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पुस्‍तक अंशः मुन्‍नी मोबाइल- 41
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पुस्‍तक अंशः मुन्‍नी मोबाइल- 41

मुन्नी तैयार होकर इटाड़ी बाज़ार पहुंच गई. यहीं उसका बैंक है. बैंक में जब उसने बीस हज़ार रुपये निकालने के लिए फॉर्म भरा तो मैनेजर ने इतने पैसे एक साथ देने से मना कर दिया. वह मैनेजर पर झुंझलाई, लेकिन बात नहीं बनी. मैनेजर ने साफ कहा, किसी की गारंटी लाओ, तभी इतने पैसे मिलेंगे. मुन्नी को उसी दिन वापस साहिबाबाद लौटना था. वह परेशान हो उठी. बैंक से बाहर निकल कर वह बाज़ार में अपने परिचित को खोजने लगी. तभी उसे अपने चाचा का लड़का मोटरसाइकिल पर जाते दिखा. उसने उसे आवाज़ देकर बुलाया, नेपाली. नेपाली की नाक नेपालियों की तरह थी, इसलिए उसका नाम नेपाली पड़ गया था. नेपाली ने पलट कर देखा और मोटरसाइकिल रोक दी. नज़दीक आकर बोला,  दीदी कब आईं?

उसने नेपाली की बात का जवाब नहीं दिया. सीधे अपने काम पर आ गई. सारी बात बताई. इत्ते़फाक़ से नेपाली का खाता भी उसी बैंक में था. उसने मुन्नी को मोटरसाइकिल पर बैठाया और बैंक पहुंच गया. मैनेजर को तसल्ली हो गई और उसने मुन्नी को बीस हज़ार रुपये दे दिए. मुन्नी के चेहरे पर एक खास तरह का संतोष उभर आया था. उसने जंग फतह कर ली थी. उसे ज़मीन अपनी होती दिख रही थी. सपनों में वह उसके ऊपर घर भी बना चुकी थी. ख़ुशी-ख़ुशी वह बाज़ार में अपने भाई के साथ होटल में आ गई. उसे भूख लग रही थी. लिट्टी-चोखा उसने मंगाया. घर-परिवार की बात करते हुए मुन्नी ने नेपाली से उसके छोटे भाई अखिलेश के बारे में पूछा. उसने कोई जवाब नहीं दिया. मुन्नी ने फिर कुरेदा. इस पर उसने बताया कि वह नक्सल पार्टी में शामिल हो गया है.

नक्सल पार्टी! मुन्नी ने अचंभित होते हुए पूछा, यह क्या होता है?

अरे लाल झंडा, नेपाली विस्तार से बताता है, ज़मीदारों और बड़े बाबू साहबों से मुक़ाबला करने के लिए लोगों ने पार्टी बनाई है. बाबू साहब लोग जब ज़ुल्म करते हैं तो ये लाल झंडा वाले वहां हमला कर लोगों को मार देते हैं. उनके पास गोला-बारूद सब है.

नेपाली की बात सुनकर मुन्नी को कुछ समझ नहीं आता है. वह कहती है, अखिलेश पर कौन ज़ुल्म हो गया, जो उसने लाल झंडा थाम लिया.

मुन्नी को कुछ समझ नहीं आ रहा था. वह वापस जाने की धुन में थी. ट्रेन रात को थी. वह घर की ओर चल पड़ी. रास्ते में वह लाल झंडा पार्टी के बारे में सोचती रही, लेकिन उसके पल्ले कुछ नहीं पड़ रहा था. वैसे बक्सर में नक्सलियों का उतना प्रभाव नहीं था, जितना पश्चिम बिहार के आरा, छपरा, सिवान, गोपालगंज, भभुआ में था. आरा नक्सली गतिविधियों का बड़ा केंद्र था. लाल सेना हथियारों से लैस थी. लाल सेना में अधिकतर पिछड़ी जाति के लोग थे, जो सामंतों और रंगदारों से प्रताड़ित थे. लाल सेना ने इलाक़े में बड़े-बड़े नरसंहार किए थे. बड़ी संख्या में भूमिहार, ठाकुर और ऊंची जाति के लोग मारे गए थे. नतीजतन लाल सेना की प्रतिक्रिया में आठवें दशक में जातिगत सेनाएं तैयार हुईं. लाल सेना से टक्कर लेने के लिए कुंवर सेना, लोरिक सेना, ब्रह्मर्षि सेना, रणवीर सेना. इन सेनाओं ने भी दलितों और हरिजनों का सामूहिक नरसंहार शुरू किया. नक्सली आंदोलन इस इलाक़े में जातीय रूप ले चुका था. वैचारिकता उसकी ख़त्म हो चुकी थी. इसीलिए आंदोलन को बिख़रने में ज़्यादा व़क्त नहीं लगा. छिटपुट तरीक़े से नक्सली अभी इस इलाक़े में हैं. भगत सिंह बनने की चाह में अब भी कुछ युवक नक्सलियों के साथ हो जाते हैं.

अगले अंक में जारी…

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