fbpx
Now Reading:
शिक्षक दिवस पर विशेष : अब शिक्षा में भी क्रांति की दरकार…

शिक्षक दिवस पर विशेष : अब शिक्षा में भी क्रांति की दरकार…

pix-

शिक्षण संस्थाएं केवल डिग्रीधारक पैदा करने की मशीन हो गई हैं और नौकरी पाने की शैक्षणिक योग्यता तय कर दी गई है. आप ग्रेजुएट हैं, तभी यह फॉर्म भर सकते हैं और पोस्ट ग्रेजुएट हैं, तभी इस पद के योग्य हैं. शैक्षणिक योग्यता शब्द ने जो प्रतिस्पर्धा खड़ी की, उसकी वजह से शिक्षा के बुनियादी तत्व खतरे में पड़ गए. इस बात का क्या प्रमाण है कि आपके पास यह डिग्री है तो आप इस पद के लिए योग्य हैं ही.

21वीं सदी में दाखिल होते-होते एक तरह से समूचा विश्‍व उत्तर आधुनिकता के दरवाजे पर खड़ा हो गया था. 17वीं से लेकर 20वीं शताब्दी तक बदलावों की परिभाषा के शब्द क्रांतियों के माध्यम से लिए जा रहे थे और यह महसूस किया जाने लगा था कि जड़ता को मिटाने के लिए बौद्धिक एकजुटता की जरूरत है. इसी बौद्धिक एकजुटता ने पुरानी और रू़ढ पड़ चुकी व्यवस्था को हटाने के लिए दुनिया में क्रांतियों को जन्म दिया, लेकिन जब गुबार थमा तो उन क्रांतियों के परिणाम की व्याख्या शुरू हुई और हालात जस के तस दिखे. आधुनिक संदर्भों में धार्मिक क्रांतियों की जो परिणति है, वह सबके सामने है. समूचा विश्‍व धर्म के नाम पर बंटा हुआ है. राजनीतिक क्रांतियां हुईं, लेकिन भीतर की सत्ताधारी मानसिकता नहीं बदली. एक दल गया, दूसरा आया. वह भी सत्ताधारी सोच का ही पोषक. आर्थिक क्रांतियां हुईं. पूंजीवाद गया, तो प्रबंधकवाद आ गया. उतना ही खतरनाक. नये-नये वर्ग बन गए, लेकिन वर्ग व्यवस्था बनी रही और वैज्ञानिक क्रांतियों ने तो मानवता को समाप्ति के मुहाने पर ही लाकर खड़ा कर दिया.

इस तरह व्यवस्था में बदलाव के लिए पिछले सैक़डों वर्षों में जितने प्रयोग हुए हैं, वे अपने उद्देश्य में सफल ही हुए. इसको लेकर संदेह बना हुआ है. इसीलिए पिछले एक दशक से यह आवाज अब जोर पकड़ने लगी है कि वास्तविक रूप में समाज के सभी अंगों में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए शिक्षा क्रांति की जरूरत है. हालांकि, इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि अंग्रेजी शासन के ही दौर से भारतीय शिक्षा व्यवस्था में बदलावों की कोशिश की जा रही है, लेकिन इन बदलावों को अमली जामा पहनाने के लिए कभी ऐसी प्रतिबद्धता नहीं दिखाई गई कि वास्तविक बदलावों के सही रूप सामने आ सकें. हां, यह जरूर किया गया कि शिक्षा व्यवस्था को राजनीतिक रंग देकर उसे दो धाराओं में यानी दक्षिणपंथी व भारतीयता को सही साबित करने वाली व्यवस्था व मैकाले पुत्रों की यानी भारतीयता को खत्म करने वाली व्यवस्था के तौर पर व्याख्यायित कर बांट दिया गया. इसलिए एक बार फिर जब हम तकनीक के माध्यम से शिक्षा में क्रांति लाने की बात कर रहे हैं, हर हाथों में टैबलेट व लैपटॉप देकर डिजिटल शिक्षा की अगली पंक्ति में खड़ा करने की बात कर रहे हैं, तब यह समझने की बेहद जरूरत है कि आखिर हमारे एजुकेशन सिस्टम के वे कौन से लूप होल हैं, जो शिक्षा क्रांति की राह में मुश्किल खड़ी कर रहे हैं.

Related Post:  Pok के बलूचिस्तान में लगेगी मोदी की प्रतिमा, इस महिला ने किया बड़ा ऐलान

शिक्षा के संदर्भ में भवानी प्रसाद मिश्र की यह पंक्तिया बड़ी प्रभावित करती हैं कि कुछ लिखकर सो कुछ पढ़कर सो, जिस जगह जागा सवेरे, उस जगह से बढ़कर सो, लेकिन आधुनिक प्रगतिवादी मान्यताओं में उस जगह से बढ़कर सो-के विचार यानी कर्म प्रधानता को भारतीय शिक्षा के बुनियादी विचार से पूरी तरह अलग कर दिया गया.  भारत में शिक्षा के चार स्तर थे-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष. प्राचीन भारत की शिक्षा मोक्ष का मार्ग थी, लेकिन आज की शिक्षा भोग का मार्ग है. भोग का मार्ग बनने में कोई बुराई नहीं है, भोग का मार्ग किस तरह बनाया जा रहा है और किन शर्तों पर, यह सवाल जरूर खड़ा होता. आइए, पहले इस सवाल को समझते हैं.

शिक्षा को लेकर एक बड़ा मशहूर जुमला है कि शिक्षे तेरा नाश हो, जो तू नौकरी के हित बनी. भारतीय शिक्षा व्यवस्था के भीतर बुनियादी मुश्किलें यहीं से शुरू हुईं, जब शिक्षा और नौकरी दोनों को एक दूसरे के पूरक के तौर पर देखा जाने लगा. शिक्षण संस्थाएं केवल डिग्रीधारक पैदा करने की मशीन हो गईं और नौकरी पाने की शैक्षणिक योग्यता तय कर दी गई. आप ग्रेजुएट हैं, तभी यह फॉर्म भर सकते हैं और और पोस्ट ग्रेजुएट हैं तभी इस पद के योग्य हैं. शैक्षणिक योग्यता शब्द ने जो प्रतिस्पर्धा खड़ी की, उसकी वजह से शिक्षा के बुनियादी तत्व खतरे में पढ़ गए. इस बात का क्या प्रमाण है कि आपके पास यह डिग्री है तो आप इस पद के लिए योग्य ही हैं. आतंकवाद की तो कोई डिग्री नहीं होती और न ही कोई पढ़ाई, लेकिन दुनिया के सबसे बड़े आतंकवादियों और अपराधियों की बात करें तो उनकी शिक्षा और ज्ञान का स्तर आम शिक्षित लोगों से कहीं ज्यादा रहा है और उन्हें दुनियाभर की मालूमात थी. तो क्या यह माना जाए कि उन्हें जो शिक्षा दी गई वह आतंकवाद की थी. निश्‍चित तौर पर बुनियादी समझ विकसित करने में कमी रह गई. इसलिए कई बार यह साबित होता है कि शिक्षा की यह पद्धति बच्चों में कहीं से स्वतंत्र चेतना तो पैदा करती ही नहीं, बल्कि भारतीय परिस्थितियों में अभाव के शिकार बचपन, समाज, परंपरा और अपने आसपास के पर्यावरण से अवलोकन कर बच्चा जो कुछ सीखता है, उसका भी गला घोंट देती है.

नील्सन-मैकिन्से का पिछले वर्ष के आखिर में एक सर्वे आया था जिसके मुताबिक भारत के 10 आर्ट्स ग्रेजुएट और और चार इंजीनियरिंग ग्रेजुएट में से एक-एक ही नौकरी के लायक हैं. साफ है, हमारी शिक्षा व्यवस्था रोजगार नहीं, बेरोजगार पैदा कर रही है. एक लंबा वक्त और बड़ी मात्रा में पैसा खर्च करने के बाद अगर यह शिक्षा व्यवस्था शिक्षित बेरोजगार पैदा कर रही है तो ऐसी निर्गुण शिक्षा के क्या मायने? भारत में हायर एजुकेशन में दाखिले का अनुपात 13 प्रतिशत है और अमेरिका में 83 प्रतिशत. जबकि हम खुद को ज्ञान की अर्थव्यवस्था कह कर अपनी पीठ थपथपाते हैं.

Related Post:  Viral Video : मोदी ने कार्यकर्ताओं का किया 'अभिनन्दन' तो पाक को याद आये विंग कमांडर

जैसे-जैसे हमारी आबादी बढ़ रही है, वैसे वैसे ही स्नातक बढ़ते जा रहे हैं. ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवेलपमेंट ऑर्गनाइजेशन की ओर से जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 2015 तक भारत में ग्रेजुएट्स की संख्या अमेरिका से ज्यादा हो जाएगी और चीन के बाद वह दूसरे नंबर पर आ जाएगा. यह सूचना बड़ी सुखद सी लगती है कि देश में साक्षर लोगों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन इसी संस्था का सर्वे जब यह भी कहता है कि शिक्षा में गुणवत्ता के लिहाज से हम 73 देशों में 72वें स्थान पर हैं, तो चिंता बढ़ जाती है.

शिक्षा व्यवस्था में क्रांति की दरकार और बढ़ जाती है, जब बात इसके राजनीतिकरण की उठती है. भारतीय संविधान  के अनुच्छेद 28, 29, 30, 45, 46, 337, 350 ए, 350 बी, और अनुच्छेद 351 में शिक्षा संबंधी प्रावधान हैं. इन सबसे बढ़कर राइट टू एजुकेशन है. लेकिन चूंकि शिक्षा राज्य का भी विषय है, इसलिए सरकारें हर बार यह कह कर पल्ला झाड़ लेती हैं कि शिक्षा व्यवस्था को लेकर केंद्र सरकारें कई योजनाएं शुरू कर चुकी हैं, लेकिन राज्य सरकारें इस दिशा में उतनी गंभीर नहीं हैं. एक समारोह में कुछ महीनों पहले कपिल सिब्बल ने एक बयान दिया था कि सकल दाखिला अनुपात को बढ़ाने के लिए मौजूदा 604 विश्‍वविद्यालय और 31,000 कॉलेज नाकाफी हैं. सिब्बल ने तर्क दिया कि समूची मांग को पूरा करने के लिए केंद्र के पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं. जबकि शिक्षा राज्य का भी विषय है, लेकिन ज्यादातर राज्य इस सेक्टर के लिए पर्याप्त पैसा आवंटित नहीं करते. क्या इस तरह की राजनैतिक बयानबाजी के माध्यम से अपनी जिम्मेदारियों पर पर्दा डाला जा सकता है.

इस संदर्भ में सबसे बड़ी मुश्किल है शिक्षकों का अपनी जिम्मेदारी से दूर भागना. हम भले ही हर वर्ष शिक्षक दिवस मना लें, लेकिन अगर सम्मानीय शिक्षक अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे तो शिक्षा क्रांति क्या, शिक्षा विश्‍व युद्ध से भी कोई तब्दीली नहीं आएगी.  देश में 13 लाख स्कूली अध्यापकों के पद खाली हैं. कॉलेजों, विश्‍वविद्यालयों में 40 फीसदी पद रिक्त हैं. लेकिन विडंबना तो यह है कि एक तरफ तो शिक्षकों का टोटा है, वहीं देश के तकरीबन हर राज्य में शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया भ्रष्टाचार की जद में है. हरियाणा, उप्र, बिहार और हिमाचल प्रदेश का नाम तो शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में व्याप्त भ्रष्टाचार में सबसे आगे है. यूनेस्को की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय शिक्षा तंत्र में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार है. करप्शन इन एजुकेशन नाम की इस स्टडी रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय स्कूलों के शिक्षक स्कूल से गायब रहने में सबसे आगे हैं. वैश्‍विक स्तर पर देखें तो युगांडा ही ऐसा देश है, जहां के शिक्षक स्कूल से गायब रहने में हमसे आगे हैं. शायद इस पर भी हम खुद को शाबासी दें जैसा कि हमारे प्रधानमंत्री कहते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था कई देशों से बेहतर है और जाहिर तौर पर वह नाम होंगे, बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्रीलंका और नेपाल. दुनिया में 100 में से औसतन बीस शिक्षक ही स्कूल से गायब रहते हैं जबकि, भारत के 100 में 25 शिक्षक स्कूल नहीं आते और इनमें बिहार और यूपी सबसे आगे हैं.

Related Post:  बिश्केक में पीएम मोदी ने की जिनपिंग और पुतिन से मुलाकात, मसूद अजहर और पाकिस्तान पर हुई बात

क्या यह वही देश है जहां नालंदा विश्‍वविद्यालय था, क्या यह वही देश है जिसने हर काल में शिक्षा के संदर्भ में कई प्रतिमान गढ़े. लार्ड मैकाले ने 1834 में ब्रिटिश संसद में दिए गए अपने एक वक्तव्य में कहा था कि मैंने उत्तर से दक्षिण तक सम्पूर्ण भारत का भ्रमण और अध्ययन किया, पर कोई भी गरीब या भिखारी नहीं मिला मुझे, शिक्षा का ऐसा प्रबंध है वहां कि हर कोई अन्वेषण कर सकता है. फिर हम इस हालात पर कैसे पहुंचे, क्योंकि इस क्षेत्र में हमने कभी लड़ाई लड़ने की जरूरत नहीं समझी.

इस देश को एमएस स्वामीनाथन मिले, जिन्होंने हरित क्रांति को जन्म दिया. धीरूभाई अंबानी मिले, जिन्होंने एक आम आदमी के सपनों को साकार करने का पाठ पढ़ाया. एपीजे अब्दुल कलाम मिले, जिन्होंने सही मायनों में भारत को शक्ति संपन्न बनाया. इन सभी मामलों में देश आगे बढ़ता गया, क्योंकि इनके प्रयासों को सही दिशा में आगे ले जाने के लिए योग्य लोग जुड़ते गए, लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में राधाकृष्णन जी के प्रयासों को सिर्फ शिक्षक दिवस के तमगे तक सीमित कर दिया गया. हम अपनी शिक्षा व्यवस्था का पतन अपनी आंखों के सामने ही होते हुए देखते रहे, उसके लिए कोई लड़ाई नहीं ल़डी. कभी क्रांति के हालात नहीं पैदा किए. प्रगतिवादी समाज में एक नारा दिया जाता है लड़ो लड़ाई लड़ने को, पढ़ो समाज बदलने को. इस सोच में सुधार की जरूरत है. शिक्षा व्यवस्था को मजूबत बनाना है तो लड़ो लड़ाई पढ़ने को और पढ़ो समाज बदलने को.

ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकॉनोमिक कोऑपरेशन एंड डेवेलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन की ओर से जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 2015 तक भारत में ग्रेजुएट्स की संख्या अमेरिका से ज्यादा हो जाएगी और चीन के बाद वह दूसरे नंबर पर आ जाएगा. यह सूचना बड़ी सुखद सी लगती है कि देश में साक्षर लोगों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन इसी संस्था का सर्वे जब यह भी कहता है कि शिक्षा में गुणवत्ता के लिहाज से हम 73 देशों में 72वें स्थान पर हैं, तो चिंता बढ़ जाती है.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Input your search keywords and press Enter.