दिखाई देती है, जब या तो ओबामा आते हैं या चीनी राष्ट्रपति, जो हमें मूर्ख बनाकर समझौते कर अपने देशवासियों के लिए हमसे तोह़फे ले जाते हैं. अगर प्रधानमंत्री थोड़ा ध्यान देते तो महात्मा गांधी ग्रामीण रोज़गार योजना में भ्रष्टाचार नहीं होता और यह देश की तक़दीर बदलने वाली योजना होती. इस योजना के कार्यान्वयन की शैली ऐसी रखी गई है कि गांव-गांव में भ्रष्टाचार फैल गया है और गांव के अधिकांश प्रधान और पंचायत के सदस्य भी इसके हिस्सेदार हो गए हैं.

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हम ये बातें इसलिए नहीं लिख रहे हैं कि हम सत्ता पर रहे लोगों का अपमान करना चाहते हैं. हमें डर है कि पश्चिम एशिया में भ्रष्टाचार के खिला़फ और लोकतंत्र के लिए जली आग कहीं हमारे यहां भी न जल जाए. हमें इतना ज़रूर पता है कि गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन में लाखों लोग इतिहास में पहली बार शामिल हुए थे. अगर जनता की तकली़फों की चिंता सत्ता को नहीं हुई तो फिर जनता न तो सत्ता और न विपक्ष, किसी के बहकाने में नहीं आएगी. न्याय होता हुआ दिखना चाहिए और यही हमारे देश में नहीं हो रहा है. सरकार को भ्रष्टाचार के खिला़फ, बेकारी, महंगाई और भूख के खिला़फ लड़ते दिखना चाहिए. जब हम सरकार कहते हैं तो उसमें विपक्ष शामिल है. संसद का अगला सत्र लोकतंत्र के भविष्य की दिशा तय कर सकता है. लोगों के गुस्से से संसद में बैठे लोगों को डरना चाहिए.

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