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भीलों का उजड़ता जीवन
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भीलों का उजड़ता जीवन

आदिवासियों की हालत के बारे में सामाजिक कार्यकर्ता शंकर तलवड़ा बताते हैं कि हमारे सामाजिक ताने-बाने को छिन्न भिन्न कर दिया गया है. बाजार ने हमारी सामूहिकता को तोड़ दिया है. लालच ने एक-दूसरे को सहयोग करने की भावना को खत्म कर दिया. 

महाभारत के महाकाव्य में जब एक साधारण सा आदिवासी बालक एकलव्य धनुषविद्या में अर्जुन से आगे निकलता दिखा तो गुरु द्रोणाचार्य ने उससे गुरु दक्षिणा के रूप में उसका अंगूठा मांग लिया. वह बालक एक भील था. रामायण नामक महाकाव्य में जब रावण द्वारा अपहृत सीता जी को भगवान श्रीराम वन में ढ़ूढ़ रहे थे तब शबरी नाम की वृद्धा ने श्रीराम को अपने जूठे बेर खिलाए थे. शबरी एक भील थी. केवल यही नहीं भील नामक जनजाति का जिक्र इतिहास में और भी कई जगहों पर पाया जाता है. वह मेवाड़ में महाराणा प्रताप की सेना में थे. महाराष्ट्र में शिवाजी की सेना में थे. भीलों का इतना लंबा चौड़ा इतिहास होने का वर्तमान में भील आदिवासियों को कोई फायदा नहीं है.जब हम टीवी के रूपहले पर्दे पर भील आदिवासियों को रंग-बिरंगी पोशाकों में नाचते हुए देखते हैं, तो मोहित हो जाते हैं पर जब हम इनसे सीधा साक्षात्कार करते हैं, तो उनके कठिन जीवन की असलियत देख-सुनकर वह आकर्षण काफुर हो जाता है.ऐसा ही एहसास मुझे तब हुआ जब मैं उनसे मिला और उनके दुख-दर्द की कहानियां सुनीं. हाल ही में मुझे पश्‍चिमी मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल अलीराजपुर में रहने का मौका मिला.

इस दौरान एक भील युवक रेमू के साथ डेढ़ दर्जन गांवों में गया और ये सभी गांव अलीराजपुर जिले के थे. इनमें से कुछ हैं-खारकुआ, छोटा उण्डवा, तिति नानपुर, घोंगसा, उन्दरी, हिरापुर, फाटा इत्यादि.यहां के गांवों की आबादी घनी नहीं है, दूर-दूर घर बसे हुए हैं. पहाड़ियों की टेकरियों पर बने उनके घर कच्चे हैं और खपरैल वाले हैं. इन घरों को मिलाकर एक मोहल्ला बनता है. घास-फुस व लकड़ियों के घर में दीवारें कच्ची, लकड़ी की और कुछ कर्कंटा की बनी हैं. मुर्गा-मुर्गी, बकरी और मवेशी भी साथ-साथ रहते हैं. जमीन ऊंची-नीची ढ़लान वाली व पहाड़ी है, तो कहीं समतल मैदान वाली. पेड़ बहुत कम हैं. जब पेड़ नहीं हैं, तो पक्षी भी नहीं. वे पेड़ों पर घोंसला बनाकर रहते हैं या बैठते हैं. छींद और ताड़ी के छातानुमा बहुत सुंदर पेड़ दिखाई दिए. उन्हीं पेड़ों से ताड़ी निकाली जाती है. गर्मी में ठंडा के रूप में ताड़ी पी जाती है. खेतों में मूंग, उड़द, मूंगफली और बाजरा की फसल लहलहा रही थी, तो कुछ खेतों में कपास भी था. पानी की कमी है, कुछ किसानों ने बताया कि मूंगफली में जब पानी की कमी होती है, तो टेंकर से पानी मंगाते हैं. यह जानकारी नई थी. जब हम गांवों में पहुंचते तो चरवाहे हमें देखकर दौड़ लगा देते या पेड़ों के पीछे छिप जाते. जब हम उनसे किसी का पता-ठिकाना पूछते तो जवाब नहीं देते. फिर रेमू अपनी भाषा में पूछता तो बता देते. गांवों में अधिकांश बुजुर्ग लंगोटी में मिले और कुछ जगह हुक्का वाले भी दिखाई दिए. यहां खेती-किसानी पर ही लोगों की आजीविका निर्भर है, लेकिन खेती में ज्यादा लागत और कम उपज होती है. कर्ज बढ़ता जाता है. इसी कर्ज के दुष्चक्र में हमेशा के लिए फंस जाते हैं.
महिलाएं और पुरुष मिलकर खेती का काम करते हैं. वे खेतों में उड़द और मूंगफली की निंड़ाई करते हुए दिखे. इसके अलावा, महिलाओं पर घर के काम की पूरी जिम्मेदारी होती है. भोजन पकाना, पानी लाना, ईंधन लाना, साफ-सफाई करना, गाय-बैल, बकरी चराना इत्यादि. बच्चों को संभालने का काम तो रहता ही है. आदिवासियों की जिंदगी उधार के पैसे से चलती है, इसके लिए वे साहूकार व महाजनों से कर्ज लेते हैं, लेकिन अक्सर गरीबी और तंगी के कारण समय पर अदा नहीं कर पाते. इसलिए जो वस्तु गिरवी रखते हैं, उसे वापस नहीं ले पाते. बारिश नहीं हुई तो फसल भी नहीं. मजबूर होकर लोग काम की तलाश में गुजरात चले जाते हैं. भोपाल और दिल्ली भी जाते हैं जो खेती और निर्माण कार्य में मजदूरी करते हैं, उन्हें न उचित मजदूरी मिलती है, न वहां जीने के लिए बुनियादी सुविधाएं. पलायन करने वालों में युवा, स्त्री-पुरुष सभी हैं. ज्यादातर परिवारों में घर के छोटे खाने-कमाने जाते हैं और बड़े-बूढ़े घर की जिम्मेदारी संभालते हैं.
पहले यहां बहुत अच्छा जंगल हुआ करता था, वह बड़ा सहारा थे. जंगल से उनका मां-बेटे जैसा संबंध था. वे इससे उतना ही लेते थे जितनी उनको जरूरत होती थी, लेकिन जंगल अब साफ हो चुका है. यहां के पहाड़ नंगे हो गए हैं, जैसे आदमी के सिर पर उस्तरा फेर दिया गया हो और वह गंजा हो गया हो. आदिवासियों की हालत के बारे में सामाजिक कार्यकर्ता शंकर तलवड़ा बताते हैं कि हमारे सामाजिक ताने-बाने को छिन्न भिन्न कर दिया गया है. बाजार ने हमारी सामूहिकता को तोड़ दिया है. लालच ने एक-दूसरे को सहयोग करने की भावना को खत्म कर दिया.
वे बताते हैं कि फसल चक्र के बदलाव ने हमारे देसी अनाजों को खत्म कर दिया. अब आदिवासी पूरी तरह बाजार के हवाले हो गया, जहां उसे शोषण का शिकार होना पड़ रहा है. वहीं जीने के लिए इसे बुनियादी सुविधाएं और रोजगार भी नहीं मिल पा रहा है.
कहने को तो आदिवासियों के हितों की रक्षा के लिए आदिवासी मामलों का मंत्रालय मौजूद है. उनके लिए कई योजनाएं और आयोग बने. रिपोर्टें भी आईं, कानून भी बने, लेकिन आदिवासियों का जीवन कठिन से कठिनतम होता जा रहा है. सवाल उनकी अस्मिता और संस्कृति का है. खेती-किसानी का है. शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति कैसे अच्छी होगी, यह सवाल है. बेहतर भविष्य का सवाल है.

1 comment

  • Good bhai

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