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सीट बंटवारे पर बवाल, कई बदलेंगे पाला
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सीट बंटवारे पर बवाल, कई बदलेंगे पाला

सूबे में सियासी दलों के बीच तालमेल की कुछ तस्वीरें भले ही अभी धुंधली हैं, मगर उसी ने ऐसा बवाल खड़ा कर दिया है कि लोकसभा के अखाड़े में कूदने वाले कई सूरमा अब पाला बदलने की कवायद में जुट गए हैं. तालमेल की तस्वीर कुछ ऐसी बन रही है, जिसमें उनका चेहरा दिख नहीं रहा है. सबसे ज़्यादा बवाल राजद में मचा है. अगर नए फार्मूले के तहत राजद, कांग्रेस एवं लोजपा का तालमेल हुआ, तो तय मानिए कि राजद के कई नेता दूसरे दलों, खासकर जदयू की तरफ़ मुखातिब होते नज़र आएंगे. इसी तरह टिकट न मिलता देख जदयू के भी कई नेता इधर-उधर हाथ-पैर मारने लगे हैं. भाजपा और लोजपा में यह रोग थोड़ा कम है. दरअसल, ये हालात इसलिए भी पैदा हुए हैं कि कई नेता यह मानकर चल रहे थे कि फलां सीट पर उन्हें टिकट मिलना तय है. कुछ को आलाकमान ने इशारा भी कर दिया था, पर तालमेल की गाड़ी कुछ इस तरह चल रही है कि उन्हें अपनी मंजिल मिलना मुश्किल लग रहा है. सूत्र बताते हैं कि कांग्रेस ने अपने और लोजपा के लिए सीटों की सूची राजद को दे दी है. उनमें सासाराम, किशनगंज, मधुबनी, झंझारपुर, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, सुपौल, जमुई, नवादा, पटना साहिब, अररिया, बेतिया एवं मोतिहारी हैं. लोजपा को हाजीपुर, समस्तीपुर, मुंगेर, गोपालगंज एवं आरा की सीटें दी जाएंगी और राकांपा को कटिहार सीट. सूत्र बताते हैं कि आख़िरी दौर में एक-दो सीटों में फेरबदल की गुंजाइश है. अगर तालमेल की यही तस्वीर रही, तो राजद भारी संकट में पड़ सकता है.
सासाराम सीट पर पिछले चुनाव में मीरा कुमार के सामने भाजपा के मुन्नीलाल एवं राजद के ललन पासवान थे. इस बार योद्धाओं के बदलाव, बदलते समीकरण और गठबंधन के बीच कई दलों की मेहनत पर पानी फिरने वाला है. सबसे ज़्यादा नुकसान राजद को होने का अनुमान है. पार्टी ने पहले ही संकेत देकर अपने पूर्व प्रत्याशी ललन पासवान को क्षेत्र भ्रमण से लेकर मातमपुर्सी और मिजाजपुर्सी के लिए छोड़ रखा था. ललन ने मेहनत भी खूब की. अब कांग्रेस के साथ गठबंधन की बात चल रही है, तो सासाराम सीट पर पहला दावा मीरा कुमार का बनता है. वैसे भी भाजपा की तरफ़ से छेदी पासवान की उम्मीदवारी की चर्चा ने राजद के लिए एकजुट हुए मतदाताओं को कांग्रेस से गठबंधन के बाद एक आसरे के रूप में देखा है. खासकर सवर्ण मतदाताओं के लिए यह डूबते को तिनके का सहारा के समान है. पहले भी भाजपा उम्मीदवार मुन्नीलाल की नैय्या सवर्ण मतदाताओं के सहारे पार होती थी. ललन पासवान की तरफ़ राजपूत मतदाताओं का बढ़ता झुकाव उम्मीदवार न आने पर भाजपा की ओर चला जाए, तो यह कहना गलत नहीं होगा. सासाराम में ब्राह्मण मतदाता पहले से ही भाजपा उम्मीदवार की ओर नज़र गड़ाए बैठे हैं. जैसे ही पार्टी ने मनमाफिक उम्मीदवार दिया, राजद का काफी आधार वोट भाजपा की ओर खिसकेगा, जिसका शायद ही कोई लाभ कांग्रेस उम्मीदवार को मिल पाए.
ऐसे में ललन पासवान अपनी जीत की प्रबल संभावना को देखते हुए टिकट न मिलने की स्थिति में पाला बदल भी सकते हैं. उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी इसका लाभ उठाकर ललन को अपना प्रत्याशी बना सकती है. कांग्रेस मधुबनी से डॉ. शकील अहमद को उम्मीदवार बनाएगी. यहां से स़िर्फ उनके नाम की सिफारिश की गई है. ऐसे में अब्दुल बारी सिद्दीकी को काफी दिक्कत हो जाएगी. उन्होंने कहा भी है कि अगर उन्हें टिकट न मिला, तो वह काफी आहत होंगे. जदयू की नज़र हमेशा उन पर लगी रहती है. हो सकता है, जदयू सिद्दीकी के आहत दिल पर मरहम लगाने में जुुट जाए. मुजफ्फरपुर सीट के लिए विनिता विजय, अक्षय वर्मा एवं सुप्रीम कोर्ट के वकील विनोद कंठ के पुत्र प्रत्युष कंठ का नाम कांग्रेस को भेजा गया है. लोेजपा की ओर से यहां विजेंद्र चौधरी प्रबल दावेदार हैं. क्षेत्र में उनकी मजबूत पकड़ है और पिछले दो सालों से चौधरी पूरे क्षेत्र का दौरा कर रहे हैं. ऐसे में अगर यह सीट कांग्रेस के पास चली जाती है, तो चौधरी राजद या फिर किसी अन्य दल का दामन थाम सकते हैं. इस सीट को लेकर जदयू में भी परेशानी है. देवेश चंद्र ठाकुर यहां से चुनाव लड़ना चाहते हैं, पर जदयू यहां से किसी अतिपिछड़े को टिकट देने के मूड में है. ऐसे में देवेश कोई अलग रास्ता भी अख्तियार कर सकते हैं.
सीतामढ़ी सीट के लिए कांग्रेस के समीर महासेठ और विमल शुक्ला में जंग छिड़ी है. कांग्रेस के पैनल में महासेठ का नाम नहीं भेजा गया है, विमल शुक्ला ने उसमें बाजी मार ली है. महासेठ की आख़िरी उम्मीद अब राहुल गांधी पर आकर टिक गई है. क़ांग्रेस से तालमेल की स्थिति में राजद को खगड़िया सीट से हाथ धोना पड़ सकता है. यहां से सम्राट चौधरी पार्टी के मजबूत उम्मीदवार हैं. कांग्रेस यह सीट महबूब अली कैसर के लिए चाहती है. लालू प्रसाद कई दफा कह चुके हैं कि तालमेल के लिए वह कोई भी कुर्बानी देने को तैयार हैं. अगर तालमेल में यह सीट कांग्रेस की झोली में चली गई, तो सम्राट चौधरी को लपकने में जदयू जरा भी देरी नहीं करेगा.
अपने बिहारी बाबू का मन भी इन दिनों डोल रहा है. वह जमकर आप पार्टी का गुणगान कर रहे हैं. दरअसल, पाटिलीपुत्र सीट पर जोरों से सुशील कुमार मोदी का भी नाम चल रहा है. हालांकि मोदी इन बातों से इंकार करते हैं. इसी तरह किशनगंज सीट अगर कांग्रेस के खाते में रही, तो फिर राजद के अख्तारुल इमाम जदयू का तीर यहां से चला सकते हैं. जदयू की नज़र काफी पहले से इमाम पर लगी है. पूरे सीमांचल में राजद के वह विधानसभा में अकेले प्रतिनिधि हैं. तेजतर्रार एवं युवा इमाम इस बार किसी भी हाल में लोकसभा चुनाव लड़ना चाहते हैं. राजद से टिकट न मिला, तो वह दूसरे दल में जाने से परहेज नहीं करेंगे. अररिया सीट लोजपा जाकिर साहब के लिए हर हाल में चाहती है, लेकिन राजद के तस्लीमुद्दीन हैं कि मानते ही नहीं. उन्होंने यहां से चुनाव लड़ने का ऐलान कर रखा है. अगर तालमेल हुआ, तो तय है कि यहां जाकिर पाला बदलेंगे या फिर तस्लीमुद्दीन. हाजीपुर में जदयू के रमई राम ने ताल ठोंक दी है. मौजूदा सांसद रामसुंदर दास अगर स्वास्थ्य के कारण चुनाव नहीं लड़ते या राज्यसभा जाते हैं, तो यह सीट खाली होगी, पर यहां का प्रत्याशी उनकी मर्जी से ही तय होगा. सूत्र बताते हैं कि रामसुंदर दास रमई राम के पक्ष में नहीं हैं. ऐसे में रमई राम चुनाव लड़ने के लिए कोई भी क़दम उठा सकते हैं.
नवादा सीट पर भी कई दलों को परेशानी है. भाजपा से यहां भोला सिंह सांसद हैं. अगर रालोसपा के साथ भाजपा का तालमेल हुआ, तो परेशानी हो सकती है. डॉ. अरुण कुमार अपने लिए यह सीट चाहते हैं. बेगूसराय की सीट भी कांग्रेस ने अपने लिए मांगी है. अगर कांग्रेस की बात मानी गई, तो रामबदन राय का सपना टूट सकता है. रामबदन बेगूसराय में काफी सक्रिय हैं और इस बार उनकी जीत की संभावना भी है, लेकिन अगर कांग्रेस ने टांग अड़ा दी, तो फिर पाला बदल के अलावा उनके पास कोई रास्ता नहीं बचेगा. यह हालत तो तब है, जब तालमेल पूरी तरह साफ़ नहीं है. जब तस्वीर साफ़ हो जाएगी, तो पाला बदल का खेल और जोर पकड़ेगा.

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