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अलविदा! इंजीनियर
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अलविदा! इंजीनियर

असगर अली इंजीनियर साहब एक तरक्की पसंद और प्रगतिशील विचारधारा के स्कॉलर थे. अस्सी के दशक में इस चिंतक और विचारक ने इस्लाम और उसकी व्याख्या को तर्कों की कसौटी पर कसना शुरू किया, तो कट्टरपंथी बेचैन हो गए. आज वे नहीं रहे, लेकिन उन्हें हम उनकी किताबों के माध्यम से श्रद्धांजलि दे सकते हैं.

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एक बार कुछ लोग मोहम्मद साहब के  पास पहुंचे और उनसे पूछा कि हुजूर आपके  बाद अगर इस्लाम के  नाम पर उसकी अनर्गल व्याख्या की जाने लगे, तो उसको कैसे परखा जाए कि वह सही है या ग़लत. मोहम्मद साहब ने कुछ देर सोचने के  बाद जवाब दिया कि इस्लाम की किसी भी तरह की व्याख्या को पवित्र कुरआन की कसौटी पर कसना और अगर कोई भी व्याख्या, चाहे वह कितने भी बड़े विद्वान की क्यों न हो, कुरआन की कसौटी पर खरा न उतरे, तो उसको उठाकर दीवार पर मारना. मोहम्मद साहब के इस कथन को कई व्याख्याकारों ने भुला दिया या फिर यह कह सकते हैं कि उसे दरकिनार कर दिया. नतीजा यह हुआ कि इस्लाम में कट्टरपंथ को लगातार ब़ढावा मिलता रहा, लेकिन यह कहना भी ग़लत होगा कि सभी इस्लामी विद्वानों ने इस्लाम की व्याख्या में ग़लती की. वहां भी कई तरक्की पसंद और प्रगतिशील विचारधारा के  स्कॉलर हुए, जिन्होंने इस्लाम में फैली कुरीतियों के  ख़िलाफ़आवाज़ उठाई. अस्सी के  दशक में भारत में एक ऐसा ही चिंतक और विचारक सामने आया, जिसने इस्लाम और उसकी व्याख्या को तर्कों की कसौटी पर कसना शुरू किया. इस शख्स का नाम था असगर अली इंजीनियर.

अस्सी के दशक में ही असगर अली इंजीनियर साहब ने इस्लाम और भारत में सांप्रदायिक हिंसा के  नाम पर किताबों की एक पूरी श्रृंखला प्रकाशित की. उनके  तर्कों ने कट्टरपंथियों को बेचैन कर दिया. उन्हें लगा कि अगर इस शख्स को नहीं रोका गया, तो उनकी दुकानदारी बंद हो सकती है. धर्म की ग़लत-सलत व्याख्या कर अपनी दुकान चमकाने वालों ने असगर अली इंजीनियर पर एक नहीं, दो नहीं, बल्कि आधा दर्जन जानलेवा हमले करवाए. लेकिन असगर अली इंजीनियर अपने पथ से डिगे नहीं और अपनी कलम के  जोर पर कुरीतियों के  खिलाफ अपनी इस जंग को जारी रखा.

असगर अली का जन्म राजस्थान के  दाऊदी वोहरा समाज के एक परिवार में 10 मार्च, 1939 को हुआ था. उनकी प्रारंभिक शिक्षा मदरसे में हुई, जहां उन्हें कुरआन, हदीस और अरबी की तालीम दी गई, लेकिन असगर अली का दिल कहीं और लग रहा था. अपनी मेहनत के  बल पर उन्होंने इंदौर के  इंजीनियरिंग कॉलेज से सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और नौकरी के लिए मुंबई जा पहुंचे. उन्होंने तक़रीबन दो दशक तक मुंबई महानगरपालिका में इंजीनियर की नौकरी की और यहीं से उनके नाम के साथ इंजीनियर शब्द जुड़ गया. जब पूरा देश इमरजेंसी के सदमे और ख़ौफ़ में था, उस वक्त असगर अली साहब ने तय किया कि वह नौकरी नहीं करेंगे. नौकरी छोड़ने के  बाद उन्होंने दाऊदी बोहरा समाज में व्याप्त कुरीतियों के  ख़िलाफ़ आवाज़ उठानी शुरू कर दी. वर्ष 1977 में वह  सेंट्रल बोर्ड ऑफ दाऊदी बोहरा कमेटी के  महासचिव बने. इस पद पर पहुंचते ही उन्होंने इस समाज में जारी कठमुल्लेपन पर अपनी लेखनी और कार्यों के  ज़रिए हल्ला बोल दिया. असगर अली साहब ने इस्लाम और इस्लामिक न्याय शास्त्र का तार्किक विवेचन शुरू कर दिया. नतीजा यह हुआ कि बोहरा समाज के धर्मगुरु ने उनको समाज से बाहर करने का फरमान जारी कर दिया. समाज बदर के  फरमान के  बाद उनके  दफ्तरों पर हमले हुए, लेकिन कोई भी इस्लामी संगठन उनके बचाव के लिए आगे नहीं आया. उस वक्त असगर अली इंजीनियर बेहद जांबाजी के साथ कठमुल्लों से लोहा लेते रहे और उन्होंने यह साबित किया कि क्रांति के  लिए हथियार उठाना ज़रूरी नहीं, बल्कि कलम के ज़ोर पर भी समाज में बदलाव के बीज बोए जा सकते हैं. उनके  इस काम में हिंदी की उस दौर की प्रतिष्ठित पत्रिका सारिका और उसके तत्कालीन संपादक कमलेश्‍वर ने साथ दिया. असगर अली इंजीनियर के कई लेख उस दौर में सारिका में छपे, जिसके  बाद गैर उर्दू पाठकों के  बीच भी उनकी एक छवि निर्मित हुई. इस्लाम की व्याख्या का असगर अली इंजीनियर का अपना एक अलहदा तरीक़ा था. दरअसल, वे यह मानते थे कि इस्लाम में जिनकी आस्था नहीं है, वह भी इस्लामिक नागरिकों की तरह ही इंसान हैं. ज़ोर जबरदस्ती से धर्म के प्रचार के वे ख़िलाफ़ थे, उनकी यही बातें कठमुल्लों को रास नहीं आती थी.

आज के मौजूदा हालात में भारत के अलावा, विश्‍व के कई देशों में इस्लाम को लेकर बहुत भ्रांतियां व्याप्त हैं. अलग-अलग तरह की टीकाओं और व्याख्याओं के  चलते इस्लाम की छवि एक कट्टरपंथी धर्म के रूप में दिनों दिन और मजबूत होती जा रही है. इस्लाम की सही व्याख्या करती हुई किताबें भी भारत में लगभग नहीं के  बराबर मौजूद हैं. असगर अली इंजीनियर ने अपने लेखन से भरसक इस कमी को दूर करने की कोशिश की. उनकी कई किताबें- इस्लाम एंड इट्स रेलिवेंस टू ऑवर एज, इस्लाम एंड रिवोल्यूशन, इस्लाम एंड मुस्लिम्स जैसी किताबों ने धर्म पर छाए धुंध को हटाने का काम किया. भारत में दंगों पर भी असगर अली इंजीनियर साहब ने काफ़ी काम किया. दंगा पीड़ित इलाक़ों का भ्रमण करने के  बाद वहां के  लोगों के मनोविज्ञान पर भी उन्होंने किताबें लिखीं. इस विषय पर लिखी उनकी दो किताबें- कम्युनलिज्म और कम्युनल वॉयलेंस इन इंडिया और कम्युनल रॉयट्स इन पोस्ट इंडिपेंडेंस इंडिया- बेहतरीन हैं. भारत के  सामाजिक तानेबाने को समझने के लिए इन दो किताबों को पढ़ना मुझे ज़रूरी सा लगता है.

असगर अली इंजीनियर साहब इस्लाम में स्त्रियों की स्थिति को लेकर ख़ासे चिंतित रहा करते थे. उनका मानना था कि कुरआन में स्त्रियों को जो जगह दी गई है, वह अभी उस मुक़ाम तक नहीं पहुंच पाई है. असगर अली साहब कहते थे कि मुसलमानों में जिस तरह का पितृसत्तात्मक समाज है, वहां महिलाओं को अभी तक बराबरी का हक़ नहीं दिया जा सका है. वह ताउम्र मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के  लिए लड़ते रहे. असगर साहब का मानना था कि आधुनिक जमाने की महिलाएं ज़्यादा पढ़ी लिखीं और संवेदनशील हैं. लिहाजा उन्हें यह गंवारा नहीं है कि वे अपने पति का प्यार अपनी सौतन के  साथ बांटें. उनका मानना था कि स्त्रियों को बराबरी का हक़ देने की वकालत नहीं करने वाले लोग धार्मिक नहीं हो सकते. हालांकि असगर अली के आलोचक इस बात से इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते थे. उनके विरोधियों का तर्क है कि असगर अली ने कुरआन की व्याख्या बेहद आधुनिक तरी़के  से की है. जिस वक्तकुरआन अस्तित्व में आया था, उस वक्तके हालात अलग थे. लेकिन असगर अली इंजीनियर अपनी बातों पर अडिग रहे. असगर अली इंजीनियर साहब ने पचास से ज़्यादा किताबें लिखीं. अभी कुछ सालों पहले ही उनकी आत्मकथा भी आई थी.

14 मई को असगर अली इंजीनियर साहब ने मुंबई में अंतिम सांस ली. उन्हें उनकी आख़िरी इच्छा के  मुताबिक दाऊदी बोहरा संप्रदाय के कब्रिस्तान में नहीं दफनाकर सांताक्रूज के  मुस्लिम कब्रिस्तान में दफनाया गया. जहां उनके दोस्त मजरूह सुल्तानपुरी, कैफी आजमी और अली सरदार जाफरी दफन हैं. उन्हें उनके  बेटे इरफान के  साथ उनके  निकट सहयोगी राम पुनियानी ने कब्र में उतारा. एक मुसलमान स्कॉलर को एक हिंदू ने कब्र में उतारा, इसका एक बड़ा संदेश है, जो अली असगर इंजीनियर साहब देना चाहते थे. असगर अली इंजीनियर साहब को श्रद्धांजलि.

हज़ारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पर रोती है.

बड़ी मुश्किल से होता है, चमन में दीदावर पैदा..

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