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आज़ादी का संघर्ष और समाजवादी
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आज़ादी का संघर्ष और समाजवादी

समाजवादी आंदोलन की शुरुआत भारत और दुनिया में एक अर्थ में बहुत पहले हो जाती है. वह अर्थ है अनासक्ति का, मिलकियत और ऐसी चीज़ों के प्रति लगाव ख़त्म करने या कम करने का, मोह घटाने का. जबसे समाजवाद के ऊपर कार्ल मार्क्स की छाप बहुत पड़ी, तबसे एक दूसरा अर्थ सामने आ गया. वह है संपत्ति की संस्था को ख़त्म करने का, संपत्ति रहे ही नहीं, चाहे क़ानून से, चाहे जनशक्ति से. रूस क्रांति करके संपत्ति को मिटा चुका 1919 में. उसके बाद दुनिया में समाजवादी आंदोलन की एक धारा ऐसी बही, जो संपत्ति को मिटाना चाहती थी, लेकिन उसके साथ-साथ रूस से जुड़ जाती थी. साम्यवादी उसे अंतरराष्ट्रीय धारा कहेंगे और विरोधी देशद्रोही धारा. मैं कहूंगा कि वह परदेशमुखी धारा थी. जिसे एक तरह से असली समाजवादी धारा कह सकते हैं, वह हिंदुस्तान में 1934 में शुरू होती है. (डॉ. राम मनोहर लोहिया-समाजवादी आंदोलन का इतिहास)

जलियांवाला बाग नरसंहार के बाद एक तऱफ अंदर ही अंदर जनसामान्य में गुस्से की लहर दौड़ गई, दूसरी तऱफ बड़े-बड़े पदवीधारियों की आंखों से अंग्रेजी सुशासन की पट्टी उतर गई. गांधी ने हिंदू और मुस्लिम जनता को जोड़कर असहयोग आंदोलन की शुरुआत की. अंग्रेजों को इस कदर व्यापक जनउभार का अंदाज़ा नहीं था. उस समय सक्रिय और बाद में बनने वाले बहुत से क्रांतिकारियों ने असहयोग आंदोलन में हिस्सेदारी की. चौरी-चौरा की घटना के बाद गांधी ने आंदोलन वापस ले लिया और देश में निराशा का एक माहौल बना.

भारत की आज़ादी का संघर्ष कई मायनों में अनूठा माना जाता है. यह एक बड़ा देश है. विभाजन से पहले और भी बड़ा था. इतने बड़े और बहुलताधर्मी देश में आज़ादी के संघर्ष की कई धाराओं और विचारधाराओं का होना स्वाभाविक है. समाजवादी धारा उनमें से एक है. आज़ादी के संघर्ष के कई चरण भी रहे. किसी न किसी रूप में उपनिवेशवादी सत्ता का विरोध शुरू से होता रहा. 1857 का महासंग्राम उस विरोध की चेतना का एक बड़ा विस्फोट था. अगर वह संगठित और सतत रह पाता तो भारत का इतिहास कुछ और होता. हम आज़ादी के उस पहले बड़े संग्राम की कमियों की ज़्यादा चर्चा करते हैं. आधुनिकतावादियों ने उसे अंग्रेजों की अगड़ी चेतना के बरक्स सामंतों की पिछड़ी चेतना का विद्रोह बताकर शुक्र मनाया कि यह सही और अच्छा हुआ कि विद्रोही हार गए. आश्चर्य की बात यह है कि चौतरफा गद्दार सामंतों और नकली आधुनिकों से घिरे होने के बावजूद 1857 के विद्रोहियों ने इतनी सफलता पाई!

1857 के विद्रोह का दमन जिस सख्ती से अंग्रेजों ने किया, उसके बाद लंबे समय तक आज़ादी की बात करना तक बंद हो गया. महारानी विक्टोरिया का गुणगान करने के साथ ज़्यादा जोर नवजागरण की चेतना जगाने और प्रशासनिक सुधार पर होने लगा. 1885 में बनी कांग्रेस के प्रयासों से असंतुष्ट होकर उन्नीसवीं सदी के अंतिम वर्षों में क्रांतिकारी सक्रिय हो गए थे, जिनका लक्ष्य अंग्रेजों की गुलामी से सीधे आज़ादी था. शायद क्रांतिकारी जज़्बे की एक चिंगारी ने कांग्रेस में गर्म दल पैदा किया, जहां से आज़ादी के जन्म सिद्ध अधिकार होने का नारा निकला. अब तक यह तय हो गया था कि उपनिवेशवादी साम्राज्यवाद से आज़ादी हासिल करना कठिन और जटिल संघर्ष है. इसी पड़ाव पर गांधी का आगमन होता है. वह आज़ादी के संघर्ष को जनांदोलन बनाते हैं. जलियांवाला बाग नरसंहार के बाद एक तऱफ अंदर ही अंदर जनसामान्य में गुस्से की लहर दौड़ गई, दूसरी तऱफ बड़े-बड़े पदवीधारियों की आंखों से अंग्रेजी सुशासन की पट्टी उतर गई. गांधी ने हिंदू और मुस्लिम जनता को जोड़कर असहयोग आंदोलन की शुरुआत की. अंग्रेजों को इस कदर व्यापक जनउभार का अंदाज़ा नहीं था. उस समय सक्रिय और बाद में बनने वाले बहुत से क्रांतिकारियों ने असहयोग आंदोलन में हिस्सेदारी की. चौरी-चौरा की घटना के बाद गांधी ने आंदोलन वापस ले लिया और देश में निराशा का एक माहौल बना. यही वह समय है, जब समाजवादी विचारधारा की भारतीय राजनीति और आज़ादी के संघर्ष में सक्रिय भूमिका शुरू होती है. हालांकि उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध से मार्क्सवाद और समाजवाद संबंधी उल्लेख एवं लेख कतिपय पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगे थे. लाला हरदयाल ने कार्ल मार्क्स : ए मॉडर्न ॠषि शीर्षक से उनकी जीवनी लिखी, जिसका पहले मलयालम में अनुवाद हुआ. रूस के संघर्ष और 1917 में होने वाली बोल्शेविक क्रांति का भारत के समाजवादी-क्रांतिकारी सोच के लोगों पर गहरा प्रभाव पड़ा. रूस की क्रांति से लेनिन की ख्याति दुनिया के साथ भारत में भी फैली. एस ए डांगे ने 1921 में गांधी वर्सिस लेनिन पुस्तक लिखी. उसमें उन्होंने रूस की क्रांति के मूल सिद्धांतों को सामने रखा. अगले साल डांगे ने दि सोशलिस्ट नाम से साप्ताहिक पत्र निकाला. उस समय समाजवाद और रूस की क्रांति उनसे प्रभावित होने वाले लोगों के लिए एक आदर्श था. भगत सिंह और उनके साथियों ने मार्क्सवाद से प्रेरणा लेकर क्रांतिकारी आंदोलन में समाजवाद का लक्ष्य शामिल किया. हालांकि यह आंदोलन रूस या अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन के तहत संचालित नहीं हुआ.

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समाजवाद और रूसी क्रांति से प्रेरित होकर देश में कई कम्युनिस्ट और समाजवादी समूह सक्रिय हुए, जो मार्क्सवाद से प्रेरित थे. समाजवादियों और कम्युनिस्टों में अंतर था. कम्युनिस्ट अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन के निर्देशानुसार चलते थे. उन्होंने थर्ड इंटरनेशनल की छठी कांग्रेस की लाइन अपना रखी थी, जिसके अनुसार भारत के कम्युनिस्टों को निर्देश दिया गया था कि वे कांग्रेस, स्वराजियों और गांधीवादियों के चरित्र को जनता के सामने बेनकाब करें. समाजवादी अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन के दबाव से स्वतंत्र रहकर आज़ादी और समाजवाद का संघर्ष चलाने में विश्वास करते थे. 1925 में कानपुर में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना होती है, लेकिन अपनी कांग्रेस विरोधी नीतियों के चलते उसकी भूमिका एक छोटे से ग्रुप की बनकर रह जाती है और कांग्रेस साम्राज्यवाद विरोध की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में मज़बूत होती जाती है. दरअसल केवल सिद्धांत और अंतरराष्ट्रीयता के आधार पर किसी देश में न मुक्ति का संघर्ष खड़ा किया जा सकता है, न सर्वहारा की क्रांति को अंजाम दिया जा सकता है. ख़ुद कम्युनिस्टों को अपनी इस ग़लती का एहसास बार-बार होता है, लेकिन शुरुआत में ही पराश्रयी हो जाने के चलते स्वतंत्र रास्ता अपनाना हमेशा उनके बूते के बाहर रहा.

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मई, 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी (सीएसपी) का गठन हुआ. ऐसा कम्युनिस्ट पार्टी के वाम संकीर्णतावाद की प्रतिक्रिया के अलावा कांग्रेस को संविधानवाद की ओर जाने से रोकने के लिए भी हुआ. नेहरू ने कांग्रेस और देश की विचारधारा को प्रभावित करने के लिए कांसोपा के गठन का स्वागत किया. बाद में लोहिया ने स्वीकार किया कि पार्टी के गठन के समय गांधी के मुक़ाबले नेहरू को ज़्यादा समाजवादी मानना ग़लती थी. उन्होंने कहा कि समाजवाद अलग, नेहरू की आधुनिकता भी नकली थी और वह नकली आधुनिकता भी असली नहीं थी. यही बात भारत के कम्युनिस्टों के अंतरराष्ट्रीयतावाद के बारे में भी कही जा सकती है. गांधी ने सहानुभूतिपूर्ण आलोचना के साथ समाजवादियों की पार्टी के गठन का स्वागत किया. उन्होंने कहा, मैं कांग्रेस के भीतर सोशलिस्ट पार्टी के गठन का स्वागत करता हूं, लेकिन यह नहीं कह सकता कि पुस्तिका में छपे उसके कार्यक्रम को पसंद करता हूं. मुझे लगता है कि इसमें भारतीय स्थितियों की अनदेखी की गई है और मैं उसकी कई मान्यताओं को भी पसंद नहीं करता हूं, जिनमें यह निहित है कि वर्गों और आम जनता के बीच या मजदूर और पूंजीपति के बीच ऐसा टकराव होता है कि वे आपसी भलाई के लिए मिलकर काम कर ही नहीं सकते. मेरे लंबे समय का अनुभव इसके विपरीत है.

कांग्रेस ने समाजवादियों के वर्ग युद्ध के सिद्धांत और निजी संपत्ति ज़ब्त करने की कार्रवाई को ग़ैर ज़िम्मेदाराना प्रलाप और अहिंसा के विरुद्ध बताया. कम्युनिस्ट पार्टी ने भी कांसोपा का विरोध किया. हालांकि उसके विरोध का कारण अलग था. उसने इसे सोशल फासिस्ट पार्टी और बुर्जुआ की वाम पैंतरेबाज़ी कहा. इस तरह समाजवादियों को कांग्रेस और कम्युनिस्ट दोनों के विरोध के बीच काम करना पड़ा. जे पी और आचार्य नरेंद्र देव ने हालांकि कम्युनिस्टों और समाजवादियों के बीच मिलकर काम करने की रणनीति अपनाई, लेकिन दोनों को निराश होना पड़ा. कम्युनिस्ट-सोशलिस्ट टकराव का वह दौर जिसकी चरम परिणति भारत छोड़ो आंदोलन में हुई, भारत की वामपंथी राजनीति और समाजवादी विचारधारा के लिए नुक़सानदेह साबित हुआ. कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं के गिरफ़्तार हो जाने के बाद भारत छोड़ो आंदोलन में समाजवादी नेताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. पहली बार वे देश की जनता के साथ सीधे संपर्क में आए. लोहिया ने आंदोलन में जनता के स्वत: स्फूर्त उभार को समाजवादियों की भूमिका से ज़्यादा महत्व दिया. देश के विभाजन के ख़िला़फ भी समाजवादियों ने गांधी का साथ दिया. भारत छोड़ो आंदोलन में नेतृत्वकारी भूमिका निभाने और देश विभाजन के प्रस्ताव का विरोध करने के चलते समाजवादी उस समय के वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं की आंख में खटकने लगे थे. शायद यही कारण है कि आज़ादी के बाद समाजवादी कांग्रेस में नहीं रह पाए.

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देश आज़ाद होने पर समाजवादी नेताओं ने कांग्रेस से अलग होकर 1948 में सोशलिस्ट पार्टी का गठन किया. 1952 के पहले आम चुनाव तक उनका उफान जोरों पर रहा, लेकिन चुनाव में मिली पराजय के बाद उनमें निराशा का उदय होता है. हालांकि 10.2 प्रतिशत मत और 12 सीटें लेकर सोशलिस्ट पार्टी दूसरे नंबर पर थी. 1953 में लोहिया का ऐतिहासिक पचमढ़ी का भाषण होता है, लेकिन आंदोलन में बिखराव और टूटने-जुड़ने का दौर शुरू हो जाता है. लोहिया ने इसे समाजवादी आंदोलन का मोड़ युग कहा है. इस बीच जे पी सक्रिय राजनीति छोड़कर सर्वोदय में चले जाते हैं. 19 फरवरी, 1956 को आचार्य नरेंद्र देव का निधन हो जाता है. उससे पहले एक जनवरी, 1956 को लोहिया हैदराबाद में प्रसोपा से अलग अपनी सोशलिस्ट पार्टी का गठन कर लेते हैं. एक और लंबी अंतर्कलह से गुजरने के बाद संयुक्त सोशल्स्टि पार्टी (संसोपा) का गठन होता है. लोहिया की ग़ैर कांग्रेसवाद की रणनीति के तहत देश की सत्ता पर चला आ रहा कांग्रेसी वर्चस्व एकबारगी टूटता है. लोहिया ख़ुद भी 1963 के उपचुनाव में जीतकर संसद पहुंचते हैं और उसे बहस का जीवंत मंच बना देते हैं. ग़ैर कांग्रेसवादी भारतीय राजनीति की यह एक बड़ी उपलब्धि थी. हालांकि जल्दी ही लोहिया संविद सरकारों और उनके नेतृत्व से खिन्न हो गए थे. 1967 का संसदीय चुनाव भी लोहिया जीतते हैं, लेकिन 12 अक्टूबर, 1967 को उनका निधन हो जाता है.

आपातकाल के बाद 1977 में जे पी सोशलिस्ट पार्टी सहित कई राजनीतिक दलों के विलयन से जनता पार्टी बनाकर देश का लोकतंत्र तो बचा लेते हैं, लेकिन समाजवादी राजनीति और आंदोलन ख़त्म होते चले जाते हैं. हालांकि इस पूरे दौर में समाजवादी नेताओं-विचारकों, विशेषकर जे पी, आचार्य जी, लोहिया, मधु लिमये, किशन पटनायक एवं सच्चिदानंद सिन्हा ने अपने चिंतन से समाजवादी दर्शन को पर्याप्त समृद्धि प्रदान की. ऐसी आशा की जा सकती है, बल्कि आज़ादी पर आए नव साम्राज्यवादी गुलामी के संकट की स्थिति में यह अनिवार्य कर्तव्य है कि जिस आंदोलन के पास चिंतन और संघर्ष की इतनी समृद्ध विरासत है, वह जल्दी ही एक बार फिर सक्रिय और सार्थक भूमिका निभाए.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एवं समाजवादी चिंतक हैं)

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