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पुरस्कारों में पारदर्शिता का प्रशन
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पुरस्कारों में पारदर्शिता का प्रशन

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पद्म पुरस्कारों पर विवाद कोई नई बात नहीं है, लेकिन हर बार सवाल चयनित नामों को लेकर हुआ इस बार विवाद चयन की प्रक्रिया को सार्वजनिक करने को लेकर है. हालांकि इस बात को लेकर कोई बहस की गुंजाइश नहीं है कि प्रतिभा की पहचान का मामला सब्जेक्टिव होता है, जिसको लेकर कई मत हो सकते हैं, लेकिन अगर इस चुनाव की प्रक्रिया को सार्वजनिक बना दिया जाए और जिन्हें चुना जा रहा है, उनकी शख्सियत को लोगों से पहले ही साझा किया जाए, तो इसमें विवाद की गुंजाइश काफी कम हो सकती है. हालांकि सरकार ने सूचना आयुक्त  के इस पत्र को ठंढे बस्ते में डालकर एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि इस देश में आम आदमी की रायशुमारी संभव नहीं है.

पद्म पुरस्कार के पीछे का खेल एक बार फिर सुर्खियों में है, लेकिन सुर्खियां इस बार किसी पुरस्कृत की योग्यता को लेकर नहीं, बल्कि उसके चयन प्रक्रिया को सार्वजनिक करने की मांग को लेकर है. देश के मुख्य सूचना आयुक्त सत्यानंद मिश्र ने हाल ही में केंद्रीय गृहमंत्री को इस आशय का पत्र लिखा है कि कई वर्षों से देश की जनता इस बात को लेकर रोष जता रही है कि पद्म पुरस्कारों के नामित लोगों की सूची, उनके चयन की प्रक्रिया, उनके चयनित होने की योग्यता व उनसे जुड़ी अन्य जानकारियां उन्हें पुरस्कृत करने से पहले गृह मंत्रालय की वेबसाइट पर अपडेट कर आम जनता से साझा की जाए. बावजूद इसके, गृह मंत्रालय ने इस बाबत अभी तक कोई भी जानकारी अपनी बेवसाइट पर अपडेट नहीं की है.

मंत्रालय के इस कदम से एक बार फिर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि इस देश में आम आदमी को कुछ भी जानकारी देने की नीयत सरकार की नहीं है. सरकार ने कई बार यह साबित भी किया है. इस संदर्भ में हाल का उदाहरण सामने है. राजनीतिक पार्टियां खुद सूचना के अधिकार के दायरे में न आएं, इसके लिए विधेयक पास करने की तैयारी हो चुकी है.

वास्तव में इस जानकारी की मांग लंबे समय से उठ रही है कि जिन लोगों नाम पद्म पुरस्कारों के लिए नामित हो रहे हैं, आम जनता उनके बारे में जाने. दुनिया भर के सभी बड़े पुरस्कारों व सम्मान में यह सार्वजनिक सूचना दी जाती है. नोबेल पुरस्कारों के लिए नामित लोगों की सूचना तो तकरीबन एक वर्ष पहले ही दे दी जाती है, लेकिन भारत में सरकारें पद्म पुरस्कारों में नामित व्यक्तियों की सूचना हर बार यह कह कर देने से मना करती रही है कि इससे गोपनीयता का हनन होता है और इसी गोपनीयता के हनन को पर्दा बनाकर प्राय: ऐसे नाम भी सामने आते हैं, जो इन पुरस्कारों की प्रतिष्ठा को ही सवालों के घेरे में खड़ा कर देते हैं. 2013 के पद्मश्री के सम्मान की सूची में एक ऐसे व्यक्ति का नाम भी था, जो वेट लॉस क्लीनिक चलाते हैं और कई सारे वीवीआईपी और मंत्री-सांसद उनकी सेवाएं लेते हैं. मीडिया में उस वक्त खबरें आई थीं कि सात कैबिनेट मिनिस्टर व दस राज्य मंत्रियों ने उनके नाम का अनुमोदन किया था. इस तरह कई बार इन पुरस्कारों में ऐसे नाम शामिल हुए, जिनको लेकर कहा गया कि यह व्यावसायिक लाभ के लिए किया गया है और जिस तरह से इन पुरस्कारों का प्रयोग राजनीतिक लाभ के लिए किया जा रहा है, ऐसे में इस बात की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता कि इस सूची में श्रीमान ओसामा बिन लादेन जी और हाफिज सईद साहब के नाम शामिल हो जाएं.

दूसरा मसला पुरस्कृत होने वाले नामों के चयन की प्रक्रिया और निर्णायक मंडल को लेकर है. सर्वोच्च न्यायालय ने बालाजी राघवन-एस.पी. आनंद बनाम भारत सरकार (1996 (1) एससीसी 361) प्रकरण पर अपने निर्णय में कई निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि पद्म पुरस्कार पाने के हकदार व्यक्तियों के चयन के लिए राष्ट्रीय चयन समिति गठित की जाए, जिसमें लोकसभा अध्यक्ष, भारत के मुख्य न्यायाधीश या उनके प्रतिनिधि, लोकसभा में विपक्ष के नेता आदि को शामिल किया जाना चाहिए. चूंकि इन पुरस्कारों का इस्तेमाल नेताओं ने अपने व्यापारिक हितों व व्यक्तिगत संबंधों को साधने में शुरू कर दिया, इसलिए इन सुझावों को नजरअंदाज किया जा रहा है. इस वर्ष की शुरुआत में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ में दायर एक याचिका में यह मांग भी की गई थी कि इन पुरस्कारों को लेकर केंद्रीय गृह मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय को सर्वोच्च न्यायालय के सुझाव पर अमल करते हुए राष्ट्रीय चयन समिति का गठन तथा मात्रात्मक एवं गुणात्मक अर्हता निर्धारित करने का निर्देश देना चाहिए.

एक और मुद्दा, जिसे लेकर फिलहाल अभी तक बड़ी बहस नहीं शुरू हुई है, वह यह कि पद्म पुरस्कारों के लिए निर्धारित फॉर्म के एक कॉलम में धर्म व जाति (एससी/एसटी/ओबीसी/सामान्य) का जिक्र किया गया है. भारतीयता से जुड़े पुरस्कार में इस कॉलम के क्या मायने हैं, यह समझ से परे है और वह तब, जबकि भारतीय संविधान में उल्लेखित मूल अधिकारों में धर्म, मूल वंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर विभेद  प्रतिषेध की भावना निहित है. ऐसे पुरस्कार, जो राष्ट्रीयता के लिए दिए जा रहे हैं, उनमें धर्म व जाति की जानकारी लेना कहीं से भी उचित नहीं है.

पद्म पुरस्कारों को लेकर एक और सवाल खड़ा होता है कि इन पुरस्कारों की सीमा में आम आदमी क्यों नहीं आता. यूनाइटेड नेशन ने देश की ऐसी कई शख्सियतों को सम्मानित किया है, जो प्रचार की आस से परे दूर-दराज के क्षेत्रों में सामाजिक उत्थान की भूमिका में हैं, लेकिन देश में उन्हें कोई पहचान नहीं है. हाल ही का उदाहरण लें, तो मेरठ की एक किशोरी रजिया सुल्ताना को अपने गांव के कुछ बच्चों को बाल मजदूरी से मुक्त कराकर शिक्षा के लिए भेजने जैसे सराहनीय काम को पहचान देते हुए संयुक्त राष्ट्र ने सम्मानित किया और पहला मलाला अवॉर्ड देने की घोषणा की. भारत सरकार ने इस बच्ची की कोई सुध नहीं ली, न तो कभी सार्वजनिक मंचो से उसके इस प्रयास को कोई सराहना ही मिली. आपको याद होगा, पिछले वर्ष एक टेलीविजन चैनल को दिए गए साक्षात्कार में जब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से यह सवाल किया गया कि किसे इस साल का इंडियन ऑफ द ईयर चुना जाना चाहिए, तो उनका जवाब था आम आदमी, लेकिन वह आदमी अब केवल भाषणों की शोभा बढ़ाने और गरीबी के आंकड़े पेश करने के लिए उदाहरण भर रह गया है. बुसान एशियाड में स्नूकर खेल में स्वर्ण पदक विजेता यासीन मर्चेंट ने पद्म पुरस्कारों में चयनित लोगों की योग्यता पर सवाल उठाते हुए कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी को पत्र लिखकर और उसे सार्वजनिक करते हुए लिखा था कि न तो मेरी राजनीतिक पहुंच है और न पुरस्कार खरीदने की क्षमता है. इन सवालों का जवाब न तो सोनिया गांधी या राहुल गांधी के पास है और न ही किसी दूसरी सरकार के पास.

पद्म पुरस्कारों के चयन में पारदर्शिता लाने के लिए 1996 में उपराष्ट्रपति के पद पर रहते हुए के. आर. नारायणन ने एक उच्च स्तरीय प्रिव्यू कमेटी बनाई थी. और फिर 2004 में तो इन पुरस्कारों को लेकर इतना विवाद हुआ कि पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम को इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा था. उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से इसमें अनियमितता दूर करने को कहा था, लेकिन हर बार की तरह मसला वही ढाक के तीन पात होकर रह गया था.

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह पुरस्कार केवल राजनीतिक फायदे के लिए ही हैं या इनके कुछ सामाजिक मायने भी हैं. 2009 में भी श्रीनगर के एक शॉल व्यापारी को कला की कैटिगरी में पद्मश्री दिए जाने की कड़ी आलोचना हुई थी. 2011 इंडियन टौबेको कंपनी (आईटीसी) के अध्यक्ष वाईसी देवेश्‍वर को पद्म भूषण दिए जाने पर कुछ संस्थाओं ने गंभीर सवाल उठाया है. खासतौर से इससे नाराज तंबाकू विरोधी लॉबी का कहना था कि कंपनी भले ही दूसरे कई उत्पाद बनाने लगी हो, पर इसकी ज्यादातर कमाई तो सिगरेट बेचने से ही हो रही है. पद्मश्री गुलाम मोहम्मद मीर के बारे में बताया जा रहा है कि वे जम्मू-कश्मीर में पुलिस के मुखबिर थे.

पद्म पुरस्कारों को लेकर मंत्रालय से जुड़े सूत्र बताते हैं कि इसमें केवल ब्यूरोक्रेट्स की मनमानी चलती है. एक अनुमान के मुताबिक, सम्मानितों के तकरीबन 75 प्रतिशत नाम यहीं से तय कर लिए जाते हैं. बाद में इसी लिस्ट में कुछ नामों की श्रेणी बदल कर मसलन पद्मश्री, पद्म भूषण और पद्म विभूषण के लिए जिन्हें नामित किया गया, उनमें थोड़ा बहुत फेरबदल कर के लिस्ट राष्ट्रपति भवन को भेज दी जाती है. यह बड़ी विडंबना है कि इस कमेटी के सदस्यों के चयन की योग्यताओं और प्रक्रिया के बारे में भी किसी को कुछ मालूम नहीं है. साफ है कि नौकरशाहों की इन पुरस्कारों में मनमानी इसलिए चल पाती है, क्योंकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन्हें अपने खास लोगों को उपकृत करने का जरिया बना लिया है.

हालांकि इस बात को लेकर कोई बहस की गुंजाइश नहीं है कि प्रतिभा की पहचान का मामला सब्जेक्टिव होता है, जिसको लेकर कई मत हो सकते हैं, लेकिन अगर इस चुनाव की प्रक्रिया को सार्वजनिक बना दिया जाए और जिन्हें चुना जा रहा है, उनकी शख्सियत को लोगों से पहले ही साझा किया जाए, तो इसमें विवाद की गुंजाइश काफी कम हो सकती है. पद्म पुरस्कारों के चयन का तरीका बदलकर भी ऐसे किसी विवाद से बचा जा सकता है. नोबेल पुरस्कार की तरह इसे एक सालाना प्रक्रिया में बदल दिया जाए और जो नाम आएं, सभी मंत्रालय और राज्य सरकारों से विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोगों के नाम मंगवा कर पूरे वर्ष भर उनका विश्‍लेषण किया जाए. इससे इन पुरस्कारों की चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी.

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह पुरस्कार केवल राजनीतिक फायदे के लिए ही हैं या इनके कुछ सामाजिक मायने भी हैं. 2009 में भी श्रीनगर के एक शॉल व्यापारी को कला की कैटिगरी में पद्मश्री दिए जाने की कड़ी आलोचना हुई थी. 2011 इंडियन टोबैको कंपनी (आईटीसी) के अध्यक्ष वाईसी देवेश्‍वर को पद्मभूषण दिए जाने पर कुछ संस्थाओं ने गंभीर सवाल उठाया है. खासतौर से इससे नाराज तंबाकू विरोधी लॉबी का कहना था कि कंपनी भले ही दूसरे कई उत्पाद बनाने लगी हो, पर इसकी ज्यादातर कमाई तो सिगरेट बेचने से ही हो रही है.

दरअसल, सूचना आयुक्त ने गृह मंत्रालय को जो पत्र लिखा है, वह केवल उनकी मांग नहीं है. उन्होंने पत्र में खुद लिखा है कि देश की जनता लंबे समय से आयोग को यह पत्र भेजकर मांग कर रही है कि इस पूरी प्रक्रिया को सार्वजनिक किया जाए, लेकिन जब इन पुरस्कारों को लेकर यह व्यवस्था तक नहीं है कि जिन्हें यह सम्मान दिया जा रहा है, उनको अग्रिम सूचना दी जाए या उनसे सहमति ली जाए कि क्या उनके बारे में आम लोगों को जानकारी देने का कोई तंत्र बनाया जाएगा. जब इन पुरस्कारों के आयोजकों में इतना शिष्टाचार नहीं है कि किसी वयोवृद्ध साहित्यकार को पद्म भूषण लेने के लिए राष्ट्रपति भवन में बुलाया जाए, लेकिन कार्यक्रम में अकेले न जा सकने के कारण उन्हें घुसने न दिया जाए, तो यह उम्मीद करना बेमानी ही है कि मंत्रालय यह सभी सूचनाएं आम जनता से साझा करेगा. मुख्य सूचना आयुक्त के इस पत्र को नजरअंदाज कर गृह मंत्रालय ने अपनी नीयत जता भी दी है.

 

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