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साधु-संतों के अखाड़े ही कुंभ स्नान के आकर्षण
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साधु-संतों के अखाड़े ही कुंभ स्नान के आकर्षण

महाकुंभ का एक अनिवार्य हिस्सा हैं साधु-संतों की जमातें, उनके पारंपरिक अखाड़े और ऐन कुंभ के दिन इन अखाड़ों का शाही स्नान. अखाड़ा शब्द सामने आते ही सहज रूप से यह प्रश्न मन-मस्तिष्क में कुलबुलाने लगता है कि क्या होते हैं अखाड़े? जीवन जगत से विरक्त साधु-संतों का अखाड़ों, कुश्तियों, युद्धों और शस्त्रों आदि से क्या लेना-देना है? यह जानना रोचक है कि अपनी धर्मध्वजा ऊंची रखने और विधर्मियों से अपने धर्म, धर्मस्थलों, धर्मग्रंथों, धर्मपुरुषों और धार्मिक परंपराओं की रक्षा के लिए किसी ज़माने में संतों की सेना ही काम आती थी. नागा संन्यासियों का इतिहास लिखने वाले सर जदुनाथ सरकार ने अपनी पुस्तकों में ऐसे बीसियों उदाहरण प्रस्तुत किए हैं, जब नागा संन्यासियों की वीरता, कूटनीति और समर्पण ने धर्म रक्षा हेतु अद्भुत सैन्य कौशल प्रदर्शित किया.

हिंदू अपनी पारंपरिक जीवनशैली के अंतर्गत वर्ण और आश्रम व्यवस्था में विश्वास रखते आए हैं. कार्य विभाजन पर आधारित चार वर्णों और आयु विभाजन पर आधारित चार आश्रमों की व्यवस्था को धर्म का संबल देकर पुष्ट करने की कोशिश की गई. इस वर्णाश्रम व्यवस्था को जीवन की पूर्णता के लिए ही धर्मादेश के रूप में स्वीकार करने का आग्रह किया गया. आश्रम व्यवस्था के अंतर्गत मनुष्य जीवन को आदर्श रूप में एक सौ वर्षों का मानते हुए हमारे समाज चिंतक मनीषियों ने पच्चीस-पच्चीस बरस के चार आयु खंडों को क्रमश: ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास नाम देकर व्यक्ति को जीवन जीने का मानों सलीका दिया. पहला आयुखंड ब्रह्मचर्य आश्रम शिक्षा प्राप्त करके व्यक्तिगत रूप से जीवन समर के लिए सुयोग्य और सन्नद्ध होने की तैयारी का काल है. दूसरा आयुखंड यानी गृहस्थ आश्रम घर बसाकर जीवनयापन करने और अपनी संतति को सुयोग्य बनाकर परिवार के प्रति दायित्वों के निर्वाह का अवसर है. तीसरा यानी वानप्रस्थ आश्रम का काल भोग-विलास से निवृत्ति पाकर अपने अर्जित को समाजसेवा के लिए वितरित करने का मौक़ा है. अंतिम यानी संन्यास आश्रम संपूर्ण मानव जाति की कल्याण कामना के साथ चिंतन-मनन और उसे दिशा-दर्शन देने का ऐसा कालखंड है, जो तप-साधना के माध्यम से स्वयं अपने मोक्ष प्राप्ति के मार्ग को सरल और सहज बनाने का अवसर प्रदान करता है.

बौद्धकाल तक आते-आते हिंदुओं की सामाजिक-धार्मिक मान्यताओं में अनेक बदलाव और कमियां आ गई थीं, जिन्हें आदि शंकराचार्य के आविर्भाव एवं उनके दिशानिर्देशों के बाद फिर से नई व्यवस्था और नया स्वरूप प्राप्त हुआ. बौद्धों द्वारा स्थापित-संचालित भिक्षुक पद्धति के चलते पारंपरिक सनातन धर्म के स्वरूप और व्यवस्था में का़फी गड़बड़ियां घर कर गई थीं. इसी के चलते आदि शंकराचार्य ने चौथे यानी संन्यास आश्रम को व्यवस्थित करने पर विशेष ध्यान दिया और उनके बीच दशनामी परंपरा का सूत्रपात किया. संन्यासियों के ये दशनाम थे गिरी, पुरी, भारती, सरस्वती, वन, अरण्य, पर्वत, सागर, तीर्थ और आश्रम. इन्हीं दशनामों  द्वारा उन्होंने हिंदुओं के संत समाज को संगठन की नई दिशा भी दी. यहां यह भी उल्लेखनीय है कि ये सारे दशनामी शैव हैं और शिवोपासक कहलाते हैं! इन्हीं साधु-संन्यासियों को दो दिशाओं में प्रशिक्षित करके आदिशंकर ने धर्म रक्षा और समाजसेवा के लिए दिशा-प्रेरणा दी. इनमें एक दिशा अगर शस्त्र की थी तो दूसरी थी शास्त्र की. साधुओं की अधिसंख्या को शस्त्र प्रवीण करके उनसे यह अपेक्षा की गई कि वे आक्रांताओं और विधर्मियों से देश, धर्म एवं समाज की रक्षा करें. योद्धा नागा संन्यासियों ने इस अपेक्षा को समय-समय पर पूरा भी किया. सर जदुनाथ सरकार ने लिखा है कि शंकर के अनुयायी दशनामी संन्यासियों की यह दोहरी परंपरा स्थिर रचना और सामरिक रचना के रूप में विकसित हुई. पहली यानी स्थिर रचना के अंतर्गत क्रमश: मठ, मढ़ी, पद एवं आम्नाय को संगठन का आधार बनाया गया और इससे संबद्ध संन्यासियों ने समाज को शास्त्र ज्ञान कराने की ज़िम्मेदारी ली तथा अध्यात्म चिंतन के माध्यम से जीव, जगत, ब्रह्म, प्रकृति और माया आदि के संदर्भ में शंकर के अद्वैत मत का प्रचार-प्रसार किया. दूसरी यानी सामरिक रचना का सांगठनिक आधार बनीं क्रमश: धूनी, मढ़ी, दावा और अखाड़ा नामक इकाइयां. इनके अंतर्गत नागा-संन्यासियों ने वस्त्रों तक का मोह त्याग कर देश, धर्म और समाज की रक्षा के लिए शस्त्रधारी होने का संकल्प भी लिया. शंकराचार्य ने चार दिशाओं में जो चार मठाम्नाय स्थापित कर दिए थे, इन्हीं आम्नायां के साथ दशनामी परंपरा के संन्यासियों को जोड़ दिया गया. वन और अरण्य नामधारी संन्यासी जगन्नाथपुरी स्थित गोवर्धन पीठ के साथ जुड़े तो तीर्थ एवं आश्रम नामधारियों को द्वारिका स्थित शारदापीठ के साथ जोड़ा गया. उत्तर की ज्योर्तिपीठ के साथ गिरी, पर्वत और सागर नामधारी संन्यासियों को रखा गया. शेष तीन यानी पुरी, भारती और सरस्वती नामधारी संन्यासियों को श्रृंगेरी मठ के साथ जोड़ दिया गया.

कालांतर में यानी शंकराचार्य के आविर्भाव काल सन्‌ 788 से 820 के उत्तरार्द्ध में देश के चार कोनों में चार शंकर मठों की स्थापना के क़रीब 200 वर्षों बाद दशनामियों द्वारा मठिकाओं की स्थापना हुई, जिन्हें बाद में मढ़ी कहा गया. संख्या में बावन इन मढ़ियों में 27 मढ़ियां गिरियों की, 16 मढ़ियां पुरियों की, 4 मढ़ियां भारतीयों की, 4 मढ़ियां वनों की और एक मढ़ी लामाओं की कहलाती है. पर्वत, सागर और सरस्वती पदधारियों की कोई मढ़ी नहीं है. तभी से बावन मढ़ियों के अंतर्गत यह सारी संन्यास परंपरा समाजसेवा के लिए सक्रिय है. बाद में इनमें भी दंडी और गोसाई यह दो भेद हुए. तीर्थ, आश्रम, सरस्वती और भारती नामधारी संन्यासी दंडी कहलाए और शेष गोसाइयों में गिने गए. बाद में इन्हीं दशनामी संन्यासियों के अनेक अखाड़े प्रसिद्ध हुए, जिनमें सात पंचायती अखाड़े आज भी अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत समाज में कार्यरत हैं. अखाड़ों की स्थापना के क्रम की बात करें तो श्रीमहंत लालपुरी ने इस व्यवस्था पर अपनी पुस्तक में जो उल्लेख किया है, उसके अनुसार सन्‌ 660 में सर्वप्रथम आवाहन अखाड़ा, सन्‌ 760 में अटल अखाड़ा, सन्‌ 862 में महानिर्वाणी अखाड़ा, सन्‌ 969 में आनंद अखाड़ा, सन्‌ 1017 में निरंजनी अखाड़ा और अंत में सन्‌ 1259 में जूना अखाड़े की स्थापना का उल्लेख मिलता है. लेकिन, ये सारे उल्लेख शंकराचार्य के जन्म को 2054 में मानते हैं. जो उनका जन्मकाल 788 ईसवी मानते हैं, उनके अनुसार अखाड़ों की स्थापना का क्रम चौदहवीं शताब्दी से प्रारंभ होता है. यही मान्यता उचित भी लगती है.

टाज के प्रसिद्ध सात शैव अखाड़ों में हरिद्वार में कुंभ स्नान के क्रम से इन अखाड़ों में श्रीपंचायती तपोनिधि निरंजनी अखाड़ा, श्रीपंचायती आनंद अखाड़ा, श्रीपंचायती दशनाम जूना अखाड़ा, श्रीपंचायती आवाहन अखाड़ा, श्रीपंचायती अग्नि अखाड़ा, श्रीपंचायती महानिर्वाणी अखाड़ा और श्रीपंचायती अटल अखाड़ा प्रसिद्ध हैं. बाद में भक्तिकाल में इन शैव दशनामी संन्यासियों की तरह रामभक्त वैष्णव साधुओं के भी संगठन बने, जिन्हें उन्होंने अणी नाम दिया. अणी का अर्थ होता है सेना. यानी शैव साधुओं की ही तरह इन वैष्णव बैरागी साधुओं के भी धर्म रक्षा के संदर्भ उद्देश्य और साधन प्राय: समान ही थे. अभी बैरागियों के प्रमुख तीन अखाड़े हैं. इनमें श्री दिगंबर अखाड़ा, श्री निर्वाणी अखाड़ा और श्री निर्मोही अखाड़ा प्रमुख हैं. इनके अंतर्गत अनेक इकाइयां और भी हैं. संन्यासियों और बैरागियों के लिए कुंभ के स्नान को लेकर हमेशा द्वंद्व रहा है. हालांकि इनके आराध्यों यानी शिव और राम के बीच कोई मतभेद नहीं तो भी यह दोनों संप्रदाय एक-दूसरे से अधिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए संघर्षरत रहते आए हैं. इन संघर्षों के अनेक उदाहरण हैं, पर आजकल सभी अखाड़ों की एक संयुक्त परिषद बन जाने से संन्यासियों और बैरागियों के संघर्ष लगभग समाप्त हो गए हैं. साधुओं की अखाड़ा परंपरा के बाद में गुरु नानकदेव के सुपुत्र श्री श्रीचंद्र द्वारा स्थापित उदासीन संप्रदाय भी चला, जिसके आज दो अखाड़े कार्यरत हैं. एक श्री पंचायती अखाड़ा बड़ा उदासीन और दूसरा श्री पंचायती अखाड़ा नया उदासीन. इसी तरह पिछली शताब्दी में सिख साधुओं के एक नए संप्रदाय निर्मल संप्रदाय और उसके अधीन श्री पंचायती निर्मल अखाड़ा का भी उदय हुआ. इस तरह कुल मिलाकर आज तेरह विभिन्न अखाड़े समाज और धर्म सेवा के क्षेत्र में कार्यरत हैं. इन सभी अखाड़ों का संचालन लोकतांत्रिक तरीक़े से कुंभ महापर्व के अवसरों पर चुनावों के माध्यम से चुने गए पंच और सचिवगण करते हैं.

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