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इस बदहाली के लिए ज़िम्मेदार कौन है
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इस बदहाली के लिए ज़िम्मेदार कौन है

आप जब इन लाइनों को पढ़ रहे होंगे तो मैं नहीं कह सकता कि रुपये की अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में या डॉलर के मुक़ाबले क़ीमत क्या होगी. रुपया लगातार गिरता जा रहा है. अंतरराष्ट्रीय रेटिंग एजेंसियों ने न केवल बैंकों की, बल्कि सभी वित्तीय संस्थाओं की रेटिंग घटा दी है. कुछ एजेंसियों ने तो हमारे देश की ही रेटिंग घटा दी है. हमारे देश के कुछ महत्वपूर्ण उद्योगपतियों का कहना है कि यह देश बिना नेतृत्व के चल रहा है. बिना नेतृत्व के चल रहे देश का आधार लेकर ही शायद एजेंसियों ने हमारी रेटिंग घटा दी. देश की आर्थिक दुर्दशा का ज़िम्मेदार आखिर कौन है. यह सवाल राजनीतिक बहस का है, लेकिन देश की राजनीतिक पार्टियां इस बहस से बच रही हैं. इसके दो ही कारण हो सकते हैं, या तो उन्हें इस विषय की गंभीरता का एहसास नहीं है या वे खुद उन्हीं नीतियों में विश्वास करती हैं, जिनके कारण देश का यह हाल हुआ है. विपक्षी गठबंधन के एक सांसद ने तो खुलेआम कह दिया कि कोई भी वित्त मंत्री होता तो देश का यही हाल होने वाला था. क्यों होने वाला था, यह उन्होंने नहीं बताया. इसका एक मतलब यही निकाला जा सकता है कि सारे दलों के पास एक ही तरह की आर्थिक नीतियों का मसौदा है, एक ही तरह का रोडमैप है और वे उसी पर चलना चाहते हैं.

क्या देश में ऐसे अर्थशास्त्री हैं, जो ऐसी नीतियां बना सकें, ताकि भूख, बीमारी, कुपोषण एवं ग़ैर बराबरी से लोगों को थोड़ी राहत मिल सके? क्या ऐसे अर्थशास्त्री हैं, जो रोजगार के साधन बढ़ा सकें, जो विकास के पहिए को सही दिशा में सही जगह ले जा सकें? क्या ऐसे अर्थशास्त्री हैं, जो दुनिया में हिंदुस्तान के काले होते चेहरे को और काला होने से रोक सकें? क्या ऐसे अर्थशास्त्री हैं, जो हिंदुस्तान के उद्योगपतियों को, बड़े पैसे वालों को बता सकें कि उन्हें अपना इंवेस्टमेंट प्लान बदलना चाहिए.

जब 1992 में तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने संसद में देश के आर्थिक विकास का मसौदा पेश किया था तो उन्होंने बड़े गर्व से कहा था कि देश अगले बीस सालों में बहुत सारी समस्याओं पर क़ाबू पा लेगा, बिजली सर्वसुलभ हो जाएगी, क़ीमतें क़ाबू में आ जाएंगी, उत्पादन बढ़ जाएगा और देश खुशहाली के साथ विश्व की आर्थिक शक्ति के बनने की तऱफ चल पड़ेगा. संसद में कई लोगों ने उनके इस वक्तव्य का विरोध किया था और मुझे याद है, भूतपूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने सवाल खड़ा करते हुए कहा था कि जितनी चीज़ें मनमोहन सिंह कह रहे हैं, उनमें से कुछ भी अगले बीस सालों में इस देश में नहीं होने वाली हैं. उन्होंने यह कहा था कि जितना मैं इस देश को जानता हूं, गांव को जानता हूं, किसानों को जानता हूं, उसके मुताबिक़ इन नीतियों से इस देश के ऊपर बहुत विपरीत असर पड़ेगा. ग़रीबी बढ़ेगी, अपराध बढ़ेगा, ग़ैर बराबरी बढ़ेगी और देश विपरीत दिशा में चलने लगेगा. तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हाराव ने चंद्रशेखर जी के भाषण में हस्तक्षेप करते हुए कहा था कि चंद्रशेखर जी, मैंने आपके ही आर्थिक सलाहकार को अपना वित्त मंत्री नियुक्त किया है और मैं तो यह मानता था कि यह आपकी विचारधारा को ही आर्थिक नीतियों के नाम पर देश के सामने रख रहे हैं. चंद्रशेखर जी ने खड़े होकर नरसिम्हाराव जी से कहा कि प्रधानमंत्री जी, आपको चाक़ू सब्ज़ी छीलने के लिए दिया था, सब्ज़ी काटने के लिए दिया था, लेकिन आप तो उस चाक़ू से दिल का ऑपरेशन करने लगे. चंद्रशेखर जी का यह बहुत गंभीर ऑब्जर्वेशन मनमोहन सिंह और नरसिम्हाराव जी की पूरी आर्थिक नीतियों पर था. आज हमारे देश के विकास की गति शून्य हो गई है, जीडीपी नीचे चली गई है, शेयर बाज़ार का बुलबुला फट गया है और मनमोहन सिंह के वित्त मंत्री रहते और अब प्रधानमंत्री रहते 200 से अधिक ज़िले नक्सलवाद की चपेट में हैं. ये ऐसे ज़िले हैं, जहां विकास नहीं हुआ. जहां रोज़ी-रोटी के साधन उपलब्ध नहीं हैं. जहां आम लोग रहते हैं. वे लोग, जो अपने वोट से सांसदों को चुनते हैं यानी अपने वोट से लोकतंत्र को बनाए रखते हैं. इन ज़िलों में बहुत बड़ी ताक़त बंदूक लेकर आर्थिक नीतियों का विरोध कर रही है और जिनके हाथ में बंदूक़ नहीं है, वे इन ताक़तों को खाना, पीना एवं रहना उपलब्ध करा रहे हैं. दूसरे शब्दों में उन्हें पूरा समर्थन दे रहे हैं.

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क्या अब व़क्त नहीं आ गया है कि सारे राजनेताओं और खासकर उन उद्योगपतियों, जिन्हें अपने देश की अस्मिता, धरोहर और परंपराओं के ऊपर गर्व है, को तत्काल बैठकर इस स्थिति के बारे में सोचना चाहिए. 20 साल में आखिर ऐसा क्या हो गया कि हमारा देश आर्थिक विकास की जगह आर्थिक विनाश के मुहाने पर जाकर खड़ा हो गया. किसी ने सरकार को नहीं रोका, न नरसिम्हाराव की सरकार को और न भारतीय जनता पार्टी की सरकार को. भारतीय जनता पार्टी सात साल सत्ता में रही. अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री रहे और उन्होंने उन्हीं आर्थिक नीतियों को लागू किया, जिनका आरंभ नरसिम्हाराव, मनमोहन सिंह की सरकार ने किया था. उसके बाद फिर कांग्रेस की सरकार आ गई और कांग्रेस ने उन आर्थिक सुधारों को और तेज़ी से बढ़ाया, लेकिन देश 1991 की स्थिति से भी पीछे की ओर जा रहा है, ऐसा सा़फ दिखाई दे रहा है.

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सवाल यह है कि क्या सारे अर्थशास्त्री या अर्थ विशेषज्ञ देश बनाने या देश के आर्थिक विकास की योजना बनाने के नाम पर देश के साथ मखौल करते रहे. क्या यह देश अर्थशास्त्रियों के दिमाग़ी फितूर का शिकार हो गया है? क्या इस देश का किसान, मज़दूर, दलित, नौजवान एवं अल्पसंख्यक उन अर्थशास्त्रियों की वजह से अपने जीवनयापन के साधन खोने लगा है, जिन्हें देश के खेतों, खलिहानों, किसानों, मज़दूरों, नौजवानों और ग़रीबों की कोई चिंता नहीं है? ऐसे अर्थशास्त्रियों के नेता प्रणब मुखर्जी हैं और प्रणब मुखर्जी के नेता प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हैं, जिन्हें देश का और दुनिया का बड़ा अर्थशास्त्री माना जाता है. पर हम कैसे मानें? हमारे देश में तो इस अर्थशास्त्र ने हर जगह परेशानियां पैदा की हैं, समस्याएं पैदा की हैं और क़ीमतें बढ़ाई हैं. क़ीमतें भी ऐसी-वैसी नहीं, दस साल की तुलना तो की ही नहीं जा सकती. स़िर्फ छह-छह महीने की तुलना की जा सकती है. छह महीने पहले क़ीमतें क्या थीं, आज क़ीमतें क्या हैं? छह महीने पहले विकास की दर क्या थी, आज क्या है? छह महीने पहले मुद्रास्फीति की दर क्या थी, आज क्या है? हमारा देश एक भंवर जाल में फंस गया है. खतरे का एहसास न राजनेताओं को है और न अर्थशास्त्रियों को. यह खतरा हिंदुस्तान की अर्थ व्यवस्था पर नहीं मंडरा रहा है, बल्कि लोकतंत्र पर मंडरा रहा है.

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वे अर्थशास्त्री कहां हैं, जिनके पास आज के आर्थिक विकास के मॉडल का अल्टरनेटिव है? क्या देश में ऐसे अर्थशास्त्री हैं, जो ऐसी नीतियां बना सकें, ताकि भूख, बीमारी, कुपोषण एवं ग़ैर बराबरी से लोगों को थोड़ी राहत मिल सके? क्या ऐसे अर्थशास्त्री हैं, जो रा़ेजगार के साधन बढ़ा सकें, जो विकास के पहिए को सही दिशा में सही जगह ले जा सकें? क्या ऐसे अर्थशास्त्री हैं, जो दुनिया में हिंदुस्तान के काले होते चेहरे को और काला होने से रोक सकें? क्या ऐसे अर्थशास्त्री हैं, जो हिंदुस्तान के उद्योगपतियों को, बड़े पैसे वालों को बता सकें कि उन्हें अपना इंवेस्टमेंट प्लान बदलना चाहिए. अगर ऐसे अर्थशास्त्री हैं, तो यही व़क्त है कि वे सामने आएं. अगर वे सामने नहीं आते हैं, खामोश रहते हैं और अपने घरों में बैठकर आज की दुर्दशा की आलोचना करते हैं तो वे भी इस स्थिति के लिए उतने ही ज़िम्मेदार हैं, जितने ज़िम्मेदार वे अर्थशास्त्री हैं, जो प्रत्यक्ष रूप से हिंदुस्तान को बर्बादी की तऱफ ढकेल रहे हैं. अब व़क्त खामोश रहने का नहीं है. देश के प्रति लगाव और दुनिया में देश की इज्ज़त बचाने की ख्वाहिश रखने वाले अर्थशास्त्री एवं उद्योगपति और अगर कुछ राजनेता इस विचार के बचे हैं तो वे भी, इन सबसे हम अपील करते हैं कि फौरन एक अल्टरनेटिव प्लान सरकार के सामने, विपक्ष के सामने और सबसे बढ़कर देश की जनता के सामने रखें, ताकि हम कम से कम इतना विश्वास कर सकें कि हम अंधेरी खाई में गिरने से अब भी बच सकते हैं, देश में लोकतंत्र अब भी बना रह सकता है. लोकतंत्र के लिए बहुत ज़्यादा ज़रूरी है कि ऐसे लोग तत्काल सामने आएं.

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