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यूनिक आइडेंटिफिकेशन: आधार पर आशंकाएं
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यूनिक आइडेंटिफिकेशन: आधार पर आशंकाएं

यूपीए सरकार ने देश के सभी निवासियों को एक विशिष्ट पहचान नंबर यानी यूनिक आइडेंटिफिकेशन देने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. हाल में पश्चिमी महाराष्ट्र के आदिवासी इलाक़े तेंभली में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 10 आदिवासियों को 12 अंकों वाले विशिष्ट पहचान नंबर की योजना आधार सौंप कर इसकी शुरुआत की. आधार दुनिया की पहली ऐसी परियोजना है, जिसमें एक अरब से ज़्यादा की आबादी को विशिष्ट नंबर देने के लिए बायोमीट्रिक डाटा का इस्तेमाल किया जाएगा. अपने तरह की इस अनोखी योजना से देश के हर नागरिक को एक विशिष्ट पहचान नंबर मिल जाएगा, जिसका इस्तेमाल सरकार जहां नागरिकों की सामाजिक सुरक्षा के लिए बेहतर तरीक़े से कर सकेगी, वहीं नागरिक भी सरकारी योजनाओं-सेवाओं का लाभ सुविधाजनक तरीक़े से ले सकेंगे.

जिन देशों को देखकर यूपीए सरकार ने यह महत्वाकांक्षी परियोजना शुरू की, अब उन्होंने भी धीरे-धीरे इस परियोजना से किनारा करना शुरू कर दिया है. संयुक्त राज्य अमेरिका, जिसने सबसे पहले यानी आज से 5 दशक पहले अपने यहां नागरिकों की सामाजिक सुरक्षा के लिए सोशल सिक्योरिटी नंबर प्रदान किए और उसकी देखादेखी छठवें-सातवें दशक में आस्ट्रेलिया और ब्रिटेन ने अपने यहां यह प्रणाली लागू की, वे भी अब इस तरह की परियोजना के विचार को लागत और व्यक्ति की निजता के सवाल पर छोड़ चुके हैं. फिर हमारी सरकार को इस परियोजना में ऐसा क्या दिखा कि उसने इस पर संसद और उससे बाहर बात करना भी गवारा नहीं समझा.

आधार के अमल में आने के बाद भारतीय नागरिकों को राशनकार्ड, पैनकार्ड, मतदाता पहचान पत्र, ड्राइविंग लाइसेंस वग़ैरह अलग-अलग पहचान पत्र रखने की ज़रूरत नहीं रहेगी. स़िर्फ आधार से काम चल जाएगा. यह नागरिकों के लिए एक पक्का सबूत होगा. इसमें नाम, जन्मतिथि और पते जैसी बुनियादी जानकारियों के अलावा व्यक्ति की शारीरिक पहचान जैसे उंगलियों के निशान, चेहरे और शरीर की कोई विशेषता या निशान (बायोमीट्रिक) भी शामिल होगा. रक्त समूह, यदि कोई एलर्जी, बीमारी है या कोई दवाई लेता है तो उसे भी इसमें शामिल करने का प्रस्ताव है, ताकि आपात स्थिति में दवाई दी जा सके और इलाज किया जा सके. यही नहीं, आधार में व्यक्ति के बैंक खातों और लिए गए कर्ज की जानकारी, यदि व्यक्ति कभी गिरफ़्तार हुआ हो, मुजरिम क़रार दिया गया हो जैसी सारी जानकारियां मौजूद होंगी. कुल मिलाकर आधार में नागरिक से संबंधित सभी सूचनाएं एक साथ होंगी. कार्ड के रूप में उक्त सूचनाएं हर समय नागरिक के पास तो रहेंगी ही, केंद्रीय सूचना भंडारण स्थल पर भी जमा कर रखी जाएंगी. यानी एक राष्ट्रीय डाटाबेस तैयार होगा, जिसका इस्तेमाल सरकार अपनी ज़रूरत के मुताबिक़ कर सकेगी. आधार हर नागरिक का पंजीयन और फिर उसका सत्यापन करने का सबसे सरल और सटीक तरीक़ा होगा. यह एक अधि प्रमाणन प्रक्रिया होगी, जिसमें दोहराव और जालसाज़ी कतई नहीं हो सकेगी. वर्तमान में मौजूद पैनकार्ड, पासपोर्ट, मतदाता पहचान पत्र, एमएनआईसी जैसे किसी भी डाटाबेस से पंजीयन तो किया जा सकता है, लेकिन इसका सत्यापन आसानी से नहीं हो पाता. फिर दोहरे पहचान पत्रों की वजह से जालसाज़ी होती है. डुप्लीकेट पहचान पत्र बनते हैं, तिस पर कुछ हमारा सिस्टम इस तरह का हो गया है, जहां डुप्लीकेटिंग की आशंका हमेशा बनी रहती है. लिहाज़ा आधार के अंतर्गत एक ऐसा नेटवर्क बनाया जा रहा है, ताकि पहचान पत्र का सत्यापन और प्रमाणन एक साथ किया जा सके. कोई इसका डुप्लीकेट न बना सके. बायोमीट्रिक या फिंगर प्रिंट के प्रमाणन से जालसाज़ी बिल्कुल नहीं हो पाएगी. जो व्यक्ति दावा कर रहा है कि वह फलां है, इसकी तस्दीक आसानी से हो जाएगी. भारतीय विशिष्ट पहचान पत्र प्राधिकरण आधार के बहाने देश में राष्ट्रीय प्रमाणन और पंजीयन के साथ पहचान का एक तंत्र खड़ा करना चाहता है, जिसकी बिना पर केंद्र एवं राज्य सरकारें अपने काम को अच्छी तरह से अमल में ला सकें. देश में आधार के अमल में आने के तुरंत बाद बैंकिग प्रणाली के दायरे से बाहर खड़े 80 करोड़ से ज़्यादा लोग बैंक व्यवस्था से जुड़ जाएंगे. सरकार एवं नागरिक के बीच सीधा वित्तीय सरोकार क़ायम किया जा सकेगा, जिसका सीधा असर सर्व समावेशी विकास की गति पर होगा और देश की बचत दर पर भी इसका व्यापक असर होगा. हर नागरिक के पास ऐसा वित्तीय खाता बन जाएगा, जिसमें सरकार सीधे धन हस्तांतरित कर पाएगी. महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना यानी मनरेगा जैसी महत्वपूर्ण सरकारी योजनाओं का फायदा वास्तविक लोगों तक पहुंचेगा. सार्वजनिक वितरण प्रणाली, जिसमें सबसे ज़्यादा खामियां हैं, वह भी दुरुस्त होगी. कोई चाहकर भी उसमें गड़बड़ी नहीं कर पाएगा. यही नहीं, सरकार यदि कोई योजना बनाती है तो उस पर एक राष्ट्रीय डाटाबेस होगा, जिसके दम पर वह लाभार्थियों को पहचान सकती है. ज़ाहिर है कि आधार के चलते तमाम सरकारी योजनाएं सही तरीक़े से अमल में आ पाएंगी.

एक तऱफ आधार से आम आदमी को फायदे ही फायदे नज़र आते हैं, वहीं दूसरी तऱफ इस परियोजना को लेकर कुछ आशंकाएं भी हैं, जो कहीं से निराधार नहीं हैं. जैसा कि सभी को मालूम है कि यह परियोजना देश की सबसे महंगी परियोजनाओं में से एक है. इसका कुल बजट फिलहाल 10 हज़ार करोड़ रुपये आंका गया है, लेकिन यह जितनी महंगी परियोजना है, उतनी गंभीरता से इस पर देश के अंदर कहीं भी चर्चा-बहस नहीं हुई. न विधानसभाओं में और न ही संसद में. सैद्धांतिक रूप से यह परियोजना हर लिहाज़ से अच्छी जान पड़ती है, लेकिन इसका व्यवहारिक पक्ष क्या है और इसके अमल में आने के बाद किस तरह की परेशानियां-दिक्कतें आ सकती हैं, इसकी तऱफ सरकार ने बिल्कुल ध्यान नहीं दिया. यह परियोजना जहां व्यक्ति की निजता के अधिकार का हनन करती है, वहीं इसके व्यवसायिक दुरुपयोग से भी इंकार नहीं किया जा सकता. आधार सीधे-सीधे तौर पर आरटीआई क़ानून का विरोधाभास नज़र आती है. मसलन, सूचना के अधिकार के तहत आम नागरिक सरकार की गतिविधियों और उसकी योजनाओं पर नज़र रख सकता है, वहीं आधार के ज़रिए इसका उलटा हो जाएगा. यानी परियोजना के अमल में आने के बाद सरकार के पास हर नागरिक की निजी पहचान का पूरा ब्योरा आ जाएगा, जिसका वह अपने हित में ग़लत इस्तेमाल भी कर सकती है. परियोजना को लागू करते समय इस बात का ज़रा भी ख्याल नहीं रखा गया कि कैसे बड़े तौर पर सूचनाओं को संगठित करने की धारणा चुपके-चुपके सामाजिक नियंत्रण, युद्ध के उपकरण और जातीय समूहों को निशाना बनाने तथा उन्हें प्रताड़ित करने के हथियार के रूप में भी इस्तेमाल की जा सकती है. जैसा कि अतीत में जर्मनी में नाजियों ने इस सूची का इस्तेमाल यहूदियों के कत्लेआम के लिए किया था. भारत सरकार क्या कोई ऐसी गारंटी दे सकती है कि भविष्य में यदि नाजियों जैसी कोई पार्टी हमारे यहां सत्ता में आती है तो आधार के आंकड़े उसे हासिल नहीं होंगे और वह इंतकाम की भावना से इनका इस्तेमाल नागरिकों के किसी खास तबके के ख़िला़फ नहीं करेगी.

देश के मानवाधिकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता यदि इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं तो इसके कुछ ठोस कारण हैं. आधार नागरिकों की निशानदेही की बात करती है, लेकिन नागरिकों की शिनाख्त का जो रास्ता सरकार ने अख्तियार किया है, उसकी बुनियाद 2000 में पारित सूचना तकनीक क़ानून है, जिसे पारित करते समय नागरिकों के निजी जीवन के तथ्यों की सुरक्षा का कोई प्रावधान नहीं किया गया. यही नहीं, आधार सरकार द्वारा नागरिकों पर नज़र रखने का औज़ार मात्र है. यह परियोजना न तो अपनी संरचना और न ही अमल में निर्दोष है. यह बात विशिष्ट पहचान अंक प्राधिकरण के कार्ययोजना प्रपत्र पढ़ने से ज़ाहिर हो जाती है. उसमें साफ-साफ लिखा है कि विशिष्ट पहचान अंक स़िर्फ पहचान की गारंटी है, अधिकारों, सेवाओं या हकदारी की गारंटी नहीं. इसमें आगे यह बात भी बड़ी चालाकी से जोड़ी गई है कि यह पहचान की भी गारंटी नहीं है, बल्कि पहचान तय करने में सहयोगी है.

आखिर में एक बात और, जिन देशों को देखकर यूपीए सरकार ने यह महत्वाकांक्षी परियोजना शुरू की, अब उन्होंने भी धीरे-धीरे इस परियोजना से किनारा करना शुरू कर दिया है. संयुक्त राज्य अमेरिका, जिसने सबसे पहले यानी आज से 5 दशक पहले अपने यहां नागरिकों की सामाजिक सुरक्षा के लिए सोशल सिक्योरिटी नंबर प्रदान किए और उसकी देखादेखी छठवें-सातवें दशक में आस्ट्रेलिया और ब्रिटेन ने अपने यहां यह प्रणाली लागू की, वे भी अब इस तरह की परियोजना के विचार को लागत और व्यक्ति की निजता के सवाल पर छोड़ चुके हैं. फिर हमारी सरकार को इस परियोजना में ऐसा क्या दिखा कि उसने इस पर संसद और उससे बाहर बात करना भी गवारा नहीं समझा. यह परियोजना देश की सारी आबादी से सीधे-सीधे तौर पर जुड़ी हुई है. इसमें देश का करोड़ों रुपया ख़र्च होना है. लिहाज़ा इसके व्यवहारिक पक्षों की तऱफ ज़्यादा ध्यान देने की ज़रूरत है. कुल मिलाकर परियोजना की तमाम अच्छाइयों के बावजूद आधार के प्रति ये कुछ आशंकाएं भी हैं, जिन्हें दूर किया जाना बेहद ज़रूरी है. जब तक कोई सरकार अपने नागरिकों को यह यक़ीन नहीं दिला देती कि जो योजना शुरू की जा रही है, वह उसके हित में है, तब तक ऐसी कोई भी योजना पूरी तरह से कामयाब नहीं हो सकती.

(लेखक अल्पसंख्यक मामलों के जानकार हैं)

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