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ठोस पहल से सार्थक परिणाम

ग्यारहवें विश्व हिंदी सम्मेलन के मॉरीशस आयोजन को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं. इसका आयोजन संभवतः इस वर्ष अगस्त में किया जाएगा. विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की अगुवाई में इस आयोजन को अंजाम दिया जाएगा. सुषमा जी का हिंदी प्रेम जगजाहिर है. हिंदी के वरिष्ठ लेखक नरेन्द्र कोहली ने कई बार सुषमा जी के हिंदी प्रेम को रेखांकित किया है.

उनके मुताबिक वे विदेश मंत्री के साथ कई बैठकों में शामिल रहे हैं और हिंदी से संबंधित किसी विषय पर अगर उनके सामने अंग्रेजी में प्रस्ताव या कार्ययोजना आदि आ जाता है तो वो बुरी तरह से नाराज हो जाती हैं. डॉ. कोहली के मुताबिक सुषमा जी हिंदी को लेकर इतनी प्रतिबद्ध प्रतीत होती हैं कि अगर बैठक हिंदी या भाषा से संबंधित है तो वेे उस बैठक को तबतक आगे नहीं बढ़ाती हैं जबतक कि उनके सामने सारे दस्तावेज हिंदी में नहीं रखे जाएं. सुषमा जी ने हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने को लोकर भी रुचि दिखाई थी.

भोपाल में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन में गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भी कहा था कि सरकार कोशिश करेगी. इस दिशा में कोई ठोस प्रगति हो पाई है या नहीं, ये तो अभी ज्ञात नहीं हो पाया है, लेकिन गाहे बगाहे बयानों से हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने को लेकर पक्ष विपक्ष में चर्चा हो जाती है. अब जबकि विश्व हिंदी सम्मेलन की आहट सुनाई दे रही है तो एक बार फिर से हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने को लेकर बातें होंगी. होगा क्या इसका अंदाज लगाना कठिन है, क्योंकि विश्व हिंदी सम्मेलन के आयोजनों में कई बार इस आशय का प्रस्ताव गाजे बाजे के साथ पास होता रहा है. मैं जोहानिसबर्ग में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलन में शामिल हुआ था.

वहां कई अहम प्रस्ताव पारित हुए थे. सबसे अहम और पहला प्रस्ताव तो हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने को लेकर ही हुआ था. विगत में आयोजित विश्व हिंदी सम्मेलनों में पारित प्रस्ताव को रेखांकित करते हुए हिंदी को संयुक्त राष्ट्रकी आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता प्रदान किए जाने के लिए समयबद्ध कार्रवाई सुनिश्चित करने पर बल दिया गया था. पहले भी आयोजित दो विश्व हिंदी सम्मेलनों में इस तरह का प्रस्ताव पारित किया जा चुका है, लेकिन उसका अबतक कोई नतीजा सामने नहीं आया था. जो दूसरा अहम प्रस्ताव पारित हुआ था, वो यह था कि दो हिंदी सम्मेलनों के आयोजन के बीच यथासंभव अधिकतम तीन वर्ष का अंतराल हो. अबतक यह व्यस्था थी कि विश्व हिंदी सम्मेलनों के आयोजन के बीच कोई भी अंतराल नियत नहीं था. सरकारों की इच्छा और अफसरों की मर्जी पर विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन होता रहा है.

अब अगर भारत सरकार ने ये इच्छा शक्ति दिखाई है कि वो अधिकतम तीन वर्षों के अंतराल पर विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन करेगी तो ये संतोष की बात है. अगर यह मुमकिन हो पाता है तो इससे हिंदी का काफी भला होगा. चाहे वे सम्मेलन भारत में आयोजित हों या फिर विदेश में. हिंदी को लेकर वैश्विक स्तर पर एक चिंता और उससे निबटने के उपायों पर विमर्श की नियमित शुरुआत तो होगी. हिंदी को लेकर सरकारों की नीतियां भी साफ तौर पर सामने आ पाएंगी.

इस वर्ष जब मॉरीशस में विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन हो रहा है तो ऐसे में मन में एक सवाल और उठता है. वह है मॉरीशस में स्थापित विश्व हिंदी सचिवालय के कामकाज के बारे में. 1975 में जब नागपुर में विश्व हिंदी सम्मेलन का आयोजन हुआ था तब मॉरीशस के तत्कालीन प्रधानमंत्री व प्रतिनिधिमंडल के अध्यक्ष सर शिवसागर रामगुलाम ने एक विश्व हिंदी केंद्र की स्थापना का विचार पेश किया था. विश्व हिंदी सचिवालय की बेवसाइट पर मौजूद जानकारी के मुताबिक इस विचार ने दृढ़ संकल्प का रूप धारण किया मॉरीशस में आयोजित द्वितीय विश्व हिंदी सम्मेलन में और लगातार कई विश्व हिंदी सम्मेलनों में मंथन के बाद मॉरीशस में विश्व हिंदी सचिवालय की स्थापना का विचार साकार हुआ.

12 नवंबर, 2002 को मॉरीशस सरकार द्वारा विश्व हिंदी सचिवालय की स्थापना व प्रबंधन से संबंधित अधिनियम पारित किया गया. हिंदी का अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में प्रचार तथा हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनाने के लिए मंच तैयार करने के उद्देश्य से सचिवालय की स्थापना हुई. 21 नवंबर, 2003 को नई दिल्ली में मॉरीशस सरकार तथा भारत सरकार के बीच विश्व हिंदी सचिवालय के गठन व कार्य पद्धतियों से संबंधित एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए. 11 फरवरी, 2008 को विश्व हिंदी सचिवालय ने आधिकारिक रूप से कार्यारंभ किया.

यहां तक तो ठीक है, लेकिन अब सवाल उठता है कि इतने लंबे समय तक मंथन के बाद 2008 में जब औपचारिक रूप से इस संस्था ने काम शुरू किया तो दस साल का हासिल क्या है? इस दस साल के हासिल के बारे में बात करते हैं तो हमें बहुत कुछ दिखाई नहीं देता है. इस संस्था को लेकर बहुत उत्साह भारत सरकार में कभी नहीं रहा. इसकी बैठकें तक नियमित नहीं होती हैं. यह जिस उद्देश्य से स्थापित किया गया था, उसतक पहुंचने के लिए इस संस्था ने क्या कदम उठाए हैं ये जानने का अधिकार भारत की जनता को है, क्योंकि उनकी गाढ़ी कमाई का पैसा इस संस्था में लगता है.

इस संस्था की बेवसाइट पर उपलब्ध जानकारी बहुत निराशाजनक है. अगर आप गतिविधियां और आयोजन खंड में जाकर झांकते हैं तो वहां जो पहली गतिविधि दिखाई देती है वह है मॉरीशल में विश्व हिंदी दिवस, दूसरा है कार्यारंभ दिवस, अंतरराष्ट्रीय क्षेत्रीय सम्मेलन, आईसीटी कार्यशालाएं और सचिवालय के प्रकाशन. अगर सचिवालय के प्रकाशन खंड को देखते हैं तो तीन पत्रिका का नाम दिखाई देता है वह है विश्व हिंदी पत्रिका, विश्व हिंदी समाचार और अंतरक्षेत्रीय सम्मेलन स्मारिका. दरअसल हिंदी के नाम पर ज्यादातर संस्थाएं ऐसी हैं जहां इन भाषाओं को लेकर बहुत खास होता दिखता नहीं है.

भाषा के लिए ठोस काम की बजाए ऐसी संस्थाओं में आयोजन ज्यादा होते हैं. लगभग सभी सरकारी संस्थाओं में बैठे आकाओं को ये लगता है कि आयोजन करवाने से संस्था सक्रिय नजर आती है. आती भी है, क्योंकि इसमें जो लोग शामिल होते हैं, वे उस आयोजन के बारे में बातें करते हैं. सोशल मीडिया पर अपनी भागीदारी को प्रचारित करते हैं तो प्रकारांतर से उस संस्था का प्रचार होता है और जनता के बीच उसके सक्रिय होने का संदेश जाता है. जबकि ऐसी संस्थाओं से ये उम्मीद की जाती है कि वो भाषा को लेकर कोई ठोस काम करेंगे.

अंग्रेजी में हर साल शब्दकोश का प्रकाशन होता है, उसको अपडेट किया जाता है, उसमें शब्द जोड़े जाते हैं लेकिन हिंदी में ऐसा नहीं हो पाता है. शब्दों को जोड़े जाने का काम तो छोड़ ही दें, हर साल शब्दकोश के प्रकाशन की भी व्यवस्था नहीं है. सालों से कोई नया शब्दकोश नहीं निकला है, जबकि इन संस्थाओं से अपेक्षा की जाती है कि वो कम से कम शब्दकोश तो प्रकाशित करें. इन संस्थाओं का करोड़ों का बजट होता है जिसमें से एक बड़ा हिस्सा आयोजनों पर खर्च होता है. प्रकाशन उनकी प्राथमिकता में नहीं है. किशोरीदास वाजपेयी ने हिंदी शब्दानुशासन जैसी किताब लिखी थी जो अब लगभग अनुपलब्ध है. उसके पुनर्प्रकाशन के लिए काम होना चाहिए. ये तो सिर्फ एक उदाहरण है, ऐसे सैकड़ों महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं जो अब लगभग अनुपलब्ध हैं.

संस्कृति मंत्रालय के कितने उपक्रम हैं, जिसके अंतर्गत इस तरह के काम हो सकते हैं, लेकिन सवाल यही कि उसको लेकर एक पहल तो करनी होगी. नौकरशाहों से हम ये अपेक्षा नहीं कर सकते, पर मंत्री से, जनता के नुमाइंदे से यह अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि वो आयोजनधर्मिता पर ठोस काम को तरजीह देने की दिशा दिखाएं. केंद्र सरकार को भी राज्य सरकारों के साथ मिलकर इस दिशा में ठोस कदम उठाने की जरूरत है. अबतक भाषा और संस्कृति सरकारों की प्राथमिकता में नहीं रही है, इसका भी बहुत नुकसान हुआ है.

अब वक्त आ गया है कि अगर हमको अपने देश को मजबूत करना है तो शिक्षा, संस्कृति, भाषा को मजबूत करने पर जोर देना होगा, क्योंकि ये तीन विषय राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने में अपनी अहम भूमिका निभा सकते हैं. इसके अलावा हिंदी समाज को भी जाग्रत होकर सरकार पर दबाव बनाना होगा कि वो इन विषयों को अपनी प्राथमिकता में शामिल करे. विश्व हिंदी सम्मेलन जैसे आयोजनों और विश्व हिंदी सचिवालय जैसी संस्थाओं की सार्थकता तभी होगी जब कि कुछ ठोस हो सकेगा, वर्ना ये सिर्फ घूमने फिरने का उपक्रम भर बनकर रह जाएगा.

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